गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

मानव अमर होने वाला है!







एक दिन पहले ही पढ़ा कि कुछ ही वर्षों के शोध के बाद मानव अमर हो जाएगा। बड़ी खुशी हुई कि अब तो न ईश्वर , न प्रकृति और न ही नश्वरता के दर्शन का भय।

पर विगत दो दिनों में हो प्रकृति का कहर फिलिपिन्स और समोआ , टोंगा और अमेरिकन समोआ में देखा तो लगा कि जब हम प्रकृति के इन कहरों से मानव जाति को बचा नहीं पा रहे हैं तो अमर कौन होगा? कितने लोग अमर होकर रहेंगे इस पृथ्वी पर। हम क्यों अमरत्व कि ओर इतना आकर्षित होते हैं। अमरत्व का अर्थ यह तो नहीं कि हम मानसिक और शारीरिक कष्टों से मुक्ति पा लेंगे। क्या हमारे ही कृत्यों से प्रकृति बगावत कर रही है? उस पर हम विजय क्यों नहीं पा रहे हैं? उसको वश में करना यदि हमारे वश में नहीं है तो उसकी कृतियों के प्रति हम इतने आश्वस्त कैसे हो सकते हैं?
मनुष्य कि कामना अमरत्व कि नहीं बल्कि जितना भी जीवन मिले वह सद्कार्यों और सद्भावों से परिपूर्ण हो। मानव के प्रति मानव में प्रेम और सम्मान हो। अपनी शक्ति और धन के बल पर शोषण कि भावना न हो। अरे जीवों को ही शान्ति पूर्वक जीने कहाँ देते हैं हम? अगर दुधारू जीव है तो उसकी अस्थियों से तक दूध निकल कर बेच रहे हैं और ख़ुद के लिए अमरत्व कि कामना करते हैं। घर में अगर अपाहिज बुजुर्ग हैं तो उनके लिए मृत्यु कि कामना कर रहे हैं और स्वयं के लिए अमरत्व चाहते हैं।
कभी हमने सोचा है कि हम कहाँ जा रहे हैं? शायद नहीं? सिर्फ 'स्व' पर आधारित जीवन हमारे जीवन के मानदंडों के अनुरूप हमें संतोष और सुख तो दे सकता है , लेकिन अगर सिर्फ 'स्व' ही सब कुछ है तो 'पर' कि अवधारणा किसके लिए बनी है? मानव बन कर आए हैं तो मानव को मानव ही बने रहना चाहिए? इसके लिए किसी दर्शन कि जरूरत नहीं होती, सिर्फ अपनी ही आत्मा की आवाज सुनने की कोशिश करना भर काफी होता है।

सिर्फ अपने को ही हम जीवन के प्रति सहृदय बना लें तो कितने जीवों के प्रति अन्याय और अमानवीय कृत्यों को रोका जा सकता है। ऐसे हालत में अमरत्व की बात हमें उचित लगाती है नहीं तो ये अमरत्व उनको ही मिलेगा जो शक्तिशाली और समर्थ हैं फिर ये जो सिलसिला है शोषण और अमानवीय कृत्यों का वाकई अमर हो जाएगा। एक नहीं कई कई पीढियां त्रस्त रहेंगी क्योंकि वे अमर नहीं हो सकते , हाँ अमरों की चक्की में पिस जरूर सकते हैं.

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