आई आई टी में भी सितम्बर माह में हिंदी सप्ताह मनाया जाता है और उसमें विभिन्न प्रतियोगिताएं भी हुआ करती हैं. मैंने उसमें कभी भाग नहीं लिया जब कि मेरी सहेलियां जो यहाँ पर मेरे साथ थी कई बार कहा. एक बार तो वह पीछे ही पड़ गयी और उसने २००५ में मेरी डायरी से कविता निकाल कर हिंदी प्रकोष्ठ में भेज दी. वहाँ से मेल आ गयी कि आपको इस लेक्चर हाल में पहुंचना है.
दरअसल बात यह है कि मैं इतने लम्बे समय से हूँ यहाँ लेकिन पूरी आई आई टी के परिसर से मेरा सरोकार कभी नहीं रहा. मैं आकर अपने कमरे में और बस जाते समय ही निकलती हूँ.
एक लड़के ने मुझे उस लेक्चर हाल तक पहुँचाया. और यहाँ पर मैंने पहली बार अपने लेखन की प्रस्तुति की. मेरी कविता थी -' पूजिता या तिरस्कृता '
सीता पूजिता
क्यों?
मौन, नीरव, ओठों को सिये
सजल नयनों से
चुपचाप जीती रही।
दुर्गा
शत्रुनाशिनी
क्रोधित, सबला
संहारिणी स्वरूपा
कब सराही गई
नारी हो तो सीता सी
बनी जब दुर्गा
चर्चा का विषय बनी
समाज पचा नहीं पाया
उंगली उठी और उठती रही।
सीता कब चर्चित हुई
प्रशंसनीय , सहनशील
घुट-घुट कर जीने वाली
जब खत्म हो गई,
बेचारी के विशेषण से विभूषित हो
अपना इतिहास दफन कर गई।
समाज पुरूष रचित औ'
नारी जीवन उसकी इच्छा के अधीन,
स्वयं नारी भी
सीता औ' दुर्गा के स्वरूप को
पहचान कर भी
अनजान बनी जीती रहती है
पुरूष छत्रछाया में मंद मंद विष पीती रहती है।
इस कविता को पहला पुरस्कार मिला. पुरस्कार में पहली बार पुस्तकों को देने का निर्णय लिया गया था और पुरस्कार में मुझे हरिवंश राय बच्चन की 'मधुशाला 'और कमलेश्वर की 'कितने पाकिस्तान ' मिली थी.
फिर हमारे जजों में से एक ने मेरे से पूछा की आप यहाँ कब से है? मैंने बताया की १८ साल से तो बड़े आश्चर्य से कहा - 'आपको पहले देखा नहीं कभी?' वाकई नहीं देखा होगा क्योंकि मेरी परिधि मेरे अपने कमरे से अधिक कहीं नहीं होती है.
दूसरे दिन मेरे साथ काम करने वाले लोगों ने बताया की कल तो बसों में आपकी ही चर्चा हो रही थी कि क्या कविता पढी? इस तरह से मुझे आई आई टी में पहली बार पहचान मिली और इसका श्रेय मैं अपनी सहकर्मी या कहिये आत्मीय नीलम त्रिपाठी को ही देती हूँ. मुझे दूसरे वर्ष भी कविता पाठ में पुरस्कार मिला . लेकिन उसके बाद मैंने भाग लेना बंद कर दिया क्योंकि एक दिन मैंने बस स्टॉप पर सुना कि जब तक ये रहेंगी कविता का पुरस्कार नहीं मिलने वाला. हो सकता है कि मुझे सुना कर रही हों वे, लेकिन मैंने फिर जाना बंद कर दिया.
यहाँ पर रह कर मेरा परिचय नेट से तो पूरा पूरा था. लेकिन अन्य विधाओं से मेरा कोई परिचय नहीं था. यही पर मेरे साथ काम कर रही एक इंजीनियर ने मेरा ऑरकुट पर खाता खोल दिया तो मेरा दायरा और बढ़ गया.
आरम्भ में जब मैंने अपने लेखन से मिले भाइयों का जिक्र किया था तो उनमें से एक था बिहार से 'अजय' . वह उस समय शायद हाई स्कूल में रहा होगा और मैं बी ए में थी. कई साल पत्राचार के बाद बंद हो गया लेकिन मुझे ये नहीं याद कि मैं किसको क्या दिशा निर्देश दिया करती थी. ये तो है कि मैं काउंसलर पैदाइशी थी. नेट करने पर कई बार उसका नाम देखने को मिला वह अब पत्रकारिता के क्षेत्र में आ चुका था. और नामी गिरामी पत्रकार भी है. लेकिन उससे संपर्क का कोई साधन नहीं था. फिर सोचा हो सकता है कि भूल भी गया हो, सब मुझ जैसे नहीं होते. एक दिन उसके लेख के साथ उसका ईमेल आई डी भी मुझे मिला. कई हफ्तों तक सोचती रही कि इसको एक मेल डालूँ फिर संकोच कर गयी कि इतना बड़ा पत्रकार हो चुका है पता नहीं पहचाने या नहीं. फिर भी मैंने उसको एक मेल लिखी - 'अगर याद हो तो मैं तुम्हारी उरई वाली रेखा दीदी हूँ, और अगर न हो तो इस मेल को इग्नोर कर देना. '
मुझे उसका उत्तर तुरंत ही मिला और उसका जबाब था - ' दीदी मैं आपको कैसे भूल सकता हूँ? '
फिर तो हमारा मेल व्यवहार फिर से हो गया . मेरे उस भाई का नाम है "अजय ब्रह्मात्मज" . फिर उसके साथ ही मुझे एक भाभी भी मिल गयी - ' विभा रानी' .
कुछ ऐसा इत्तेफाक हुआ कि कुछ ही महीनों के बाद ही अजय को यहाँ पर एक फ़िल्म कि टीम लेकर आना पड़ा. उसने मुझे फ़ोन किया कि मैं कानपुर आ रहा हूँ और आपसे मिलना चाहता हूँ. शाम को पता चला कि वह आ तो गया लेकिन मेरे पास तक नहीं आ पायेगा. अतः मैंने कहा कि मैं ही आ जाती हूँ. वह उस समय 'आहिस्ता-आहिस्ता ' कि टीम लेकर आया था. फ़ोन से संपर्क हुआ और मैं पतिदेव थे नहीं तो पडोसी के बेटे के साथ रेव थ्री पहुँची. चूँकि फ़िल्म वाले थे तो बहुत ही सुरक्षा थी. मेरे को तो ऊपर जाने से मना कर दिया. आप नहीं जा सकती हैं. मैंने नीचे से ही फ़ोन किया तो गार्ड समझा कि कोई खास हैं तो उसने मुझे ऊपर भिजवा दिया. मैं अजय को नहीं पहचानती थी और अजय मुझे नहीं. कभी देखा ही नहीं था. मैं इतने बड़े हाल में किसको पूंछू. खैर मैंने उसके मोबाइल पर कॉल की तो वह खुद ही मेरे पास आ गया. आकर सबसे पहले उसने मेरे पैर छुए थे. उस क्षण मैं कितनी अभिभूत हुई थी उसका बयान नहीं आकर सकती . वह बचपन का रिश्ता आज भी कितना गहरा और सम्मान दे रहा है.
और उससे से बड़ी बात उसने तब कही - जो मेरे साथ लड़का गया था उससे ही कहा कि आज मैं जो कुछ भी दीदी कि बदौलत ही हूँ.
और बस हम भाई बहन इस तरह फिल्मी अंदाज में ही मिले . उसने मेरे 'अभय देओल' से भी इंट्रो करवाया कि ये मेरे दीदी है यही रहती है और मुझसे मिलने आयीं है. सबसे बड़ी बात ये रही कि मैं अभय देओल को पहचानती नहीं थी. बाद मैं जो लड़का मेरे साथ गया था उसने पूछा कि आंटी जिससे आपका परिचय मामाजी ने करवाया था उसको नहीं जानती . मैंने कहा नहीं तब उसने कहा कि वो अभय देओल था.
कुल मिलाकर मेरी छोटी सी मुलाकात थी लेकिन थी बहुत यादगार. दुबारा जब उसका कानपुर आना हुआ तब भी मैंने कहा कि मैं आ जाती हूँ, उसने कहा नहीं अब कि बार मैं ही घर आऊंगा और फिर वह घर भी आया सबसे मिला. मुझे नहीं लगा कि ये हमारे रिश्ते कहीं से भी अपने खून के रिश्ते से अलग हैं.
अब मेरी भाई से तो कम भाभी से अधिक बात हो जाती है. हम ऑरकुट पर हैं , पता नहीं कुछ लोगों ने इस पर भी रिसर्च की और हमारे आपस के स्क्रैप पढ़े . फिर घुमा कर पूछना शुरू किया कि आप कहाँ से है? मैंने कहा UP से , तो फिर दूसरा सवाल कि फिर विभा रानी आपकी भाभी कैसे हैं? अब मैं किसको किसको कहानी सुनाऊं ? इस लिए इस जगह सब खोल कर बता दिया कि ये मेरे रिश्ते भी वही से मिले हैं .
दरअसल बात यह है कि मैं इतने लम्बे समय से हूँ यहाँ लेकिन पूरी आई आई टी के परिसर से मेरा सरोकार कभी नहीं रहा. मैं आकर अपने कमरे में और बस जाते समय ही निकलती हूँ.
एक लड़के ने मुझे उस लेक्चर हाल तक पहुँचाया. और यहाँ पर मैंने पहली बार अपने लेखन की प्रस्तुति की. मेरी कविता थी -' पूजिता या तिरस्कृता '
सीता पूजिता
क्यों?
मौन, नीरव, ओठों को सिये
सजल नयनों से
चुपचाप जीती रही।
दुर्गा
शत्रुनाशिनी
क्रोधित, सबला
संहारिणी स्वरूपा
कब सराही गई
नारी हो तो सीता सी
बनी जब दुर्गा
चर्चा का विषय बनी
समाज पचा नहीं पाया
उंगली उठी और उठती रही।
सीता कब चर्चित हुई
प्रशंसनीय , सहनशील
घुट-घुट कर जीने वाली
जब खत्म हो गई,
बेचारी के विशेषण से विभूषित हो
अपना इतिहास दफन कर गई।
समाज पुरूष रचित औ'
नारी जीवन उसकी इच्छा के अधीन,
स्वयं नारी भी
सीता औ' दुर्गा के स्वरूप को
पहचान कर भी
अनजान बनी जीती रहती है
पुरूष छत्रछाया में मंद मंद विष पीती रहती है।
इस कविता को पहला पुरस्कार मिला. पुरस्कार में पहली बार पुस्तकों को देने का निर्णय लिया गया था और पुरस्कार में मुझे हरिवंश राय बच्चन की 'मधुशाला 'और कमलेश्वर की 'कितने पाकिस्तान ' मिली थी.
फिर हमारे जजों में से एक ने मेरे से पूछा की आप यहाँ कब से है? मैंने बताया की १८ साल से तो बड़े आश्चर्य से कहा - 'आपको पहले देखा नहीं कभी?' वाकई नहीं देखा होगा क्योंकि मेरी परिधि मेरे अपने कमरे से अधिक कहीं नहीं होती है.
दूसरे दिन मेरे साथ काम करने वाले लोगों ने बताया की कल तो बसों में आपकी ही चर्चा हो रही थी कि क्या कविता पढी? इस तरह से मुझे आई आई टी में पहली बार पहचान मिली और इसका श्रेय मैं अपनी सहकर्मी या कहिये आत्मीय नीलम त्रिपाठी को ही देती हूँ. मुझे दूसरे वर्ष भी कविता पाठ में पुरस्कार मिला . लेकिन उसके बाद मैंने भाग लेना बंद कर दिया क्योंकि एक दिन मैंने बस स्टॉप पर सुना कि जब तक ये रहेंगी कविता का पुरस्कार नहीं मिलने वाला. हो सकता है कि मुझे सुना कर रही हों वे, लेकिन मैंने फिर जाना बंद कर दिया.
यहाँ पर रह कर मेरा परिचय नेट से तो पूरा पूरा था. लेकिन अन्य विधाओं से मेरा कोई परिचय नहीं था. यही पर मेरे साथ काम कर रही एक इंजीनियर ने मेरा ऑरकुट पर खाता खोल दिया तो मेरा दायरा और बढ़ गया.
आरम्भ में जब मैंने अपने लेखन से मिले भाइयों का जिक्र किया था तो उनमें से एक था बिहार से 'अजय' . वह उस समय शायद हाई स्कूल में रहा होगा और मैं बी ए में थी. कई साल पत्राचार के बाद बंद हो गया लेकिन मुझे ये नहीं याद कि मैं किसको क्या दिशा निर्देश दिया करती थी. ये तो है कि मैं काउंसलर पैदाइशी थी. नेट करने पर कई बार उसका नाम देखने को मिला वह अब पत्रकारिता के क्षेत्र में आ चुका था. और नामी गिरामी पत्रकार भी है. लेकिन उससे संपर्क का कोई साधन नहीं था. फिर सोचा हो सकता है कि भूल भी गया हो, सब मुझ जैसे नहीं होते. एक दिन उसके लेख के साथ उसका ईमेल आई डी भी मुझे मिला. कई हफ्तों तक सोचती रही कि इसको एक मेल डालूँ फिर संकोच कर गयी कि इतना बड़ा पत्रकार हो चुका है पता नहीं पहचाने या नहीं. फिर भी मैंने उसको एक मेल लिखी - 'अगर याद हो तो मैं तुम्हारी उरई वाली रेखा दीदी हूँ, और अगर न हो तो इस मेल को इग्नोर कर देना. '
मुझे उसका उत्तर तुरंत ही मिला और उसका जबाब था - ' दीदी मैं आपको कैसे भूल सकता हूँ? '
फिर तो हमारा मेल व्यवहार फिर से हो गया . मेरे उस भाई का नाम है "अजय ब्रह्मात्मज" . फिर उसके साथ ही मुझे एक भाभी भी मिल गयी - ' विभा रानी' .
कुछ ऐसा इत्तेफाक हुआ कि कुछ ही महीनों के बाद ही अजय को यहाँ पर एक फ़िल्म कि टीम लेकर आना पड़ा. उसने मुझे फ़ोन किया कि मैं कानपुर आ रहा हूँ और आपसे मिलना चाहता हूँ. शाम को पता चला कि वह आ तो गया लेकिन मेरे पास तक नहीं आ पायेगा. अतः मैंने कहा कि मैं ही आ जाती हूँ. वह उस समय 'आहिस्ता-आहिस्ता ' कि टीम लेकर आया था. फ़ोन से संपर्क हुआ और मैं पतिदेव थे नहीं तो पडोसी के बेटे के साथ रेव थ्री पहुँची. चूँकि फ़िल्म वाले थे तो बहुत ही सुरक्षा थी. मेरे को तो ऊपर जाने से मना कर दिया. आप नहीं जा सकती हैं. मैंने नीचे से ही फ़ोन किया तो गार्ड समझा कि कोई खास हैं तो उसने मुझे ऊपर भिजवा दिया. मैं अजय को नहीं पहचानती थी और अजय मुझे नहीं. कभी देखा ही नहीं था. मैं इतने बड़े हाल में किसको पूंछू. खैर मैंने उसके मोबाइल पर कॉल की तो वह खुद ही मेरे पास आ गया. आकर सबसे पहले उसने मेरे पैर छुए थे. उस क्षण मैं कितनी अभिभूत हुई थी उसका बयान नहीं आकर सकती . वह बचपन का रिश्ता आज भी कितना गहरा और सम्मान दे रहा है.
और उससे से बड़ी बात उसने तब कही - जो मेरे साथ लड़का गया था उससे ही कहा कि आज मैं जो कुछ भी दीदी कि बदौलत ही हूँ.
और बस हम भाई बहन इस तरह फिल्मी अंदाज में ही मिले . उसने मेरे 'अभय देओल' से भी इंट्रो करवाया कि ये मेरे दीदी है यही रहती है और मुझसे मिलने आयीं है. सबसे बड़ी बात ये रही कि मैं अभय देओल को पहचानती नहीं थी. बाद मैं जो लड़का मेरे साथ गया था उसने पूछा कि आंटी जिससे आपका परिचय मामाजी ने करवाया था उसको नहीं जानती . मैंने कहा नहीं तब उसने कहा कि वो अभय देओल था.
कुल मिलाकर मेरी छोटी सी मुलाकात थी लेकिन थी बहुत यादगार. दुबारा जब उसका कानपुर आना हुआ तब भी मैंने कहा कि मैं आ जाती हूँ, उसने कहा नहीं अब कि बार मैं ही घर आऊंगा और फिर वह घर भी आया सबसे मिला. मुझे नहीं लगा कि ये हमारे रिश्ते कहीं से भी अपने खून के रिश्ते से अलग हैं.
अब मेरी भाई से तो कम भाभी से अधिक बात हो जाती है. हम ऑरकुट पर हैं , पता नहीं कुछ लोगों ने इस पर भी रिसर्च की और हमारे आपस के स्क्रैप पढ़े . फिर घुमा कर पूछना शुरू किया कि आप कहाँ से है? मैंने कहा UP से , तो फिर दूसरा सवाल कि फिर विभा रानी आपकी भाभी कैसे हैं? अब मैं किसको किसको कहानी सुनाऊं ? इस लिए इस जगह सब खोल कर बता दिया कि ये मेरे रिश्ते भी वही से मिले हैं .


