काउंसलिंग कैसी हो : बच्चों के संदर्भ में!
वर्तमान परिवेश में बच्चों को काउंसलिंग की जरूरत है। बचपन से स्कूल जाने तक बच्चे का स्वभाव स्पष्ट हो जाता है। वैसे तो इस स्तर पर माता-पिता ही सबसे बड़े काउंसलर हो सकते हैं और कहा गया है कि बच्चों को जो बातें सिखाई जाती हैं, वे कोरी स्लेट की तरह उनके मन-मस्तिष्क पर हमेशा के लिए अंकित हो जाती हैं। यह तो है उन बच्चों के लिए जो घर में रहते हैं और परिवार में उन्हें हमेशा किसी न किसी संरक्षण मिलता है। आज के परिवेश और स्थितियों में ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है तो संभावनाएं तलाशना होगा। उसी दिशा में कुछ सोचने के बिंदु --
काउंसलिंग और प्ले स्कूल जाने वाले बच्चे :--
जितना बच्चे को घर में देखरेख की जरूरत होती है, उतनी ही स्कूल में भी होती है। वैसे तो शिक्षक बाल मनोविज्ञान समझते हैं और उन्हें बच्चों के मन को किस तरह पढ़ना है. उनका अबोध मन क्या संजो कर बैठा ? उसको पढ़कर उनके भविष्य की रूपरेखा तय करती हैं। जहाँ माता पिता दोनों कामकाजी होते हैं, वहाँ बच्चे ज्यादा संवेदनशील होते हैं क्योकि अन्य बच्चों की तरह उनकी अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पाती हैं। तब काउंसलिंग ही उनको सही दिशा दिखती हैं और ये इस समय बहुत जरूरी होती है।
माँ बच्चे की प्रथम शिक्षक होती है लेकिन जब बच्चा स्कूल में कदम रखता है तो उसके लिए अपनी शिक्षिका की बात पत्थर की लकीर होती है।
बाल मनोविज्ञान का ज्ञान : --
छोटे बच्चों की शिक्षिका को बाल मनोविज्ञान का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। उसके समक्ष विभिन्न स्वभाव के बच्चे आते हैं और बच्चों के लिए यही एक स्थिति होती है जबकि उनके स्वभाव को पहचान कर उसे समाज के सामाजिक और नैतिक मूल्यों के अनुरूप व्यवहार करने की शिक्षा दी जाती है। जो बच्चे सिर्फ प्ले में डाले जाते हैं, उनकी टीचर को बाल मनोविज्ञान का ज्ञान होना चाहिए ताकि बच्चों की नींव सही से पड़ सके। जब बच्चे घर से बाहर जाने लगते हैं तो वे माँ से ज्यादा अपनी शिक्षिका की बात को महत्व देते हैं।
इस उम्र के बच्चों को कोई साइंस , गणित या अन्य विषयों की पोथी नहीं पढानी होती हैं , बल्कि उनके मनो-मष्तिष्क को नैतिक शिक्षा देने वाली कहानियां, आपसी प्रेम बढ़ाने वाले खेल , सहयोग की भावना बढ़ाने वाले पाठ पढ़ाना होता है। उनमें चरित्र निर्माण की नींव डाली जाती है।
कभी कभी घर के माहौल के कारण बच्चा अंतर्मुखी हो जाता है और फिर उसको टीचर पहचान कर उसकी काउंसलिंग करे और घर के विषय में जानकारी लेकर माता पिता को आगाह कर सकती है क्योंकि ऐसे बच्चे छोटी छोटी बात पर आहत हो जाते हैं।
काउंसलिंग माता-पिता की: बच्चों के संदर्भ में :--
मां-बाप की काउंसलिंग भी बहुत जरूरी है क्योंकि ये जरूरी नहीं है कि धन से, शिक्षा से या अच्छी नौकरी से सम्पन्न होने पर माता-पिता बाल मनोविज्ञान को उतना ही समझते हों। कभी कभी कार्यस्थल का तनाव माता-पिता आपस में या कभी कभी बच्चों पर भी निकाल देते हैं, बगैर ये जाने कि इसका प्रभाव उन बच्चों पर क्या हो सकता है? इसलिए समय समय पर जब पेरेंट्स-टीचर मीटिंग हो तो उनको काउंसलिंग के द्वारा समझाया जा सके।
विशेष बच्चों की काउंसलिंग:--
इस तरह के बच्चों के बारे में अभी भी अभिभावक इतने सजग नहीं है और विशेष बच्चों के विषय में एकदम पता नहीं लगता है। जिन बच्चों में कुछ प्रतिशत ही इस तरह का स्वभाव पाया जाता है, उनको भी काउंसलिंग की जरूरत होती है और इसके लिए हर बड़े स्कूल में इस तरह के विशेषज्ञ की नियुक्ति होती है। बच्चों के क्रिया-कलापों से जब साधारण शिक्षक कोई निर्णय नहीं ले पाए तो उन्हें विशेष बच्चों के काउंसलर से परामर्श करके या फिर उसके पास भेज कर बच्चे की काउंसलिंग करवानी चाहिए। जैसी घटनाएं आजकल छोटे बच्चों के साथ घट रही हैं, उनको देखते हुए बच्चों के स्वभाव में होने वाले परिवर्तन को वह बहुत अच्छी तरह से समझ सकती हैं।
किशोरावस्था की काउंसलिंग :--
किशोरावस्था उम्र का वह दौर होता है जब बच्चों में कुछ शारीरिक और मानसिक बदलाव आता है। आज के दौर में बच्चे नेट से या अन्य जरिये से इसके विषय में जानें, माँ को ही एक कुशल काउंसलर बन कर बच्चों को होने वाले परिवर्तन के विषय में समझाना चाहिए। उनमें सुरक्षा की भावना का भी बीजारोपण करना होता है। वैसे तो इसकी जरूरत आज भी माँ समय से नहीं समझती है और यही कारण है कि अप्रत्याशित घटनाएं घट जाती हैं। इसके लिए बेटी और बेटे दोनों के प्रति बराबर सावधानी की जरूरत होती है क्योंकि आज जो दौर समाज में चल रहा है उसके चलते भटकने में देर नहीं लगती है। इसीलिए माँ-बाप को बहुत सतर्क और पैनी नजर रखनी चाहिए। जो संयुक्त परिवार में नैतिकता का पाठ बच्चे पढ़ते थे, उसका आज सर्वथा अभाव है।
सोशल मीडिया और नेट से प्राप्त होने वाली जानकारी और उसमें बच्चों की संलिप्तता उनको हमेशा सही दिशा नहीं देती बल्कि कई बार कुछ ऐसे स्रोत भी उनकी नजर में आ जाते हैं, जो उसको भटका देती है। कुछ वीडियो गेम बच्चों को भटका कर आत्महत्या तक के रास्ते पर ले जाते हैं। पहले तो माता पिता की अनदेखी मनमानी करने के लिए स्वतन्त्र छोड़ देती है और फिर जब वे उनके हाथ से निकल जाते हैं तो उस समय उन्हें भी काउंसलिंग की जरूरत होती है।
युवाओं की काउंसिलिंग :--
आज के संदर्भ में बच्चों की आईक्यू (IQ) बहुत तेज है और वे कब बाल्यावस्था से किशोरावस्था में प्रवेश कर जाते हैं, पता नहीं चलता। इसके पीछे सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव से युवावस्था जैसी सोच और क्रियाकलाप में संलिप्त होकर अपने को मां-बाप से ज्यादा समझदार समझने लगते हैं। इस समय काउंसलिंग हर कदम पर चाहिए क्योंकि स्कूल के बाद कॉलेज या प्रोफेशनल इंस्टीट्यूट में पहुंच कर आत्महत्या जैसी घटनाओं का बढना इस बात का संकेत है कि काउंसलिंग की बहुत अहम् भूमिका हैं।


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