किस रूप में माँ अपने बच्चोँ के मन मेँ अपनी छवि अंकित कर जाती है ये तो उसके अपने बच्चे हि सबसे अधिक आंक सकते हैं और फिर उससे ही वे ग्रहण करते हैं अपने जीवन के कुछ पहलूओं को और फिर उसको अपने मन में विश्लेषित करते हैं। तभी तो अंजू चौधरी ने अपनी माँ की ये तसवीर खींचीं और फिर जोड़ दिया उसको उसके जीवन के हर पहलू से।
''हैलो''....हाँ जी मम्मी! राम राम जी ....कैसे हो आप?तबीयत कैसी है आपकी ?
''हाँ! मैं ठीक हा ....तू दस ...तेरा की हाल | तबीयत वदिया हैं ना तेरी ''
''हाँ जी मम्मी जी | मैं ठीक हा ...तुस्सी अपना दसो | त्वाड़े गोड़ेया दा दर्द हूण ठीक है ना.....शुगर ते नहीं वदी पई ना त्वादी ?''
''ना ना ! मैं चंगी हा ...बस तू अपना ते सबदा ख्याल रखी ....बच्चया नुं नानी दा प्यार देवीं और घर विच सबनु मेरी राम राम आखीं, बाकी सब चंगा ना| अच्छा ए दस ,तू किसी ओर नाल गल करणी है या हुन मैं फोन रखाँ''|
''नहीं! मम्मी जी कर लिती सब नाल गल |''
''हाँ! मैं ठीक हा ....तू दस ...तेरा की हाल | तबीयत वदिया हैं ना तेरी ''
''हाँ जी मम्मी जी | मैं ठीक हा ...तुस्सी अपना दसो | त्वाड़े गोड़ेया दा दर्द हूण ठीक है ना.....शुगर ते नहीं वदी पई ना त्वादी ?''
''ना ना ! मैं चंगी हा ...बस तू अपना ते सबदा ख्याल रखी ....बच्चया नुं नानी दा प्यार देवीं और घर विच सबनु मेरी राम राम आखीं, बाकी सब चंगा ना| अच्छा ए दस ,तू किसी ओर नाल गल करणी है या हुन मैं फोन रखाँ''|
''नहीं! मम्मी जी कर लिती सब नाल गल |''
''चंगा फिर ! सदा खुश रह,सुगाह-भाग बना रहे ! राम राम ''|और फोन बंद |
भले
ही हम दोनों की बातचीत में कभी भी इसके अतिरिक्त कोई बात नहीं हुई |ना
कभी किसी की बुराई-अच्छाई ...ना कुछ पूछना और ना कुछ बताना |बस इतनी सी ही
बातचीत और फोन का रखा जाना.....हम माँ बेटी का सालों से इतना सा ही
वार्तालाप है |हालचाल पूछना हाँ जी- हाँ जी करना और फोन का रख देना फिर भी
हम दोनों एक खामोशी की डोर से बंधी हैं, जिसका एक छोर मेरी''माँ'' है और एक
सिरा मैं खुद हूँ उसकी इस खामोशी में भी मुझे और मेरे परिवार के लिए दी
गयी दुआएँ और आसीसें साफ साफ सुनाई देती हैं |
''माँ'' जितना
छोटा सा शब्द है उतनी ही मुश्किल उसकी व्याख्या है |''माँ' एक ऐसा टॉपिक है
जिस पर ना जाने कितना कुछ लिखा जा चुका है और आगे भी लिखा जाता रहेगा |
मेरे
मन में भी हजारो सवालों का मंथन चलता है ...पर मेरी आवाज़ से ही वो पहचान
जाती है कि मेरी तबीयत का मिजाज कैसा है ...वो मेरी परेशानी तो नहीं पूछती
पर इतना जरूर कह देती है कि तेरी जो भी परेशानी है ''राम जी तु प्रार्थना
करसा ओ तेरी चिंता दूर करेसण''उनका इतना कहना ही निश्चित तौर पर मुझे
रिलेक्स कर जाता है |
मैंने कभी अपनी
माँ को किसी की बुराई करते हुए नहीं देखा | जहां अक्सर एक सास अपनी बहू की
बुराई करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती है वही मैंने हमेशा अपनी मम्मी को
शांत बैठे हुए देखा है । कभी-कभी उनकी ये गहरी चुप्पी मुझे परेशान भी करती
है कि और माँओं की तरह वो अपने दिल का हाल ना देती है और ना मेरे से मेरे
दिल का हालचाल पूछती है?
बहुत अमीर घर से आई मेरी माँ को अपने
ससुराल में वो उचित सम्मान नहीं मिला, शाायद इसी वजह से उन्होंने अपनी
जिंदगी से समझौता कर लिया और एक चुप को सौ सुख की चाबी मान कर उन्होंने
अपना जीवन अपने बच्चो को समर्पित कर दिया ।
ये ही सोच मुझे जीवन में आगे बढ्ने की
प्रेरणा भी देती है कि हालत कैसे भी रहे खुद पर संयम रखना बेहद जरुरी है| हर
इच्छा पूरी हो जाए ये जरुरी भी तो नहीं है ना और फिर सोचती हूँ उन अनाथ
बच्चो को जिनकी माँ ही नहीं होती |जिन बच्चों ने माँ के आंचल को तो क्या
उसके अहसास को ही अपने अंदर नहीं जिया , जो ये तक नहीं जानते कि माँ और
उसका लाड़-प्यार होता कैसा है?माँ रातों को जागती कैसे है ?माँ गीली बिस्तर
पर सोती कैसे है ?
मेरे पास माँ है कद्र करती हूँ मैं
उसकी और उस ईश्वर की जिसने मुझे माँ का प्यार इस उम्र तक भी दिया आज मैं भी
माँ हूँ और अपनी माँ के शांत स्वभाव और अनुभवों को बहुत अच्छे से समझ सकती
हूँ |
कम
से कम मैंने माँ के साथ अपने बचपन को बांटा है, उन्हे जिंदगी की मुश्किलों
से लड़ते हुए तो देखा है....मैंने उनकी चुप्पी को तो समझा है|माँ
की चुप्प रहने की आदत ने ही कहीं ना कहीं मुझे मेरे बच्चो के करीब रखा है
क्यों कि आज मैं खुल कर उन से हर विषय पर बात कर लेती हूँ |
और सबसे बड़ी बात
....माँ है तब तक मायका है |ऐसा नहीं है कि भाई-भाभी प्यार नहीं करते
या ध्यान नहीं रखते, सब बहुत प्यार करते हैं, फिर भी जब तक माँ है मायका भी
तब तक ही अपना लगता है और ये बात शायद दुनिया की हर लड़की पर लागू होती है
क्योंकि हर लड़की बेटी से बहु.....बहु से माँ बनती हैं ।


