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सोमवार, 30 जनवरी 2012

चुनौती जिन्दगी की: संघर्ष के वे दिन !

जिन्दगी वह महा समर है जिसको जीतने के लिए शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने जीवन में संघर्ष न किया हो। ऐसा नहीं इसके कुछ अपवाद होते हें जिन्होंने कभी इस प्रकार का कोई भी अनुभव जीवन में न लिया हो लेकिन ९९ प्रतिशत जीवन ऐसे होते हें - जिन्हें खुद को स्थापित करने में सामाजिक , पारिवारिक , आर्थिक या फिर अपने कार्यक्षेत्र में संघर्ष का सामना करना ही पड़ा होगा।
इस संघर्ष के बिना शायद जीवन का स्वाद कुछ अधूरा ही रहता है। किसी ने जन्म से मृत्यु तक सिर्फ संघर्ष और संघर्ष ही किया और करते करते ही चले गए, लेकिन हारे नहीं । ऐसी ही एक जिन्दगी मैंने भी देखी बचपन से लेकर मृत्यु तक 'हादसों की जिन्दगी ' नाम से वे कहानी लिख गए। उस कहानी ने ही ये प्रेरणा दी की सबके जीवन में झांक कर देखा जाय कितना कुछ झेल कर वे इस मुकाम तक पहुंचे हें और फिर भी मुस्करा रहे हें। अपनी उपस्थिति इस जगत में दर्ज करा कर अपने संघर्ष पर विजय की पताका फहरा रहे हें।
आज के दौर में बढ़ती युवा आत्महत्या हो या फिर समाज में प्रतिष्ठित लोगों द्वारा के गयी आत्माहत्या - यह एक हारे हुए जीवन की कहानी बन जाती है। वे जो लड़ नहीं सके और मन से हार गए , उनके अन्दर हालातों से संघर्ष करने की क्षमता ही शेष न रही । काश कोइ ऐसा मिल जाता जो उन्हें इस दौर से उबार लेता या फिर ऐसी कोई संघर्ष गाथा जो उन्हें संबल देती इस लड़ाई को लड़ने की न की जीवन हार जाने की।
इस विषय को मैं आप सबके बीच ले आ रही हूँ और हम भी इंसान है कोई फरिश्ते नहीं सबने अपने अपने ढंग से जीवन में संघर्ष किया है और इसी लिए सबके अनुभव लेकर एक श्रृंखला तैयार करने का मेरा इरादा है जिससे के युवा पीढ़ी हमारे जैसे हालातों में पड़ कर जीवन हारने की सोचने के स्थान पर इन अनुभवों को अपना संबल बनाये और सोचे की अगर वे लड़ कर निकल सकते हें तो हम भी इन हालातों को जीत कर आगे बढ़ सकते हें। ये तो निश्चित है कि दूसरे का ज्यादा दर्द देख कर इंसान अपना दर्द भूल जाता है और सोचता है की हम तो इनसे बेहतर हें इस तरह तड़प तो नहीं रहे हें।
मेरा अपना जीवन भी इससे इतर नहीं है , आज के हालात पर आने तक बहुत कुछ झेला है लेकिन न हारी और न साथ वाले को हारने दिया। बस आज एक झलक ही दिखाऊंगी।
बात १०८१ की है मेरी बड़ी बेटी का जन्म हुआ और मेरा बी एड में एडमिशन । बस एक महीने की हुई कि क्लास के लिए जाना था। उस समय मैं कानपुर विश्वविद्यालय परिसर में रहती थी , वहाँ से मेरा कॉलेज बहुत दूर था। बी एड करने की ठान ही ली थी सो कॉलेज के पास कोई कमरा देखा गया जहाँ रहकर मैं बी एड कर लूं और कॉलेज से बीच बीच में अगर बेटी को भी देख सकूं।
उस समय कानपुर में मिलें चल रहीं थी सो वहाँ के मजदूरों के रहने के लिए लोगों ने छोटे छोटे कमरे बनवा रखे थे जिनमें न रोशनी और न खिड़की होती थी। मुझे एक घर मिला उन मजदूरों के बीच ही एक कमरा उसके आगे बंद बरामदा सिर्फ एक दरवाजा और वह भी ऊपर की मंजिल पर एकदम नीची छत। लेकिन वह उस समय मेरी जरूरत बन चुका था। सो सासुजी को लेकर हम दोनों वहाँ पहुँच गए। गर्मी में ये आलम होता कि सासू तो बाहर खुली छत पर सो जाती लेकिन हम उस कमरे में सीलिंग फैन भी नहीं लग सकता था और गर्मी इतनी कि रात में सो नहीं सकते थे तब हम एक बाल्टी में पानी रख कर लेटते थे और चादर उस पानी से भिगो कर लेटते टेबल फैन से हवा लगती तो कुछ देर ठंडक लगती तो एक आध झपकी मार लेते और फिर जब चादर सूख जाती तो वही काम करते । इस तरह से गर्मियां गुजारी हमने और ये हमारी जिन्दगी का एक ऐसा अनुभव था कि सारी सुविधा उपलब्ध होने पर भी इंसान को हालात कैसी परीक्षा में डाल देता है कि वह एक बार उन लोगों की समस्या को सोचने के लिए मजबूर हो जाता है। वहा रहने वाले मजदूर उनके कमरे के आगे तो बंद बरामदा भी नहीं था सीधी धूप पड़ती सारा दिन और फिर उस कमरे में रहना जिसमें पंखा भी नहीं होता था। कमरे के बाहर सोते तो एल्गिन मिल विक्टोरिया मिल म्योर मिल की चिमनियों से निकलने वाला धुआं कार्बन के छूटे छोटे टुकड़े बनकर सब कुछ काला कर चुका होता था।
आगे अपने और साथियों की संघर्ष गाथा लेकर आ रही हूँ, जो प्रेरणा बनेंगी और खासतौर पर उन लोगों के लिए जो अभी इस दौर से गुजर रहे हैं ।

रविवार, 29 जनवरी 2012

गाँधी जी के लिए !

हम ही उन्हें महात्मा गाँधी नहीं कहते थे , वे सम्पूर्ण विश्व के लिए एक प्रेरणा स्रोत थे और सम्पूर्ण विश्व को उनकी हत्या ने हिला दिया था। इस अवसर पर एक दुलभ कविता अफ्रीका के स्वातंत्र्य संग्राम के सेनानी पेड्रिस लुमुम्बा ने लिखी थी। आप सबके सामने रख कर उस महा पुरुष को श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हूँ।

महात्मा ! तुमने आदमी को
प्यार
, अहिंसा और सद्भावना देनी चाही

कैसी जुर्रत की तुमने गाँधी ?
कैसा था दुह्साहस ?
ऐसा ही दुह्साहस किया था यीशु
फिर यीशु से इतर तुम्हारी परिणति क्या होती?
यह अंत कितना अपूर्व है,
कितना मोहक?
क्या मौत इतनी मेहरबान होती है?
अगर ऐसी मौत मिलनी हो तो
मैं आज ही
आज ही नहीं अभी इसी क्षण मरना चाहूँगा।
मृत्यु इतनी श्लाघ्य !
मृत्यु इतनी वरेण्य !
ऐसी ही मृत्यु मुझे भी देना मेरे अंतर्यामी ।

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

वसंत पंचमी !




        वाणी पुस्तक वीणा हस्ते , विद्या देवी तुम्हें नमस्ते !


आज का दिन माँ सरस्वती के प्रकट होने का दिन कहा जाता है ।माँ सरस्वती के वरद हस्त से ही मनुष्य इस जीवन में विद्या , बुद्धि, कला और साहित्य में ऊँचे स्थान पर विराजमान होता है । माँ मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती हें। कहते हें कि दिन में एक बार जिह्वा पर सरस्वती के वास होता है और उस पल इंसान जो कुछ भी बोलता है उसका सत्य होना सुनिश्चित है। इसी लिए कहा जाता है की मुख से वचन निकलने से पहले सौ बार सोचना चाहिए। माँ सरस्वती की प्रासंगिता हर युग में रही है और रहेगी। जब तक मनुष्य के पास बुद्धि और वाणी है तब तक हम इन्हें नमन करते रहेंगे। इसके बिना तो मनुष्य का अस्तित्व एक मिट्टी के पुतले की तरह से होता है। जब मनुष्य अपनी परिस्थितियों से परेशान होता है तो उससे निकलने का रास्ता यही से आता है। जिह्वा की बात चली तो ये सरस्वती जी का निवास स्थान भी होता है , इसका कार्य सिर्फ भोजन के रसास्वादन का नहीं होता है बल्कि परमेश्वर की जिह्वा से प्रकट हुई वाग्देवी सरस्वती कहलाई। इसी दिन यानि कि वसंत पंचमी के दिन वाग्देवी का आविर्भाव हुआ था इसी लिए यह दिवस वाग्देवी जयंती के रूप में मनाया जाता है। आज इस वाणी के महत्व को कोई नहीं पहचानता है, कोई भी कुछ भी बोल रहा है, बयान दे रहा है , गालियाँ दे रहा है या फिर झूठे आरोपों के बल पर दूसरों को नीचा दिखा रहा है। ये अपमान है माँ सरस्वती का - वाणी का जीवन में जो महत्व है उसको पहचानिए। इस मुख से ऐसे वचन निकलने चाहिए की किसी दुखी ह्रदय को शांति और सांत्वना दे सकें। जीवन से निराश लोगों के लिए एक प्रेरणा और संबल बन सके। जो भी बोला जाय वह सार्थक हो, निरर्थक वचन भी व्यक्ति के लिए घातक बन जाते हें। इसी लिए इस वाणी से जो भी कहें सोच समझ कर कहें। वाणी का स्वर मधुर होकर शत्रु को भी मित्र बना सकता है और कठोरता तो सम्पूर्ण जगत को आपका बैरी बना सकता है। वाणी का बाण अगर एक बार मुख से निकाल गया तो फिर वापस नहीं आता । निरर्थक और अनर्गल बोलना स्वयं व्यक्ति के व्यक्तित्व को क्षीण करता है और वाग्देवी का अपमान होता है। जीवन में सदैव ऐसा बोलने की कोशिश करें जो मधुर और कर्णप्रिय हो। इसी लिए कहा गया है --
वाणी ऐसी बोलिए मन का आपा खोय , औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय ।

बुधवार, 25 जनवरी 2012

राष्ट्रीय मतदाता दिवस !

"हम भारत के नागरिक, लोकतंत्र में अपनी पूर्ण आस्था रखते हुए यह शपथ लेते हें कि हम अपने देश की लोकतांत्रिक परम्पराओं की मर्यादा को बनाये रखेंगे तथा स्वतन्त्र , निष्पक्ष एवं शांतिपूर्ण निर्वाचन की गरिमा को अक्षुण रखते हुए , निर्भीक होकर धर्म , वर्ग, जाति, समुदाय, भाषा अथवा अन्य किसी भी प्रलोभन से प्रभावित हुए बिना सभी निर्वाचनों में अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।"

२५ जनवरी २०१२ को राष्ट्रीय मतदाता दिवस घोषित करने का उद्देश्य मतदान में नजर आ रही उदासीनता को दूर करना है । आज युवा पीढ़ी की सोच पुरानी पीढ़ी से बदल रही है। अगर हम सिर्फ विद्याथियों की सोच को देख रहे हें तो एक स्वर में सभी की मांग यही सुनाई पड़ रही है कि प्रत्याशी जाति , वर्ग, धर्म , भ्रष्टाचार और आरक्षण का पोषक न हो , उसका समर्थक न हो। विकास के लिए प्रतिबद्ध हो।
सरकार भी मतदाताओं को उनके अधिकार प्रति जागरूक बनाने के लिए कार्य कर रही है। इसके लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाये जा रहे हें। वैसे भी भारत विश्व में सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में जन जाता है और एक ऐसे लोकतंत्रीय शासन वाले राष्ट्र में मतदाता इसकी कार्यपालिका, विधायिका के सदस्यों के चुनाव के लिए एक महत्वपूर्ण अंश हें। उनका एक मत किसी को भी पराजित या विजयी बना सकता है। अपने वोट के महत्व को समझाने के लिए ही यह सब किया जा रहा है। पिछले कई चुनाव से मतदान के प्रतिशत ४० से ६० प्रतिशत से अधिक कभी भी नहीं हो सका है । इसके लिए उदासीन वर्ग सिर्फ एक कोई तबका नहीं नहीं है बल्कि इसमें प्रबुद्ध वर्ग की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पढ़े लिखे लोग चुनाव के लिए मिली छुट्टी को घर में रहकर एन्जॉय करना चाहते हें और बाहर जाकर चाहे बूथ कितने ही पास क्यों न हो पसंद नहीं करते हें। वे लोकतंत्र की सभी सुविधाओं को लेना चाहते हें। चुनाव में होने वाली धांधली कि आलोचना करेंगे लेकिन खुद अपने गिरेबान में झांक कर नहीं देखेंगे कि हम कितने आलोचना के पात्र हें।
इस विधान सभा चुनाव में हम आशा करते हें कि मतदान का प्रतिशत बढेगा। अगर हम मतदान नहीं करते हें तो फिर हम योग्य या फिर मनचाहे प्रतिनिधि के चुन कर आने की आशा कैसे कर सकते हें?
ऐसा नहीं मतदान के बहिष्कार की बात भी लोग कर रहे हें कि अगर सफाई और सड़क की व्यवस्था में सुधार नहीं होगा तो हम मतदान का बहिष्कार करेंगे लेकिन ये तो उनकी सबसे बड़ी भूल होगी क्योंकि उनका मतदान न करना तो किसी को भी चुनकर लाने में सहायक होगा फिर वे जो जागरूक नहीं है या फिर जो जाति धर्म वर्ग के आधार पर समर्थन दे रहे हें उनके मतदान का प्रतिशत अधिक होगा और फिर वही चुन जाएगा जो इस भावना का पोषक होगा वही लोगों को इस आधार पर भ्रमित करके अपने पक्ष में मतदान के लिए उकसा सकता है फिर वह चाहे योग्य , ईमानदार हो या फिर बेईमान या अयोग्य - आप उसको अगले पांच वर्षों के लिए ढोने के लिए बाध्य होंगे। आपको अपने मत को सही और योग्य व्यक्ति के समर्थन में देना होगा और अपने संपर्क में आने वाले व्यक्ति भी अगर मतदान के प्रति उदासीन हें तो unhen इस बारे में समझना होगा। इस वंशवाद और जातिवाद की परंपरा को हटाकर दल के समर्थन नहीं करना है बल्कि व्यक्ति का चुनाव करना है। दल का चुनाव प्रदेश को सिर्फ बर्बादी ही दे पाया है। किसी भी दल के मिट्टी के माधो को चुनने से अच्छा है कि एक योग्य व्यक्ति को चुनें। विधान सभा में उसके भी वही अधिकार होंगे जो अन्य के होंगे और अपने क्षेत्र के विकास के लिए अगर वह प्रयत्नशील होगा तो विकास भी अवश्य ही होगा।
इस मतदाता दिवस के महत्ता को समझाने की जरूरत है ये आप और हमें सबको जगाने के लिए है कि अब आने वाले सत्ताधारियों को चुनने के लिए सजग होइए और इसके चुनाव आयोग ने बहुत हद तक दलों के प्रचार और लोगों को बरगलाने वाली गतिविधियों पर अंकुश लगा दिया है। दलों के घोषणा पत्रों में दिए वादों से भ्रमित मत होइए बल्कि अपने विकास की दिशा से खुद परिचित होइए और फिर अपने प्रत्याशी में अगर वे संभावनाएं दिखलाई दे रही हें तो आप अपने विवेक के अनुसार ही मतदान करें।

रविवार, 22 जनवरी 2012

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस !

       .....नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती पर उनको शत शत नमन करते हुए कुछ लिखने का मन हुआ। उन्हें देश की आज़ादी में अलग ढंग से लड़ाई लड़ते हुए पाया और लोगों ने उन्हें देश की स्वतंत्रता की लड़ाई की मुख्य धारा से उन्हें अलग कर दिया। सारा श्रेय औरों के सर आ गया और फिर वही इस देश के संचालकों में आ गए।
कभी जानने की कोशिश नहीं की और जब जाना तो वे एक महान राजनीतिक नेता था। गंभीर और उग्र देशभक्ति के साथ भारत में ब्रिटिश शासन के प्रति उनके मन में तीक्ष्ण शत्रुता ही उनके विद्रोही व्यक्तित्व का सार थी।
       .उन्होंने भी १९२० में आई सी एस ( इंडियन सिविल सर्विसेस) की परीक्षा में सफलता प्राप्त की थी और १९२१ में २४ वर्ष की आयु में त्यागपत्र दे दिया था। वे सक्रिय राजनीति में उतर आये। वे पूर्ण कर्मयोगी थे और आत्मत्याग में विश्वास रखते थे । उन्होंने राजीतिक कार्य को अपने जीवन का ध्येय बना कर अपने को उसमें समर्पित कर दिया। कष्ट रहने की उनमें अपरिमित क्षमता थी , कहते हें की तिलक के अतिरिक्त उनके समान किसी ने कष्ट सहन नहीं किया। उन्हें दस बार कारागार में डाला गया और वे जीवन के आठ वर्ष जेल में रहे।

उन्हें समझौतावादी रवैया पसंद नहीं था , विद्रोही प्रवृत्ति के थे और यही कारण था की उन्होंने काग्रेस में गाँधीवादी पक्ष के विरुद्ध सदैव वामपंथी विरोधी पक्ष का साथ दिया। उन्होंने १९२३ में एक असहयोगी के रूप में अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया बाद में में चितरंजन दस के नेतृत्व में स्वराज दल में शामिल हो गए क्योंकि गांधीजी की नीतियों से उनको कोई सहानुभूति नहीं थी। १९२५-२७ तक उन्हें बर्मा में नजरबन्द रखा गया। इसके बाद ही उन्होंने स्वराज दल की राह छोड़ कर 'independence लीग ' के सदस्य बन गए। उनका नाम सुर्ख़ियों तब आया जब की उन्होंने १९३५ में भारतीय शासन अधिनियम में प्रस्तिवित संघ योजना की स्वीकृति का विरोध करने वाली शक्तियों का नेतृत्व किया।
              १९४० में वे गुप्त रूप से देश छोड़ कर चले गए। मार्च १९४१ में वायुयान से काबुल से बर्लिन पहुंचे। देश से निकल भागने से लेकर उनके बर्लिन से जर्मनी पहुँचाने तक की वीर गाथा है।२७ फरवरी १९४२ को उन्होंने बर्लिन से ब्रिटिश     साम्राज्यवादियों के विरुद्ध भयंकर प्रचार अभियान चलाया और विभिन्न स्थानों से वर्षों तक प्रसारण करते रहे। जून १९४३ को वे जापान पहुंचे थे और ५ जुलाई १९४३ को उन्होंने आजाद हिंद फौज की स्थापना की घोषणा की। उस समय उनकी फौज मे साठ हजार भारतीय शामिल थे.फरवरी १९४४ से अप्रैल १९४५ तक आजाद हिंद फौज ने मित्र राष्ट्रों की सेनायों के विरुद्ध अभियान चलाया और भारत भूमि पर प्रवेश में सफल हो गए ।
         उनकी कहानी ८ अगस्त १९४५ को उनकी विमान दुर्घटना में मृत्यु घोषित कर दी गयी , जब की यह मात्र एक नाटक था। नेताजी यहाँ के नेताओं की नीतियों से असंतुष्ट तो रहे ही बल्कि इनके कुछ समझौतों के तहत सामने नहीं आ सके। वे अपने ही देश में आजाद हवा में सांस न ले सके। उन्होंने गुमनामी का जीवन किया।
          इस बात का जिक्र उनकी आजाद हिंद फौज के सेनानी मानवती आर्या ने अपनी पुस्तक में जिक्र किया है कि न कोई विमान दुर्घटना हुई और न ही नेताजी का निधन हुआ। लेकिन राजनीतिक षड्यंत्रों के चलते वे हमेशा के लिए गुमनामी के अँधेरे में जीते रहे और और अपने ही देश में गुमनाम चले गए।
नेताजी को आज शत शत नमन !

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

इगो : एक मनोरोग !

परसों के "दैनिक जागरण" में एक खबर पढ़ी थी - "पति ने "सॉरी" नहीं कहा तो गर्भवती ने आग लगा ली" पढ़ा और उसकी तस्वीर भी देखी और फिर एक घटना समझ कर बंद कर दिया। आज ही पता चला कि वह मेरे एक करीबी रिश्तेदार की चचेरी बहन थी।
जैसा कि समाचार में लिखा गया था वाकई सत्यता वही थी। पति रेलवे में नौकरी करता था और अभी एक साल पहले ही शादी हुई थी। उसको अपने ऑफिस से आने में देर हो गयी और आने पर उसने पत्नी से "सॉरी" नहीं बोला और उसकी पत्नी के अहम् को इतनी चोट लगी कि उसने न आगा सोचा और न पीछा और जाकर मिट्टी का तेल डाल कर आग लगा ली। उसे बुझाने में पति भी झुलस गया लेकिन उसको और उसके गर्भस्थ शिशु को नहीं बचाया जा सका।
ये अहम् या जिसे हम इगो कहते हें वास्तव में एक मनोरोग है । यह व्यक्ति में अपने को अतिरिक्त गुणों से युक्त होने का भ्रम भी पैदा कर देता है। ये इगो लड़कियों में आमतौर पर घर में सबसे खूबसूरत समझने पर , अधिक धनवान परिवार की होने पर, इकलौती संतान होने पर या फिर परिवार में उसको अधिक महत्व देने पर पैदा हो जाती है। ये मनुष्य के स्वभाव का एक सामान्य गुण नहीं है और तब तो बिल्कुल ही नहीं जब कि वह अपने आगे किसी को भी कुछ न समझती हो। ऐसे गुण बच्चों में थोड़ा बड़े होते ही प्रस्फुटित होने लगते हें। इस समय जरूरत होती है कि बच्चों को बहुत सावधानी से समझाया जाए और ये भी नहीं होना चाहिए कि माँ ने उसको समझाने का प्रयास किया और पिता या दादी और दादा ने उसको शह दे दी। ये आदते बचपन में बहुत अच्छी लगती हें लेकिन बड़े होने पर वे इतने गहरे जड़ें जमा चुकी होती हें कि वह जीवन में ऐसे निर्णय भी लेने में संकोच नहीं करती है।
अगर इगो की ये समस्या पारिवारिक जीवन में या फिर वैवाहिक जीवन में सामंजस्य स्थापित करने में आड़े आने लगे तो मनोचिकित्सक से सलाह ली जा सकती है और उसको काउंसलिंग के द्वारा भी समझाया जा सकता है। वैवाहिक जीवन में दोनों में से किसी भी एक का अहमवादी होना दूसरे के जीवन को नरक बनाने में पूर्ण रूप से जिम्मेदार होता है।
कुछ लोग इस इगो को स्वाभिमान के रूप में परिभाषित करते हें लेकिन ये गलत है, स्वाभिमान और अहम् दोनों ही अलग अलग मनोभाव होते हें। जहाँ स्वाभिमान सकारात्मक भाव है वहीं इगो नकारात्मक भाव है। स्वाभिमान के लिए व्यक्ति खुद को संयमित भी रखता है और उसके आहत होने पर वह विपरीत प्रतिक्रिया कम ही करता है , लेकिन इगो में वह संयमित नहीं होता है बल्कि उसके आहत होने पर कभी खुद को और कभी दूसरे को भी हानि पहुंचा सकता है।
इस लेख के लिखने का मेरा तात्पर्य सिर्फ इतना ही है कि हम अपने घर में , अपने परिचितों के घर में अगर बच्चों में इस तरह की भावना को पलते हुए देखें तो उनको आगाह किया जा सके। ये काम घर में और स्कूल में दोनों ही जगह पर किया जा सकता है क्योंकि घर में फिर भी कम स्कूल में बच्चे इस तरह के भावों का प्रदर्शन बहुत अधिक करते हें। कालेजों में छात्रों में होने वाले संघर्ष के पीछे कभी कभी ये भी भाव रहता है। जिसे हम वर्चस्व की लड़ाई कहते हें उसके पीछे काम करने वाली भावना यही अहम् या इगो होती है।
अगर समय रहते इसको संयमित कर लिया गया तो घर और परिवार दोनों के लिए अच्छा होगा, नहीं तो बच्चे की ये इगो माँ बाप , भाई , बहन या किसी भी पारिवारिक सदस्य के लिए कोई भी मुरव्वत नहीं करती है। वे ऐसे निर्णय ले बैठते हें जिससे एक और कभी कभी दो परिवार जीवन भर के लिए कष्ट पाते हें।

सोमवार, 16 जनवरी 2012

हमारी कमजोर नस!

आज के युवा जो अपने भविष्य निर्माण के लिए पढ़ रहे हें और माँ बाप जिन्हें अपने घर गाँव से दूर , चाहे वे खुद नमक रोटी खा लें लेकिन बेटे के लिए खर्च पूरा ही भेजना पड़ेगा उसे कोई कमी न हो, वे मेहनत कर सकते हें और अपने खर्चों में कटौती कर सकते हें लेकिन बेटे की पहरेदारी नहीं कर सकते हें । आज ही जब अखबार में पढ़ा कि एक ट्रक को लूटकर उसके ड्राइवर और क्लीनर को बाँध कर फ़ेंक दिया और ट्रक में लदे माल को बेचने के बाद भी वह लुटेरों का गैंग पकड़ा गया। ये एक महज खबर समझ कर पढ़ ली गयी लेकिन उन माँ बाप की स्थिति को किसी ने सोचा जो गाँव से बच्चे को पढ़ाई के लिए पैसे भेज रहे हें। कोई इंजीनिरिंग पढ़ने के लिए आया है, कोई मेडिकल के तैयारी कर रहा है और कोई पोलिटेक्निक कर रहा है। सारे बच्चे १८ -२२ वर्ष के बीच के हें। ये समस्या उनकी है जिनके बच्चे हें , इसके बारे में समाज की दृष्टि से सोचने के लिए किसी के पास समय कहाँ है? इसके कारणों को खोजने की जरूरत कहाँ हें? पुलिस ने पकड़ लिया और जेल भेज दिया अब घर वाले करते रहें उनके लिए भाग दौड़।
इसको अगर हम समाज की दृष्टि से देखें तो शायद बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा से ही नैतिक शिक्षा और उनके मनोवैज्ञानिक विकास के दिशा निर्देश कहीं नहीं मिलता है। ये बच्चे क्यों भटक जाते हें? सिर्फ यही क्यों आज कल तो बाइक पर सवार बगल से गुजरने वाले हर लड़के को देख कर डर लगता है कि पता नहीं कब से पर्स छीन लें या फिर धक्का देकर कान की बाली या जंजीर छीन कर भागते बने। वैसे अब ये तो फैशन में शामिल हो चुका है कि बच्चों को बाइक लेना माता पिता के सामाजिक स्तर को बढ़ाने में सहायक होता है और बच्चे क्या करते हें?
मेरी एक परिचित विधवा हें - बच्चे किशोर भी नहीं थे कि उनके पति का आकस्मिक निधन हो गया। पति की नौकरी उन्हें नहीं मिली और बच्चे इतने छोटे थे कि उनको भी नौकरी नहीं मिल सकती थी। उन्हें पेंशन मिल रही है। किसी तरह से बेटे को इंटर तक पढ़ाया फिर जैसा कि आज कल ट्रेंड बन चुका है उसको इंजीनियरिंग ही करनी थी बगैर ये देखे कि हमारे बच्चे में कितनी क्षमता है? कम्पटीशन में उन्हें कहीं भी आना ही नहीं था। सो रेंक इतनी दूर थी कि सोचा नहीं जा सकता था कि कहीं एडमिशन हो सके फिर सोचा कि कानपुर में ही किसी प्राइवेट कॉलेज में करवा दें ताकि घर में रह कर पढ़ाई होती रहे। उसने ऐलान कर दिया कि जहाँ दोस्त पढेंगे वहीं पढ़ेगा अगर यहाँ एडमिशन करवाया तो वह पढ़ेगा ही नहीं। बागी तेवर देख कर माँ ने बगैर किसी की सलाह के उसको भोपाल में एडमिशन करवा दिया। वह भी डोनेशन के साथ। पिछले दो साल में उसकी सिर्फ बैक ही आई एक भी सेमेस्टर उसने पास नहीं किया। वह विधवा माँ इस आशा में पैसे दे रही है कि दो साल बाद उसका बेटा कमाने लगेगा।
इस प्रकार की परिस्थितियां ही बच्चों को अपने रास्ते से भटका देती हें। इसके सिर्फ वे ही जिम्मेदार हों ऐसा नहीं है बल्कि इसके उनकी शिक्षा , अभिभावकों का बच्चे की क्षमता का न पहचानना, शिक्षा का स्तर और शिक्षकों का अपने दायित्वों के प्रति लापरवाही।
शिक्षा में आरम्भ से ही नैतिक शिक्षा और उनके मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के लिए शिक्षक की नियुक्ति होनी चाहिए। आज कल तो प्राथमिक शिक्षा के लिए भी उच्च शिक्षित शिक्षक उपलब्ध हें। अगर समाज के इस स्वरूप पर अंकुश लगाना है तो इस काम को प्राथमिक स्तर से ही सुधरा जाना आवश्यक है ताकि उनकी नीव में ही नैतिकता, आत्म संयम का विकास किया जा सके। हम कितने ही प्रगतिशील हो जाएँ, आधुनिकता की कितनी सीढियां चढ़ लें लेकिन नैतिक मूल्यों के महत्व को नकार नहीं सकते हें। जीवन जो हमें समाज में ही जीना है उसके मूल्यों का पालन करना है और नहीं करना है तो फिर हम खुद को भले ही एक सफल मानव समझ लें लेकिन ऐसा किसी भी दृष्टि से संभव नहीं है।
अपने बच्चों को बाहर पढ़ाने के लिए भेज कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री नहीं समझनी चाहिए , बच्चों के कॉलेज में जाकर उसके शिक्षकों से मिल कर उसके बारे में जानकारी लेना भी उतना ही जरूरी होता है जितना कि उनको हर महीने पैसा भेजना। उनके भटकते हुए कदमों को थामा जा सकता है उनके दलदल में फँसने से पहले। सिर्फ अभिभावक ही नहीं शिक्षकों और संस्थान को भी उनके भविष्य के प्रति सचेत रहना होगा क्योंकि फीस लेने के बाद उनके बारे में वे भी जिम्मेदार होते हें। उनका अपने छात्र से रिश्ता सिर्फ उसकी फीस या फिर क्लास लेने तक ही नहीं होता है बल्कि उसके भविष्य के साथ भी जुड़ा होता है।
शिक्षक कहते हें कि पहले की तरह से बच्चे नहीं रह गए हें लेकिन क्या शिक्षक भी पहले की तरह से रह गए हें। अगर पहले की तरह से अनुशासन वाले हें तो फिर वे सभी लोगों के बीच टिक नहीं सकते हें। सभी एक जैसे नहीं होते न छात्र और न ही शिक्षक। देश जिनके बल पर प्रगति कर रहा है वे भी बच्चे ही हें और अपनी मेधा से आगे बढ़ गए लेकिन हर बच्चा एक जैसा नहीं होता तो हमारे लिए समस्या है ऐसे मध्यम स्तर के बच्चों की जिन्हें भटकने में देर नहीं लगती है और ऐसे ही बच्चों के लिए हर विद्यालय में शिक्षा के मानक इस तरह के हों कि बच्चे एक जिम्मेदार इंसान और नागरिक बन सकें।