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शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

वसंत पंचमी !




        वाणी पुस्तक वीणा हस्ते , विद्या देवी तुम्हें नमस्ते !


आज का दिन माँ सरस्वती के प्रकट होने का दिन कहा जाता है ।माँ सरस्वती के वरद हस्त से ही मनुष्य इस जीवन में विद्या , बुद्धि, कला और साहित्य में ऊँचे स्थान पर विराजमान होता हैमाँ मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती हें कहते हें कि दिन में एक बार जिह्वा पर सरस्वती के वास होता है और उस पल इंसान जो कुछ भी बोलता है उसका सत्य होना सुनिश्चित हैइसी लिए कहा जाता है की मुख से वचन निकलने से पहले सौ बार सोचना चाहिए माँ सरस्वती की प्रासंगिता हर युग में रही है और रहेगीजब तक मनुष्य के पास बुद्धि और वाणी है तब तक हम इन्हें नमन करते रहेंगेइसके बिना तो मनुष्य का अस्तित्व एक मिट्टी के पुतले की तरह से होता हैजब मनुष्य अपनी परिस्थितियों से परेशान होता है तो उससे निकलने का रास्ता यही से आता है जिह्वा की बात चली तो ये सरस्वती जी का निवास स्थान भी होता है , इसका कार्य सिर्फ भोजन के रसास्वादन का नहीं होता है बल्कि परमेश्वर की जिह्वा से प्रकट हुई वाग्देवी सरस्वती कहलाईइसी दिन यानि कि वसंत पंचमी के दिन वाग्देवी का आविर्भाव हुआ था इसी लिए यह दिवस वाग्देवी जयंती के रूप में मनाया जाता है आज इस वाणी के महत्व को कोई नहीं पहचानता है, कोई भी कुछ भी बोल रहा है, बयान दे रहा है , गालियाँ दे रहा है या फिर झूठे आरोपों के बल पर दूसरों को नीचा दिखा रहा हैये अपमान है माँ सरस्वती का - वाणी का जीवन में जो महत्व है उसको पहचानिएइस मुख से ऐसे वचन निकलने चाहिए की किसी दुखी ह्रदय को शांति और सांत्वना दे सकेंजीवन से निराश लोगों के लिए एक प्रेरणा और संबल बन सकेजो भी बोला जाय वह सार्थक हो, निरर्थक वचन भी व्यक्ति के लिए घातक बन जाते हेंइसी लिए इस वाणी से जो भी कहें सोच समझ कर कहेंवाणी का स्वर मधुर होकर शत्रु को भी मित्र बना सकता है और कठोरता तो सम्पूर्ण जगत को आपका बैरी बना सकता हैवाणी का बाण अगर एक बार मुख से निकाल गया तो फिर वापस नहीं आतानिरर्थक और अनर्गल बोलना स्वयं व्यक्ति के व्यक्तित्व को क्षीण करता है और वाग्देवी का अपमान होता है जीवन में सदैव ऐसा बोलने की कोशिश करें जो मधुर और कर्णप्रिय होइसी लिए कहा गया है --
वाणी ऐसी बोलिए मन का आपा खोय , औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय