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बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

चुनौती जिन्दगी की: संघर्ष भरे वे दिन (८)

मुकेश कुमार सिन्हा

रास्ते जिन्दगी के सुगम तो नहीं होते लेकिन कभी वो सिर्फ कांटे ही कांटे दिखलाता है और कभी डूब से भरी जमीन सुखद अहसास लिए होता है और कभी उससे उतरते ही काँटों की चुभन भी अनुभव होती है। फिर भी हम जीते हें और हर पल को उतनी ही शिद्दत से जीते हें। ऐसे पलों से दो चार होते रहे मुकेश कुमार सिन्हा के अनुभव प्रस्तुत हें


जिंदगी के सफ़र में आगे बढ़ते गए, बहुत सारी रुकावट आयी.....सिर्फ आयी ही नहीं, आज भी साथ ही है......संघर्ष! देखा ही नहीं, अनुभव किया... जिंदगी के हर पल.. !! रेखा दी ने कहा, अपने कुछ उस खास पल के लिए लिखो जिसको तुम समझते हो, उस रुकावट को तुम्हें बहुत बेहतर ढंग से पार किया हो, पर शायद मुझे ऐसा कुछ नहीं दिख रहा जो लगे कि सिर्फ इस पल में मैंने जिंदगी को जलते देखा हो, सच कहता हूँ.. आज तक ऐसा कभी भी नहीं आया, जब मुझे लगा हो............. क्या मस्त जिंदगी है.... हर कुछ दिनों बाद कुछ न कुछ बड़ी सी कठिनाई मुह बाये खड़ी हो जाती है... बेशक ये अलग बात है, उस से लड़ने कि आदमी इच्छा कहूँ या भगवान कि दी हुई ताकत... जो कठिनाई आते ही अपने आप उड़ भी जाती है ... मुझे नहीं लगता ये कभी कम होगा.... ये आगे भी जारी रहेगा ...

पर अगर पीछे मुड़ के देखता हूँ तो लगता है , बहुत कुछ पाया मैंने... ये अलग बात है कि वो जो पाया वो अपने परिवार और दोस्तों का सिर्फ प्यार है..!
शुरू की जिंदगी खुबसूरत थी, मेरा बचपन अपने दादा दादी के प्यार में पला बढ़ा, वो सरकारी मुलाजिम थे, और अपने साथ ही मुझे रखा, मैंने दादी में ही माँ को पाया, उसको मैया कहता था... फिर धीरे धीरे बचपन से आगे बढे... छः भाई बहनों में सबसे बड़ा हूँ, और मेरे पिताजी के पास कोई खास नौकरी भी नहीं ...जो थी वो भी बराबर बदलती रही... मेट्रिक के बाद से ही मैं आर्थिक रूप से खुद पे निर्भर रहा, पहले टूयुशन, प्राइवेट स्कूल में अध्यापन का कार्य, फिर दुकानदारी, एक छोटी सी फैक्ट्री में उनके account का काम, medical representative , insurance consultant , नॉन-बैंकिंग सहारा इंडिया में मैंने लगातार दस साल तक field जॉब में रहा....... सामान्यतः एक माध्यम वर्गीय परिवार से सम्बन्ध रखने वाले लोग आर्थिक बदहाली के कारण सिर्फ अय्यासी वाली जिंदगी जी नहीं पाते, पर हमने अपने आर्थिक बदहाली के कारण जीने कि सबसे अहम् जरुरत खाना में कमी भी देखा है.... फिर आदमी जब मुश्किल हालातों से गुजरता है तो धीरे धीरे उसकी आदत हो जाती है... ......... और जब आदत होने लगी तो अंत में नौकरी मिल गयी...:)
फिर एक एक छोटे से शहर का छोरा दिल्ली पहुँच गया...और सबसे पहले पोस्टिंग मिली अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधान मंत्री कार्यालय में ..फिर मनमोहन सिंह के साथ. उनके मातहत में रहे... फिर कृषि मंत्रालय में स्थानांतरण हुआ और फिर अब ..कृषि राज्य मंत्री के साथ सम्बद्ध है...| धीरे धीरे जिंदगी संवरती गयी... पर कठिनाइयों से मेरा चोली दामन का सम्बन्ध रहा... शादी करके आये तो सोचा तो ... बहुत सारी खुशियाँ देंगे.. पर कुछ दिनों में अक्ल ठिकाने आ गए, किराये के मकान में जब बेड तक नहीं था... मुझे याद है, हम उस समय टी.वी. लेना चाहते थे.. पर दूकानदार consumer loan देने को तैयार नहीं था, क्योंकि मेरी पोस्टिंग प्रधानमंत्री कार्यालय में थी, उन्हें लगता था.. हम नहीं लौटाए तो वो क्या कर लेंगे...!!, फिर जिंदगी पटरे में आने लगी तो मेरे से दस साल छोटे भाई का दोनों किडनी ख़राब हो गया... ! उसके लिए transplant अब कैसे और किस तरह हुआ ये अलग बात है..| fir अपनी दीदी को अपने सामने आँख मूंदते हुए देखा... अनुभव किया.... | २०१० में अपने शादी के वर्षगांठ के दिन ही अपने हाथ और पैर दोनों तुडवा लिए.. !! अब आप ही बताओ, कैसे कहूँ कि कोई खास पल था, जब मैंने कठिनाई के सबसे उच्च स्तर को झेला हो... .. और भी बहुत सारी रुकावटें आयी, और आज भी कुछ न कुछ लगा रहता है... पर जिंदगी है तो दर्द है... और दर्द को दूर करने कि कोशिश भी जारी है.......


जिंदगी के सफ़र में आगे बढ़ते गए, बहुत सारी रुकावट आयी.....सिर्फ आयी ही नहीं, आज भी साथ ही है......संघर्ष! देखा ही नहीं, अनुभव किया... जिंदगी के हर पल.. !! रेखा दी ने कहा, अपने कुछ उस खास पल के लिए लिखो जिसको तुम समझते हो, उस रुकावट को तुम्हें बहुत बेहतर ढंग से पार किया हो, पर शायद मुझे ऐसा कुछ नहीं दिख रहा जो लगे कि सिर्फ इस पल में मैंने जिंदगी को जलते देखा हो, सच कहता हूँ.. आज तक ऐसा कभी भी नहीं आया, जब मुझे लगा हो............. क्या मस्त जिंदगी है.... हर कुछ दिनों बाद कुछ न कुछ बड़ी सी कठिनाई मुह बाये खड़ी हो जाती है... बेशक ये अलग बात है, उस से लड़ने कि आदमी इच्छा कहूँ या भगवान कि दी हुई ताकत... जो कठिनाई आते ही अपने आप उड़ भी जाती है ... मुझे नहीं लगता ये कभी कम होगा.... ये आगे भी जारी रहेगा ...

पर अगर पीछे मुड़ के देखता हूँ तो लगता है , बहुत कुछ पाया मैंने... ये अलग बात है कि वो जो पाया वो अपने परिवार और दोस्तों का सिर्फ प्यार है..!
शुरू की जिंदगी खुबसूरत थी, मेरा बचपन अपने दादा दादी के प्यार में पला बढ़ा, वो सरकारी मुलाजिम थे, और अपने साथ ही मुझे रखा, मैंने दादी में ही माँ को पाया, उसको मैया कहता था... फिर धीरे धीरे बचपन से आगे बढे... छः भाई बहनों में सबसे बड़ा हूँ, और मेरे पिताजी के पास कोई खास नौकरी भी नहीं ...जो थी वो भी बराबर बदलती रही... मेट्रिक के बाद से ही मैं आर्थिक रूप से खुद पे निर्भर रहा, पहले टूयुशन, प्राइवेट स्कूल में अध्यापन का कार्य, फिर दुकानदारी, एक छोटी सी फैक्ट्री में उनके account का काम, medical representative , insurance consultant , नॉन-बैंकिंग सहारा इंडिया में मैंने लगातार दस साल तक field जॉब में रहा....... सामान्यतः एक माध्यम वर्गीय परिवार से सम्बन्ध रखने वाले लोग आर्थिक बदहाली के कारण सिर्फ अय्यासी वाली जिंदगी जी नहीं पाते, पर हमने अपने आर्थिक बदहाली के कारण जीने कि सबसे अहम् जरुरत खाना में कमी भी देखा है.... फिर आदमी जब मुश्किल हालातों से गुजरता है तो धीरे धीरे उसकी आदत हो जाती है... ......... और जब आदत होने लगी तो अंत में नौकरी मिल गयी...:)
फिर एक एक छोटे से शहर का छोरा दिल्ली पहुँच गया...और सबसे पहले पोस्टिंग मिली अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधान मंत्री कार्यालय में ..फिर मनमोहन सिंह के साथ. उनके मातहत में रहे... फिर कृषि मंत्रालय में स्थानांतरण हुआ और फिर अब ..कृषि राज्य मंत्री के साथ सम्बद्ध है...| धीरे धीरे जिंदगी संवरती गयी... पर कठिनाइयों से मेरा चोली दामन का सम्बन्ध रहा... शादी करके आये तो सोचा तो ... बहुत सारी खुशियाँ देंगे.. पर कुछ दिनों में अक्ल ठिकाने आ गए, किराये के मकान में जब बेड तक नहीं था... मुझे याद है, हम उस समय टी.वी. लेना चाहते थे.. पर दूकानदार consumer loan देने को तैयार नहीं था, क्योंकि मेरी पोस्टिंग प्रधानमंत्री कार्यालय में थी, उन्हें लगता था.. हम नहीं लौटाए तो वो क्या कर लेंगे...!!, फिर जिंदगी पटरे में आने लगी तो मेरे से दस साल छोटे भाई का दोनों किडनी ख़राब हो गया... ! उसके लिए transplant अब कैसे और किस तरह हुआ ये अलग बात है..| fir अपनी दीदी को अपने सामने आँख मूंदते हुए देखा... अनुभव किया.... | २०१० में अपने शादी के वर्षगांठ के दिन ही अपने हाथ और पैर दोनों तुडवा लिए.. !! अब आप ही बताओ, कैसे कहूँ कि कोई खास पल था, जब मैंने कठिनाई के सबसे उच्च स्तर को झेला हो... .. और भी बहुत सारी रुकावटें आयी, और आज भी कुछ न कुछ लगा रहता है... पर जिंदगी है तो दर्द है... और दर्द को दूर करने कि कोशिश भी जारी है.......

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

चुनौती जिन्दगी की: संघर्ष भरे वे दिन (७)


अनीता कुमार


संघर्ष के अलग अलग स्वरूपों को हम देख रहे हें औरों की आँखों और अनुभवों से , कभी तो लगाने लगता है कि कहीं ये हमारी कहानी ही तो नहीं है क्योंकि जिन्दगी के कुछ पहलू ऐसे होते हैं जो सामने से एक जैसे ही होते हैं वह उनके रंग अलग हो जाते हैं। कभी वे रंग बहुत गहरे और कभी बहुत हल्के होते हैं लेकिन ये संघर्ष के पल इंसान की परीक्षा लेते हैं - उनसे लड़ने की क्षमता तो वह ईश्वर ही देता है और हम उसके सामने नत होते हैं।


रेखा जी ने अनुरोध किया कि कुछ लिखूं इस नये स्तंभ के लिए और मैं तब से पीछे मुड़ कर जिन्दगी को देख रही हूँ
, सोच रही हूँ कि क्या बताऊं? जो मेरे लिए संघर्ष रहा वो शायद नितांत व्यक्तिगत है, उसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है और जो मेरे लिए एक हादसा था वो शायद संघर्ष की परिभाषा में आता ही नहीं। फ़िर भी एक ऐसी घटना जिसने मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव डाला वो आप के साथ बांट रही हूँ, अगर वो संघर्ष की परिभाषा में न बैठता हो तो रेखा जी से अग्रिम माफ़ी मांग रही हूँ।

बात उन दिनों की है जब कॉलेज में नौकरी लगे एक दो साल हुए थे, बेटा चार पांच साल का था। कई साल इंडस्ट्री में काम करने के बाद हम अध्यापन क्षेत्र में आये थे और आते ही समझ गये थे कि अगर इस क्षेत्र में आगे बढ़ना है तो पी एच डी करनी चाहिए, जरूरी नहीं था लेकिन कैरियर के लिए अच्छा था। सो हमने पी एच डी करना शुरु कर दिया। काम लगभग पूरा होने को आया। डेटा एकत्र कर लिया गया था और अब उसका विश्लेषण करना बाकी था। उन दिनों कंप्युटर इतने आम नहीं थे। किसी के घर में होना तो दूर बहुत कम दफ़तरों में भी कंप्युटर पाये जाते थे। मेरे पिता के एक मित्र ने हमारी सहायता करने का वादा किया और अपने एक दोस्त को फ़ोन किया। तय ये हुआ कि इतवार के दिन मैं और मेरे अंकल उस व्यक्ति के दफ़तर जायेगें और वहां काम करेगें ताकि उसके दफ़तर की आम रूटीन में भी खलल न पड़े।

उस इतवार हम खुशी खुशी अपना पूरा डेटा समेटे डबल डेकर बस में सवार हो लिए, घर से करीब 25 कि मी की दूरी पर वो दफ़्तर था जहां हमें जाना था। बम्बई की सड़कें तब भी हमें चांद पर होने का एहसास दिलाती थीं और आज भी। खैर हाथी जैसी भारी भरकम बस के ऊपरी तल पर बैठे ऐसे हिचकोले खा रहे थे जैसे हाथी पर ही बैठे हों। दो घंटे लगे हमें उस सफ़र पार करने में।

काम शुरु हुआ, कुछ हमने समझाया कि हम क्या करना चाहते हैं कुछ उन लोगों ने समझाया कि कंप्युटर क्या कर सकता है। आधा घंटा भी न गुजरा होगा कि हमें लगा जैसे कुर्सी की सीट गीली हो रही है। हम आश्चर्यचकित रह गये और तुरंत अपनी सीट से उठ खड़े हुए। हमने पूछा क्या यहां बाथरूम है? और हाँ सुनते ही उस तरफ़ दौड़ लिये। आधा घंटा गुजर गया, अंकल परेशान कि हम बाथरूम से बाहर नहीं आये, अब आगे क्या काम करना है वो कैसे निश्चित हो, जिस व्यक्ति का दफ़तर है उसे भी खाना खाने घर जाना है उसे इतवार के दिन इस तरह रोकना ठीक नहीं, पर हमें भी कैसे आवाज दे इसी उपापोह में थे कि इतने में दफ़तर मालिक की पत्नि वहां आ गयी। उन दोनों की जान में जान आयी और उन्हों ने उसे पता करने भेजा कि हम बाथरूम से बाहर क्युं नहीं आ रहे।

उस महिला ने आकर पूछा हमने अपना हाल बताया उसने सोचा कि अचानक महिला को जो इमरजेंसी आन पड़ती है वो आन पड़ी होगी, उसने कहा वहीं आले में सेनिटरी नैपकिन रखें हैं ले लो। हमने कहा कि बात उस से कहीं आगे बढ़ चुकी है और हमारे पूरे कपड़े भीग चुके हैं और हम बाहर नहीं आ सकते, हमारे घर फ़ोन लगाया जाये और पति देव से कहा जाये कि वो दूसरा जोड़ा कपड़ों का ले कर आयें और अगर हो सके तो काली साड़ी ले कर आयें तब उस महिला के कान खड़े हुए उसने पूछा कि क्या बात है? दरअसल मेरी प्रेंगनेंसी का तीसरा महीना था और माहवारी होने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था। उन दिनों मोबाइल नहीं हुआ करते थे। एक घंटे में हम अस्पताल पहुंच गये। डॉक्टर ने कहा बस के झटके लगने से नुकसान तो हुआ है लेकिन ऐसा नहीं कि बचाया न जा सके। शर्त ये थी कि हम कम से कम सात दिन अस्तपताल में सीधे लेटे रहें करवट भी न बदलें।

उसी समय पता चला कि मेरे ससुर जो रूटीन चैक अप के लिए अस्पताल गये थे उन्हें वहीं भर्ती कर लिया गया है।( यहां मैं बताती चलूं कि मेरे ससुर आर्मी में थे और बहुत ही छोटी उम्र में उनका एक फ़ेफ़ड़ा दूसरे विश्वयुद्ध की बली चढ़ गया था। आठ गोलियां लगने के बावजूद उन्हें आर्मी डॉक्टर्स ने बचा तो लिया था लेकिन उन्हें सेवानिवृत होना पड़ा था।)

अब ससुर उस समय भर्ती थे नेवी अस्पताल में कोलाबा में और मैं पड़ी थी चैम्बूर के अस्पताल में। पति देव के लिए अपना दफ़तर और दोनों अस्पताल के चक्कर काटना बहुत भारी पड़ रहा था। हमने कहा आप ससुर जी को देखिये मेरे पास मेरे माता पिता हैं ही। पर इस तरह बिना कुछ किये बिस्तर पर पड़े रहना मेरे लिए बहुत ही असहनीय था। खास कर तब जब अस्पताल से छुट्टी देते समय डॉक्टर ने कहा कि और पंदरह दिन घर पर भी ऐसे ही लेटे रहना पड़ेगा। हम अपनी माँ के घर पर थे। पांच साल के बेटे को बड़ा अजीब लगता था कि मां हर समय लेटी रहती है, वो चाहता था कि हम उसे घुमाने नीचे ले कर जायें उसके साथ खेलें…इतने में हमारे घर कुछ मेहमान भी आ गये और माँ पर बोझ दोहरा हो गया। अब हमसे लेटा नहीं जा रहा था।

हमने एक रात माँ से कहा कि चाहे कुछ भी हो जाये कल हम ससुर को देखने जरूर जायेगें वो अपने मन में क्या सोचते होगें, आखिरकार प्रेगनेंसी कोई बिमारी थोड़े है जो मुझे देखने भी न आयी और अपनी मां के घर जा कर बैठ गयी। माँ ने हलका सा विरोध किया और तय हुआ कि कल डॉकटर को फ़ोन किया जायेगा। हम सब सो गये।

रात तीन बजे फ़ोन की घंटी घनघना उठी। हड़बड़ा कर मेरे पिता ने फ़ोन उठाया। दूसरी तरफ़ मेरे पति थे, कह रहे थे कि अभी अभी मेरे ससुर का देहांत हो गया है और ये खबर वो अपनी मम्मी को फ़ोन पर नहीं देना चाहते। उन्हें अस्पताल से निकलने में काफ़ी समय लगेगा और वो चाहते हैं कि मैं खुद जा कर ये खबर अपनी सास को सुनाऊं। अब तो कुछ सोचने का समय ही नहीं था। मैं, मेरे माता पिता तीनों झटपट सड़क पर आ गये और टेक्सी तलाशने लगे। करीब पौने चार बजे हम खार( मेरी ससुराल) पहुंचे। उस दिन विशु का पर्व था, मलयालियों का नववर्ष, उस में ग्रहणी सुबह अंधेरे मुंह साल भर घर में काम आने वाला सारा सामान एक जगह सजाती है, दीप जलाती है और फ़िर घर के एक एक सदस्य को नींद से उठा कर सबसे पहले उन सब चीजों का दर्शन कराती है। मेरी सास उसी की तैयारी कर रही थीं। दरवाजे की घंटी बजी तो उन्हें लगा शायद मेरे पति अस्पताल से लौटे होगें। जैसे ही उन्हों ने दरवाजा खोला और हम तीनों को देखा तो उन्हें समझते और फ़िर बेहोश होते वक्त नहीं लगा। पूरे घर में हाहाकार मच गया।

मेरे जैठ अस्पताल भागे, मेरी जैठानी सास को संभालने में जुट गयीं और सब को इत्तला करने का सिलसिला शुरु हो गया। केरला से मेरे ससुर के भाई का फ़ोन आ गया कि उनके आने तक इंतजार किया जाये, मतलब ससुर जी के शरीर को करीब चौबीस घंटे रखना होगा। आने वालों का तांता लग गया।

हमने अपनी जैठानी से कहा कि वो मेहमानों को संभालें क्युं कि हमें मलयालम बोलनी नहीं आती और हम किचन संभालेगें। तीन दिन तक कई कई घंटे खड़े रह कर खाना बनाने से ले कर बर्तन मांजने तक का काम हम अथक करते रहे। तीसरे दिन मेरी मम्मी ने बहुत हिचकते हुए हमारी हालत का जिक्र किया। ये बात तो मैं और मम्मी पहले दिन ही समझ गये थे हमारा अजन्मा बच्चा भी उसी दिन चला गया जिस दिन हमारे ससुर गये थे। जैसे ही बात मेरे पति की ताई तक पहुंची उन्हों ने मेरे पति को आदेश दिया कि सब काम छोड़ अभी का अभी हमें अस्पताल ले कर जाया जाये। दूसरे दिन सुबह हम अस्पताल पहुचें डी एन सी करवाने। डॉक्टर ने खूब फ़टकार लगायी और पति देव से कहा कि अगर एक दिन की भी और देरी होती तो जहर हमारे पूरे शरीर में फ़ैल जाता और फ़िर हमें भी बचाना मुश्किल हो जाता।

उसके बाद दो महीने आलम ये था कि ऐसा लगता था जैसे हमारे शरीर में कोई नल लगा हुआ हो और हम दो महीने तक जमीन पर सोते रहे। दो महीने बाद जब कॉलेज पहुंचे तो सब को लगा कि हमें जोरदार पीलीया या टी बी हो गयी है।

पति देव ने ऐसी तौबा की कि निश्चय कर लिया कि अब कभी मुझे ऐसी मुसीबत में नहीं डालेगें…:) बस, कुछ सिलसिला ऐसा बना कि हम अपनी पी एच डी भी पूरी न कर सके, अब छोटा सा परिवार मैं वो और मेरा एक पुत्र्…

खुशी की बात ये है कि अब वो भी पिता बनने जा रहा है :)

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

chunauti jindgi kee: sangharsh bhare ve din (६)


वंदना गुप्ता
सबके जीवन के संघर्ष एक से नहीं होते लेकिन होते सभी के जीवन में है , बस उनके रूप बदले हुए होते हें और इस संघर्ष से गुजर कर ही जीवन के अर्थ को समझा जा सकता है और दूसरे भी कभी कभी संघर्ष के इस रूप से अवगत होते हें। अगर कभी खुद को उस स्थिति से गुजरना पड़े तो वे मानसिक तौर पर इस बात के लिए तैयार होते हें कि किसी दूसरे को भी इन हालातों से गुजारते देखा है और उनसे लदकर जीतते हुए भी देखा है। बस यही तो चाहत है कि हम सभी के अनुभवों से दो चार हो लें । आज प्रस्तुत हें वंदना गुप्ता के अनुभव :


कभी कभी खुद को वक्त के आईने में देखना कितना दुरूह होता है मगर जीवन एक संघर्ष है तो पन्ने पलटने ही पड़ते हैं ,पुनः अवलोकन करना ही पड़ता है और आज एक बार फिर ज़िन्दगी ने कहा है खुद को निहारो और देखो क्या थे तुम और क्या बन गए शायद इसलिए रेखा जी का सन्देश मिला कि अपने संघर्षों के बारे में लिखो . पहले तो समझ ही नहीं आया कि क्या लिखूं मगर दोबारा सन्देश मिला तो लगा शायद किस्मत या कहो ज़िन्दगी चाहती है कि एक बार फिर उन गलियारों से गुजरो शायद कोई भूला बिसरा सिरा फिर हाथ आ जाये .

यूँ तो आज की तारीख में ज़िन्दगी से कोई शिकायत नहीं है इस तरह मुड चुकी है कि अब ज़िन्दगी से मिलना जैसे मिलती है उसी तरह जीना सुखद लगता है मगर एक वक्त था जब इससे बहुत सी शिकायतें भी थीं जैसे हर आम इन्सान हो होती हैं क्यूँकि जो चाहो वो देती नहीं और जो देती है उसे हम चाह नहीं पाते . बस उन्ही रहगुजरों से हमें भी गुजरना पड़ा . बचपन तो बचपन होता ही है या कहो शादी से पहले और उसके बाद की ज़िन्दगी में जमीन आसमाँ का अंतर होता है सभी जानते हैं तो बस यहाँ भी शादी के बाद ज़िन्दगी की करवट ऐसी थी जो जल्दी से गले से नीचे नहीं उतरती मगर कोशिश की जाती है उन हालात में भी जीने की , समझौता करने की और वो ही हम भी करते रहे .
ज़िन्दगी में धोखा भी वहीँ मिलता है जहाँ अन्धविश्वास होता है ऐसा ही हमारे साथ हुआ . अब भला अपनों पर भरोसा ना किया जाये तो किस पर किया जाये ? मगर ये भी एक सच है कि अपने ही ठुकराते हैं , उनसे ही हमारा विश्वास चकनाचूर होता है तभी हम ज़िन्दगी का वास्तविक अर्थ समझ पाते हैं .............बस हमने भी अपनों के हाथों ठोकर खाई . जब माता पिता यानि मेरे सास ससुर ही धोखा दें तो किस पर विश्वास करें कुछ ऐसा ही हाल हमारा हुआ और एक वक्त आया जब ऐसा लगा कि हम तो खाली हाथ खड़े हैं , चारों तरफ देखने पर कोई चेहरा अपना नहीं दिखता था , ना संबंधों में ना अपनेपन में यहाँ तक कि पैसों की दृष्टि से भी लगने लगा था कि अब क्या होगा आगे ज़िन्दगी कैसे जियेंगे ? बच्चे कैसे पढ़ाएंगे? बेटी की शादी कैसे करेंगे? ऐसे ना जाने कितने प्रश्न खड़े हो गए थे मगर जब आप सत्य के मार्ग पर होते हैं तो आप का साथ चाहे सारी दुनिया छोड़ दे मगर एक का साथ हमेशा मिलता है और वो है भगवान . बस हमें भी उस पल सिर्फ और सिर्फ उसी का सहारा था.
हर रिश्ते ने छला था मगर हमारी नियत अच्छी थी और हमने जो भी कहा या किया सबके भले के लिए किया तो उसका फल ये मिला कि हमारे जीवन संघर्ष में वो परमपिता परमात्मा सारथि बनकर इस महायुद्ध में हमारे साथ आ खड़ा हुआ . एक दम अन्जान व्यक्ति जो सिर्फ हमारी दुकान से कभी कभी कपडा ले जाता था जब उसे हमारे बारे में पता चला कि माँ बाप भाई - बहनों तक ने धोखा दिया है और हमें सारी दुनिया से अलग- थलग सा कर दिया है यहाँ तक कि हमारा पूरा हक़ भी हमें नहीं दिया है तब उन्होंने राह दिखाई . तब रिश्तों का महत्त्व पता चला . कैसे अपने पराये हो जाते हैं और पराये अपने . बस ज़िन्दगी में एक बात का दुःख रहा कि अपनों पर विश्वास करने का क्या यही प्रतिफल होता है बात पैसे से ज्यादा विश्वास के टूटने की थी , धोखेबाजी की थी जिसकी हम सपने भी उम्मीद नहीं कर सकते थे .

जैसा वास्तव में पांडवों के साथ हुआ था हमें अपने जीवन के हर पग पर वैसे ही हालातों से गुजरना पड़ा था यहाँ तक कि अपमान के घूँट भी बहुत पिए मगर यही चाहा कि शांति बनी रहे और जिस कीमत भी शांति मिले वो सस्ती है मगर जिस तरह सारी सेना , सारे रिश्ते दुर्योधन की तरफ थे और साथ में पुत्रमोह था एक पिता का कुछ वैसा ही हमारे परिदृश्य में भी था तो फिर कैसे हम न्याय की उम्मीद कर सकते थे । जब हर तरफ से देख लिया कि अब कोई रास्ता नहीं बचा सब रास्ते बंद हो चुके तो हम चुप करके बैठ गए कि शायद यही भाग्य में बदा था मगर उस पल मलिक साहब के रूप में भगवान हमारे जीवन में आये और उन्होंने हमें रास्ते दिखाए , उन्होंने बताया कि तुम कर्म से मुँह नहीं मोड़ सकते और प्रयास करो जीवन जीना थोड़े छोड़ोगे बल्कि करारा जवाब दो ताकि कल को वो तुम्हें कमजोर ना समझें .जो तुम्हारा था वो यदि तुम्हें नहीं मिल सका और उन्होंने तुमसे जबरदस्ती छीना है उसे उनका भी मत होने दो और हो सकता है वो तुमसे इस बात पर समझौता कर लें क्यूँकि जब उन्हें सारी चीज जाती दिखेगी तो शायद उन्हें समझ आ जाये और तुम्हें तुम्हारा हक़ दे दें या कम ज्यादा करके कोई बीच का रास्ता निकाल लें तो कम से कम जीने का आधार तो मिल ही जायेगा ना और यदि ऐसा ना करें तो बेशक सरकार के पास चला जाये मगर उनके हाथ में मत रहने दो कम से कम ऐसा करने से वो डरेंगे तो सही और आगे तुम पर कोई वार नहीं करेंगे और हमने वो कदम उठाये , हर रास्ता उन्होंने सुझाया कि सरकारी कार्य कैसे किये जाते हैं कहाँ से कौन से कागजात कैसे निकलवाने हैं, जगह जगह जाते थे घर में छोटे छोटे बच्चों को छोड़कर कभी मैं जाती तो कभी मेरे पति सुबह से शाम हो जाती सरकारी कार्यों में पैसे अलग लगते चाहे कितनी भारी गर्मी हो सर्दी हो या बरसात जब जाना होता तो जाते ही यहाँ तक कि खाने पीने का भी कोई हिसाब नहीं सिर्फ बच्चों के भविष्य का सोच कर हम कर रहे थे कि चलो थोडा सा ही सही उनके मनों में रहम तो आये और हमारे बच्चों का हक़ उन्हें मिल जाये बस इसी सबके चलते हमने ये कदम उठाये और बीच बीच में उन्हें सन्देश भिजवाए मगर जब पैसे की गर्मी होती है तो कौन किसी की सुनता है जो हाल दुर्योधन का था वो ही वहाँ था हमें तो हर कदम पर एक कुरुक्षेत्र नज़र आता था जहाँ अर्जुन खड़ा है और कृष्ण सारथि बनकर राह दिखा रहे हैं . बस जैसे मलिक साहब ने बताया वैसा ही हम करते गए और उसका नतीजा ये निकला कि हमारे सन्देश को दरकिनार करके उन्होंने वो सब भी हाथ से गँवा दिया जो समझौता करने पर शायद हम सबका रह जाता . शायद हमारे अहम् , हमारे लालच इन सबसे ऊपर होते हैं जिसके आगे हम अपना बुरा भला भी नहीं देख पाते . जैसे दुर्योधन को मिटना मंजूर था मगर सूईं की नोक के बराबर जमीन देना मंजूर नहीं था वैसा ही हाल वहाँ का था और वो ही हुआ भी . बेशक हमें कुछ नहीं मिला मगर दिलवाने वाले के पास हजारों रास्ते होते हैं वो दूसरी तरह कहीं ना कहीं से जुगाड़ कर ही देता है और वैसा ही ऊपर वाले ने हमारे साथ किया . जो काम हमने किया था उसी की वजह से एक दूसरे जरिये से हमें थोडा बहुत मिला पूरा तो नहीं मगर जो मिला हमने तो वो भी बोनस समझा और हमें पता चला कि कैसे बिना किसी को कुछ कहे , लड़े झगडे बिना भी शीत युद्ध होता है और उसका वार खाली भी नहीं जाता...........हम तो आज भी खुश हैं क्यूँकि ऊपर वाले ने बहुत दया दृष्टि रखी मगर गलत करने वालों को भी वो दंड जरूर देता है और उसका असर हम देख रहे हैं कि वहाँ क्या हालात होते जा रहे हैं मगर शायद आज भी वो लोग समझ नहीं पाए हैं चाहे अपनी औलाद की ज़िन्दगी पर बन आई उनकी मगर तब भी अपने अहम् को सर्वोपरि बनाया हुआ है बस यही फर्क होता है .

इस सबमे एक ऐसी बात हुई जिसने हमें सोचने पर मजबूर किया कि हाँ भगवान साक्षात् भी आता है वो ऐसे कि मलिक साहब हमारे साथ सिर्फ उतने वक्त ही रहे जितने वक्त तक हमारे पैरों के नीचे जमीन नहीं थी जैसे ही एक आधार मिला वो इस जहान को ही छोड़कर चले गए .......वो पल ऐसा लगा जैसे किसी ने हमारा सब कुछ लूट लिया हो और हम फिर से कंगाल हो गए हों ..........उनका हमारे जीवन में एक ऐसा स्थान है जिसे बयां करना नामुमकिन है . तब लगा था हाँ भगवान किसी ना किसी वेश में जरूर आते हैं जैसे पांडवों का हक़ दिलाकर प्रभु धराधाम को छोड़कर चले गए थे वैसे ही हमारे साथ भी हुआ और उस दिन के बाद हमारा विश्वास प्रभु पर अटल होता चला गया .

अब जीवन से कोई गिला शिकवा नहीं जिस ओर प्रभु ले चलते हैं हम चलते हैं ना आगे की चिंता ना पीछे का गम क्यूँकि होता वो ही है जो उसने रच रखा है और जो वो करता है वो सबसे अच्छा होता है उससे अच्छा कोई कर नहीं सकता ऐसा अपनी ज़िन्दगी के अनुभवों से सीखा क्यूँकि जब हम दुनियादारी की चालबाजियों से अन्जान थे तो हम सबके भले की बात कहते थे और वो बात ही इस धर्मयुद्ध में हमारे लिए रामबाण बन गयी तो फिर कैसे ना कहें कि वो जो करता है अच्छा करता है उसने हमारी कही बात को हमारे लिए ही सत्य साबित करके दिखा दिया और बता दिया कि अगर अच्छी और सच्ची नीयत से किसी के भले के लिए कुछ किया जाये या कहा जाये और वैसा हो जाये तो वो किया या करा बेकार नहीं जाता वो तुम्हें वापस मिलता है या कहो वो ऐसे रास्ते बना देता है कि जो तुम्हारा बुरा चाहता है उसके लिए वो ही अच्छाई बुराई साबित हो जाती है मगर इसके बाद वो एक बात और कहता है कि अब मैंने रास्ता दिखा दिया , जब तू मुश्किलों में था और जग की हकीकतों से अनजान था तो मैंने तेरा साथ दिया मगर अब तुझे ज़िन्दगी संभाल कर चलनी होगी सावधानी के साथ यदि ऐसा नहीं करेगा और बार- बार गिरेगा तो कब तक मैं तेरा साथ दूँगा इसलिए हमने तो अपने जीवन से यही सीखा और अब ना किसी से ज्यादा मोह, अपनापन नहीं रखते मगर सबको एक नज़र से देखते हैं और कोशिश करते हैं कि हमसे किसी का बुरा ना हो और जितनी जिसकी सहायता कर सकें करें और जीवन प्रभु गुण गाते हुए बीते .




शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

चुनौती जिन्दगी की: संघर्ष भरे वे दिन (५)

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डॉ रूपचंद शास्त्री 'मयंक ' :


जीवन में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो कि जिसको सरल सरिता की तरह से बहते हुए मिला हो। ये जीवन तो है ही कंटकाकीर्ण पाठ की तरह जिस पर कभी ठोकर खाकर , कभी लड़खड़ा कर , कभी गिरते गिरते बचते हुए चलना ही है। इस सफर में कभी किसी का सहारा मिल जाता है, कटाक्ष भी मिलते हें और नसीहतें भी लेकिन वास्तव में साथ देने वाले , कठिन वक्त में साथ चलने वाले कितने मिलते हें? ये सबके जीवन की अलग अलग कहानी है।
आज अपने ऐसे ही अनुभव को प्रस्तुत कर रहे हें डॉ रूपचंद शास्त्री 'मयंक' जी .........

संघर्ष ही जीवन है!

“नर हो न निराश करो मन को”

सन् 1969 की बात है। उस समय मैं आयुर्वेद महाविद्यालय, हरिद्वार में तृतीय वर्ष में पढ़ रहा था। पिता जी पटवारी के पद पर कार्यरत थे मगर उनकी परगनाधिकारी से बहस हो गई और उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इससे घर की आर्थिक स्थिति बहुत डाँवाडोल हो गई। घर में तीन बहने और माता जी के लालन-पालन की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई और मैंने हरिद्वार के पास एक गाँव में अपनी प्रैक्टिस शुरू कर दी।

हरिद्वार से नजीवावाद 50 किमी था और उस समय रास्ता भी दुर्गम था। गंगा नदी और बीच में पड़ने वाले नालों का पुल भी नहीं था। मेरे पास एक अदद साइकिल थी। अतः मुझे प्रत्येक शनिवार को सुबह 4 बजे उठकर साइकिल से नजीबाबाद घर में खर्चा देने के जाना पड़ता था। एक दिन घर में रुक कर सोमवार को फिर हरिद्वार के लिए निकल पड़ता था और 10 बजे से 2 बजे तक मेडिकल कालेज में क्लास ज्वाइन करता था।

दो बजे जब कालेज छूटता था तो बहुत भूख लगती थी। इसलिए पेट की आग बुझाने के लिए रास्ते में पड़ने वाली अमरूद की बगिया से एक आने के एक सेर अमरूद लेकर अपना पेट भर लेता था।

शाम 3 बजे से 7 बजे तक रोगियों को देखता था। उस समय सस्ता जमाना था बच्चों की एक दिन की दवा आठ आने की और बड़ों की एक दिन की दवा एक रुपये की देता था। ले-देकर प्रतिदिन पच्चीस-तीस रुपये की आमदनी हो जाती थी। जिसमें प्रति सप्ताह घर के लिए 100 रुपये भी देने होते थे। इसके बाद जो बचता था उससे मेडिकल कालेज की फीस और अपना खर्चा कर लेता था।

जैसे-तैसे ढाई साल गुजर गये और मुझे डॉक्टरी की डिग्री भी मिल गई अब मैंने घर से 16 किमी की दूरी पर एक बड़े गाँव में अपनी प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। संकट का समय ढल गया था मगर तीन बहनों के विवाह की जिम्मेदारी भी निभानी थी। 2 साल में दस हजार रुपये जमा किये और बड़ा होने के नाते 1973 में अपना विवाह किया।

मेरी धर्मपत्नी ने मुझे भरपूर हौसला दिया और दो साल बाद शान के साथ बहिन की शादी कर दी।

अब 2-3 साल का समय और मिल गया। तभी मेरे छोटे मामा जो खटीमा में प्रैक्टिस करते थे मेरे पास आये और कहने लगे कि इतना कम पैसा लेकर तुम रोगियों का इलाज करते हो मेरे साथ खटीमा चलो वहाँ रोगी से एक दिन की दवा का कम से कम 10 रुपये लेते हैं। पहले तो मैंने आनाकानी की मगर इस शर्त पर कि एक महीना मैं परीक्षण के तौर पर खटीमा में रहूँगा, यह सोच कर मैं खटीमा आ गया।

नेपाल के सीमावर्ती कस्बे बनबसा में मैंने प्रैक्टिस शुरू की। यहाँ पहले ही दिन पाँच-छः सौ रुपये की प्रैक्टिस हुई तो मैं यहीं का होकर रह गया। कष्ट का समय निकल गया और मैं आज अपने को सबसे सुखी इंसान समझता हूँ!

राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने कहा ठीक ही कहा है “नर हो न निराश करो मन को!”







शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

चुनौती जिन्दगी की : संघर्ष भरे वे दिन (४)

रश्मि प्रभा :

मेरी दृष्टि से संघर्ष करके अगर हम जीत गए हें तो उसको अगर संस्मरण के रूप में अपनी विजय न सही लेकिन कठिन परिस्थितियों में भी डेट रहने और विचलित न होने से मनुष्य एक मिसाल बन जाता है और कभी कभी तो वह मिसाल किसी दूसरे के लिए एक बहुत बड़ा संबल बन जाता है लेकिन अपने संघर्ष को किस तरह से सहेज कर रखा जाए और उसके बयान से कुछ ऐसा भी हो जाता है ये अवधारणा रश्मि प्रभा जी ने बताई और उनकी बात मुझे अच्छे भी लगी। उनकी बात उनके शब्दों में :

संघर्ष ? क्या है ? क्या इसे अक्षरशः बताया जा सकता है ? क्या असफलता से सफलता की ओर जाना ही संघर्ष है ? या एक स्थिति पर ठहरे रहने की कशमकश भी संघर्ष है ? बहुत सारे प्रश्न जेहन में उठे और प्रश्नवाचक मुद्रा में ही लिखने बैठी हूँ ...
एक खूबसूरत बगीचे में टहलने का आनंद लेते समय अचानक सांप आ जाए तो उससे बचना भी संघर्ष है . सांप के कोटर के पास ही घर बनाकर रहते हुए उससे बचना भी संघर्ष है . घोंसले के पास सांप को खड़ा करने का विश्वास लेना - देना भी संघर्ष है. सांप ना मरे और लाठी के साथ हम सुरक्षित रह जाएँ , यह भी एक संघर्ष की पीड़ा है . लिखना भी एक संघर्ष है , मन की स्थिति , शरीर की स्थिति , समाज की स्थिति ..... किसी भी स्थिति को परोक्ष रूप से लिखकर ( वह भी संतुलन बनाये हुए ) हम शांत होने के लिए संघर्ष करते हैं .
बहुत क्लिष्ट , भारी भरकम लग रहा होगा मेरा कहना - पर बिना गीता पर हाथ रखे , खुद की रूह को ही साक्षी मानकर कहिये , क्या कुछ गलत कहा ?
ज़िन्दगी कभी एक सी नहीं चलती - न पैसेवालों की , न बिना पैसेवालों की . जन्म संघर्ष , मृत्यु संघर्ष ... पूरी जिंदगी संघर्ष में गुजर जाती है . एक छोटे से बच्चे का संघर्ष है - चौकलेट , बड़े का संघर्ष - रोटी ! लेकिन रोटी हलक तक आए और कोई छीन ले ... ऐसे में अपनी भूख पर काबू पाने के लिए संघर्ष ! सुनने में अटपटा लगेगा ... पर अटपटा लगने से सत्य कहाँ बदलता है . ............ सबकुछ गंवाकर खुद्दारी दिखाना भी संघर्ष है . ऐसे में , किस दिन को कलम से पकडूँ ? फिर यकीन दिलाऊं ...
कितनों के जीवन अग्नि के मध्य रहते हैं , पर वे अपने चेहरे पर बसंत लेकर जीते हैं , यह उपलब्धि ही उनकी जीत है । पीछे की अग्नि जब दिखाई ही न दे , उसकी लपटें छू न जाएँ - तो बताना क्या . हाँ , खंडहर से ईमारत बनने में संघर्ष के मायने मिलते हैं , पर ईमारत से खंडहर होने में और कम से कम एक मकान होने की जद्दोजहद संघर्ष से कहीं ऊपर होती है !
कैसे लिख सकती हूँ ? संघर्ष ... शुरू हुआ तो जारी है . और कुछ संघर्ष लिखने से बिखर जाते हैं -