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शुक्रवार, 30 मई 2014

माँ तुझे सलाम ! (14)

                                 माँ हर इंसान की एक ही होती है , वह होती है एक आम औरत जो अपने जीवन में तमाम रिश्ते और नामों को लेकर चलती रहती है लेकिन जो माँ का रूप होता है वह सबसे अनमोल - जिसका रिश्ता अपने बच्चे के अपने गर्भ में पालने का एक अहसास होता है जिसका दर्द उसे अपने से अधिक भरी लगता है।  वह बाँट चाहे न पाये लेकिन उसकी ममता से भरा हाथ जब सर पर रखा होता है तो लगता है की कोई है मेरे ऊपर जो मेरे लिए दुआ करता है और उसके रहने तक मेरी हर मुसीबत उसकी बन कर मेरे लिए हलकी हो जाती है।   इसी लिए कह  रहे हैं - वो होते हैं किस्मत वाले जिनके माँ होती है : एस एम मासूम।





इंसान को उन मुहब्बतों की कद्र कम हुआ करती है जो उन्हें मिलती रहती है इसलिए यदि माँ की मुहब्बत किसी कहते हैं वो हम जैसे उन लोगों से पूछिए जिनकी माँ अब दुनिया में नहीं रही |हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम के ज़माने में दो औरतें अपने कुछ माह के बच्चों को साथ लिए जंगल से गुज़र रही थीं कि एक भेड़ीया आया और एक औरत के बच्चा को छीन कर भाग गया। थोड़ी देर के बाद उस औरत के दिल में ख़्याल आया कि ये दूसरी औरत का बच्चा मैं ले लूं। ये सोच कर इसने झगड़ा शुरू कर दिया की भेदिया जिसे ले गया वो तेरा बच्चा था मेरा नहीं । बात  हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम तक पहुंचा। हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया छुरी लाओ, में इस बच्चे के दो टुकड़े करके दोनों  में आधा आधा बाँट  देता हूँ। इन में से जब एक ने ये फ़ैसला सुना तो वो कहने लगी ठीक है, लेकिन जब दूसरी ने सुना तो रोना शुरू कर दिया और कहने लगी मेरे बच्चे के टुकड़े ना किए जाएं, बल्कि इसे  दूसरी औरत को दे दिया जाये, कम अज़ कम मेरा बच्चा ज़िंदा तो रहेगा। हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम समझ गए कि ये बच्चा उसी औरत का है, लिहाज़ा आप ने उसे अता फ़र्मा दिया। इसे कहते हैं माँ की मुहब्बत |इसी लिए नबियों और इमाम् के कथन हैं की जिसकी माँ दुनिया में नहीं उसे अपने क़दम सभाल के रखना चाहिए क्यूँ की अब सच्चे दिल से उसके लिए दुआ करने वाला कोई दुनिया में नहीं है |
 
माता जी का देहांत हुए ५ साल बीत गए | अभी कल की ही बात तो लगती है की जब भी दिल परेशान हुआ कोई चिंता हुयी माँ की  गोद में सर रख के कह दिया और ऐसा करते ही लगता था जैसे सारी परेशानी दूर हो गयी और नयी ताक़त सी महसूस करता था |मैं अक्सर एक घर की तस्वीर जब देखो तब अपने लेख के साथ डालता और लोगों को दिखाता  रहता हूँ जिसमे मैंने अपने जीवन के 21 साल गुज़ारे | यह बहुत कम लोग जानते हैं की मुझे उस घर से प्रेम इसलिए है क्यूँ की उसी घर में बचपन से जवानी गुजरी और हर दौर में माँ का प्यार साथ रहा | जब भी उस घर को देखता हूँ तो कभी वो जगह याद आती है जहां माँ लोरियां सुनाती थी, कभी वो जगह याद आती है जहां मुझे पढ़ाती थी , कभी वो जगह याद आती है जब मैं बहुत बीमार पड़ा था तो माँ  रातों में जाग जाग के सर में पट्टियाँ रखती थी, दुआएँ किया करती थी और उस समय मुझे ऐसा लगता था की यह केवल माँ की दुआएँ हैं जो मुझे ठीक कर देंगी |
 
मुझे आज भी याद है जब एक बार मेरा एक्सिडेंट हो गया था और डॉ ने कहा इसका हाथ काटना पड़ेगा | मुझे आज भी याद है माँ का वो चेहरा जिसपे अजीब सी परेशानी और बेबसी सी झलके लगी थी और डॉ से कहती जाती क्या कोई रास्ता नहीं है की इसका हाथ ठीक हो जाये ? दो तीन डॉ से बात करने पे एक डॉ के खतरा मोल लिया और आश्वाशन दिया की ठीक हो सकता है और जब ऑपरेशन कामयाब हुआ तो माँ ख़ुशी के मारे रोने लगी |आज मेरे दोनों हाथ सही सलामत है और ये माँ के नहीं मेरे काम आ रहे हैं जिनको बचाने के लिए माँ इधर उधर  दौड़ी  थी ,इसे कहते हैं सच्ची मुहब्बत |
 
ऐसे ही एक बार झाड़ियों में जामुन जमा करते समय मेरे पैर में कुछ ठंडा ठंडा लगा और कट गया | लोगों से सुना था सांप ठंडा होता है , बचपना था माँ को जा के कह दिया माँ लगता है सांप ने का लिया | बस फिर क्या था डॉ बुलाया गया, नीम के पत्ते आये , इंजेक्शन लगा , लोगों ने कहा सोने मत देना | कुछ देर तक तो यह सब चलता रहा धीरे धीरे रत गहरी होती गयी डॉ और आस पास के लोग चले गए मैं भी सोने लगा लेकिन माँ की आँखों में नींद कहाँ | मुझे ज़रा सी झपकी आई की जगा देती थी और रात भर नहीं सोयी |सुबह जब डॉ आया और उसने कहा की कुछ नहीं सब ठीक है तब कहीं जा के माँ ने आराम किया |
 
कहाँ मिलती है ऐसी मुहब्बत जो माँ दे गयी ? जवानी आई तो ज़िन्दगी बेपरवाह हो गयी अब उसकी बातें पुराने समय की बातें लगती थीं कभी कभी बहस भी कर जाता था | माँ गुस्सा दिखाती थी बात नहीं करती थी | लेकिन गुस्से में जब सो जाता तो अक्सर माँ का हाथ  अपने सर  पे महसूस करता | मैं सब समझता था और अक्सर तो ऐसा होता की मैं जब  गुस्सा होता तो सोने का बहाना कर के माँ का इंतज़ार करता था अब आएगी अब सर सहलाएगी | अधिकतर माँ  मुझे ही जीतने देती थी और मेरी बात मान लेती थी | पढाई ख़त्म हुयी नौकरी मिली फिर शादी हुयी मैं बड़ा होता गया लेकिन जब भी परेशान हुआ माँ के पास जा पहुँचता और अंदर छुपा एक बच्चा बाहर आ जाता | दुनिया वालों के सामने बड़ा बनने वाला हर इंसान अपने माता पिता के सामने खुद को बच्चा ही महसूस किया करता है |
 
फिर एक दिन खबर आई माँ का देहांत हो गया बहुत देर तक यकीन ही नहीं हुआ की जो माँ मेरे जीवन  का एक ऐसा  हिस्सा थी जिसके बिना जीने की मैं सोंच भी नहीं  सकता था वो अब नहीं रही और अचानक ऐसा महसूस हुआ मैं इस दुनिया में एक दम तनहा रह गया | अब मुश्किलों में किसकी गोद में सर रख के आंसू बहाऊंगा ? कौन मेरी परेशानी में मेरे लिए दुआएँ मांगेगा ? लेकिन सत्य को स्वीकार करना पड़ा | आज भी जब जब मैं परेशान होता हूँ तो सर पे अपनी माँ के सहलाते हाथों  को महसूस करता हूँ |
 
मैं अपने इस लेख के ज़रिये हर उस इंसान से जिसकी माँ जीवित है यही कहना  चाहूँगा जितनी मुहब्बत माँ से कर सकते हो करो क्यूँ की जिस दिन इसकी आँखें बंद हुयी तुम दुनिया में अकेले रह जाओगे और यह मुहब्बत फिर कभी नहीं पा सकोगे | 

बुधवार, 28 मई 2014

माँ तुझे सलाम ! (13)

                               
          लगता है कि हम लोगों का मतलब माँ की बेटियों का अपनी माँ से लगाव ज्यादा होता है , अपवाद इसके भी हैं , बेटे भी माँ से जुड़े होते हैं लेकिन कहते हैं न कि बेटे तब तक ही माँ और बाप के होते हैं जब तक कि उनकी शादी न हो लेकिन बेटियां जब तक उनकी सांस है माँ बाप से जुडी ही रहती हैं और मायका इसी लिए तो कहा जाता है।  माँ के जाने पर बेटियां आनाथ अनुभव करने लगाती हैं।  अपनी वही बात आज प्रस्तुत कर रही हैं : रश्मि प्रभा जी।  


                                                   




अम्मा' इस एक शब्द में मेरी ज़िंदगी थी/है  … पिछले वर्ष जाने कितनी बार उसने फोन किया - मदर्स डे बीत गया ? तुमने विश नहीं किया 
नहीं बीता अम्मा 
और  … मदर्स डे भी भला बीतता है ? 
आज का दिन - तुम्हारे नाम 
माँ के नाम  


माँ, 
इस एक शब्द -
नहीं नहीं 
इस एक महाग्रंथ में मेरी माँ भी है 
मैं भी हूँ  . 
माँ ने मुझे जीवन दिया 
मेरी गलतियों को नज़रअंदाज कर 
मुझे वह सब दिया - जिसे प्यार कहते हैं 
आशीर्वाद कहते हैं 
आँखों से बहती दुआ कहते हैं !
मैंने जीवन के सारे संजीवनी मंत्र 
लिए अपनी `माँ से 
और अपने बच्चों के लिए 
नज़र उतारनेवाली माला बनाई 
रक्षा मंत्र के धागे में !
कुछ बचकाने धोखे दिए मैंने अपनी माँ को 
जिसे माँ समझती थी 
पर हर बार अनजान बन जाती थी 
क्योंकि उसने वैसे धोखे अपनी माँ को दिए थे 
और वह जानती थी 
कि वैसे ही भोलेभाले धोखे मेरे बच्चे मुझे देंगे 
और तब मैं हँसूँगी अबाध गति से 
अपने बच्चों में अपनी माँ को 
और खुद को पाकर  ....!
माँ होना एक नियामत है 
एक एक क्षण को आँचल से पोछना 
रुद्राक्ष के 108 मनकों को जपने जैसा है 
सुबह बच्चे से 
दिन बच्चे से 
शाम बच्चे से 
रात बच्चे से - इस तरह माँ परिवार रचती है !
यदि माँ गर्भनाल से जुड़े अपने आत्मिक रूप संग नहीं जीये 
तो माँ एक मृत काया है 
और यही माँ का सत्य है !
अन्यथा माँ -
हमेशा है 
उसकी रूह फ़िज़ाओं में भरती है साँसें 
प्रकृति के कण कण में 
अपने बच्चे के लिए शुभ का शंखनाद करती है 
ब्रह्ममुहूर्त का आगाज़ बनती है  … 
माँ 
एक ग्रन्थ 
महाग्रंथ 
जिसका एक खूबसूरत पृष्ठ मैं भी हूँ 
हाँ मैं भी हूँ 

रश्मि प्रभा

मंगलवार, 27 मई 2014

माँ तुझे सलाम ! (12)

                 कभी कभी हम कुछ सीखने के लिए प्रयास नहीं करते और न ही माँ हमें सीखने के लिए कुछ करती है।  वह अपने स्वभाव के अनुरूप अपने जीवन की विभिन्न भूमिकाओं के साथ अपना दायित्व निभा रही होती है और हम उससे सीख रहे होते हैं।  यही तो है जो संस्कार कहे जाते हैं।  वह हाथ पकड़  सिखाती नहीं है बल्कि हम उसे ग्रहण कर लेते हैं और फिर वह  हमारे जीवन का दर्शन बन जाता है।  अपनी माँ से सीख कर जीवन में उतारने वाली है : वंदना गुप्ता। 





           माँ ब्रह्माण्ड का सबसे खूबसूरत शब्द ही नही ईश्वर का स्वरूप होता है । कहते हैं जब ईश्वर ने देखा वो हर जगह नहीं पहुँच सकता तब उसने माँ को बनाया अपने प्रतिनिधि के रूप में । दया , करुणा , ममता की प्रतिमूर्ति के रूप में । यूँ तो माँ का ममत्व अनमोल है जिसे किसी भी तरह चुकाया नहीं जा सकता फिर भी जब जब मातृ दिवस आता है तो अचानक हम सबको जैसे अहसास होता है , जैसे सोये से जाग जाते हैं कि हाँ , हमारा भी कुछ कर्तव्य है लेकिन इतने भर से संभव नही मातृ ॠण से उॠण होना । फिर भी रेखा जी के आग्रह पर सोच में पड गयी कि क्या लिखूँ , क्या बताऊँ मैं अपनी माँ के बारे में ।
 
                          मेरी माँ जिसे मैने बचपन से ही सबके लिए ममत्व से भरे देखा फिर चाहे अपना हो या पराया सबको सीने से लगा लेतीं , सबको अपना समझतीं किसी से कोई द्वेष नहीं , जैसे सारा संसार हमारा शब्दों को जीती हों । आज आपको एक घटना से रु-ब-रु करवाती हूँ जिसने बहुत गहरी छाप छोडी मुझ पर क्योंकि उस वक्त मैं मात्र दस वर्ष की थी जब मेरी दादी जिन्हें मैं बहुत प्यार करती थी और वो भी मुझे इतना प्यार करती थीं कि सारे घर से मेरे लिये लड लेती थीं और मेरे लिए खाना पीना तक छोड देती थीं इतनी लाडली थी मैं अपनी दादी की , वो दादी अपने अन्तिम दिनों में चार महीने तक बिस्तर पर थीं । यहाँ तक कि उनके सारे कार्य बिस्तर पर ही होने लगे थे जैसा मुझे याद है तो उनको मोशन की प्रॉब्लम शुरु हो गयी थी जिसके कारण उन्हें मोशन नहीं होता था और अन्दर गाँठें बन जाती थीं जो कितनी भी कोशिश वो करतीं बाहर नहीं आती थीं ऐसे में डॉक्टर बुलाई जाती और वो औजार डाल डाल कर बुरी तरह अम्मा को जख्मी करते हुए उन गाँठों को बाहर निकालती और उस वक्त अम्मा दर्द से तडप कर ऐसे चीखतीं कि सारा घर रो पडता । चीखें ऐसी जैसे गाय डकरा रही हो मगर सब मजबूर रहते क्योंकि और कोई उपाय ही नहीं था और हॉस्पिटल वो जाना नहीं चाहती थीं ऐसे में सब मजबूर थे यहाँ तक कि उनकी सेवा के लिए बाऊजी ने चार महीने की छुट्टी तक ले ली थीं मगर इन हालात के आगे सब मजबूर थे तब जब मेरी मम्मी से ये सब नहीं देखा गया तो उन्होने देखा कि  डॉक्टर कैसे  गाँठें बाहर निकालती है और उसके बाद मेरी मम्मी ने खुद इस काम को अपने हाथों से अंजाम देना शुरु किया उस वक्त कहाँ ग्लव्स होते थे , बस मेरी मम्मी चाहे खाना बना रही हों या खिला रही हों या खा रही हों जैसे ही अम्मा को तकलीफ़ शुरु होती फ़ौरन सब काम छोडकर उनके इस काम में लग जातीं और अन्दर ऊँगलियों से उन  गाँठों को बाहर निकालतीं जिससे अम्मा को तकलीफ़ भी नहीं होती मगर इस चक्कर में मम्मी कितनी ही बार खाना भी नहीं खा पाती थीं जो बीच मे छुट जाता तो फिर दोबारा नहीं खातीं । इस काम के लिये मम्मी ने अपने आधे आधे नाखून तक काट लिये थे ताकि अम्मा को चुभें नहीं और दूसरे नाखूनों में इन्फ़ैक्शन न हो क्योंकि सारे काम तो करने होते ही थे घर के । यूँ तो मेरी मम्मी से बडी उनकी तीने जेठानियाँ भी थीं मगर उनमें से किसी ने भी इस काम की जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं ली । वैसे मम्मी कोई खुद भी सही नहीं रहती थीं उन्हें खुद साँस , दिल और बीपी की शिकायत थी ऐसी हालत में भी  वो  अम्मा की तकलीफ़ के लिए  रोज उनके ऊपर श्रीमद भगवद गीता के सारे के सारे 18 अध्याय करतीं जो बीच में अम्मा की वजह से छुट जाते तो उनका काम करके दोबारा नहातीं और फिर दोबारा पूरा करतीं ताकि उन्हें तकलीफ़ में आराम मिले क्योंकि मेरी मम्मी एक धार्मिक प्रवृत्ति की महिला रही हैं तो ये सब काम उनकी लिस्ट में पहले स्थान पर थे फिर चाहे उसके लिये अपनी अनदेखी कर लेतीं मगर अम्मा के दुख में उन्होने अपने आप को भुला दिया और जब अम्मा को आराम मिलता तो वो ढेरों आशीष देतीं कि तूने मुझे आराम पहुँचाया वरना वो डॉक्टर तो कब का मार चुकी होती क्योंकि अम्मा का खाना पीना तो बंद ही हो गया था बस जरा सा जूस आदि ही दे पाते थे ऐसे में पेट में खुश्की होनी ही थी और उन्हें न तो इंजैक्शन लगवाना था और न हस्पताल जाना था तो घर में इलाज के लिए इसके सिवाय और कोई चारा ही नहीं था । मम्मी को बस ये इत्मिनान रहा कि मुझसे जो बन पडा मैने किया फिर चाहे पता है कि एक दिन सबको जाना ही है और फिर चाहे प्राण कितनी तकलीफ़ से निकले अम्मा के मगर मोशन की तकलीफ़ से तो मरते दम तक अम्मा को आराम रहा ।
                 तब की ये घटना या इसके बाद की और भी छोटी छोटी घटनायें ऐसी हैं जहाँ मम्मी के अंदर की दया और करुणा झलकती है जैसे कभी कोई चिडिया का बच्चा यदि चोट खाकर अधमरा सा हो जाता तो मम्मी को लगता इसे बिल्ली न खा जाए तो उसके लिये कटोरी में गंगाजल लेकर उस पर गीता का पन्द्रहवाँ अध्याय कर जल छिड्क देतीं और देखते ही देखते वो ठीक हो उड जाता । किसी भी कीडे मकौडे तक को कभी नहीं मारतीं यहाँ तक कि यदि कानखजूरा भी आ जाता तो उसे चिमटे से उठा कर बाहर फ़ेंक देतीं मगर मारती कभी नहीं ,ऐसी जाने कितनी ही घटनायें हुयीं जीवन में जिनसे उनके अन्दर छुपी दया और करुणा उजागर होती रहती जिसका हम सबके जीवन पर गहरा प्रभाव पडा और ये संस्कार कुछ हद तक मुझमें भी उतरे । मैं भी किसी भी जीव को मार नहीं पाती बेशक चीखती रहूँ मगर मार नहीं सकती ना उसे उठाकर फ़ेंक सकती हूँ । 

                यहाँ तक कि जब मेरे बाऊजी भी बिस्तर के हो गये तो उनकी भी जब मम्मी खुद  तकरीबन 72 साल की थी तब  उस उम्र में भी इसी तरह सेवा की कि कोई कर नहीं सकता , न दिन देखा न रात हर वक्त बाऊजी का हर काम बिस्तर पर ही होता और मम्मी अपनी सम्पूर्ण निष्ठा और समर्पण से उनकी सेवा में लगी रहीं साथ ही उनके लिए भी जितना हो सका जप तप करती रहीं वो पल तो मेरी आँखों के आगे घटित हुए हैं तो कैसे अन्जान रह सकती हूँ । जब बाऊजी का तीन महीने पहले खाना पीना छुट गया था और आखिरी वक्त में तो कोमा में ही चले गये थे तब तक मेरी मम्मी ने जो सेवा की है उसका तो मैं वर्णन भी नहीं कर सकती । सेवा को धर्म मानने वाली मेरी माँ ने जीवन में जाने कितने आघात सहे हैं न केवल मानसिक बल्कि शारीरिक भी मगर उसमें भी कभी अपने हौसले को गिरने नहीं दिया और उनका ये हौसला हम सबका संबल बना रहा ।


यूँ तो जाने कितने किस्से मिल जायेंगे जहाँ मम्मी के अन्दर की एक औरत कैसे अपने घरबार को चलाती है , कैसे समायोजन कर जीती है वो सब मैने सुना देखा इसलिये नहीं क्योंकि मैं काफ़ी देर से हुयी थी तो जो मुश्किल हालात का दौर था वो तो तब तक गुजर चुका था । मेरे पिता तो सरकारी नौकरी में थे और हम तीन बहनें थीं साथ ही अपने घर में भी बाऊजी को कुछ साझा विरासत के रूप में देना होता था ऐसे में उनकी नौकरी में हाथ तंग रहता था तो मम्मी ने कुछ काम घर बैठे ही शुरु किए काटने सीने के ताकि रिश्तेदारी में कहीं जाना हो या वहाँ का लेन देन हो तो वो उसे पूरा कर सकें और किसी को पता भी न चले जिससे हमें पता चला कि कैसे कम पैसे में समायोजन बैठाया जा सकता है और कैसे रिश्तेदारी आदि में अपने परिवार की इज्जत बनाये रखी जाती है , उनकी इन्हीं बातों ने हमें जीवन जीने में सही योगदान दिया , हमारा मार्गदर्शन किया जिस कारण हम अपने जीवन की बडी से बडी समस्याओं को यूँ पार कर गये कि आज वो सब स्वप्नवत लगते हैं । 

इसके अलावा मम्मी एक धार्मिक महिला रहीं इसलिये धर्म के प्रति जो मेरी आस्था बनी वो उन्हीं के कारण बनी जब वो अपनी ज़िन्दगी के अनेकों किस्से सुनातीं , ईश्वर की दया और करुणा का महत्त्व बतातीं तो हमारी भी आस्था उस ओर जमने लगी जो आज मेरी रग रग में लहू सी पैबस्त हो गयी है। आज जो भी धार्मिक संस्कार हैं वो मेरी माँ और पिता की ही देन हैं ।मैं खुद को भाग्यशाली समझती हूँ कि ऐसे उच्च विचारों और आचरण वाले घर में मेरा जन्म हुआ और उनकी संस्कारों की धरोहर मुझमें भी पैबस्त है जिसे मैं अपने बच्चों में डालने की कोशिश करती रहती हूँ ताकि जो संस्कार हैं वो कभी खत्म न हों ।

घर परिवार में सामंजस्य बैठाना , सबके साथ मिलकर रहना , सबके लिए प्रेम और सौहार्द बनाये रखना जैसे संस्कारों की धरोहर एक माँ ही अपने बच्चों को दे सकती है और इस कार्य को अंजाम मेरी मम्मी ने बखूबी दिया जिसके लिए मैं ताउम्र नतमस्तक रहूँगी । आज मेरी मम्मी 82 साल की हैं और मेरे साथ ही रहती हैं मगर मुझे लगता है मैं उनके लिये कुछ नहीं कर पाती जितना करना चाहिये बस उन्हें देख ये ही ख्याल आता है कि जो उन्होने सबके लिए सेवा ,त्याग, दया, करुणा और ममता रखी उसी का फ़ल है कि आज हम सब जो फ़ल फ़ूल रहे हैं उन्ही के आशिर्वाद के  कारण ये सब संभव हो रहा है ।
     

सोमवार, 26 मई 2014

माँ तुझे सलाम ! (11)

                              माँ को हर इंसान अपने अपने ढंग से परिभाषित करता है और उसका एक निजी रूप से लगाव उसमें दिखलायी देता है।  इसी  को कहते हैं - माँ को हम कभी परिभाषित कर ही नहीं सकते हैं।  हर माँ के जीवन में बच्चे  की जगह अपने एक अलग स्वरूप में होती हैं और हर बच्चे  के लिए भी यही कहा जा सकता है।  सरस दरबारी जी ने कितने सहज ढंग से माँ के कितने सारे अर्थ प्रस्तुत कर दिए : 



मातृ दिवस पर.....



माँ .......न जाने कितनी भावनाएँ जुड़ी हैं इस एक उदगार से....

माँ ...याने हर समस्या का समाधान -

माँ....याने हर दुःख से निदान -

माँ....याने हर पीड़ा का मरहम -

माँ ...याने संस्कारों का मान -

अंतहीन है यह फेहरिस्त. बस इतना जानती हूँ कि ज़ुबाँ पर यह नाम आते ही मन आश्वस्त हो जाता है .

आज माँ को गए १४ साल हो गए . एक पूरा युग बीत गया. लेकिन वह आज भी साथ हैं....अपनी दी हुई सीखों में...अपनी झिड़कियों  में ..अपने जुमलों में...... जिन्हें माँ के मुँह से अक्सर सुना करते थे और बुरा भी लगता था

आज उन्हीं जुमलों को याद कर आँखें भर आती हैं . माँ के साथ एक अलग ही रिश्ता था हम बच्चों का , क्योंकि वह बहुत स्ट्रिक्ट थीं. अपना प्यार छिपातीं थीं...पापाके बिलकुल विपरीत, जो बिलकुल एक दोस्त की  तरह थे, जिनसे हम हर बात बेख़ौफ़ होकर कह सकते थे. लेकिन मम्मी से कुछ कहना होता तो बहोत हिम्मत जुटानी पड़ती .

लेकिन जब मेरा विवाह हुआ तो माँ जैसे अंदर से टूटकर बिखर गयीं …….बर्फ का वह कठोर आवरण जो उन्होंने सदा अपने चारों ओर लपेट रखा था जैसे ममता की ऊष्मा से बह गया. उन आँसुओं में ...हमेशा एक चिंता रहती जो हर माँ को खाए  जाती है ...मेरी बेटी अपने ससुराल में खुश तो है ..कहीं कुछ छिपा तो नहीं रही.

मेरे विवाह के बाद मम्मी का पूरा व्यक्तित्व ही जैसे बदल गया था और वह स्नेह बेपर्दा हो गया था जो उन्होंने सदा हम सबसे छिपाया . सब कुछ तो मिला था मम्मी से , सही संस्कार  , सही गलत की समझ, पाक शास्त्र का हुनर, हर ज़रूरतमन्द की सहायता करने का जज़्बा.......बस कमी थी जीवन में तो उस स्नेह भरे स्पर्श की जो यदा कदा ही मिलता था उनकी गोद  में सर  रखकर भी. आज लगता है वह आवरण ही उनका स्वभाव था जो उन्होंने जान बूझकर ओढ़ रखा था क्योंकि वह एक इंट्रोवर्ट थीं ....

विवाहोपरांत मेरे साथ बदले  हुए इस इक्वेशन से जो स्नेह मुझे उनसे मिला उससे सारे पुराने  गिले शिकवे धुल गए ...कमियाँ दूर हो गयीं . उनका पुचकार कर वह आश्वस्त करना, मेरी तकलीफ में छिपकर आँसू बहाना  और मायके  आते  जाते गले मिलकर हिलक हिलककर रोना  ....देखकर लगता कहाँ थीं तुम अब तक  ...कहाँ छिपा रखा था अपने आपको इतने सालों.

और अब जब तुम्हारे इस स्नेह को समझना शुरू ही किया था.....तो तुम इतनी दूर चलीं गयीं .... कहाँ  हो माँ.....क्यों चली गयीं...... 

सरस दरबारी

रविवार, 25 मई 2014

विश्व सीजोफ्रेनिया दिवस !

           वैसे तो हम अपने स्वास्थ्य के  सजग रहते हैं और अपने परिवार के प्रति भी - लेकिन कुछ बातें और चीजें ऐसी होती हैं कि हम कभी तो उसके बारे में जानकारी न होने पर और कुछ अपने बच्चे के बारे में दूसरों को पता न चले . ये हमारे समाज में आम मानसिकता है , के चलते किसी को बताते नहीं और गंभीरता से लेते भी नहीं है।   ये बीमारी मानसिक होती है और कई बार तो इसके चलते कई जिंदगी बर्बाद हो जाती है।वास्तव में ये एक गंभीर मानसिक रोग है। 

                              सीजोफ्रेनिया ये रोग आम तौर पर लोगों की जानकारी में नहीं होती है।  इस रोग के कारणों में कभी कभी ये मनोवैज्ञानिक , पारिवारिक या व्यक्तिगत तनाव , परिवार में , प्रियजन के साथ या फिर मित्र मंडली में कुछ अप्रिय घटनाओं के घटित होने से , सामाजिक प्रभाव और इससे भी बढ़ कर जेनेटिक प्रॉब्लम भी हो सकती है।  अपने ही जीवन में अवसाद , तनाव या किसी  तरह के काम्प्लेक्स से शिकार बच्चे भी इसके शिकार हो सकते हैं।   इस में दिमाग  बायो केमिकल परिवर्तन , मस्तिष्क के चेतन तंतुओं के मध्य होने वाले रासायनिक तत्वों के परिवर्तन विशेषरूप से डोपामाइन नाम के केमिकल में परिवर्तन भी इसका कारण  हो सकता है ।   डोपामाइन केमिकल हमारी सोच को प्रभावित  करता है और इसके असंतुलन से ही व्यक्ति सीजोफ्रेनिया का शिकार हो जाता है।   इसका आरम्भ किशोरावस्था में होता है और सामान्यतौर पर इसको हम किशोर के जीवन में होने वाले सामान्य परिवर्तन के तौर पर इसको लेते हैं और इसके प्रति गंभीर नजरिया नहीं रखते हैं।  खुद इसके शिकार को इसके विषय में जानकारी नहीं होती हैं और विश्व में लगभग १ प्रतिशत लोग इस से ग्रस्त पाये जाते हैं।  
                                 सीजोफ्रेनिया दिमाग की एक ऐसी स्थिति है जिसमें दिमाग  अपना काम ठीक से नहीं कर पाता और इससे मरीज की स्वयं सोचने - समझने की शक्ति क्ष्रीण  हो जाती है और  फैसला नहीं ले पाता है साथ ही उसकी मानसिकता ये हो जाती है कि  उसे महसूस होता है कि दूसरे लोग उसके खिलाफ साजिश रच  रहे हैं।  उसके अकेले में डर  लगता है और हर एक को वह संदेह की  नजर से देखता है।  खुद अपना ध्यान नहीं रखता है।  समाज से खुद कट कर रहने लगता है , समूह में बैठना  या फिर दूसरों की बातों में उसे कोई रूचि नहीं रह जाती है।  
                                 ऐसे मरीज के बारे  जानकारी होने पर उसे उचित इलाज की जरूरत होती है।  उसके सही इलाज और देखभाल से वो सामान्य जिंदगी जी सकता है।  इसके लिए डॉक्टर के उचित परामर्श और दवा के विषय  सावधानी बरतनी पड़ती है।  डॉक्टर के  सलाह के बिना दवा कभी बंद नहीं।   परिवार वालों  ध्यान रखना चाहिए।  
                                 जानकारी के अभाव में जो की हमारे समाज में अभी  इतनी जागरूकता नहीं आई है - इस तरह के मरीज को जादू टोना , भूत प्रेत का शिकार मान लेते हैं और फिर उनको उसी तरह के इलाज मुहैय्या करते हैं।  इसके विषय में एक उदाहरण मेरे पारिवारिक मित्र के बेटे जो CA है का विवाह जिस लड़की से हुआ वह सीजोफ्रेनिया की शिकार थी और यहाँ आते ही उसके लक्षण प्रकट होने लगे।   उसको मायके  थे भेज दिया गया।  ससुराल वाले उसको बुलाने के लिए तैयार नहीं थे और उसका दूसरा विवाह करने की तयारी भी करने लगे , लेकिन उस के पति की समझदारी थी कि  वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ और उसको लेकर आया सही मार्गदर्शन  मिलने पर उसने सही ढंग से इलाज करवाया और  वह आज ३ बच्चों की माँ है और उसको पता है कि वह सीजोफ्रेनिया का शिकार है।  समय से दवा लेती है और बच्चों का पालन कर रही है।  
                                 

शनिवार, 24 मई 2014

माँ तुझे सलाम ! (10)


                       माँ सिर्फ जन्म ही नहीं देती है , वह एक मानव को तन , मन दोनों से गढ़ती है।  वह संस्कार देती है और हम उसको ग्रहण करते हैं, कितना करते हैं ये हमारे जीवन में परिलक्षित होता है। कोई भूल नहीं पाता  है उसको जीवन के शेष काल में और कोई उसके जीते जी त्याग देता है। जिन्होंने माँ को खो कर भी अपने में समेट लिया है वे हैं नासवा जी - माँ के चले जाने से लेकर आज तक न जाने कितनी रचनाएँ गढ़ ली हैं माँ पर ,फिर भी अभी शेष हैं।  आज की प्रस्तुति -- दिगंबर नासवा जी !



यकीनन तू मेरी यादों में अम्मा मुस्कुराती है 
तभी तो खुद ब खुद होठों पे ये मुस्कान आती है

दिगंबर नाम की पहचान तेरी देन है फिर भी
सफेदी आ गई तू आज भी लल्ला बुलाती है

में घर से जब निकलता हूँ बड़े ही प्यार से मुझको
लगे कोई नज़र ना आज भी काजल लगाती है

बुरी आदत कभी जो देख लेती है मेरे अंदर 
नहीं तू डांटने से आज भी फिर हिचकिचाती है

कभी बचपन में मैं कमजोर था पर आज भी अम्मा
फकीरों की मजारों पर मुझे माथा टिकाती है

रफ़ी आशा लता गीता सुरैया या तलत सहगल
पुराने गीत हों तो साथ अम्मा गुनगुनाती है

बढा कर हाथ अपना थाम लेती है तु चुपके से 
मेरी कश्ती भंवर में जब कभी भी डगमगाती है

शुक्रवार, 23 मई 2014

माँ तुझे सलाम ! (9)

माँ सिर्फ जन्म ही नहीं देती बल्कि उस साँस लेते हुए आकर ग्रहण किये हुए बच्चे को अपने सीने से लगाये उसके बदले खुद जीती हैं।  किस तरह से उसको  कुछ सिखाती है  तभी तो वह प्रथम शिक्षक कही जाती है और बच्चे भी माँ के कहे  वेदवाक्य समझता है।  लड़कों को सीखने के लिए कुछ और होता है और लड़कियों के लिए कुछ और।  तभी तो लड़कियां बचपन से गुड़ियाँ , चौके चूल्हे के खेल खेलती हैं  लडके धमाचौकड़ी वाले खेल।  ऐसे ही माँ के सिखाये हुए को जीवन में ग्रहण किये हुए हैं अन्नपूर्णा जी।  है बहुत छोटी बात लेकिन जिसके लिए वह आज भी माँ की सौगात है।  आज अपनी यादों को संजो कर मुझे देने वाली हैं : अन्नपूर्णा गेही।   

           



आमतौर पर लड़कियों के जीवन मे खाना बनाने का अवसर धीरे-धीरे आता है और शुरूवात मे भोजन की  एकाध चीज़ ही बनाते है लेकिन मेरे जीवन मे यह अवसर अचानक आया. बात उन दिनों की है जब नौंवी कक्षा की वार्षिक परीक्षा के बाद मेरी गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हुई थी. दीदी की कॉलेज की परीक्षाएं चल रही थी. दोपहर में माँ की तबीयत सुस्त हो गई और शाम होते-होते माँ के लिए रसोई मे जाकर भोजन बनाना असंभव हो गया था. माँ ने मुझसे रात का खाना बनाने के लिए कहा. इससे पहले मैने सिर्फ़ 2-3 बार चाय ही बनाई थी. मैंने कहा कि मुझसे नही होगा, दीदी आकर बना देगी। माँ ने कहा कि परीक्षा केन्द्र दूर है, उसे आते-आते देर हो जाएगी फिर अगले दिन के पेपर की भी तैयारी करनी है, इसीलिए तुझे ही बनाना है. मैं जैसा-जैसा बताती जाऊँगी तू वैसा ही करती जाना और माँ सामने बैठ गई और मुझे बताने लगी. सबसे पहले कडी बनाने के लिए दही फेंटा, जीवन मे पहली बार यह काम किया। फिर आई छौंक लगाने की बारी। माँ ने बताया कि दही की कडी हो या कोरमा या व्रत मे बननें वाला दही अरवी का साग या पत्ते दार सब्जीयों सहित, भिन्डी जैसी कोई भी हरे रंग की सब्जी हो लाल मिर्च पाउडर की जगह हरी मिर्च का पेस्ट डालना जिससे स्वाद भी बना रहेगा और रंग भी अच्छा होगा। यह पहला टिप था रसोई का जो मैने अपने जीवन मे सीखा। कडी के बाद बारी आई दाल बनाने की, हैदराबादी खट्टी दाल जो अलग तरह से बनती है. तूअर ( अरहर ) की दाल होती है, इमली का खट्टा और इसमे साधारण छौंक नही लगता बल्कि इसका बघार ( यहां भगार भी कहते है ) करने में प्याज के पतले टुकड़े और पेस्ट, लहसुन-अदरक का पेस्ट, जीरा, राई, मेंथी के दाने और पाउडर भी तथा हींग हल्दी वगेरह का प्रयोग होता है जिनका अनुपात और कौन सी चीज़ पहले और कौन सी बाद मे डाले इसका भी महत्व है अन्यथा स्वाद बिगड़ता है. यह सभी तभी माँ ने समझाया। सभी पेस्ट हमारे यहां पहले से तैयार रहते है. फिर चावल बना लिया। कहना न होगा कि तीन चीजों के भोजन मे कोई कमी न थी, आखिर माँ के बताए अनुसार काम करती गाई थी. हालांकि उसके बाद लम्बे अरसे तक रसोई मे काम का अवसर नही मिला लेकिन उस दिन जो सीखा आज तक उसी विधि से काम करती हूँ.


अन्नपूर्णा गेही