www.hamarivani.com
lekhan ka saphar लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
lekhan ka saphar लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 4 जून 2010

मेरे लेखन का सफर: स्मृतियाँ कुछ तिक्त कुछ मधुर (४)

                                       मेरे रोज के लेखन में ऐसी ही समस्याएँ  और उससे जुड़ी कहानियां ही थी. लेकिन ये अवश्य था कि इससे  लोगों पर प्रभाव पड़ता था. बड़ा रुतबा रहता था और साथ ही ये भी ऐसी लड़की से शादी नहीं करेंगे ये तो घर कि बाते बाहर भेज देगी.  खैर ये तो मेरी चिंता का विषय नहीं था. मेरे पापा का एक वादा था कि जब तक मैं पास होती रहूंगी वे मुझे पढ़ने से नहीं मना करेंगे.  मैं एक  M . A . कर चुकी थी और दूसरे में कर रही थी. कविताओं के ढेर हो चुके थे लेकिन कहीं भेजने कि हिम्मत नहीं होती थी या ये कहो कि साहस नहीं कर पा रही थी. तभी सोचा कि क्यों न कादम्बिनी में भेजा जाय  और मैंने अपनी एक कविता के साथ फोटो रख कर भेज दी. ये काम मैं किसी को बाद में बताती थी जब कि स्वीकृति आ जाती . पता चला कि कादम्बिनी से कविता इस आदेश के साथ लौटकर आ गयी कि आप अपनी २-३ कविताएँ और साथ ही फोटो ग्लोसी पेपर पर बनवा कर भेजे. मुझे तो पता नहीं था कि ये ग्लोसी पेपर होता क्या है? फिर पापा से बोला तो पापा ने बनवा कर दी.
                         १९७५ में मेरी पहली कविता प्रकाशित हुई. मैंने पहली कविता रेखा 'भावना'  के नाम से लिखी थी. मेरी सहेली प्रतिमा ने यही नाम सुझाया था . पहले हम यही सोचा करते थे कि जब कविता लिखते हैं तो पीछे कुछ उपनाम लगते हैं. मेरे पापा 'सुमन' के नाम से लिखते थे. तारीफ की बात ये है कि मैंने आज तक कभी अपने पापा का लिख हुआ नहीं पढ़ा. तब जिस तरह से मैं लिखती थी. आज भी मुझे लगता है कि मेरी भाषा और शैली और सोच में कहीं भी बदलाव नहीं हुआ है.
  इस कविता के प्रकाशित होने के साथ ही फिर फैन मेल का सिलसिला शुरू हो गया क्योंकि मनोरमा में पता प्रकाशित नहीं होता था और इससे सिर्फ नाम और शहर ही रहता था. उससे फैन मेल का खतरा कम होता था. अब फिर वही सिलसिला शुरू हो गया . इसमें प्रबुद्ध और संवेदनशील  लोगों के पत्र अधिक होते थे. कई पत्रिकाओं के कविता भेजने के प्रस्ताव और फिर मित्रता और शादी के प्रस्ताव आने बहुत ही मामूली बात थी. हम सभी भाई बहन इस पत्रों को मजे लेकर पढ़ा करते थे. इससे मेरी माँ को बहुत उलझन होती थी लेकिन कहती कुछ न थी.  एक प्रतिष्ठित पत्रिका में स्वरचित रचना को स्थान मिलना मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी. अब कदम आगे बढ़ाने की सोची तो धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान पर हाथ आजमाना शुरू किया.   इस काम में किसी को हमराज नहीं बनाती थी, सिर्फ मेरी छोटी बहन थी जिससे मैं अपने लैटर पोस्ट करवाती थी . उसको सब पता रहता कि मैं क्या कहाँ भेज रही हूँ? इस दिशा में मुझे न कोई गाइड करने वाला था और न ही मुझे कोई नियम क़ानून पता थे. बस हाथ से लिखा ( राइटिंग मेरी अच्छी थी) और लिफाफे में रख कर पोस्ट कर दिया. फिर भूल गयी जब स्वीकृति आ गयी तो समझ गए कि अब छप जाएगा. मेरी सबसे पहली कमाई मुझे मनोरमा से हुई थी तब एक पत्र के २५ रुपये पारिश्रमिक मिलता था. और उस समय इसकी बहुत कीमत होती थी. मैं अपने लिखे हुए को भेजने , मित्रों और भाइयों को पत्र लिखने सब का खर्चा खुद उठने में सक्षम थी.         
                       उसी समय साप्ताहिक हिंदुस्तान में "टूटी हुई जिन्दगी" नाम से महिला पृष्ठ पर एक श्रंखला शुरू की गयी. मैंने भी लिख कर भेज दिया और इत्तेफाक से वह स्वीकृत हो गया और छप कर आ गया. ये सच कहानी पर ही आधारित होती थी और कहानी मेरे एक खास रिश्तेदार  , जो कि मेरे घर अक्सर आते रहते थे,  पर आधारित थी.  साप्ताहिक हिंदुस्तान आया ही था और चूंकि उसमें मेरी कहानी थी तो बाहर कमरे में रखा था. इतने में वे आ गए और मुझे काटो तो खून नहीं क्योंकि मेज पर पत्रिका रखी है और अगर उन्होंने उठ कर कहानी पढ़ ली तो क्या होगा? आखिर मैं भी इंसान थी. डर लगा और मैंने छोटी बहन से कहा कि तुम वहीं रहना जैसे ही साप्ताहिक ये मेज पर वापस रखें तुरंत ले आना. खैर ऐसा कुछ नहीं हुआ उन्होंने उलट पलट कर रह दिया और मैं चिंता से मुक्त हुई. जब मैंने ये बात माँ को बतलाई तो माँ लगी डांटने- मैंने कहा था कि ये काम मत करो , बेकार कि बुराई हो जायेगी.   उनका भी कहना सही था क्योंकि भले हम गलत करें लेकिन अगर किसी ने कह दिया तो वह हमारा सबसे बड़ा दुश्मन होता है.
           मैंने कहा बुराई हुई तो नहीं न, बस ऐसे ही डर कर रहे तो लिख चुके हम तो. इसके बाद और दो कहानियां इस कालम में प्रकाशित हुई .  अब मैं स्थापित लेखक बन चुकी थी. और साप्ताहिक में छपना आसन काम नहीं था लेकिन मैंने तो कुछ किया भी नहीं. यहाँ तक कि मैं संपादक के नाम उसके साथ पत्र लिख कर भी नहीं रखती थी.  इस कहानी से मुझे उस समय १२५ रुपये का चैक मिला. मेरा बैंक में कोई अकाउंट तो था नहीं, अभी तक तो मनी आर्डर से पैसे आ जाते थे. कभी जरूरत ही नहीं पड़ी. पहली बार मैंने बैंक में अकाउंट खुलवाया. और तारीफ की बात ये थी कि मैं उस बैंक में न उस समय न आज तक कभी गयी ही नहीं. अकाउंट खुल गया, पैसे आ गए और निकलवा भी लिए. मैंने बैंक की शक्ल नहीं देखी. इतनी जानपहचान थी कि जाने की जरूरत नहीं पड़ी  .
                                      सामाजिक रूढ़ियों, नारी शोषण , अंधविश्वास और अन्याय के प्रति ही मैंने हमेशा लिखा . कौन क्या कहता है? इसके बारे में मैंने कभी नहीं सोचा. लेकिन हाँ कहीं ये बात सामने आई कि लड़की लिखती है तो कहीं घर की बातें बाहर न चली जाएँ. मैंने सुन लिया और सोचा कि ऐसे लोग जरूर कुछ गलत करते होंगे तभी तो उन्हें घर की बातें बाहर जाने का डर है.  वे मेरी सोच के अनुरुप नहीं हो सकते और इससे पहले वे मेरे पापा और भाई साहब के द्वारा लिस्ट से हटा दिए जाते .
                                      मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी. डबल M .A .  राजनीति और समाजशास्त्र में कर चुकी थी.  अपने करार के अनुसार पापा ने पूछा कि अब किया इरादा है? मैंने कहा कि अब LLB  करना चाहती हूँ, लेकिन वह उस समय उरई में थी  नहीं सो नहीं हो सकी. वैसे मेरा सपना जज बनाने का था.  ताकि मैं अन्याय के खिलाफ खड़ी हो सकूं. वह  नहीं हो पाया. मैं मस्त इंसान नहीं हुआ तो कोई बात नहीं अपनी कलम जिंदाबाद फुरसत किसे थी कि सोचें कि अब क्या करें? 
                                      मेरी शादी कि बात मेरे एक रिश्तेदार ने अपने ही रिश्तेदार के साथ चलाई. उन लोगों को पता चला कि लड़की लिखती है और पत्रिकाओं में छपता है. उनके लिए ये नयी बात थी , खैर वह तैयार नहीं हुए, मेरे भाई साहब सुबह वापस आने वाले थे कि रात में लड़का अपने  टूर से वापस आ गया , रात में भाई साहब से बात करता  रहा  और जब लड़के को पता चला कि ऐसा है तो भाई साहब तो सुबह वापस आ गए,   लेकिन उसने घोषणा कर दी कि जब शादी करनी ही है तो इसी लड़की से क्यों नहीं? घर वाले चाहते थे कि कहीं इकलौती लड़की से करें जहाँ दान दहेज़ और मकान भी मिल जाए. और भी कई प्रस्ताव थे उनके पास. अब अगर लड़का ही अड़ जाए तो कोई क्या करे?  लड़के ने अपने रिश्तेदार के द्वारा कहलाया कि फिर से आये बात करने. भाई साहब फिर पहुंचे तो उनके बड़े भाई और पिताजी ने बहुत नखरे दिखाए आखिर रात १ बजे बात बनी और भाई साहब शगुन करके चले आये.  मेरे लिखने से प्रभावित हो कर ही इन्होने शादी की जिद पकड़ी थी और आज वही मेरे पतिदेव आदित्य जी हैं.

बुधवार, 2 जून 2010

मेरे लेखन का सफर : स्मृतियाँ कुछ तिक्त कुछ मधुर (३) !

                     कभी फिल्मी पत्रिका के लेख और कभी कोई और आलेख चर्चा का विषय बनाये ही था.  लेखन में  समाज और अन्याय  के प्रति आक्रोश शुरू से ही था और मेरी सारी रचनाएँ ऐसी ही होती थी. मैं कोई बहुत बड़ी तो थी नहीं और न ही बड़े शहर की रहने वाली एक क़स्बा  है ( अब नहीं रहा क़स्बा)  सब एक दूसरे को जानने वाले , फिर मेरे पापा उरई में सम्मानित व्यक्तियों में थे और भाई साहब भी B .Sc . करके इंटर कॉलेज में अध्यापक हो गए थे. वह भी बड़े सिद्धांतवादी थे क्या,  आज भी वैसे ही हैं? उन्हें कोई बात गलत पता चलती तो कहते -  'रेखा इस पर ऐसा लिखो कि पढ़ कर ये ऐसे काम करना भूल जाए.'
                    जो आलेख मेरे को लगते कि कोई वबाल खड़ा हो सकता है वह मैं 'भावना' नाम से लिखने लगी. सिर्फ मेरी बहनों बाकी किसी को नहीं. उस समय कुछ विषय ऐसे थे जिनपर सबके सामने बात नहीं होती थी और उन पर लिखना भी अच्छा नहीं समझती थी . इस लिए ऐसे हॉट विषय पर उस समय ये हॉट कि श्रेणी में ही आते थे.


उसी समय भोपाल  के प्रतिष्ठित लेखक जगदीश किंजल्क से संपर्क हुआ. उनहोने एक परिचर्चा आयोजित की.
"विवाह में वैदिक रीति अधिक उचित या अन्य" ऐसा ही कुछ विषय था . मैंने वैदिक रीति का समर्थन किया और आज भी करती हूँ, वैदिक मन्त्रों की महत्ता को मैं बहुत मानती हूँ और इसको अनुभूत किया है. बस उसका छपना था की शादी के प्रस्ताव आने शुरू हो गए. हर दूसरे पत्र में प्रस्ताव. हम भाई बहन मजे ले लेकर पढ़ते और फिर रख देते.
                 अब तो मोहल्ले वालों को भी चिंता होने लगी की लड़की के नाम इतने सारे ख़त आते हैं, जरूर कुछ गड़बड़ है इसकी शादी हो जानी चाहिए. अब मोहल्ले की महिलाओं ने आकर मेरी माँ को समझाना शुरू किया कि  अगर कहीं बदनाम हो गयी तो कोई शादी भी नहीं करेगा. कहीं कुंवारी लड़कियों के नाम इतने ख़त आते हैं. मेरे घर में भी तो हैं, रिश्तेदारों  के भी इनके ही नाम आते हैं. मैं उस मंडली में कोई रूचि नहीं रखती थी. हाँ माँ ने कहा तो चाय नाश्ता बना कर दे दिया . मेरी छोटी बहने ये काम करती थी. पहले सुनती और फिर जाकर मुझे बताती. मेरी माँ भी गाँव की थी फिर इन सबसे उनका कोई वास्ता नहीं था. फिर एक दिन ऐलान हुआ कि ये लिखना  विखना बंद करो. ये सब अपने घर में जाकर करना. वो ऐसे कह रही थी, वो ऐसे कहती है. मुझे इज्जत से शादी कर लेने दो मेरी अभी और भी लड़कियाँ हैं. मेरे बाद मेरी ३ बहने छोटी थी. बात पापा के पास तक गयी क्योंकि माँ के हथियार तो वही थे.
                       पापा मेरे प्रबुद्ध व्यक्ति थे और वे खुद भी लिखते थे. उन्होंने माँ को समझाया की ऐसा नहीं होता है, ये औरतें तो बिना  पढ़ी लिखी हैं तो क्या तुम भी ऐसे ही करोगी? वो जो कर रही है उसको करने दो. शादी भी हो जायेगी अभी उसको पढ़ने दो.
इस समय तक मेरे आलेख  मनोरमा में छपने लगे थे. मनोरमा ऐसी पत्रिका थी कि महिलाओं की पत्रिका करीब सभी के घर तो नहीं आती लेकिन हाँ आम घरों तक आती ही थी और उसमें लिखा हुआ सब पढ़ते थे.  उस समय भी नारी, सामाजिक मुद्दे ही मेरे लेखन के  विषय थे.
            मनोरमा में "आपके पत्र' नाम से कालम आता था और मैं उसी में अपनी बात कह पाती थी , सब उसको चाव से पढ़ते थे. मेरे एक बहुत दूर के रिश्तेदार थे, उनकी तीन बहुएं जलकर  मरी और दो बेटों की.  एक दिन बताने चली आई कि उसकी शादी वाले आ रहे हैं लोग भड़का देते हैं, अगर हमारे पास पैसा है तो हम अभी चार शादियाँ और कर लेंगे. मुझे सुनकर बहुत बुरा लगा कि एक तो जल कर मार डाला और फिर ये तुर्रा. मैंने उनको लक्ष्य करके मनोरमा में भेज दिया और जब प्रकाशित हो गया तो समझा ही जा सकता कि वो दनदनाती  हुई मेरे घर आ गयी कि कैसे रिश्तेदार हो तुम ? बात को ऐसे फैलाया जाता है, हम भी देख लेंगे अभी तुम्हें ४-४ लड़कियों की  शादी करनी है. मेरी माँ तो बैठ कर रोने लगी , मुझे भी डर लगा कि कहीं पापा कुछ न कहें. भाई साहब आये तो पता चला. मैंने अन्दर कमरे में जाकर लेट गयी. मुझे बुलाया गया. माँ इस आशा में कि भाई साहब अब मुझे डांट लगायेंगे बिल्कुल एलर्ट बैठ गयी.
    'हाँ , रेखा किसपर लिखा था तुमने?'
    'उन्हीं की बहुयों के जलाने पर लिखा था.' मैं डांट पड़ने के डर से बहुत धीमे धीमे बोल रही थी.
    'ये तो तुमने बहुत अच्छा किया , ऐसे लोगों को चौराहे पर खड़ा करके जूते भी लगाये जाएँ तो कम है.'
    मेरी तो आँखे चमक उठी और माँ शांत हो गयीं की अब तो ये मानने वाली नहीं. पापा और भाई साहब की शह मिल रही है.


 मेरा काम अपनी गति से चलने लगा. अब मुझे किसी कि भी परवाह नहीं थी. मेरी अभिव्यक्ति और विचारधारा वैसे ही आज भी है, आदर्शों और सिद्धांतों पर चलाने वाली अगर कुछ गलत है तो गलत है चाहे उसके करने वाला मेरा अपना खास ही क्यों न हो. मेरी लेखनी के शिकार मेरे अपने बहुत करीबी भी बने और मैंने बेबाकी से ही लिखा. वह बात और है कि उ सा बात का उलाहना मेरे पापा या भाई साहब को सुनने को मिला हो. मिलता रहता था और वे अपने ढंग से उससे निपटते रहते थे. बस मुझे बता देते कि आज तुम्हारे इस लिखने से ये हुआ.
          इन्हीं के साथ एक कटु अनुभव ये भी हुआ कि मेरी एक शिक्षिका थी अब रिटायर हो चुकी थी लेकिन उन्होंने मुझे बचपन में पढ़ाया था और हम उनको 'चाची बहनजी ' कहते थे. घर से बहुत दूर नहीं रहती थी. पता चला कि उनकी पुत्रवधु उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार करती है. सबसे बुरी बात जो मेरे दिल को लगी वो ये थी. कि चाची बहनजी हमेशा एकदम सफेद साड़ी पहनती थी. अब सुना कि बहू अपने कपड़े धो कर उससे निकले साबुन में कहती कि अब अपनी साड़ी इसमें धो लेना. हो सकता है कि ये आपको कहानी लगती हो लेकिन ऐसा ही था और इससे भी बहुत अधिक सुना. मेरा मन तो रो दिया. हमेशा स्मार्ट रहने वाली मेरी वो शिक्षिका आज इस हाल में. फिर क्या था मेरी वेदना बह निकली और निकल कर इस रूप में आ गयी.
              मनोरमा आई नहीं कि ये खोज शुरू हो गयी कि ये रेखा श्रीवास्तव है कौन? मेरा घर बहुत दूर नहीं था और सब आपस में परिचित भी थे. इत्तेफाक से उनके पुत्र मेरे भाई साहब के कालेज में ही टीचर थे.  कैर उनको पता चल गया कि ये रेखा श्रीवास्तव है कौन? फोटो उसमें बहुत साफ नहीं छपा था फिर भी पता चलना कोई बड़ी बात नहीं थी . फिर क्या था? एक दिन कॉलेज में स्टाफ रूम में भाई साहब से बोले - 'विनोद तुम्हारी सिस्टर ने ये ठीक नहीं किया?'
'क्या ठीक नहीं किया? क्या किया है उसने? ' भाई साहब को पता था लेकिन उन्होंने भी नाटक किया.
'यही जो मनोरमा में निकाला है, कितनी बदनामी हो रही है?' वे गुस्से में थे.
उसमें उनका नाम कहीं भी नहीं दिया था. लेकिन कहानी अपनी हो तो सबको पता चल जाता है.
'देखो, मेरी सिस्टर लिखती है, और वह क्या लिखती है इससे मेरा कोई सरोकार नहीं. वह लिखने के लिए फ्री है. अगर तुम्हें लगता है तो जाकर उस पर मानहानि का मुकदमा कर दो.' भाई साहब ने दो टूक जबाव दिया था.
                      अब तो स्टाफ रूम में सभी टीचर ' अरे विनोद रेखा ने क्या लिखा है? यहाँ लाओ हम भी पढ़ें?' लोगों को तो मजा आता है किसी कि बात का बतंगड़ बनाने. भाई साहब ने आकर मुझे बताया मैंने कहा - ' ये स्टाफ रूम में नहीं जायेगी , अगर उनमें जरा सी भी गैरत होगी तो वे अपने व्यवहार को सुधारने का प्रयास करेंगे.'                                                                     (क्रमशः)