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गुरुवार, 15 मई 2014

माँ तुझे सलाम ! (3)

                  किस रूप में माँ अपने बच्चोँ के मन मेँ अपनी छवि अंकित कर जाती है ये तो उसके अपने बच्चे हि सबसे अधिक आंक सकते हैं और फिर उससे ही वे ग्रहण करते  हैं अपने जीवन के कुछ पहलूओं को और फिर उसको अपने मन में विश्लेषित करते हैं।  तभी तो अंजू चौधरी ने अपनी माँ की ये तसवीर खींचीं और फिर जोड़ दिया उसको उसके जीवन के हर पहलू से। 



''हैलो''....हाँ जी मम्मी! राम राम जी ....कैसे हो आप?तबीयत कैसी है आपकी ?
''हाँ! मैं ठीक हा ....तू दस ...तेरा की हाल | तबीयत वदिया हैं ना तेरी ''
''हाँ जी मम्मी जी | मैं ठीक हा ...तुस्सी अपना दसो | त्वाड़े गोड़ेया दा दर्द हूण ठीक है ना.....शुगर ते नहीं वदी पई ना त्वादी ?''
''ना ना ! मैं चंगी हा ...बस तू अपना ते सबदा ख्याल रखी ....बच्चया नुं नानी दा प्यार देवीं और घर विच सबनु मेरी राम राम आखीं, बाकी सब चंगा ना| अच्छा ए दस ,तू किसी ओर नाल गल करणी है या हुन मैं फोन रखाँ''|
''नहीं! मम्मी जी कर लिती सब नाल गल |''

''चंगा फिर ! सदा खुश रह,सुगाह-भाग बना रहे ! राम राम ''|और फोन बंद |

भले ही हम दोनों की बातचीत में कभी भी  इसके अतिरिक्त कोई बात नहीं हुई |ना कभी किसी की बुराई-अच्छाई ...ना कुछ पूछना और ना कुछ बताना |बस इतनी सी ही बातचीत और फोन का रखा जाना.....हम माँ बेटी का सालों से इतना सा ही वार्तालाप है |हालचाल पूछना हाँ जी- हाँ जी करना और फोन का रख देना फिर भी हम दोनों एक खामोशी की डोर से बंधी हैं, जिसका एक छोर मेरी''माँ'' है और एक सिरा मैं खुद हूँ उसकी इस खामोशी में भी मुझे और मेरे परिवार के लिए दी गयी दुआएँ और आसीसें साफ साफ सुनाई देती हैं |

 ''माँ'' जितना छोटा सा शब्द है उतनी ही मुश्किल उसकी व्याख्या है |''माँ' एक ऐसा टॉपिक है  जिस पर ना जाने कितना कुछ लिखा जा चुका है और आगे भी लिखा जाता रहेगा |

मेरे मन में भी हजारो सवालों का मंथन चलता है ...पर मेरी आवाज़ से ही वो पहचान जाती है कि मेरी तबीयत का मिजाज कैसा है ...वो मेरी परेशानी तो नहीं पूछती पर इतना जरूर कह देती है कि तेरी जो भी परेशानी है ''राम जी तु प्रार्थना करसा ओ तेरी चिंता दूर करेसण''उनका इतना कहना ही निश्चित तौर पर मुझे रिलेक्स कर जाता है |

मैंने कभी अपनी माँ को किसी की बुराई करते हुए नहीं देखा | जहां अक्सर एक सास अपनी बहू की बुराई करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती है वही मैंने हमेशा अपनी मम्मी को शांत बैठे हुए देखा है । कभी-कभी  उनकी ये गहरी चुप्पी मुझे परेशान भी करती है कि और  माँओं की तरह वो अपने दिल का हाल ना देती है और ना मेरे से मेरे दिल का हालचाल पूछती है?
बहुत अमीर घर से आई मेरी माँ को अपने ससुराल में वो उचित सम्मान नहीं मिला, शाायद  इसी वजह से उन्होंने अपनी जिंदगी से समझौता कर लिया और एक चुप को सौ सुख की चाबी मान कर उन्होंने अपना जीवन अपने बच्चो को समर्पित कर दिया । 
ये ही सोच मुझे जीवन में आगे बढ्ने की प्रेरणा भी देती है कि हालत कैसे भी रहे खुद पर संयम रखना बेहद जरुरी है| हर इच्छा पूरी हो जाए  ये जरुरी भी तो नहीं है ना और फिर सोचती हूँ उन अनाथ बच्चो को जिनकी माँ ही नहीं होती |जिन बच्चों ने माँ के आंचल को तो क्या उसके अहसास को ही अपने अंदर नहीं जिया , जो ये तक नहीं जानते कि माँ और उसका लाड़-प्यार होता कैसा है?माँ रातों को जागती कैसे है ?माँ गीली बिस्तर पर सोती कैसे है ? 
मेरे पास माँ है कद्र करती हूँ मैं उसकी और उस ईश्वर की जिसने मुझे माँ का प्यार इस उम्र तक भी दिया आज मैं भी माँ हूँ और अपनी माँ के शांत स्वभाव और अनुभवों को बहुत अच्छे से समझ सकती हूँ |

कम से कम मैंने माँ के साथ अपने बचपन को बांटा है, उन्हे जिंदगी की मुश्किलों से लड़ते हुए तो देखा है....मैंने उनकी चुप्पी को तो समझा है|माँ की चुप्प रहने की आदत ने ही कहीं ना कहीं मुझे मेरे बच्चो के करीब रखा है क्यों कि आज मैं खुल कर उन से हर विषय पर बात कर लेती हूँ |

और सबसे बड़ी बात ....माँ है तब तक मायका है |ऐसा नहीं है कि भाई-भाभी प्यार नहीं करते या ध्यान नहीं रखते, सब बहुत प्यार करते हैं, फिर भी जब तक माँ है मायका भी तब तक ही अपना लगता है और ये बात शायद दुनिया की हर लड़की पर लागू होती है क्योंकि हर लड़की बेटी से बहु.....बहु से माँ बनती हैं ।   



बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

चुनौती जिन्दगी की: संघर्ष भरे वे दिन (२)



अंजू चौधरी :

सबकी अपनी अपनी कहानी है, जो जहाँ से चला , कंटकाकीर्ण पाठ पर चलता ही रहा और जब हिम्मत नहीं हारी तो अपनी पहचान बना लीअपने उद्देश्य के लिए लड़ते रहे और फिर दिल जीत कर अपनी फतह हासिल कीआज सब कुछ सपने सा लगने लगता है कि क्या वाकई इस मुकाम तक पहुँचने में इतना संघर्ष किया थालीजिये अंजू जी की आप बीती देखें



मेरी क्षितिजा ........जिसके लिय मैंने संघर्ष किया ...



मैं अपने इस लेख को नाम दूंगी .........
क्षितिजा ....जो मेरे काव्य संग्रह का नाम भी हैं ...इस क्षितिजा को लिखने के लिए ...मुझे बहुत कुछ सुनना और सहना पड़ा | जिंदगी में मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी कोई मुकाम आएगा कि मुझे अपने लिए ही जिद्द करनी पड़ेगी ...लड़ना पड़ेगा अपने वजूद को एक नई दिशा देने के लिए |

बात वहाँ से शुरू करती हूँ जहाँ से ये सब करने की मन में ठानी थी .....मैं अंजु चौधरी ...साधारण सी गृहणी और दो बेटो की माँ हूँ ...बच्चे उम्र के इस पड़ाव पर थे कि ...वो घर पर कम और अपने स्कूल और दोस्तों के बीच ज्यादा रहते हैं ...और पति अपने काम में व्यस्त ...रही एक औरत वो घर पर इंतज़ार करती हैं ...जो कि मैं भी किया करती थी ....मुझे लिखने का शौंक १६ साल की उम्र से ही रहा ...बहुत कुछ डायरी में लिख के रखा करती थी ...खाली वक्त ..और खाली दिमाग फटने को हो जाया करता था ...मन में ऐसा कुछ था कि ..मुझे कुछ करना हैं ...पर क्या ...वो मुझे समझ नहीं आता था ...दिन पर दिन बीत रहे थे ...ऐसे ही खाली खाली से और बेकार में ....मैं में अवसाद भरने लगी थी |
एक दिन यूँ ही बेटे को कम्पूटर चलाते देखा ...तो उसके करीब एक कॉपी लेकर बैठ गई ...वो जैसे जैसे करता गया ...मैं हिंदी में उसे लिखती रही ...बेटे को लगा की मैंने ऐसे ही बैठ कर कुछ लिख रही हूँ ...पर तभी वो बोला ....''मम्मी ..आप क्या लिख रहे हो ''? तो मैंने सीधे से उस से कहाँ ..मुझे ये कंप्यूटर सीखना हैं ...सिखायेगा क्या मुझे ? तो वो बोला ...हां क्यों नहीं ...आप बैठो ...मैं आपको सिखाता हूँ ....फिर उसने जो जो मुझे उस वक्त सिखाया ...मैं वो -वो अपनी कॉपी में नोट करती गई ..|उसने सबसे पहले मुझे कंप्यूटर स्टार्ट करना और बंद करना सिखाया |घर से सबके चले जाने के बाद ..जब अपने काम से मैं फ्री हो जाती थी तो मैं अपने बेटे की सिखायी बातों को बार बार करती थी ...उसके बाद उसने मुझे गूगल पर ..जीमेल और जीमेल पर ऑरकुट की id बनानी सिखायी ....तब मैंने २...३ बार खुद से id बनाई और उसको डिलीट किया ..| ऑरकुट ने मेरी जिंदगी ही बदल के रख दी ...मेरे लिए ये बिलकुल नया अनुभव था ...नए दोस्त...नई बाते ...नई उलझनें..| पर ऑरकुट ने मेरे मन की बच्ची को जिंदा कर दिया एक बार फिर से ...जो बचपन बहुत पीछे छोड़ आई थी ...वो यहाँ के दोस्तों के साथ फिर से जीने लगी थी ...वक्त दर वक्त ...मैंने इस कंप्यूटर पर बहुत कुछ सीखती चली गई ...मेरी टाइपिंग की स्पीड इतनी तेज हो गई कि ..किसी ऑफिस के लिए भी मैं काम कर सकती थी ( पर इसकी मुझे कोई जरूरत नहीं थी )...मैं अपने किये काम को रोज अपने बेटे को दिखाती और उसके साथ अपनी हर बात को शेयर करती थी .....इस से एक बात सबसे अच्छी ये हुई कि हम दोनों माँ बेटे बहुत करीब आ गए ...अब वो भी मुझ से अपनी हर बात शेयर करने लगा ...मैं खुश थी ...नए दोस्तों में ...एक नशा सा था उस ऑरकुट की दुनिया में ...पर मैं इस से भी उबने लगी थी ...मुझे ये माया जाल सा लगने लगा था ..जहाँ कुछ भी सच नहीं लगता था ....हां कुछ अच्छे दोस्तों का साथ मिला ...और कुछ बहुत बुरे भी मिले ...ऐसे ही एक दिन खाली बैठे ..बैठे ...ऐसे ही एक दोस्त के साथ तुकबंदी शुरू हो गई ...और वो तुकबंदी एक बहुत अच्छी कविता के रूम में मेरे सामने थी ......लिखती तो मैं पहले भी थी ..पर ऐसे भी लिखा जा सकता हैं मैंने कभी सोचा भी नहीं था ....२००८...१४ मई को मैंने नेट पर ही बैठे बैठे ..पहली कविता लिखी ...जो आज तक मेरे पास हैं ...जिसको मैंने सेव किया हुआ हैं ....अपनी कॉपी के पन्नों में |धीरे धीरे ...मैं अपनी ही कविता में खोने लगी ...एक ऐसा नशा जो मेरे सर चढ चुका था ...ऑरकुट पर बाते कम होती चली गई ...और मैं अपने आप में व्यस्त हो गई ...दोस्तों से बाते साइड बय साइड चलती रहती थी पर मेरे लिखने का जुनून
बढ़ता चला गया ...अब परेशानी मेरे लिए और मेरे पति के लिए थी ....मेरे पति जो इस कंप्यूटर की दुनिया से एक दम अनजान थे ..और मेरा संयुक्त परिवार ..जिनको समझाना ....मेरे बस का नहीं था ...मैंने सबकी बाते सुनी ..और सुनती रही ...पर कभी मैं उन्हें ये नहीं बता पाई की मैं यहाँ इस कंप्यूटर पर करती क्या हूँ ...खेर २००८ जाने को था ...और तभी मैंने अखबार में नेट पर ब्लॉग कैसे बनाया जाता हैं ....वो पढ़ा ..उस पेपर लो अपनी जान से ज्यादा संभल के रखा....पर वो फिर भी खो गया ...तो बहुत हिम्मत करके एक ऑरकुट दोस्त जिसका नाम ...पंकज हैं ...उसको अपनी परेशानी बताई ..और उस से पूछा कि क्या वो ब्लॉग बनाना जनता हैं .....तो बोला हां .....मैंने अपना ये ब्लॉग
''अपनों का साथ ''...उस से बनवाया वो सफर ...शुरू हुआ ...कभी ना थमने के लिए ...पर एक बात का अफ़सोस रहा कि इस दौरान ...बहुत से लांछनो से गुजरना पड़ा ...बहुत सी बाते सुनी ..जो एक औरत होने के नाते मुझे अंदर ही अंदर तोड़ कर रख देती थी ...मैं हिम्मत हार जाती थी और अकेले में खूब रोती थी ...पर इन सब में ..मेरे दोनों बेटे ....दिशांत ..और रोहन ने बहुत साथ दिया वक्त वक्त पर मेरी हिम्मत बन कर उभरे वो दोनों .....यहाँ तक की वो अपने पापा से भी मेरे लिए उलझ पड़ते थे ''कि आप मम्मी को लिखने से नहीं रोको ,,,वो कुछ गलत नहीं कर रही हैं ,और हमको उन पर विश्वास हैं |'' मुझे ऐसा लगता था जैसे मैं घर के लिए हूँ और घर के लिए ही रहूंगी ...अपने लिए मैं कभी कुछ नहीं कर पाऊँगी...मन अंदर ही अंदर बेचैन था ...कुछ सिर्फ अपने लिए करने को ..शब्द और विचार अंदर थे ..टाइपिंग में थे ...नेट पर सब काम सेव था ...बस उसे दिशा नहीं मिल रही थी ....
अब यहाँ मैं ज़िक्र करुँगी अपने उस दोस्त का जिसने मुझे नई दिशा दी ...विवेक दुबे जो कि भोपाल (रायसन) में रहते हैं ...वो नियमित मेरी कविता को बहुत दिल से पढते थे ...उनके एक दोस्त जो की भोपाल में एक अखबार निकलते हैं ''निर्दलीय''...उन्हों ने मुझे से बिना पूछे मेरी कविता का प्रिंट आउट निकल कर उन्हें दिया ..और मेरी कविता उस अखबार में छप भी गई ...जब मुझे इस बात की खबर दी गई तो ...मैं तो जैसे पागल सी हो गई थी ...और उन दिनों खुद से इतनी मायूस हो चुकी थी की मैं कविता लेखन का काम बंद करने की सोच रही थी ...पर विवेक जी ने ऐसा मुझे नहीं करने दिया ...एक साल तक लगातार मेरी कविता निर्दालिये में छपी ...और मुझे निर्दलीय टीम ने २०१० ...३ जुलाई को भोपाल में ...........





निर्दलीय प्रकाशन ....संपादक / प्रकाशक ...कैलाश आदमी भोपाल

सम्मान.......निर्दलीय प्रकाशन के राष्ट्रीय अलंकरण की श्रृंखला में साहित्य वारिधि अलंकरण....श्रीमती अंजु चौधरी (अनु) करनाल...हरियाणा को कविता एवं साहित्य के क्षेत्र में सम्मानित किया गया....|

इस सफर में मेरी मुम्बई की दोस्त नीता ने भी मेरा बखूबी साथ दिया ...वो सफर जो अधूरा रहने वाला था ..उसको मंजिल तक लाने वाले ही विवेक और नीता हैं ....२०१० ..मार्च के बाद ...मेरे सफर और मेरी इज्ज़त में इज़ाफा हुआ ...सबकी नज़रों में अब पहले जैसी नाराज़गी नहीं थी ...जो स्पोर्ट मुझे परिवार की तरफ से पहले नहीं मिल रहा था ...अब वो मिलने लगा ...घर से बाहर भी अब लोग मुझे मेरे काम से जानने लगे थे ..हल्की हल्की तारीफ़ होने लगी थी ...मन में मैं अपने काम को लेकर और मजबूत होती चली गई ..एक नई ताकत का संचार महसूस करने लगी थी अपने ही अंदर ...इसी दौरान वटवृक्ष ,अनुगूँज और
अरूण कुमार झा जी की दृष्टिपात ..से जुडना मेरे लिए मील का पत्थर साबित हुआ ...इन सबसे मुझे बहुत कुछ नया सिखने को मिला ....३० अप्रैल २०१० दिल्ली में हुई ब्लॉगर मीटिंग में जाने के बाद ...जैसे जिंदगी ही बदल गई .....और वो पहले वाली डरी हुई अंजु (अनु)..कहीं बहुत दूर रह गई ..और सबके सामने एक नई अनु आई ..जो सिर्फ अपने काम से प्यार करती हैं ...और अपने उस हर दोस्त से ...जो उसके साथ जुड़ा हुआ हैं ...मुझे मेरी जिंदगी में मेरा मकसद देने वाले दोस्तों को मैं दिल से नमन करती हूँ ...और अब अपने पति मोहिंदर चौधरी जी ...जिनके सहयोग के बिना मैं अपनी क्षितिजा नहीं ला सकती थी और परिवार के हर उस सदस्य का आभार जिसने मुझे समझा और मुझे यहाँ तक लाने के लिए दिल से शुक्रिया ...|

अनु