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मंगलवार, 27 मई 2014

माँ तुझे सलाम ! (12)

                 कभी कभी हम कुछ सीखने के लिए प्रयास नहीं करते और न ही माँ हमें सीखने के लिए कुछ करती है।  वह अपने स्वभाव के अनुरूप अपने जीवन की विभिन्न भूमिकाओं के साथ अपना दायित्व निभा रही होती है और हम उससे सीख रहे होते हैं।  यही तो है जो संस्कार कहे जाते हैं।  वह हाथ पकड़  सिखाती नहीं है बल्कि हम उसे ग्रहण कर लेते हैं और फिर वह  हमारे जीवन का दर्शन बन जाता है।  अपनी माँ से सीख कर जीवन में उतारने वाली है : वंदना गुप्ता। 





           माँ ब्रह्माण्ड का सबसे खूबसूरत शब्द ही नही ईश्वर का स्वरूप होता है । कहते हैं जब ईश्वर ने देखा वो हर जगह नहीं पहुँच सकता तब उसने माँ को बनाया अपने प्रतिनिधि के रूप में । दया , करुणा , ममता की प्रतिमूर्ति के रूप में । यूँ तो माँ का ममत्व अनमोल है जिसे किसी भी तरह चुकाया नहीं जा सकता फिर भी जब जब मातृ दिवस आता है तो अचानक हम सबको जैसे अहसास होता है , जैसे सोये से जाग जाते हैं कि हाँ , हमारा भी कुछ कर्तव्य है लेकिन इतने भर से संभव नही मातृ ॠण से उॠण होना । फिर भी रेखा जी के आग्रह पर सोच में पड गयी कि क्या लिखूँ , क्या बताऊँ मैं अपनी माँ के बारे में ।
 
                          मेरी माँ जिसे मैने बचपन से ही सबके लिए ममत्व से भरे देखा फिर चाहे अपना हो या पराया सबको सीने से लगा लेतीं , सबको अपना समझतीं किसी से कोई द्वेष नहीं , जैसे सारा संसार हमारा शब्दों को जीती हों । आज आपको एक घटना से रु-ब-रु करवाती हूँ जिसने बहुत गहरी छाप छोडी मुझ पर क्योंकि उस वक्त मैं मात्र दस वर्ष की थी जब मेरी दादी जिन्हें मैं बहुत प्यार करती थी और वो भी मुझे इतना प्यार करती थीं कि सारे घर से मेरे लिये लड लेती थीं और मेरे लिए खाना पीना तक छोड देती थीं इतनी लाडली थी मैं अपनी दादी की , वो दादी अपने अन्तिम दिनों में चार महीने तक बिस्तर पर थीं । यहाँ तक कि उनके सारे कार्य बिस्तर पर ही होने लगे थे जैसा मुझे याद है तो उनको मोशन की प्रॉब्लम शुरु हो गयी थी जिसके कारण उन्हें मोशन नहीं होता था और अन्दर गाँठें बन जाती थीं जो कितनी भी कोशिश वो करतीं बाहर नहीं आती थीं ऐसे में डॉक्टर बुलाई जाती और वो औजार डाल डाल कर बुरी तरह अम्मा को जख्मी करते हुए उन गाँठों को बाहर निकालती और उस वक्त अम्मा दर्द से तडप कर ऐसे चीखतीं कि सारा घर रो पडता । चीखें ऐसी जैसे गाय डकरा रही हो मगर सब मजबूर रहते क्योंकि और कोई उपाय ही नहीं था और हॉस्पिटल वो जाना नहीं चाहती थीं ऐसे में सब मजबूर थे यहाँ तक कि उनकी सेवा के लिए बाऊजी ने चार महीने की छुट्टी तक ले ली थीं मगर इन हालात के आगे सब मजबूर थे तब जब मेरी मम्मी से ये सब नहीं देखा गया तो उन्होने देखा कि  डॉक्टर कैसे  गाँठें बाहर निकालती है और उसके बाद मेरी मम्मी ने खुद इस काम को अपने हाथों से अंजाम देना शुरु किया उस वक्त कहाँ ग्लव्स होते थे , बस मेरी मम्मी चाहे खाना बना रही हों या खिला रही हों या खा रही हों जैसे ही अम्मा को तकलीफ़ शुरु होती फ़ौरन सब काम छोडकर उनके इस काम में लग जातीं और अन्दर ऊँगलियों से उन  गाँठों को बाहर निकालतीं जिससे अम्मा को तकलीफ़ भी नहीं होती मगर इस चक्कर में मम्मी कितनी ही बार खाना भी नहीं खा पाती थीं जो बीच मे छुट जाता तो फिर दोबारा नहीं खातीं । इस काम के लिये मम्मी ने अपने आधे आधे नाखून तक काट लिये थे ताकि अम्मा को चुभें नहीं और दूसरे नाखूनों में इन्फ़ैक्शन न हो क्योंकि सारे काम तो करने होते ही थे घर के । यूँ तो मेरी मम्मी से बडी उनकी तीने जेठानियाँ भी थीं मगर उनमें से किसी ने भी इस काम की जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं ली । वैसे मम्मी कोई खुद भी सही नहीं रहती थीं उन्हें खुद साँस , दिल और बीपी की शिकायत थी ऐसी हालत में भी  वो  अम्मा की तकलीफ़ के लिए  रोज उनके ऊपर श्रीमद भगवद गीता के सारे के सारे 18 अध्याय करतीं जो बीच में अम्मा की वजह से छुट जाते तो उनका काम करके दोबारा नहातीं और फिर दोबारा पूरा करतीं ताकि उन्हें तकलीफ़ में आराम मिले क्योंकि मेरी मम्मी एक धार्मिक प्रवृत्ति की महिला रही हैं तो ये सब काम उनकी लिस्ट में पहले स्थान पर थे फिर चाहे उसके लिये अपनी अनदेखी कर लेतीं मगर अम्मा के दुख में उन्होने अपने आप को भुला दिया और जब अम्मा को आराम मिलता तो वो ढेरों आशीष देतीं कि तूने मुझे आराम पहुँचाया वरना वो डॉक्टर तो कब का मार चुकी होती क्योंकि अम्मा का खाना पीना तो बंद ही हो गया था बस जरा सा जूस आदि ही दे पाते थे ऐसे में पेट में खुश्की होनी ही थी और उन्हें न तो इंजैक्शन लगवाना था और न हस्पताल जाना था तो घर में इलाज के लिए इसके सिवाय और कोई चारा ही नहीं था । मम्मी को बस ये इत्मिनान रहा कि मुझसे जो बन पडा मैने किया फिर चाहे पता है कि एक दिन सबको जाना ही है और फिर चाहे प्राण कितनी तकलीफ़ से निकले अम्मा के मगर मोशन की तकलीफ़ से तो मरते दम तक अम्मा को आराम रहा ।
                 तब की ये घटना या इसके बाद की और भी छोटी छोटी घटनायें ऐसी हैं जहाँ मम्मी के अंदर की दया और करुणा झलकती है जैसे कभी कोई चिडिया का बच्चा यदि चोट खाकर अधमरा सा हो जाता तो मम्मी को लगता इसे बिल्ली न खा जाए तो उसके लिये कटोरी में गंगाजल लेकर उस पर गीता का पन्द्रहवाँ अध्याय कर जल छिड्क देतीं और देखते ही देखते वो ठीक हो उड जाता । किसी भी कीडे मकौडे तक को कभी नहीं मारतीं यहाँ तक कि यदि कानखजूरा भी आ जाता तो उसे चिमटे से उठा कर बाहर फ़ेंक देतीं मगर मारती कभी नहीं ,ऐसी जाने कितनी ही घटनायें हुयीं जीवन में जिनसे उनके अन्दर छुपी दया और करुणा उजागर होती रहती जिसका हम सबके जीवन पर गहरा प्रभाव पडा और ये संस्कार कुछ हद तक मुझमें भी उतरे । मैं भी किसी भी जीव को मार नहीं पाती बेशक चीखती रहूँ मगर मार नहीं सकती ना उसे उठाकर फ़ेंक सकती हूँ । 

                यहाँ तक कि जब मेरे बाऊजी भी बिस्तर के हो गये तो उनकी भी जब मम्मी खुद  तकरीबन 72 साल की थी तब  उस उम्र में भी इसी तरह सेवा की कि कोई कर नहीं सकता , न दिन देखा न रात हर वक्त बाऊजी का हर काम बिस्तर पर ही होता और मम्मी अपनी सम्पूर्ण निष्ठा और समर्पण से उनकी सेवा में लगी रहीं साथ ही उनके लिए भी जितना हो सका जप तप करती रहीं वो पल तो मेरी आँखों के आगे घटित हुए हैं तो कैसे अन्जान रह सकती हूँ । जब बाऊजी का तीन महीने पहले खाना पीना छुट गया था और आखिरी वक्त में तो कोमा में ही चले गये थे तब तक मेरी मम्मी ने जो सेवा की है उसका तो मैं वर्णन भी नहीं कर सकती । सेवा को धर्म मानने वाली मेरी माँ ने जीवन में जाने कितने आघात सहे हैं न केवल मानसिक बल्कि शारीरिक भी मगर उसमें भी कभी अपने हौसले को गिरने नहीं दिया और उनका ये हौसला हम सबका संबल बना रहा ।


यूँ तो जाने कितने किस्से मिल जायेंगे जहाँ मम्मी के अन्दर की एक औरत कैसे अपने घरबार को चलाती है , कैसे समायोजन कर जीती है वो सब मैने सुना देखा इसलिये नहीं क्योंकि मैं काफ़ी देर से हुयी थी तो जो मुश्किल हालात का दौर था वो तो तब तक गुजर चुका था । मेरे पिता तो सरकारी नौकरी में थे और हम तीन बहनें थीं साथ ही अपने घर में भी बाऊजी को कुछ साझा विरासत के रूप में देना होता था ऐसे में उनकी नौकरी में हाथ तंग रहता था तो मम्मी ने कुछ काम घर बैठे ही शुरु किए काटने सीने के ताकि रिश्तेदारी में कहीं जाना हो या वहाँ का लेन देन हो तो वो उसे पूरा कर सकें और किसी को पता भी न चले जिससे हमें पता चला कि कैसे कम पैसे में समायोजन बैठाया जा सकता है और कैसे रिश्तेदारी आदि में अपने परिवार की इज्जत बनाये रखी जाती है , उनकी इन्हीं बातों ने हमें जीवन जीने में सही योगदान दिया , हमारा मार्गदर्शन किया जिस कारण हम अपने जीवन की बडी से बडी समस्याओं को यूँ पार कर गये कि आज वो सब स्वप्नवत लगते हैं । 

इसके अलावा मम्मी एक धार्मिक महिला रहीं इसलिये धर्म के प्रति जो मेरी आस्था बनी वो उन्हीं के कारण बनी जब वो अपनी ज़िन्दगी के अनेकों किस्से सुनातीं , ईश्वर की दया और करुणा का महत्त्व बतातीं तो हमारी भी आस्था उस ओर जमने लगी जो आज मेरी रग रग में लहू सी पैबस्त हो गयी है। आज जो भी धार्मिक संस्कार हैं वो मेरी माँ और पिता की ही देन हैं ।मैं खुद को भाग्यशाली समझती हूँ कि ऐसे उच्च विचारों और आचरण वाले घर में मेरा जन्म हुआ और उनकी संस्कारों की धरोहर मुझमें भी पैबस्त है जिसे मैं अपने बच्चों में डालने की कोशिश करती रहती हूँ ताकि जो संस्कार हैं वो कभी खत्म न हों ।

घर परिवार में सामंजस्य बैठाना , सबके साथ मिलकर रहना , सबके लिए प्रेम और सौहार्द बनाये रखना जैसे संस्कारों की धरोहर एक माँ ही अपने बच्चों को दे सकती है और इस कार्य को अंजाम मेरी मम्मी ने बखूबी दिया जिसके लिए मैं ताउम्र नतमस्तक रहूँगी । आज मेरी मम्मी 82 साल की हैं और मेरे साथ ही रहती हैं मगर मुझे लगता है मैं उनके लिये कुछ नहीं कर पाती जितना करना चाहिये बस उन्हें देख ये ही ख्याल आता है कि जो उन्होने सबके लिए सेवा ,त्याग, दया, करुणा और ममता रखी उसी का फ़ल है कि आज हम सब जो फ़ल फ़ूल रहे हैं उन्ही के आशिर्वाद के  कारण ये सब संभव हो रहा है ।
     

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

chunauti jindgi kee: sangharsh bhare ve din (६)


वंदना गुप्ता
सबके जीवन के संघर्ष एक से नहीं होते लेकिन होते सभी के जीवन में है , बस उनके रूप बदले हुए होते हें और इस संघर्ष से गुजर कर ही जीवन के अर्थ को समझा जा सकता है और दूसरे भी कभी कभी संघर्ष के इस रूप से अवगत होते हें। अगर कभी खुद को उस स्थिति से गुजरना पड़े तो वे मानसिक तौर पर इस बात के लिए तैयार होते हें कि किसी दूसरे को भी इन हालातों से गुजारते देखा है और उनसे लदकर जीतते हुए भी देखा है। बस यही तो चाहत है कि हम सभी के अनुभवों से दो चार हो लें । आज प्रस्तुत हें वंदना गुप्ता के अनुभव :


कभी कभी खुद को वक्त के आईने में देखना कितना दुरूह होता है मगर जीवन एक संघर्ष है तो पन्ने पलटने ही पड़ते हैं ,पुनः अवलोकन करना ही पड़ता है और आज एक बार फिर ज़िन्दगी ने कहा है खुद को निहारो और देखो क्या थे तुम और क्या बन गए शायद इसलिए रेखा जी का सन्देश मिला कि अपने संघर्षों के बारे में लिखो . पहले तो समझ ही नहीं आया कि क्या लिखूं मगर दोबारा सन्देश मिला तो लगा शायद किस्मत या कहो ज़िन्दगी चाहती है कि एक बार फिर उन गलियारों से गुजरो शायद कोई भूला बिसरा सिरा फिर हाथ आ जाये .

यूँ तो आज की तारीख में ज़िन्दगी से कोई शिकायत नहीं है इस तरह मुड चुकी है कि अब ज़िन्दगी से मिलना जैसे मिलती है उसी तरह जीना सुखद लगता है मगर एक वक्त था जब इससे बहुत सी शिकायतें भी थीं जैसे हर आम इन्सान हो होती हैं क्यूँकि जो चाहो वो देती नहीं और जो देती है उसे हम चाह नहीं पाते . बस उन्ही रहगुजरों से हमें भी गुजरना पड़ा . बचपन तो बचपन होता ही है या कहो शादी से पहले और उसके बाद की ज़िन्दगी में जमीन आसमाँ का अंतर होता है सभी जानते हैं तो बस यहाँ भी शादी के बाद ज़िन्दगी की करवट ऐसी थी जो जल्दी से गले से नीचे नहीं उतरती मगर कोशिश की जाती है उन हालात में भी जीने की , समझौता करने की और वो ही हम भी करते रहे .
ज़िन्दगी में धोखा भी वहीँ मिलता है जहाँ अन्धविश्वास होता है ऐसा ही हमारे साथ हुआ . अब भला अपनों पर भरोसा ना किया जाये तो किस पर किया जाये ? मगर ये भी एक सच है कि अपने ही ठुकराते हैं , उनसे ही हमारा विश्वास चकनाचूर होता है तभी हम ज़िन्दगी का वास्तविक अर्थ समझ पाते हैं .............बस हमने भी अपनों के हाथों ठोकर खाई . जब माता पिता यानि मेरे सास ससुर ही धोखा दें तो किस पर विश्वास करें कुछ ऐसा ही हाल हमारा हुआ और एक वक्त आया जब ऐसा लगा कि हम तो खाली हाथ खड़े हैं , चारों तरफ देखने पर कोई चेहरा अपना नहीं दिखता था , ना संबंधों में ना अपनेपन में यहाँ तक कि पैसों की दृष्टि से भी लगने लगा था कि अब क्या होगा आगे ज़िन्दगी कैसे जियेंगे ? बच्चे कैसे पढ़ाएंगे? बेटी की शादी कैसे करेंगे? ऐसे ना जाने कितने प्रश्न खड़े हो गए थे मगर जब आप सत्य के मार्ग पर होते हैं तो आप का साथ चाहे सारी दुनिया छोड़ दे मगर एक का साथ हमेशा मिलता है और वो है भगवान . बस हमें भी उस पल सिर्फ और सिर्फ उसी का सहारा था.
हर रिश्ते ने छला था मगर हमारी नियत अच्छी थी और हमने जो भी कहा या किया सबके भले के लिए किया तो उसका फल ये मिला कि हमारे जीवन संघर्ष में वो परमपिता परमात्मा सारथि बनकर इस महायुद्ध में हमारे साथ आ खड़ा हुआ . एक दम अन्जान व्यक्ति जो सिर्फ हमारी दुकान से कभी कभी कपडा ले जाता था जब उसे हमारे बारे में पता चला कि माँ बाप भाई - बहनों तक ने धोखा दिया है और हमें सारी दुनिया से अलग- थलग सा कर दिया है यहाँ तक कि हमारा पूरा हक़ भी हमें नहीं दिया है तब उन्होंने राह दिखाई . तब रिश्तों का महत्त्व पता चला . कैसे अपने पराये हो जाते हैं और पराये अपने . बस ज़िन्दगी में एक बात का दुःख रहा कि अपनों पर विश्वास करने का क्या यही प्रतिफल होता है बात पैसे से ज्यादा विश्वास के टूटने की थी , धोखेबाजी की थी जिसकी हम सपने भी उम्मीद नहीं कर सकते थे .

जैसा वास्तव में पांडवों के साथ हुआ था हमें अपने जीवन के हर पग पर वैसे ही हालातों से गुजरना पड़ा था यहाँ तक कि अपमान के घूँट भी बहुत पिए मगर यही चाहा कि शांति बनी रहे और जिस कीमत भी शांति मिले वो सस्ती है मगर जिस तरह सारी सेना , सारे रिश्ते दुर्योधन की तरफ थे और साथ में पुत्रमोह था एक पिता का कुछ वैसा ही हमारे परिदृश्य में भी था तो फिर कैसे हम न्याय की उम्मीद कर सकते थे । जब हर तरफ से देख लिया कि अब कोई रास्ता नहीं बचा सब रास्ते बंद हो चुके तो हम चुप करके बैठ गए कि शायद यही भाग्य में बदा था मगर उस पल मलिक साहब के रूप में भगवान हमारे जीवन में आये और उन्होंने हमें रास्ते दिखाए , उन्होंने बताया कि तुम कर्म से मुँह नहीं मोड़ सकते और प्रयास करो जीवन जीना थोड़े छोड़ोगे बल्कि करारा जवाब दो ताकि कल को वो तुम्हें कमजोर ना समझें .जो तुम्हारा था वो यदि तुम्हें नहीं मिल सका और उन्होंने तुमसे जबरदस्ती छीना है उसे उनका भी मत होने दो और हो सकता है वो तुमसे इस बात पर समझौता कर लें क्यूँकि जब उन्हें सारी चीज जाती दिखेगी तो शायद उन्हें समझ आ जाये और तुम्हें तुम्हारा हक़ दे दें या कम ज्यादा करके कोई बीच का रास्ता निकाल लें तो कम से कम जीने का आधार तो मिल ही जायेगा ना और यदि ऐसा ना करें तो बेशक सरकार के पास चला जाये मगर उनके हाथ में मत रहने दो कम से कम ऐसा करने से वो डरेंगे तो सही और आगे तुम पर कोई वार नहीं करेंगे और हमने वो कदम उठाये , हर रास्ता उन्होंने सुझाया कि सरकारी कार्य कैसे किये जाते हैं कहाँ से कौन से कागजात कैसे निकलवाने हैं, जगह जगह जाते थे घर में छोटे छोटे बच्चों को छोड़कर कभी मैं जाती तो कभी मेरे पति सुबह से शाम हो जाती सरकारी कार्यों में पैसे अलग लगते चाहे कितनी भारी गर्मी हो सर्दी हो या बरसात जब जाना होता तो जाते ही यहाँ तक कि खाने पीने का भी कोई हिसाब नहीं सिर्फ बच्चों के भविष्य का सोच कर हम कर रहे थे कि चलो थोडा सा ही सही उनके मनों में रहम तो आये और हमारे बच्चों का हक़ उन्हें मिल जाये बस इसी सबके चलते हमने ये कदम उठाये और बीच बीच में उन्हें सन्देश भिजवाए मगर जब पैसे की गर्मी होती है तो कौन किसी की सुनता है जो हाल दुर्योधन का था वो ही वहाँ था हमें तो हर कदम पर एक कुरुक्षेत्र नज़र आता था जहाँ अर्जुन खड़ा है और कृष्ण सारथि बनकर राह दिखा रहे हैं . बस जैसे मलिक साहब ने बताया वैसा ही हम करते गए और उसका नतीजा ये निकला कि हमारे सन्देश को दरकिनार करके उन्होंने वो सब भी हाथ से गँवा दिया जो समझौता करने पर शायद हम सबका रह जाता . शायद हमारे अहम् , हमारे लालच इन सबसे ऊपर होते हैं जिसके आगे हम अपना बुरा भला भी नहीं देख पाते . जैसे दुर्योधन को मिटना मंजूर था मगर सूईं की नोक के बराबर जमीन देना मंजूर नहीं था वैसा ही हाल वहाँ का था और वो ही हुआ भी . बेशक हमें कुछ नहीं मिला मगर दिलवाने वाले के पास हजारों रास्ते होते हैं वो दूसरी तरह कहीं ना कहीं से जुगाड़ कर ही देता है और वैसा ही ऊपर वाले ने हमारे साथ किया . जो काम हमने किया था उसी की वजह से एक दूसरे जरिये से हमें थोडा बहुत मिला पूरा तो नहीं मगर जो मिला हमने तो वो भी बोनस समझा और हमें पता चला कि कैसे बिना किसी को कुछ कहे , लड़े झगडे बिना भी शीत युद्ध होता है और उसका वार खाली भी नहीं जाता...........हम तो आज भी खुश हैं क्यूँकि ऊपर वाले ने बहुत दया दृष्टि रखी मगर गलत करने वालों को भी वो दंड जरूर देता है और उसका असर हम देख रहे हैं कि वहाँ क्या हालात होते जा रहे हैं मगर शायद आज भी वो लोग समझ नहीं पाए हैं चाहे अपनी औलाद की ज़िन्दगी पर बन आई उनकी मगर तब भी अपने अहम् को सर्वोपरि बनाया हुआ है बस यही फर्क होता है .

इस सबमे एक ऐसी बात हुई जिसने हमें सोचने पर मजबूर किया कि हाँ भगवान साक्षात् भी आता है वो ऐसे कि मलिक साहब हमारे साथ सिर्फ उतने वक्त ही रहे जितने वक्त तक हमारे पैरों के नीचे जमीन नहीं थी जैसे ही एक आधार मिला वो इस जहान को ही छोड़कर चले गए .......वो पल ऐसा लगा जैसे किसी ने हमारा सब कुछ लूट लिया हो और हम फिर से कंगाल हो गए हों ..........उनका हमारे जीवन में एक ऐसा स्थान है जिसे बयां करना नामुमकिन है . तब लगा था हाँ भगवान किसी ना किसी वेश में जरूर आते हैं जैसे पांडवों का हक़ दिलाकर प्रभु धराधाम को छोड़कर चले गए थे वैसे ही हमारे साथ भी हुआ और उस दिन के बाद हमारा विश्वास प्रभु पर अटल होता चला गया .

अब जीवन से कोई गिला शिकवा नहीं जिस ओर प्रभु ले चलते हैं हम चलते हैं ना आगे की चिंता ना पीछे का गम क्यूँकि होता वो ही है जो उसने रच रखा है और जो वो करता है वो सबसे अच्छा होता है उससे अच्छा कोई कर नहीं सकता ऐसा अपनी ज़िन्दगी के अनुभवों से सीखा क्यूँकि जब हम दुनियादारी की चालबाजियों से अन्जान थे तो हम सबके भले की बात कहते थे और वो बात ही इस धर्मयुद्ध में हमारे लिए रामबाण बन गयी तो फिर कैसे ना कहें कि वो जो करता है अच्छा करता है उसने हमारी कही बात को हमारे लिए ही सत्य साबित करके दिखा दिया और बता दिया कि अगर अच्छी और सच्ची नीयत से किसी के भले के लिए कुछ किया जाये या कहा जाये और वैसा हो जाये तो वो किया या करा बेकार नहीं जाता वो तुम्हें वापस मिलता है या कहो वो ऐसे रास्ते बना देता है कि जो तुम्हारा बुरा चाहता है उसके लिए वो ही अच्छाई बुराई साबित हो जाती है मगर इसके बाद वो एक बात और कहता है कि अब मैंने रास्ता दिखा दिया , जब तू मुश्किलों में था और जग की हकीकतों से अनजान था तो मैंने तेरा साथ दिया मगर अब तुझे ज़िन्दगी संभाल कर चलनी होगी सावधानी के साथ यदि ऐसा नहीं करेगा और बार- बार गिरेगा तो कब तक मैं तेरा साथ दूँगा इसलिए हमने तो अपने जीवन से यही सीखा और अब ना किसी से ज्यादा मोह, अपनापन नहीं रखते मगर सबको एक नज़र से देखते हैं और कोशिश करते हैं कि हमसे किसी का बुरा ना हो और जितनी जिसकी सहायता कर सकें करें और जीवन प्रभु गुण गाते हुए बीते .