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रविवार, 13 अक्टूबर 2019

शरद पूर्णिमा,कोजागरी पूर्णिमा रास पूर्णिमा

         शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहते हैं; हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन  मास की पूर्णिमा  को कहते हैं। ज्‍योतिष के अनुसार, पूरे साल में केवल इसी दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। हिन्दू धर्म में इस दिन कोजागर व्रत माना गया है। इसी को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। इसी दिन श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था। मान्यता है इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है। तभी इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चाँदनी में रखने का विधान है।आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसे 'रास पूर्णिमा' भी कहते हैं। ज्योतिष की मान्यता है कि संपूर्ण वर्ष में केवल इसी दिन चंद्रमा षोडश कलाओं का होता है। धर्मशास्त्रों में इस दिन 'कोजागर व्रत' माना गया है। इसी को 'कौमुदी व्रत' भी कहते हैं। रासोत्सव का यह दिन वास्तव में भगवान कृष्ण ने जगत की भलाई के लिए निर्धारित किया है, क्योंकि कहा जाता है इस रात्रि को चंद्रमा की किरणों से सुधा झरती है। इस दिन श्री कृष्ण को 'कार्तिक स्नान' करते समय स्वयं (कृष्ण) को पति रूप में प्राप्त करने की कामना से देवी पूजन करने वाली कुमारियों को चीर हरण के अवसर पर दिए वरदान की याद आई थी और उन्होंने मुरलीवादन करके यमुना के तट पर गोपियों के संग रास रचाया था। इस दिन मंदिरों में विशेष सेवा-पूजन किया जाता है।

कथा

एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी।[1] दोनो पुत्रियाँ पुर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा ही मर जाती थी। उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पुरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है।
उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया। उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से पकडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा। बडी बहन बोली-” तु मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।“ तब छोटी बहन बोली, ” यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। “उसके बाद नगर में उसने पुर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।
                 इस दिन मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखे और जितेन्द्रिय भाव से रहे। धनवान व्यक्ति ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए १०० दीपक जलाए। इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें। जब एक प्रहर (३ घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें। तत्पश्चात भक्तिपूर्वक सात्विक ब्राह्मणों को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। तदनंतर अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्य को अर्पित करें। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी।
                  इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह कोजागर व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं माँ लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

दशहरा !

                               दशहरा या विजयादशमी हमारे देश का बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है और साथ ही इसको संस्कृति से जोड़ते हुए समाज को एक सन्देश - बुराई पर भलाई की विजय या सत्य की असत्य पर विजय जाता है।  पूरे  देश में कहीं विजयादशमी का सम्बन्ध सिर्फ रामायण महाकाव्य की लीला से होता है और कहीं पर इसको दुर्गा पूजा के साथ जोड़ कर देखते हैं कि  दुर्गा जी के द्वारा महिषासुर का वध भी शक्ति की विजय दिखता है और दोनों का ही एक ही सन्देश जाता है। हमारे देश में ही दशहरा विभिन्न स्थानों पर अलग अलग तरीके से मनाया जाता है।  सबका उद्देश्य एक ही होता है लेकिन कहीं कहीं पर लोक कथाओं पर आधारित भी है।   

 बंगाल का दशहरा :-- बंगाल में यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है, जो कि बंगालियों, ओडिओं तथा असमियों का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है।   इसमें  दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है, जिसके अन्‍तर्गत स्त्रियाँ द्वारा नौ दिनों तक मां दुर्गा की आराधना के बाद दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।  देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं व देवी को अश्रुपूरित विदाई देती हैं इसके साथ ही वे आपस में भी सिंदूर खेलती हैं और अंत में सभी देवी प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाया जाता  है। उसके बाद दशहरा का त्यौहार मनाया जाता है। विसर्जन की ये यात्रा महाराष्‍ट्र के गण‍पति-उत्‍सव के गणेश-विसर्जन के समान ही भव्‍य, शोभनीय और दर्शनीय होती है जबकि इस दिन नीलकंठ पक्षी को दर्शन  बहुत शुभ माना जाता है।

कर्नाटक का दशहरा :  -  मैसूर का दशहरा अंतर्राष्ट्रीय उत्सव के रूप में अपनी अलग पहचान बना चूका है जिसमे शामिल होने के लिए विदेशो से पर्यटक आते है | इस दिन यहाँ कई प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किये जाते है लेकिन सबसे अधिक प्रसिद्ध है 12 हाथियों की इस इस उत्सव में उपस्थिति | इन हाथियों की अपनी अपनी विशेषता होती है | दशहरा उत्सव के अंतिम दिन यहा मैसूर महल से “जम्बो सवारी” का आयोजन किया जाता है जिसमे रंग बिरंगे आभूषण और कपड़ो से सजे हाथी एक साथ शोभायात्रा के रूप में इकट्ठे चलते है और इन सबका नेतृत्व करने वाल विशेष हाथी “अम्बारी ” है जिसकी पीठ पर चामुंडेश्वरी देवी की प्रतिमा सहित 750 किलो का “स्वर्ण हौदा” रखा होता है | यह सवारी मैसूर महल से तीन किलोमीटर की दूरी तय करने एक बाद बन्नीमंडप पहुचकर समाप्त होती है | इस समय प्रसिद्ध मैसूर महल को दीप-मालिकाओं से दुल्‍हन की तरह सजाते हैं। साथ ही शहर में लोग टॉर्च लाइट के संग नृत्य और संगीत की शोभायात्रा भी निकालते हैं।

 तमिलनाडू , तेलंगाना , आंध्रप्रदेश का दशहरा :--

इन सभी  राज्यों में दशहरा  नौ दिनों तक मनाते  है ,| यहाँ के लोग दशहरे पर तीनो देवियों लक्ष्मी ,सरस्वती और दुर्गा की पूजा करते है | अगर कोई भी नया कार्य करना हो तो इस दिन को बहुत शुभ माना जाता है | इन सभी राज्यों में लक्ष्मी माता की पूजा प्रथम तीन दिनों में की जाती है उसके अगले तीन दिनों में विद्या की देवी माता सरस्वती की पूजा अर्चना की जाती है और अंत के तीनो दिनों में शक्ति की देवी माँ दुर्गा का पूजन किया जाता है। |यहाँ नवरात्रि जैसी कोई परिकल्पना नहीं है लेकिन शक्तिपूजा का ही विधान है।

 उत्तर भारत का दशहरा --( उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , बिहार और पंजाब ):--

उत्तर भारत  में दशहरे के पर्व का सम्बन्ध सीधे सीधे असत्य पर सत्य की विजय माना जाता है। इस पर्व को मनाने से पूर्व रामलीला का जगह जगह पर आयोजन होता है।  यहाँ पर रामलीला बहुत लोकप्रिय है , जिसमें रामायण को आधार मान कर उसको नायकीय रूप में प्रस्तुत किया जाता है। रामलीला इस तरह से आयोजित की जाती है कि दशहरे के दिन रावण वध का प्रसंग आता है और फिर रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के बड़े बड़े पुतले बना कर जलाये जाते हैं।   | यहा दशहरे की रौनक देखते ही बनती है | जहाँ  एक ओर रामनगर की लीला विश्वविख्यात है | वही बनारस में घट स्थापना से शुरू हुआ यह उत्सव दस दिन तक चल चलता है | दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, इन सभी राज्यों में दशहरे का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। इन सभी प्रदेशों में इस दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। यहां दशहरे को विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर प्रदेश में दशहरे के दिन नीलकंठ नामक चिड़िया और मछली के दर्शन करना विशेष शुभ माना जाता है।

  कुल्लू का दशहरा:--

                            हिमाचल प्रदेश में स्थित कुल्लू का दशहरा एक अनोखे और भव्य अंदाज में मनाये जाने के कारण विश्वविख्यात है  | कुल्लू का दशहरा पारम्परिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्व रखता है | यहाँ  इस पर्व को मनाने की परम्परा राजा जगत सिंह के समय से चली आ रही है  |एक लोक कथा के अनुसार राजा जगत सिंह ने एक साधू की सलाह पर कुल्लू में अयोध्या से मंगवा कर भगवान रघुनाथ जी (राम जी ) की प्रतिमा स्थापित की थी | वास्तव में राजा किसी रोगग्रस्त से थे और इसी से मुक्ति पाने के लिए साधू ने उन्हें यह सलाह दी थी | मूर्ति स्थापना के बाद राजा धीरे धीरे स्वस्थ हो गए और  उन्होंने इसी वजह से अपना शेष जीवन भगवान को समर्पित कर दिया। इस उत्सव के एक दिन पहले एक रथ यात्रा आयोजित की जाती है जिसमे रथ में भगवान रघुनाथ जी ,सीता जी एवं दशहरे की देवी मनाली की हिडिम्बा जी की प्रतिमाओं को रखा जाता है |सातवे दिन रथ से व्यास नदी के किनारे लाया जाता है जहा लंका दहन का आयोजन होता है | इसके बाद रथ पुन: वापस लाकर रघुनाथ जी को उनके मन्दिर में फिर से स्थापित कर दिया जाता है | दशहरे के दिन यहाँ की धूमधाम देखने योग्य होती है |

गुजरात का दशहरा

गुजरात में मिटटी का एक रंगीन घड़े को देवी का प्रतीक माना जाता है जिसको कुंवारी लडकिया अपने सिर पर रखकर गरबा करती है  जो गुजरात की शान है | गुजरात के सभी पुरुष और महिलाये दो डंडो से गरबे के संगीत पर गरबा नाचते है | इस अवसर पर भक्ति और पारम्परिक लोक संगीत का समायोजन भी होता है | आरती हो जाने के बाद यहा पर डांडिया रास का आयोजन होता है जो पूरी रात चलता है | | नवरात्रि  में सोने के गहनों को खरीदना बहुत ज्यादा शुभ माना जाता है   राजस्थान और गुजरात दोनों एक दुसरे से सटे हुए राज्य है शायद यही कारण है कि यहां पर दशहरे से जुडी एक ही मान्यता को दोनों जगह समान माना जाता है यहां नवरात्रि के 9वें दिन के उपवास के बाद 10वें दिन व्रत को खत्म कर लोग अन्न खातें है। गुजरात में दशहरे के दिन सुबह उठ के लोग जलेबी और फाफडा खा के अपने दिन की शुरुवात करतें हैं।

बस्तर का दशहरा :--

बस्तर के दशहरे के मुख्य कारण को राम की रावण पर विजय न मानकर लोग इसे माँ दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित एक पर्व मानते है | दंतेश्वरी माँ बस्तर के निवासियों की आराध्य देवी मानी जाती है जो माँ दुर्गा का ही स्वरूप  है | यहाँ पर यह पर्व पूरे 75 दिन तक चलता है जो  दशहरा श्रावण मास की अमावस से लेकर आश्विन मास  की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है | पहले  दिन को काछिन गादी कहते है जिसमे देवी से समारोह आरम्भ की अनुमति ली जाती है | यहाँ पर देवी एक कांटो की शैय्या पर विराजमान होती है जिसे काछिन गादी कहते है | यह कन्या अनुसूचित जाति की है जिससे बस्तर के राजपरिवार के व्यक्ति की अनुमति लेते है | यह समारोह लगभग 500 साल पहले 15वी शताब्दी से शुरू हुआ था | इसके बाद जोगी बिठाई होती है | इसके बाद यहाँ पर भीतर रैनी (विजयादशमी) , फिर बाहर रैनी (रथ यात्रा ) और अंत में मुरिया दरबार होता है | इसपर्व का समापन आश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाडी पर्व से होता है |

महाराष्ट्र का दशहरा :--

महाराष्ट्र में माँ दुर्गा को नवरात्रि के नौ दिनों तक पूजा जाता है और दसवे दिन माता सरस्वती की पूजा की जाती है | यहा के लोगो का मानना है कि इस दिन माँ सरस्वती की पूजा करने से स्कूल में नये नये पढने वाले बच्चो पर माँ का आशीर्वाद रहता है इसलिए इस दिन को विद्या के लिए बहुत ज्यादा शुभ माना जाता है | महाराष्ट्र में लोग नया घर खरीदने के लिए भी इस दिन को बहुत शुभ मानते है | | यहा पर एक सामजिक उत्सव सिलंगण का आयोजन भी इस दिन होता है जिसमे गाँव के सभी लोग नये कपड़े पहनकर गाँव के दुसरी ओर जार्क शमी वृक्ष के पत्तो को अपने गाँव लाते है | एक पौराणिक कथा के अनुसार शमी वृक्ष के पत्तो को स्वर्ण से जोड़ा गया है | इन शमी वृक्ष के पत्तो को स्वर्ण के रूप में लोग एक दुसरे को देकर इस पर्व का आनन्द लेते है |

कश्मीर का दशहरा :--

वैसे तो कश्मीर में हिन्दुओ की संख्या बहुत कम है फिर भी यहा पर अल्संख्यक हिन्दू इस पवित्र त्यौहार को अपने अलग ही अंदाज में मनाते है | यहाँ के लोग नवरात्रि के दिनों में केवल पानी पीकर ही उपवास करते है | यहा के हिन्दू परिवार खीर भवानी माता में बहुत आस्था रखते है और इस दिन माता के दर्शन को बहुत शुभ मानते है | यहाँ के लोगो का मानना है कि दशमी के दिन जो तारा उगता है उस समय विजय मुहूर्त माजा जाता है जो सभी कार्यो को सफल करता है इसलिए उस विजय मुहूर्त के तारे के नाम पर इसे विजयादशमी कहते है |
 
इन सबके अतिरिक्त विदेशो में भी विजयादशमी का त्यौहार बड़ी उमंगो और धूमधाम से मनाते है  | नेपाल में नौ दिन तक माँ काली और माँ दुर्गा की पूजा की जाती है और दशहरे वाले दिन राज दरबार में राजा अपनी प्रजा को अबीर ,दही और चावल का तिलक लगाते है  | श्रीलंका ,चीन ,मलेशिया और इंडोनेशिया में भी अपने अपने रीति  रिवाजो से अनुसार यह पर्व मनाने की परम्परा है |
                 

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

विभिन्न राज्यों में नवरात्रि !


                      भारतीय हिन्दू समाज में जितने पर्व और त्यौहार मनाये जाते हैं , उनमें नवरात्रि का  विशिष्ट स्थान है।  नवरात्रि शक्ति की उपासना का पर्व है।  शक्ति ही सृष्टि का निर्माण करती है , उसका पालन  करती है और उसका संहार भी करती है।  इसीलिए देवी शक्ति को सर्वोपरि माना गया है।  शक्ति ही महालक्ष्मी , महासरस्वती और महाकाली के रूप में जानी  जाती हैं। नवरात्रि में इन्हीं व्यक्त महाशक्तियों की आराधना की जाती है। 
                     नवरात्रि भी वर्ष में दो बार मनाई जाती है।  प्रथम वासंतिक नवरात्रि - जिसके प्रथम दिन से नवसंवत्सर आरम्भ होता है और वह हिंदी पंचांग के नववर्ष का प्रारम्भ कहा जाता है।  दूसरी नवरात्रि आश्विन मास में होती हैं , जिन्हें  शारदीय नवरात्रि कहा जाता है।  नवरात्रि का अर्थ है नौ रातों तक नौ रूपों में देवी दुर्गा की आराधना। शक्ति की उपासना का पर्व प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि , नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जाता है।  सर्वप्रथम श्री रामचंद्र जी ने इस शारदीय नवरात्रि की पूजा का आरम्भ समुद्र तट  पर किया था और विजय प्राप्त की। दशमी को विजयादशमी इसी लिए मनाई जाती है क्योंकि इस दिन श्रीरामचंद्र्र जी ने रावण का वध किया था।  
  भारत के सभी राज्यों में नवरात्रि का पर्व विभिन्न तरीकों से इसे मनाया जाता है।   इस समय नौ दिनों तक महिलाएं एवं पुरुष व्रत रखते  हैं।घर पर व्रत का खाना बनता है और सभी इसका आनंद उठाते हैं। दुकानों में  के व्रत दौरान खाए जाने वाले खाध पदार्थों की भरमार होती है। सजे धजे मंदिरों में पूजा ,भजन,कीर्तन ,जगराता होता है। कुल मिलाकर हर शहर का वातावरण उत्सव के रंग में रंगा होता है ।  हां पूजा के रस्मों में अंतर अवश्य होता है।  

                    उत्तरप्रदेश , मध्य प्रदेश और बिहार :--उत्तर भारत के इन राज्यों लगभग समान रूप से पूजा की जाती है और इसके नौ दिन नौ देवियों के नाम को समर्पित होते हैं।  पहले दिन कलश की स्थापना कर देवी का आह्वान किया जाता है और क्रमशः प्रथम - शैलपुत्री , द्वितीय- ब्रह्मचारिणी , तृतीय चंद्रघंटा , चतुर्थ - कूष्माण्डा , पंचम स्कंदमाता , षष्ठ - कात्यायनी , सप्तम - कालरात्रि , अष्टम - महागौरी , नवम - सिद्धिदात्री देवियों के नाम से पूजन और इनके मन्त्रों का जप भी किया जाता है। 
               नवरात्रि  में प्रथम दिन ही कलश स्थापना की जाती है और अखंड ज्योति जला कर रखी जाती है, जो नौ दिनों तक लगातार जलती रहती है।  व्रत रखने वाले शुद्धता से साथ अधिकतर भूमि शयन करते हैं।  अष्टमी या नवमी के दिन पूजन, हवन के बाद व्रत का परायण किया जाता है। 
                 नवरात्रि में अष्‍टमी और नवमी के दिन निकलने वाले ज्वारों पर भक्तों की अटूट आस्था है। माना जाता है कि ज्वारों में सांग लगवाने से मन्‍नतें पूरी होती है। कानपुर में ज्वारों का अलग ही महत्व है। यहां पर बच्चे, बड़े और महिलाएं जुलूस में शामिल होकर सांग* लगाकर देवियों के मंदिर जाते हैं , कानपुर में सिद्ध देवी मंदिरों के दरबार में जाते हैं। नवरात्रि  के पर्व पर शहर के सभी जगहों से ज्वारे निकलते हैं। इसमें कुछ लोग तो 40 सालों से ज्‍वारे निकाल  रहे हैं। लोगों का मानना है कि ज्वारे में शामिल होने मात्र से लोगों की सभी मन्नतें पूरी हो जाती हैं।

क्‍या होता है ज्‍वारा -  नवरात्रि के पहले दिन मिट्टी के घड़े में जौ डालकर ज्वारे बोए जाते हैं। इसमें नौ घड़े होते हैं और जहां पर ज्वारे बोए जाते हैं, वहा पर शुद्ध जल का कलश भी रखा जाता है। इस कलश के ऊपर नौ दिनों तक ज्‍योत जलाई जाती है। नवमी के दिन महिलाएं माता के दरबार के लिए ज्वाराअपने सर पर रख कर मंदिर की और प्रस्थान करती हैं और उनके साथ गाजे बाजे भी होते हैं।   बच्चे-पुरुष सांग लगवाते हैं।
                 इस क्षेत्र में नवरात्रि के व्रत में सब अपनी अपनी श्रद्धा के अनुरूप पूजा और व्रत करते हैं।  कुछ लोग निर्जल नौ दिन का व्रत  करते हैं और कुछ लोग सिर्फ एक लौंग खाकर रहते हैं।  फलाहारी व्रत अधिकतर लोग रखते हैं।समय और श्रद्धा के अनुसार कुछ लोग एक समय व्रत रह कर शाम को एक बार खाना ग्रहण कर लेते हैं।  नवरात्रि के पुरे नौ दिन कन्याओं की कुछ लोग विशेष पूजा करते हैं।  उनको घर बुला कर उनके पैर धोकर और टीका लगा कर पूजा करके भोजन कराते  हैं और दक्षिणा देकर उनको विदा करते हैं।
               इसके अतिरिक्त नवरात्रि में रामचरित मानस का पाठ भी नवाह्न परायण के अनुसार नौ दिन में रामायण का सम्पूर्ण पाठ पूर्ण कर लेते हैं।
तमिलनाडु
दक्षिण के इस राज्य में नवरात्रि  का त्यौहार अलग  अंदाज में मनाया जाता है। नवरात्रि  की नौ रातें देवी दुर्गा ,देवी लक्ष्मी एवं देवी सरस्वती को समर्पित हैं।अय्यर  समुदाय की महिलाएं शाम को सुहागिनों को अपने घर पर बुलाती हैं तथा सुहाग की निशानियां जैसे चूड़ी ,कान की बाली आदि उपहार में देती हैं। एक नारियल , पान ,सुपारी एवं रूपये भी इन महिलाओं को दिये जाते हैं। मसूर और अन्य दालों से बने विशेष व्यंजन आमंत्रित लोगों के लिए प्रतिदिन बनता है। कुछ लोग घर में गोलू बनाते हैं।गोलू में अस्थाई रूप से नौ सीढ़ी बनाई जाती है जिस पर सजावटी सामान , देव देवी की मूर्तियां रखी जाती हैं। यह मूर्तियां पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती हैं  ।
आंध्र प्रदेश 
                                 यहां नवरात्रि  के दौरान विशेषकर तेलंगाना क्षेत्र में  बटुकम्मा पाण्डूगा मनाया जाता है।  इसका अर्थ देवी मां का आह्वान  करना है। महिलाएं बटुकम्मा तैयार करती हैं। इसमें मौसमी फूलों की सात परतें होती हैं। यह देखने में फूलों का फूलदान जैसा लगता है। तेलगू में बटुक का अर्थ है जीवन और अम्मा का अर्थ है मां। इस दौरान महिलाएं सोने के जेवर और सिल्क की साड़ी पहनती हैं। बटुकम्मा बनाने के बाद महिलाएं शाम को रस्म निभाती हैं। बटुकम्मा को बीच में रखकर देवी शक्ति  को समर्पित गीतों पर नृत्य करती हैं। इसके बाद बटुकम्मा का विसर्जन पानी में कर दिया जाता है।
केरल
                 यहां अंतिम तीन दिन ही नवरात्रि  मनाई जाती है अष्टमी ,नवमी एवं विजया दशमी। केरल में शिक्षा प्रारंभ करने के लिए इन तीन दिनों को शुभ माना जाता है। अष्टमी के रोज किताबें और वाद्य यंत्र देवी सरस्वती के समक्ष  रखकर उसकी पूजा का जाती है। ऐसा ही बसंत पंचमी के दिन पश्चिम बंगाल में होता है । दशमी के दिन किताबों को निकालकर पढ़ा जाता है। 
कनार्टक
                  कर्नाटक में नवरात्रि मनाने की परंपरा आज भी पुरातन काल से चली आ रही है  , उसे ही मानते हैं। सन  1610 ई..में राजा वाडयार के समय से यह त्यौहार मनाया जाता है। विजयनगर साम्राज्य में जिस तरह से नवरात्रि  मनाई जाती थी आज भी यहां के लोग उसी तरह से इसे मनाते हैं। अधिकांश स्थानों की तरह यहां भी नवरात्रि  मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय के रूप में मनाई जाती है।महिषासुर मैसूर का निवासी था। मैसूर का दशहरा विश्व प्रसिद्ध है।आज भी यहाँ पर भव्य तरीके से मनाया जाता है। यहां सड़क पर सजे धजे हाथियों का जुलूस निकलता है।इसके अलावा प्रदर्शनी और मेले तो आम बात है।
गुजरात
                यहां धरती पर जीवन का स्रोत मां के गर्भ का प्रतीक मिटटी का कलश नवरात्रि  का मुख्य आकर्षण है। कलश में पानी ,सुपारी एवं चांदी का सिक्का डाला जाता है। सबसे ऊपर एक नारियल रखते हैं। महिलाएं इसके चारों ओर नृत्य करती हैं। इसे ही गरबा कहते हैं। डांडिया रास भी गुजरात में नवरात्रि  का आकर्षण है।गुजरात में नवरात्रि  के दौरान गरबा महोत्सव का आयोजन किया जाता है। पारंपरिक गुजराती ड्रेस में सजे लड़के-लड़कियां जोड़े के साथ गरबा पंडालों में गीत-संगीत की धुन पर डांस करते हैं। गरबा पंडालों को खासतौर पर सजाया जाता है।   इस महोत्सव के दौरान देवी  दुर्गा की आराधना की जाती है। गरबा में हिस्सा लेने के लिए लोग खास तौर पर तैयारी करते हैं। करीब एक महीने पहले से ही ट्रेनिंग क्लास ज्वाइन करते हैं। आजकल गरबा का क्रेज देश के कई शहरों में बढ़ता जा रहा है।
महाराष्ट्र
            यहां के निवासियों के  लिए नवरात्रि  नई शुरूआत करने का समय है जैसे नया घर ,नया वाहन इत्यादि खरीदना। महिलाएं एक दूसरे को अपने घर पर आमंत्रित करती हैं और उन्हें नारियल ,पान ,सुपारी भेंट करती हैं। सुहागिनें एक दूसरे के माथे पर हल्दी-कुमकुम लगाती हैं।महाराष्ट्र विशेषकर मुम्बई में नवरात्रि  गुजरात जैसा ही मनाया जाता है। प्रत्येक इलाके में गरबा और डांडिया खेला जाता है और सभी इसका भरपूर मजा लेते हैं।
हिमाचल प्रदेश
                यहां का नवरात्रि  अनोखा है। नवरात्रि  में यहां के लोग रिश्तेदारों के साथ मिलकर पूजा करते हैं। अन्य राज्यों में जब यह पर्व खत्म होता है तब यहां कुल्लू दशहरा प्रारम्भ होता है। यह भारतवर्ष की शान है। लोग भक्ति  को व्यक्त करने के लिए नाचते गाते हैं। दशमी के दिन मंदिर  की मूर्तियों का जुलूस निकाला जाता है। 
पंजाब
        यहां के निवासी पहले सात दिन व्रत रखते हैं। यहां जगराते  विशेष महत्व मन जाता है। जगराते  का अर्थ है  - पूरी रात जागकर देवी के भजन गाना। अष्टमी के दिन व्रत तोड़ने के लिए नौ कुमारी कन्याओं को भोजन कराया जाता है । भंडारे में पूरी , हलवा और भिगोकर और फिर चने को चौंक कर खिलाया जाता है ।कन्याओं को लाल चुनरी उपहार में दी जाती है। इन कन्याओं को कंचिका  भी कहते हैं । नवरात्रि  पूरे देश में मनाई जाती है। मनाने की विधि में अंतर है। परंतु पूजा हर जगह पर देवी के शक्ति  रूप की ही होती है और लोगों का जोश ,उमंग और उल्लास भी एक जैसा ही होता है।
पश्चिम बंगाल 
                बंगाल में दुर्गा पूजा की तैयारियां काफी पहले ही शुरू हो जाती हैं। यहां पंचमी से दुर्गोत्सव की शुरुआत होती है। महाकाली की नगरी कोलकाता में तो पांच दिनों तक श्रद्धा और आस्था का ज्वार थमने का नाम ही नहीं लेता है बल्कि पूरे साल में सबसे उत्साह से इसे मनाने की तैयारी करते हैं।
                  पूजा के इन चार दिनों में सभी लोग खुशियां मनाते हैं। जिस प्रकार लड़की विवाह के बाद अपने मायके आती है, उसी प्रकार बंगाल में श्रद्धालु इसी मान्यता के साथ यह त्योहार मनाते हैं कि दुर्गा मां अपने मायके आई हैं।
               दुर्गोत्सव से पहले तो देवी मां की सुन्दर और मनोहारी मूर्तियां बनाई जाती हैं। प्रमुख रूप से कोलकाता के कुमोरटुली नामक स्थान पर कलाकार मूर्तियों को आकार देते हैं। बंगाली मूर्तिकार द्वारा देवी दुर्गा के साथ साथ लंबोदर गणेश, सरस्वती, लक्ष्मी और कार्तिकेय की भी मूर्तियां बनाई जाती हैं। देश के बहुत से प्रांतों में बंगाली मूर्तिकारों की खूब मांग रहती है। यहां निर्मित मूर्तियां देश के अन्य स्थानों के साथ ही दुर्गा पूजा के लिए कोलकाता में विशाल पंडाल सजाए जाते हैं। शहर और दूर गांवों से आकर शिल्पकार पंडालों का निर्माण करते हैं। इन भव्य पंडालों को बनाने में आने वाली लागत लाखों रुपए में होती है। वहां के निवासी इन दिनों खूब खरीदारी करते हैं। 

                    फुटपाथ पर लोग सजावट की बहुत सारी सामग्री बेचते हैं। दुकानों से लेकर शॉपिंग मॉल तक हर जगह भीड़ का रेला दिखाई पड़ता है। सभी अपनी-अपनी पसंद की चीजें खरीदते हैं। लोग अपने परिजनों, संबंधियों को वस्त्र आदि उपहार स्वरूप देते हैं। विजयादशमी के दिन मां का विसर्जन होता है।
                      कुल मिला कर सम्पूर्ण देश में चाहे वह किसी भी भाग में हो , नवरात्रि शक्ति स्वरूपा देवी के लिए ही मनाया जाता है और सभी में पूर्ण श्रद्धा और भक्ति का भाव भरा होता है। 
 *सांग : या लोहे का भरी सा भाला जैसा होता है , जिसे सांग लेकर चलने वाले अपने एक गाल से डालते हुए मुंह के अंदर से दूसरे गाल से निकाल कर चलते हैं।  भारी होने के कारण दोनों तरफ लोग उसे भाले को हाथों का सहारा देते हुए चलते हैं।  यह लोग ज्वारों के साथ साथ चलते हुए मंदिर तक जाते हैं।

शनिवार, 21 सितंबर 2019

ब्लॉगिंग के 11 वर्ष !

ब्लॉगिंग के 11 वर्ष !

                                     वह साल 2008 का था जब मेरा ब्लॉगिंग से परिचय हुआ था और वहीँ से दिशा मिली थी खुद को अपनी मर्जी से प्रकाशित करने की सुविधा।  इसमें ये कोई चिंता नहीं थी कि कोई पढ़ेगा या नहीं फिर भी धीरे धीरे लोग पढ़ने लगे और उस समय चल रहे ब्लॉग की सूचना देने वाले एग्रीगेटर थे और आज भी है जो  ब्लॉग के लिखने और उसके प्रकाशित होने की सूचना सबको देते थी। "हमारी वाणी" ने बहुत काम किया।
                      कई वर्षों तक ब्लॉग अपने चरम पर थे, हमारे पास समय भी था और सब  नियमित लिखते थे।  आलोचना , समालोचना , बहस से लेकर सब कुछ होता था फिर भी वह एक मंच है , जहाँ पर सब एक दूसरे को पढ़ते थे और नहीं भी पढ़ पाते थे तो कोई शिकायत जैसी  बीच नहीं थी।  एक परिवार की तरह से थे हम और आज भी ब्लोगर्स के बीच वही भावना है।  कभी भी किसी को पुकारों उत्तर जरूर देता है।  वह रिश्ते क्यों इतने गहरे थे क्योंकि उसे समय तू मुझे दे और मैं तुझे दूँ ऐसा नहीं था।  जब जिसको जहाँ समय मिला पढ़ लिया और नहीं मिला तो नहीं पढ़ पाए।  फेसबुक का मंच आया तो इसने सेंध लगा दी ब्लॉग में।  तुरंत लिखना और तुरंत पाठकों की प्रतिक्रिया मिलाने का खेल सबको अधिक भाया और फिर वही मंच पकड़ लिया।  हजारों की संख्या में मित्र बन गए लेकिन वे कितना आपसे जुड़े हैं इसके लिए आप अंदाज नहीं लगा सकते हैं।  नाम के मित्रों का मजमा लगा रहता है। उससे बड़ा झटका तब लगा जब हर हाथ में स्मार्ट फोन आ गया और फिर उसमें हिंदी लिखने की सुविधा भी मिल गयी।  इस हालत में ब्लॉग पर कौन जाए ? एक बार में फेसबुक खोली और चेप दिया।  हर हाथ में मोबाइल और हर हाथ में फेसबुक ने ब्लॉग को बुरी तरह से झटका दिया।  ब्लॉग पर सभी अर्थ पूर्ण पढ़ने के आदी थे और वहां लिखा भी वही जाता था। सही अर्थों में ब्लॉग में फेसबुक ने सेंध लगायी और हम उससे खुद ब खुद दूर होते गए।  कुछ समर्पित ब्लॉगर आज भी उतनी ही लगन से अपने ब्लॉग को चला रहे हैं और फेसबुक को भी भी दे रहे हैं।
                         अरे मैं फेसबुक की आलोचना करने में लग गयी।  हमारे ब्लॉग ने हमें जितना बड़ा संसार दिया उसके लिए मैं शुक्रगुजार हूँ।  डायरियों में बंद पड़ी रचनाएँ , जो खो चुकी थी पन्नों के ढेरों में, फिर से मंच पर आ गयी।  सबने मुझे दिशा दी , सिखाया क्योंकि मैं काम जरूर कंप्यूटर साइंस विभाग में थी और सारे दिन सिर्फ डेस्कटॉप पर होते थे और तब हमें नेट सुविधा उपलब्ध नहीं थी।  ईमेल आई डी जरूर थी और मैं से काम चल जाता था।  बाद में नेट सुविधा मिलने पर जुडी , लेकिन इस ब्लॉग के टिप्स से मैं अपरिचित थी।  धीरे धीरे हमारी मित्रों ने मुझे दिशानिर्देश दिया और फिर धीरे धीरे सब तो नहीं हाँ कुछ तो करना आ ही गया।
                         बीच में साथ छूट गया था लेकिन फिर उस मंच की गरिमा और उसके महत्व को स्वीकार करते हुए , उस पर लिखना शुरू कर दिया है।  बहुत सारी  सामग्री है जिसको अभी लिखना शेष है। अपने ब्लॉग का महत्व समझें तो ये एक ऑनलाइन डायरी है , किताब है जो सबके लिए उपलब्ध है।  जो ब्लॉग़र बंधु और बहने इससे दूर हैं वो वापस आ  जाय और फेसबुक को मंच बनाने वाले भी अपने को इसा पर संचित रख सकते हैं।
                       ग्यारह वर्ष में एक काम २०१२ में किया था और वह भी अपने सभी ब्लॉगर साथियों के सहयोग से , उसको पुस्तकाकार देने का कार्य चल रहा है , जो मेरे ब्लॉगर होने के नाते ब्लॉगर साथियों के संस्मरण को संचित कर सबके सामने लाने का प्रयास है।  "अधूरे सपनों की कसक " विषय को लेकर अंदर पलने वाली कसक को उजागर किया है।  भले ही वो कसक अब कोई मायने नहीं रखती लेकिन जीवन के लिए देखे सपने एक धरोहर तो हैं ही इस जीवन के।  मेरे उस सपने को साकार करने में भी हमारे ब्लॉगर साथियों का सहयोग है और उनकी मैं शुक्रगुजार हूँ।

रविवार, 15 सितंबर 2019

बेटियों का दंश (५) !

        लोगों ने जीना हराम कर दिया।  तरह तरह के सवाल कभी कभी हमें खुद अपराधबोध कराने लगे थे।
--पांच पांच लड़कियां है कब  करेंगे शादी ?
--अरे बेटियों की कमाई खा रहे हैं पैसा किसे बुरा लगता है ?
--हमें लगता है कि इन लोगों के पास पैसा नहीं है , लड़कियां कमा कर इकठ्ठा कर लेंगी तो कर देंगे।
-- इन लोगों को रात में नींद कैसे आती है ? जवान लड़कियां घर में बैठी हैं। 

                 कोई किसी से कहता तो दूसरा आकर हमें बताता या फिर खुद अपने मन से गढ़ कर बताता।  जो भी हो हम बहुत शांत भाव से सुन लेते और कह देते कि कुछ चीजें इंसान के वश में नहीं होती , जब भाग्य साथ देगा तो सब हो जाएगा। अंदर ही अंदर ये बातें सुन मन कभी कभी खुद को दोषी ठहराने लगता.।
                 फरवरी २०१० में बड़ी  बेटी की शादी पक्की हुई। अंतर्जातीय थी कर्नाटक के रहने वाले थे।   प्रश्न उठे और सिर  पटक कर दम तोड़ गए। हमने वहीँ जाकर शादी की थी और फिर अनुभव किया कि हमारे उत्तर भारत में जैसे लड़की का पिता और उसके पक्ष के लोग "बेचारे " बने लडके  वालों के नखरे उठाया करते हैं।  वहां ऐसा कुछ भी न था।  सारा इंतजाम उन्होंने ही किया था और सम्मान भी पूरा किया।

बड़ी बेटी ऋतु  और दामाद विनय केशव

                अभी तो चार बाकी हैं , फिर वही एक से गिनती गिनना शुरू करना था।  दूसरे नंबर की बेटी लम्बे समय के लिए यू एस में रही  कंपनी के काम से , और लोगों को लगा कि हम चुपचाप बैठे हैं।  खोज जारी थी दूसरे और तीसरे नंबर की बेटियों के लिए।  तीसरी भी तब तक  अपनी पढाई पूरी करके दिल्ली में जॉब करने लगी थी।शायद विवाह की कोई भी ऐसी साइट नहीं थी जिस पर मैंने उसका विज्ञापन न दे रखा हो।  आज भी वह डायरी मेन्टेन करके रखी है। 
             इसी बीच मेरी छोटी बेटी का चयन भी IPH   दिल्ली में ही हो गया और उससे बड़ी वाली की इंटर्नशिप चल रही थी । 
                    दिल्ली में लडके देखने की जिम्मेदारी मैंने अपने मानस पुत्र हरीश को दे रखी थी। चूँकि वह दिल्ली में जॉब कर रही थी तो मेरी प्राथमिकता यही थी कि वही एनसीआर में कोई लड़का मिले तो अच्छा है। फिर हरीश ने एक लड़का बताया जो महाराष्ट्रीय था और ये बात मेरे पतिदेव को बिलकुल भी पसंद न थी। हरीश ने बहुत समझाया क्योंकि वह कई रिश्तों के लिए दौड़ रहा था और हर जगह कभी मेरी बेटी की पांच फुट लम्बाई और कभी उसका रंग आड़े आ रहा था।  कोई बीस लाख की शादी करने पर समझौता करने को तैयार था।  पहली दो चीजों को तो हम बदल नहीं सकते थे।हमारे पास इतने सारे पैसे भी नहीं थे कि हम लाखों दहेज़ में देकर शादी कर पाते।  
                     वह लड़का उसके पापा के विभाग एनपीएल से डॉक्ट्रेट करके पुर्तगाल में पोस्ट डॉक्ट्रेट फ़ेलोशिप लेकर काम कर रहा था।  उससे भी हरीश ने संपर्क साध रखा था और फिर हम लोगों से कहा।  किसी तरह से पतिदेव नागपुर लडके के घर वालों से मिलने को तैयार हुए।  उससे पहले उन्होंने अपने सभी मित्रों और रिश्तेदारों से इस पर चर्चा कर ली और सब से पॉजिटिव उत्तर मिलने के बाद वह तैयार हुए।  
                         उसके बाद  सब कुछ ठीक रहा और शादी पक्की हो गयी।  शादी की तिथि हमने करीब ग्यारह महीने  के बाद रखी क्योंकि इससे पहले पवन को छुट्टी भी न मिलती और हमारी दूसरे नंबर की बेटी के लिए वर खोजने समय भी मिल जाता क्योंकि संयुक्त परिवार में बड़ी बैठी रहे और छोटी की शादी जो जाए एक बड़ा प्रश्न बन जाता है।  उसको यूएस से वापस आने को कहा गया और फिर खोज शुरू हुई।  भाग्य ने साथ दिया और उसकी भी शादी पक्की हो गयी। 
                 मेरी बेटी की शादी के लिए पवन के परिवार ने हमें पूरा पूरा सहयोग किया बल्कि वहां पर मेरे चचेरे भाई के होने से सारी जिम्मेदारी उसने संभाल रखी थी। हमें बड़ा आश्चर्य हुआ और बड़े सुखद अनुभव भी हुए और अहसास हुआ कि लड़की वाले भी इज्जत पाने के हक़दार होते हैं।  हमें कहीं न लगा कि हम निरीह बेटी वाले हाथ जोड़े खड़े हैं ।
      दहेज़ हमारे पास देने को न था और न उन्होंने कुछ माँगा। मन से बड़े ही सहृदय लोग हमने पाये। शादी हम दोनों की रस्मों के अनुसार नवम्बर 2011 सम्पन्न हो गयी। दूसरे नं की बेटी की फरवरी 2012 में हुई ।
                         तीन बेटियों की शादी दो साल के अंदर हो गयी तो लोगों के मुंह बंद हो गए।  बाद की दोनों छोटी थी अभी पढ़ रही थीं सो कुछ दिन के लिए सब कुछ शांत हो गया।  एक बात और कि तीनों बड़ी के बीच दो दो साल का अंतर था और चौथी पाँच साल छोटी थी

             चौथी बेटी की शादी 2014 फरवरी में हो गई । सब कुछ ऊपर वाले की मर्जी से हो रहा था । उसकी जॉब भी दिल्ली में ही थी और दामाद की गुड़गांव में । बस अब एक रह गई थी । वह मुम्बई के सरकारी संस्थान से BSLP .का कोर्स कर रही थी । उसके वहीं से मास्टर्स के दौरान ही डॉक्टर लड़का मिल गया और उसकी पढ़ाई पूरी होते है 2016 में उसकी भी शादी हो गई ।

     आज बड़ी अपने पति व बेटे के साथ यूएस में , उससे छोटी अपने परिवार के साथ आस्ट्रेलिया , तीसरी नागपुर , चौथी दिल्ली और पाँचवी झाँसी में अपना क्लीनिक चला रही है । हमें बेटियाँ देकर दामाद नहीं पाँच बेटे मिले और पाँच नाती भी मिल गये । 
            जमाने का दंश जी लिया , अब चिंतामुक्त हूँ।

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

राजभाषा हिंदी का सफर : संविधान से प्रयोग तक !

राजभाषा हिंदी का सफर : संविधान से प्रयोग तक !

                                       हिंदी को संविधान में राजभाषा का स्थान प्राप्त हुए 69 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं और अगर हम गंभीरता से इस बार विचार करें तो ये पायेंगे कि इतने वर्षों में अगर इस लक्ष्य की और हमने एक कदम भी बढ़ाया होता तो मंजिल के बहुत करीब होते।  हमने तो सिर्फ दशकों में उसे अधिनियम में परिवर्तन किया और कुछ परिवर्तन भी नहीं किया बल्कि उसको गोल गोल घुमा कर वहीँ ला कर रख दिया गया।  हमने इसको इतने वर्षों में इस दिशा में कार्य करने सितम्बर माह की 14 तारीख , प्रथम पखवारा , अंतिम पखवारे तक सीमित कर दिया है।  प्रयास चाहे सरकारी हों या  संस्थानीय , अगर निरंतर प्रयास किया गया होता या फिर हम आज भी करें तो सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।  अच्छे कार्य  के लिए देर कभी भी नहीं होती है।  अब भी सिर्फ राजभाषा के लिए नहीं अपितु हिंदी भाषा के लिए प्रगति और उसको गतिमान बनाये रखने की दिशा में हम बहुत काम कर चुके होते।
                       सरकार ने नीतियां बनाई लेकिन राजभाषा के साथ अंग्रेजी को हमेशा जोड़े रखा , आखिर क्यों ? अंग्रेजी हमारी देश की किसी भी राज्य की मातृभाषा नहीं है।  इसको तमिलनाडु की राजभाषा घोषित क्यों गया ? वहां की अपनी मातृभाषा है।  संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं पास करके   समस्त  राज्यों से अधिकारी बनते हैं तो फिर उन समस्त विषयों के साथ राजभाषा की परीक्षा अनिवार्य क्यों नहीं रखा गया क्योकि नौकरशाही और राजनीतिक महत्वाकांक्षा हिंदी को उसका   समुचित स्थान देने के लिए प्रतिबद्ध हुए ही नहीं है।
                           
                  हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में १४ सितम्बर सन् १९४९ को स्वीकार किया गया। इसके बाद संविधान में अनुच्छेद ३४३ से ३५१ तक राजभाषा के साम्बन्ध में व्यवस्था की गयी। इसकी स्मृति को ताजा रखने के लिये १४ सितम्बर का दिन प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। केंद्रीय स्तर पर भारत में दूसरी सह राजभाषा अंग्रेजी है।

धारा ३४३(१) के अनुसार भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी एवं लिपिदेवनागरी है। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप (अर्थात 1, 2, 3 आदि) है।

              हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है क्योंकि भारत का संविधान में कोई भी भाषा को ऐसा दर्जा नहीं दिया गया था।[2][3] संसद का कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जा सकता है। परन्तु राज्यसभा के सभापति महोदय या लोकसभा के अध्यक्ष महोदय विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। {संविधान का अनुच्छेद 120} किन प्रयोजनों के लिए केवल हिंदी का प्रयोग किया जाना है, किन के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग आवश्यक है और किन कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाना है, यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा नियम 1976 और उनके अंतर्गत समय समय पर राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए निदेशों द्वारा निर्धारित किया गया है।
        
हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किये जाने का औचित्य

हिन्दी को राजभाषा का सम्मान कृपापूर्वक नहीं दिया गया, बल्कि यह उसका अधिकार है। यहां अधिक विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है, केवल राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा बताये गये निम्नलिखित लक्षणों पर दृष्टि डाल लेना ही पर्याप्त रहेगा, जो उन्होंने एक ‘राजभाषा’ के लिए बताये थे-

(१) अमलदारों के लिए वह भाषा सरल होनी चाहिए।(२) उस भाषा के द्वारा भारतवर्ष का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवहार हो सकना चाहिए।(३) यह जरूरी है कि भारतवर्ष के बहुत से लोग उस भाषा को बोलते हों।(४) राष्ट्र के लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए।(५) उस भाषा का विचार करते समय किसी क्षणिक या अल्प स्थायी स्थिति पर जोर नहीं देना चाहिए।

इन लक्षणों पर हिन्दी भाषा बिल्कुल खरी उतरती है।
           
अनुच्छेद 343 संघ की राजभाषा

(१) संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।(२) खंड (१) में किसी बात के होते हुए भी, इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था, परन्तु राष्ट्रपति उक्त अवधि के दौरान, आदेश द्वारा, संघ के शासकीय प्रयोजनों में से किसी के लिए अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का और भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूप के अतिरिक्त देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा।(३) इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी, संसद उक्त पन्द्रह वर्ष की अवधि के पश्चात्‌, विधि द्वारा(क) अंग्रेजी भाषा का, या(ख) अंकों के देवनागरी रूप का,

ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग उपबंधित कर सकेगी जो ऐसी विधि में विनिर्दिष्ट किए जाएं।

अनुच्छेद 351 हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश

संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्थानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।

राजभाषा संकल्प, 1968

भारतीय संसद के दोनों सदनों (राज्यसभा और लोकसभा) ने १९६८ में 'राजभाषा संकल्प' के नाम से निम्नलिखित संकल्प लिया-

1. जबकि संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी रहेगी और उसके अनुच्छेद 351 के अनुसार हिंदी भाषा का प्रसार, वृद्धि करना और उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके, संघ का कर्तव्य है :

यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी के प्रसार एंव विकास की गति बढ़ाने के हेतु तथा संघ के विभिन्न राजकीय प्रयोजनों के लिए उत्तरोत्तर इसके प्रयोग हेतु भारत सरकार द्वारा एक अधिक गहन एवं व्यापक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जाएगा और किए जाने वाले उपायों एवं की जाने वाली प्रगति की विस्तृत वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट संसद की दोनों सभाओं के पटल पर रखी जाएगी और सब राज्य सरकारों को भेजी जाएगी।

2. जबकि संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी के अतिरिक्त भारत की 21 मुख्य भाषाओं का उल्लेख किया गया है , और देश की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि इन भाषाओं के पूर्ण विकास हेतु सामूहिक उपाए किए जाने चाहिए :

यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी के साथ-साथ इन सब भाषाओं के समन्वित विकास हेतु भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों के सहयोग से एक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जाएगा ताकि वे शीघ्र समृद्ध हो और आधुनिक ज्ञान के संचार का प्रभावी माध्यम बनें।

3. जबकि एकता की भावना के संवर्धन तथा देश के विभिन्न भागों में जनता में संचार की सुविधा हेतु यह आवश्यक है कि भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों के परामर्श से तैयार किए गए त्रि-भाषा सूत्र को सभी राज्यों में पूर्णत कार्यान्वित करने के लिए प्रभावी किया जाना चाहिए :

यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी तथा अंग्रेजी के अतिरिक्त एक आधुनिक भारतीय भाषा के, दक्षिण भारत की भाषाओं में से किसी एक को तरजीह देते हुए, और अहिंदी भाषी क्षेत्रों में प्रादेशिक भाषाओं एवं अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी के अध्ययन के लिए उस सूत्र के अनुसार प्रबन्ध किया जाना चाहिए।

4. और जबकि यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि संघ की लोक सेवाओं के विषय में देश के विभिन्न भागों के लोगों के न्यायोचित दावों और हितों का पूर्ण परित्राण किया जाए

यह सभा संकल्प करती है कि-(क) कि उन विशेष सेवाओं अथवा पदों को छोड़कर जिनके लिए ऐसी किसी सेवा अथवा पद के कर्त्तव्यों के संतोषजनक निष्पादन हेतु केवल अंग्रेजी अथवा केवल हिंदी अथवा दोनों जैसी कि स्थिति हो, का उच्च स्तर का ज्ञान आवश्यक समझा जाए, संघ सेवाओं अथवा पदों के लिए भर्ती करने हेतु उम्मीदवारों के चयन के समय हिंदी अथवा अंग्रेजी में से किसी एक का ज्ञान अनिवार्यत होगा; और(ख) कि परीक्षाओं की भावी योजना, प्रक्रिया संबंधी पहलुओं एवं समय के विषय में संघ लोक सेवा आयोग के विचार जानने के पश्चात अखिल भारतीय एवं उच्चतर केन्द्रीय सेवाओं संबंधी परीक्षाओं के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित सभी भाषाओं तथा अंग्रेजी को वैकल्पिक माध्यम के रूप में रखने की अनुमति होगी।
                  
                    
संगोष्ठी के उद्देश्य - 
• राजभाषा को दस्तावेजों से उठाकर वास्तव में प्रयोग करने की दिशा में कार्ययोजना तैयार करना
• ‎प्राथमिक स्तर से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक हिंदी की अनिवार्यता पर विचार किया जाय।
• ‎शिक्षा के स्तर का समय समय और परीक्षण होना ज़रूरी है।
• ‎प्राथमिक शिक्षकों के हिंदी के ज्ञान के स्तर का परीक्षण के पश्चात नियुक्ति की जाय। अथवा नियुक्ति से पहले एक परीक्षा हिंदी व्याकरण आदि के ज्ञान पर आधारित पास करना अनिवार्य हो।
• ‎अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भी स्कूलों में हिन्दी का पाठ्यक्रम सतही ना होकर सभी शिक्षा बोर्डों में समान हो, ताकि हिंदी को दोयम दर्जे का ना समझ जाये।
• ‎राजभाषा को इतने वर्षों में पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका है, संविधान में परिभाषित इसके सफर को इतने वर्ष बाद गति देने के विषय में विमर्श किया जाए।
• ‎अंग्रेजी को हिन्दी के स्थान और कुछ वर्षों तक रहने का प्राविधान किया गया था लेकिन आज भी अंग्रेजी ऊपर और हिन्दी नीचे है।
• ‎हिन्दी को समुचित स्थान पर लाने का प्रयत्न करना है।
• ‎अभिजात्य वर्ग की राजभाषा को उसके स्थान से चित्त रखने में भूमिका पर विचार।
• ‎विश्व के पटल पर छायी रहने वाली हिन्दी और देश में प्रयोग होने वाली हिन्दी का स्थान सुनिश्चित कैसे हो। सोशल मीडिया द्वारा हिन्दी को विकृत करने की दिशा में उसकी भूमिका पर विमर्श एवं अंकयश पर प्रस्ताव।
• ‎राजभाषा को मिलने वाले अनुदान पुरस्कार तथा अन्य सहायता का समुचित प्रयोग।

   इतने वर्षों में यदि शिक्षा के स्तर पर हिंदी को देखा जाय तो मीडिया , मोबाइल और नेट से उपलब्ध सामग्री ने गहन ज्ञान में सेंध लगाई है । हिंदी का स्वरूप बिगड़ रहा है । न स्कूली शिक्षा में , न कार्यालयीन कार्यों में । जितने वर्ष हमने  हिंदी माह , पखवाड़ा, सप्ताह और दिवस मना रहे हैं , उतना ही हिंदी को प्राथमिकता देते तो ये दिवस बेमानी हो चुका होता ।
            

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

ओणम्

ओणम्
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                 भारत भूमि पर अनेक धर्म और मतों के लोग रहते हैं और सबके अपने अपने त्यौहार हैं । कुछ त्यौहार सम्पूर्ण देश में मनाये जाते हैं और कुछ राज्य विशेष में अपनी अपनी आस्था के अनुरूप भी मनाये जाते हैं । ओणम् एक ऐसा ही त्यौहार है , जो केरल राज्य में मनाया जाता है और जो प्राचीन पौराणिक कथा के कथानक को जीवंत करते हुए मनाते हैं ।
                 ओणम् मलियाली पंचांग के अनुसार वर्ष के पहले महीने चिंगम में जब थिरुवोनम नक्षत्र आता है तभी मनाया जाता है । यह दस दिनों का त्यौहार होता है और इसमें दीपावली के समान ही कुछ परम्परायें होती हैं ।

                 ओणम पर्व कृषि से सम्बंधित है और यह खेतों की समृद्ध फसल  के लिए प्रसिद्ध है। यह दक्षिण भारत में हर साल बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस साल ओणम की आरम्भ 6 सितम्बर से हुई  वहीं इसका समापन 15 सितंबर हुआ है। इस दिन को लेकर लोगों की अपनी-अपनी मान्यताएं हैं।

         
   पौराणिक कथा 
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                राजा महाबली , हिरण्याकश्यप के बेटे प्रह्लाद के पोते थे  । महादानी महाबली का शासन पृथ्वी और स्वर्ग लोक तक फैला था । प्रजा अपने राजा को पराक्रमी ,न्यायप्रिय , प्रजा पालक होने के करण भगवान का स्थान देती थी । इसी से राजा में अहंकार बढ़ने लगा और उसकी आसुरी शक्तियों से देवता भी घबड़ाने लगे, जिससे व्याकुल होकर उन्होंने भगवान विष्णु से इससे बचाने के लिए गुहार लगायी । भगवान विष्णु ने महाबली के अहंकार को भंग करने के लिए माता अदिति के पुत्र के रूप में वामन अवतार लिया । 
 
                जब राजा महाबली इन्द्र से अपने सबसे शक्तिशाली शस्त्र को बचाने के लिए नर्मदा नदी के तट पर अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे , जिसके पूर्ण होने पर तीनों लोक में आसुरी शक्तियाँ प्रबल हो जातीं । महाबली ने निश्चय किया कि वे यज्ञ के दौरान जो कोई कुछ भी माँगेगा मैं दूँगा । यह सुनकर वामन रूपी विष्णु यज्ञशाला में आये और उन्होंने तीन पग जमीन माँगी । वामन की इस माँग से राजा के गुरु को सशंकित हुए  और उन्होंने राजा को ऐसा करने से मना किया किन्तु राजा अपने वचन के पक्के थे तो अपने वचन पर अडिग रहे ।
 
          वामन अपने विशालकाय रूप में आ गये और उन्होंने एक पग में धरती , दूसरे में स्वर्ग नाप लिया और तीसरे पग के लिए राजा ने अपना सिर रख दिया और पग रखते ही राजा पाताल में चले गये । पाताल में जाने से पूर्व उनसे उनकी एक इच्छा पूरी करने के लिए पूछा गया तो उन्होंने  भगवान विष्णु से जो वर माँगा वह था - हर वर्ष धरती पर ओणम् उनकी याद में मनाया जाय और उस दिन उन्हें पृथ्वी पर आने की अनुमति दी जाय ताकि वे अपनी प्रजा का सुख दुःख जान सकें ।
            
              यही मान्यता है कि ओणम् के दौरान राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने और उनकी खुशहाली देखने के लिए आते हैं । उन्हीं के सम्मान में यह मनाया जाता है ।
 
       
       ओणम् के दस दिनों के नाम --
 
              ओणम् के दस दिनों को विशेष नामों से जाना जाता है और प्रत्येक दिन अलग अलग कार्य सम्पादित किये जाते हैं । इन दस दिनों तक केरल राज्य में बहुत ही धूमधाम होती है।  यह वहां का राष्ट्रीय त्यौहार के रूप में मनाया जाता है और केरल में इसके लिए चार दिनों का अवकाश रखा जाता है। सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि जहाँ पर भी मलयाली लोग रहते हैं, वहां पर अपना पर्व पूरे उत्साह और श्रद्धा से मानते हैं।

 
1. अथं - यह पहला दिन होता है , जब राजा महाबली पाताल से केरल आने के लिए तैयार होते हैं ।
 
2 - चिथिरा - फूलों का कालीन बनाना शुरू किया जाता है, जिसे पूवक्लम कहा जाता है ।
 
3 - चोधी - पूवक्लम में विभिन्न फूलों की अगली परत चढा़ते हैं ।
 
4 - विशाका - इस दिन से विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताएं शुरू होती हैं ।
 
5 - अनिज्हम - नौका दौड़ की तैयारी शुरू होती है ।
 
6 - थ्रिकेता - छुट्टियाँ आरम्भ हो जाती हैं ।
 
7 - मूलम - मंदिरों में विशेष पूजा शुरू होती है ।
 
8 - पूरादम - महाबली और वामन की प्रतिमा स्थापित की जाती हैं ।
 
 9 - उठ्रादोम - इस दिन महाबली केरल में प्रवेश करते हैं ।
 
 10 - थिरुवोनम - मुख्य त्यौहार होता है ।
 
 
ओणम मनाने की पद्धति --
 
                इस पर्व की मुख्य धूम कोच्चि के थ्रिक्कारा मंदिर में रहती है । इसके विशेष आयोजन पूरे दस दिन तक होते रहते है , जिनमें नाच गाना , पूजा आरती , मेला आदि होता है । इसको देखने के लिए देश - विदेश से सैलानी आते हैं ।
    ओणम में फूलों का विशेष कालीन बनाया जाता है  - जिसे पूवक्लम पहते हैं , इसमें फूलों की परत रोज चढ़ाई जाती है । 
 
          ओणम के दिन नारियल के दूध व गुड़ से पायसम, केले का हलवा, नारियल चटनी, चावल के आटे को भाप में पका कर और कई तरह की सब्जियां मिलाकर अवियल, आदि बनाकर 64 प्रकार के पकवान बनाने की परंपरा है।
             
              इसमें विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया जाता है । इनमें केरल के लोक नृत्यों जैसे -- थिरुवातिराकाली , कुम्मात्तिकाली,कथकली , पुलिकाली आदि का विशेष आयोजन होता है ।
 
              इस त्यौहार में नौका दौड़ प्रतियोगिता  , जिसे वल्लाम्काली कहते है, की तैयारी जोर शोर से होती है । यह ओणम के बाद होती है लेकिन तैयारियाँ शुरू हो जाती है । यह विश्व प्रसिद्ध नौका दौड़ सिर्फ केरल में होती है और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र होती है ।
 
        ओणम्  में चावल के घोल से घर के बाहर सजाया जाता है , घर को दीपावली की तरह रोशनी से सजाया जाता है ।
       ओणम चूंकि महाबली से जुड़ा त्यौहार है इस लिए दान का विशेष महत्व होता है । गरीबों को दान दिया जाता है ।
       ओणम के आठवें दिन महाबली और वामन की प्रतिमायें स्थापित की जाती हैं । उनकी पूजा अर्चना की जाती है ।
       ओणम के आखिरी दिन बनने वाले व्यंजनों को 'ओणम सद्या' कहते हैं , इसमें 26 प्रकार के व्यंजन बनाये जाते हैं और केले के पत्तों में परोसे जाते हैं ।
             वैसे तो ओणम दस दिनों का त्यौहार होता है किन्तु इसके बाद दो दिन और मनाया जाता है । इन दिनों में पहले दिन महाबली और वामन की प्रतिमाओं का विसर्जन होता है और दूसरे दिन पूवक्लम को साफ किया जाता है ।