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सोमवार, 2 जून 2014

माँ तुझे सलाम ! (15)

                               बच्चे कच्ची मिटटी के लौंदे की तरह होते हैं और किसी कुम्भार की तरह माँ उसको आकर देती हैं।  तभी तो कहा जाता है  कि माँ से क्या सीखा है ? वह भी चाहती है कि मेरे बच्चे ऐसे बने किसी को ये शब्द कहने का मौका  न मिले।  तभी तो अपने संस्मरण में लिख रही हैं : आशा लता सक्सेना जी।

                                                                   



बात बहुत पुरानी है पर जब कि मैं खुद नानी दादी हो गयी हूँ आज भी भूल नहीं पाती |वह ऐसा समय था जब बच्चे माँ की आँखों से डरते थे |उनकी हर बात समझते थे व कहना मानते थे |हमारे पड़ोस में एक आंटी रहतीं थीं

उनके यहाँ का निमंत्रण आया |सब तैयार होने लगे |जब जाने के लिए निकल रहे थे मम्मी ने समझाया “वहा जा कर चुपचाप बैठना |जब तक मैं न कहूँ किसी चीज को हाथ न लगाना |”मैंने सर हिला कर अपनी स्वीकृति दे दी |

तब मुश्किल से मेरी उम्र ४ वर्ष की रही होगी |

    वहाँ सभी बड़े लोग आपस में बातों में व्यस्त हो गए |सारे बच्चे खेलने लगे पर मैं गुमसुम गुडिया सी मम्मी के पास चिपकी बैठी थी |आंटी ने २-३ बार कहा जाओ तुम भी जा कर खेलो |पर मैं मम्मी की और देखती रही |आंटी को लगा मुझे भूख लगी होगी तभी नहीं खेल्र रही |वे एक प्लेट में कुछ खाने के लिए ले आईं |

   मैं भूल गयी कि मम्मी ने क्या कहा था? चट से खाने बैठ गई |वहाँ तो वे कुछ नहीं बोलीं पर घर आते ही एक तमाचा पड़ा गाल पर |मैं जोर जोर से रोने लगी तब वे बोलीं “क्या घर में खाने की कमी थी जो वहाँ फैल कर बैठ गयी | “ उसदिन के बाद उनकी हर बात  मानने की जैसे मैंने कसम खाली | जब बड़ी हुई तब भी सदा उनके कहने में चली इसी कारण आज भी उनकी हर छोटी शिक्षा भी याद आती है |माँ ही बच्चों की प्रथम गुरू है उन्हें समाज में विचरण के तरीके सिखाती है | माँ के अनुशासित व्यवहार के कारण ही मेरा व्यक्तित्व निखर पाया |

आज जो भी हूँ उ़नके कारण हूँ |