
नीरज गोस्वामी :
फिर लौटना बचपन में !
गर्मियों की छुट्टियों का जिक्र आते ही मन चालीस साल पीछे लौट गया है. यूँ तो छुट्टियों के बहुत से किस्से ज़ेहन में हैं लेकिन उनमें से एक विशेष है जो आपको सुनाता हूँ. हम दो भाई हैं .हमारा ननिहाल जगाधरी यमुना नगर में था. माताजी हर गर्मियों की छुट्टियों में हमें ननिहाल हमें लेजाया करती थीं. ननिहाल में नानी नाना दो मामा मामियां दो मौसियाँ थीं. मौसियाँ शादी शुदा थीं लेकिन रहती यमुना नगर में ही थीं. उनके और हमें मिला कर कुल मिला कर बारह तेरह बच्चे हो जाया करते थे. नाना का खूब बड़ा सा घर जिसमें आम अमरुद लीची जामुन नीम्बू नीम के कई पेड़ थे. अंगूरों की बेल की छत के नीचे एक बड़ा सा पानी का हौद था जिसे हम बच्चे पहले रगड़ रगड़ कर साफ़ किया करते और शाम को पानी भर के घंटों नहाया करते. सारे दिन सिवा धमा चौकड़ी मचाने और खाने के और कोई काम नहीं हुआ करता था.
मैं शायद आठवीं में था जब गर्मियों की छुट्टियाँ आने पर पिताजी ने कहा के तुम इस बार अपनी माताजी के साथ ननिहाल न जा कर यहीं जयपुर में मेरे साथ रहो. मुझे उनकी बात रुचिकर नहीं लगी, लेकिन उन्हें मना करने का साहस नहीं था. मेरे उतरे चेहरे को पिताजी ने भांप लिया और बोले अच्छा ये बताओ तुम मेरे क्या करने पर यहाँ रुक जाओगे. मैंने सोचने के बाद जवाब दिया के अगर आप मुझे एक महीने में तीन फ़िल्में दिखायेंगे तो मैं ननिहाल नहीं जाऊंगा. कहाँ तो हम साल में एक आध फिल्म देखते थे और कहाँ मैंने एक महीने में तीन फ़िल्में देखने की बात कह दी. मुझे यकीन था के पिताजी मेरी इस बात को कभी नहीं मानेंगे लेकिन हुआ इसके ठीक उल्टा, पिताजी ने मेरी शर्त मान ली. मैं पिताजी के इस निर्णय से खुश होऊं या दुखी ये सोच नहीं पा रहा था एक तरफ ननिहाल की मस्ती और दूसरी तरफ फिल्मों का आकर्षण दोनों ही मेरे प्रिय थे. खैर मेरे पास सिवा जयपुर में रुकने के दूसरा कोई रास्ता नहीं बचा था. छोटे भाई और माताजी को रोते रोते स्टेशन से विदा किया और घर आ गया. दिन बीतते गए और फिल्मों का कोई जिक्र पिताजी की तरफ से जब नहीं हुआ तो मुझे लगा के मुझे रोकने के लिए ही ये शाजिश की गयी थी.
एक दिन शाम के पांच बजे थे पिताजी घर आये और बोले नहा धो कर तैयार हो जाओ बाहर जाना है. कहाँ जाना है पूछने की हिम्मत नहीं पड़ी .फटाफट नहा धो कर तैयार हो गया. उन्होंने अपनी साइकिल पर मुझे आगे बिठाया और इधर उधर की बातें करते हुए बाज़ार की और बढ़ने लगे. मेरी उत्सुकता चरम सीमा पर थी मैंने पूछ ही लिया के हम कहाँ जा रहे हैं वो मुस्कुराते हुए बोले अभी खुद ही देख लेना.पंद्रह मिनट के बाद हम जयपुर के प्रेम प्रकाश सिनेमा के बाहर थे. सिनेमा के बाहर मुगले आज़म फिल्म के बड़े बड़े पोस्टर लगे थे. मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था के मैं फिल्म देखने आया हूँ. साइकिल स्टेंड पर रखने के बाद टिकट ली गयी और जब हम हाल में अन्दर घुसे तो मारे ख़ुशी के मैं रो ही पड़ा. उस वक्त फिल्म देख कर समझ तो ज्यादा नहीं आई लेकिन मज़ा बहुत आया. खास तौर पर सलीम और अकबर की लड़ाई वाले दृश्यों को देख कर.रात को बाहर आ कर होटल पर जा कर कुलचे छोले और आलू की टिकिया खाई. मेरे मन में अपने पिता को लेकर जो डर था वो इस यादगार शाम के बाद काफूर हो गया. बाद में उन्होंने मुझे सुनील दत्त वाली "गुमराह " और " आज और कल" फ़िल्में भी दिखाईं. मेरे पिता उन गर्मियों की छुट्टियों के बाद से मेरे सबसे अच्छे दोस्त बन चुके थे.
