आज सुबह अखबार हाथ में आया तो नजर पड़ी 'अर्थ पावर' का सन्देश मिला - कुछ गिने चुने शहरों में आज रात ८:३० से ९:३० के बीच सभी अपने घरों में बिजली बंद रखें , ये अनुरोध किया गया था.
ग्लोबल वार्मिंग - ऊर्जा संचय, जल संरक्षण, और पृथ्वी बचाओ जैसे लक्ष्यों से जुड़ा एक संकल्प है.
इस काम के लिए क्या हमको सन्देश प्रसारित करने की आवश्यकता है?
लेकिन क्या इसके बाद भी आज का मानव इसमें स्वेच्छा से अपना सहयोग देगा?
अगर देगा भी तो कितने प्रतिशत?
हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या देने वाले हैं?
जल विहीन, आग में तपता हुआ एक अन्धकारपूर्ण जहाँ !
हाँ शायद यही, हम अपने अपने घरों में झाँक कर चलें. अगर हम ईमानदार उपभोक्ता है तो अपने अपने घरों से ही इस बारे में पहल करें.
जहाँ हम रहें वहाँ ही बिजली जलाएं, AC और TV को वहाँ किसी के न होने पर चलता हुआ न छोड़ें. सिर्फ सुन्दरता के लिए घर में बल्बों की पंक्तियाँ न सजाएँ. ऊर्जा की भी एक सीमा है, अगर हम आबादी पर काबू पा सकते हैं तो ये कार्य तो हमारे अपने ऊपर निर्भर करता है. कंप्यूटर सिर्फ खेलने के लिए प्रयोग न करें? अगर प्रयोग करें तो रचनात्मक कार्यों के लिए ही करें. खेलने के लिए और भी खेल हैं जो कि घर में या बाहर खेले जा सकते हैं.
जल का भी भण्डारण असीमित नहीं है, हर वर्ष पानी का स्तर जिस तरह से नीचे जा रहा है, एक दिन वह भी होगा - जब कि हम इस पानी के लिए ही महायुद्ध का सामना कर रहे होंगे. अभी से संचित करें. अपव्यय न करें? सबमर्सिबल लगा कर सड़क धोने वालों को मैं रोज देखती हूँ और साथ ही सरकारी नलों पर लगी हुई खाली बाल्टियों की लाइनें भी. इस विरोधाभास के लिए हम क्या कर सकते हैं? सिर्फ उन्हें सलाह दे सकते हैं. मानना और न मानना सबकी मर्जी पर निर्भर करता है.
कभी सुबह कि सैर के लिए सड़क के किनारे निकल जाते थे और पेड़ों कि ठंडी छाँव में ठंडी हवा की ताजगी से तबियत खुश हो जाती थी. और आज इस ठंडी हवा और हरियाली को देखने के लिए तरस रहे हैं. अगर किसी पार्क में जाना भी है तो उसके लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं. पार्क में जाने के लिए पास बनवाइए. हम अपने हाथों से ही प्रकृति से दूर जा रहे हैं और मोल ले रहे हैं हजारों बीमारियाँ. अब सिर्फ सड़कें और वाहन हैं , उसपर चलते हुए सांस नहीं ले सकते हैं क्योंकि हमारा वाहन हमें इतना धुआं दे रहा है कि हम मास्क पहन कर ही सड़क पर चल सकते हैं. एक घर में जितने लोग हैं, उतने ही वाहन भी हैं. उतने ही धुआं उगलने वाले साधन हैं और वातावरण को प्रदूषित करने वाले साधन भी.
आप सब से एक करबद्ध अनुरोध हैं कि जैसे भी संभव हो अपने स्तर पर जल, ऊर्जा और वृक्ष को संरक्षण कीजिये. अगर ये हैं तो हमारा जीवित रहना और स्वस्थ रहना भी संभव है अन्यथा जीवित तो रहेंगे लेकिन मर मर कर जीने के हालत भी बन जायेंगे. इस दिशा में पहल करें और जीवन को बचाएं.
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शनिवार, 27 मार्च 2010
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