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शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

व्यावसायिक चिकित्सा पद्धति (३) !

                   मनोरोग और मानसिक अपंगता दोनों अलग अलग व्याधियां है. इनके बारे में हम सामान्य व्यक्ति नहीं जान पाते हैं और हम इसके इलाज के लिए गलत जगह या गलत व्यक्ति के संपर्क में आकर अपना समय और धन दोनों नष्ट करते हैं और हमें उससे फायदा कुछ भी नहीं मिलता है.
                 एक मनोरोगी वह स्वस्थ व्यक्ति होता है , जो मानसिक और शारीरिक दोनों  दृष्टि से सामान्य होता है और उसके शरीर के सम्पूर्ण अवयव सही ढंग से काम करते हैं. अपने स्वभाव और वातावरण के अनुरुप वह मनोरोग से ग्रसित हो जाता है - जैसे यदि वह अंतर्मुखी व्यक्तित्व वाला है तो वह अपनी बात किसी से शेयर नहीं करता और अंदर ही अन्दर सोचता रहता है . उसके जीवन में तमाम ऐसी स्थितियां आती है कि वह उनसे अकेले लड़ नहीं पाता है और किसी को वह साझीदार बना नहीं पाता है. जिसका परिणाम ये होता है कि वह किसी न किसी प्रकार की मानसिक व्याधि से ग्रसित हो जाता है. एक कमजोर व्यक्तित्व वाला व्यक्ति अपनी परिस्थितियों  से भी नहीं लड़ पाता है और वह जीवन के उतार चढाव में आने वाले तनावों से अनिद्रा, अवसाद, कुंठा का शिकार हो जाता है और कई बार इनसे बचने के लिए वह नशीले पदार्थ तक लेने लगता है. ऐसे लोग मनोरोगी कहे जाते हैं . उनकी इन व्याधियों  का इलाज मनोचिकित्सक के पास होता है,  वे उसे काउंसलिंग, व्यावहारिक चिकित्सा  और विभिन्न दवाओं के द्वारा सामान्य स्थिति में ले आते हैं. ऐसे मनोरोगी ही आत्महत्या या दूसरों की हत्या करने तक का कृत्य कर डालते हैं.
                     मानसिक अपंगता वह स्थिति है , जब व्यक्ति अपनी उम्र के अनुसार कृत्य  नहीं कर पाता है. ये जन्मजात भी हो सकती है और किसी दुर्घटना के बाद भी. अक्सर इन लोगों की शारीरिक और मानसिक उम्र बराबर नहीं होती. जिसको हम I .Q के द्वारा चेक करते हैं. चाहे वे जन्मजात अपंगता के ग्रसित हो, किसी दुर्घटना के कारण या फिर पक्षाघात के बाद . इन लोगों को उनकी अधिकतम क्षमता तक पहुँचाना व अपने दैनिक कार्यों के लिए आत्मनिर्भर बनाना ही व्यावसायिक चिकित्सक का कार्य होता है.  उसके कार्य में धैर्य और सहानुभूति प्रमुख आधार होती है क्योंकि ऐसे रोगियों में सुधार बहुत धीमी गति से होता है और यही धैर्य और रोगी में आने वाला सुधार उनकी सफलता का द्योतक होता है.
                    इस विषय में जानकारी के अभाव में बच्चे के माता पिता या परिजन डॉक्टर के पास जाते हैं क्योंकि चिकित्सा की  ये शाखा अभी प्रत्येक अस्पताल में उपलब्ध नहीं है , हाँ इसके लिए विशेष अस्पताल या एन जी ओ अवश्य ही  कार्य कर रहे हैं. कुछ लोग उनको मनोचिकित्सक  के पास भेज देते हैं और मनोचिकित्सक भी अपने स्वार्थवश और पैसे की चाह में उन्हें भ्रमित कर देते हैं . ये मामला मेरे संज्ञान में आया है इसलिए उल्लेख कर रही हूँ. एक बच्चे को जो हाइपर एक्टिव था, मनोचिकित्सक ने उसको ब्लड प्रेशर लो करने की दवा देनी शुरू कर दी और उससे वह बच्चा सुस्त हो गया. जो सारे दिन घर में दौड़ता और तोड़ फोड़ करता था उसके सुस्त हो जाने से माता पिता को लगा कि मेरे बच्चे में सुधार आ रहा है जो  कि ये उनकी भूल थी क्योंकि वे इस बात से वाकिफ ही नहीं थे कि उनके बच्चे के साथ क्या हो रहा है? ऐसे ही बच्चों को व्यावसायिक चिकित्सक नियंत्रित करते हैं. जब उस बच्चे को और उसके पर्चे और दवा को एक व्यावसायिक चिकित्सक ने देखा तो बताया कि इसको गलत दवा दी जा रही है बस सिर्फ इस लिए कि माता पिता इस भुलावे में रहें कि  बच्चा अब कम परेशान कर रहा है और उसका इलाज जारी रखें.
                      इसका एक और उदाहरण भी सामने आया कि एक मनोचिकित्सक ऐसे रोगियों की बुलाती है और माता पिता को बाहर निकाल कर बच्चे  को कमरे में छोड़ देती है और वह अपनी गतिविधियाँ करता रहता है. आधे घंटे बाद वह माता पिता को बुलाती है और कहेगी कि आज मैंने ये observe किया है, दो दिन बाद फिर आइयेगा तब और देखूँगी. इसको बिहेवियर थेरेपी की जरूरत है. इस तरह से एक दिन के observation पर चार बार फीस वसूल लेती है. इसी बहाने होम विजिट पर भी आने की बात करेगी और उसकी फीस और अधिक होती है. माँ बाप इससे अनभिज्ञ होते हैं  और बच्चे के लिए कुछ भी करने को तैयार होते हैं. इलाज के लिए वह अपने साथ व्यावसायिक चिकित्सक को रखती है और फिर उससे पूछ कर माता पिता को संतुष्ट कर देती है बस उसका इलाज नहीं कर पाती है हाँ पैसे जरूर ऐंठ लेती है.
                   इसको बताने का मेरा सिर्फ यह आशय है की ये व्याधियां तो इंसां के वश की बात नहीं है, जो मिली हैं उनसे मुक्ति या राहत के लिए सही दिशा में जाकर ही निदान मिल सकता है. आप हों या आपके परिचित हों, उन्हें सही दिशा का भान कराइए कि  उनको कैसे और कहाँ इसकी चिकित्सा के लिए प्रयास करना चाहिए.
                  ऐसे कई सेंटर भी होते हैं जहाँ पर ऐसे बच्चों को रखा जाता है और उनके चिकित्सा भी दी जाती है लेकिन अपने बच्चे को डालने से पहले वहाँ का वातावरण और वहाँ बच्चों के देख रेख के लिए रखे गए लोगों के विषय में जानकारी जरूर ले लें क्योंकि इस बारे में भी लोग मूर्ख बना कर पैसे ऐंठते रहते हैं. मेरे एक परिचित अपने बच्चे को एक डे  केयर सेंटर में रखते हैं और भरोसा उनको इसलिए हुआ क्योंकि उस सेंटर के संचालिका एक डॉक्टर हैं और उसमें उनका बच्चा भी रहता है. वे दिन में खुद अपने क्लिनिक जाती हैं और उनके सेंटर को कोई दूसरी लड़की देखती है. इस सेंटर में वह और भी बच्चों को रखती हैं. प्रति बच्चे वे कोई ३ हजार रुपये लेती हैं और एक लड़की रखी हुई है जो मात्र बी. ए पास है. उसको १ हजार रुपये देती हैं क्योंकि उन्होंने खुद कहा कि मैं Occupation Therapist को नहीं अफोर्ड कर सकती हूँ. हाँ ये उनकी एक आमदनी का साधन भी है और अपना बच्चा भी ठीक से रहता है.