मायके के चंद घंटे ! (3)
उरई की संक्षिप्त यात्रा में सबसे ज्यादा प्रतीक्षित मुलाकात मुझे करनी थी अपने चाचाजी श्री रामशंकर द्रिवेदी जी से। कई बार वह भी कह चुके थे कि मिलना है , लेकिन जिस उद्देश्य से हम मिलना चाहते थे , उसे पूरा करने का समय नहीं मिला। मैं उनको बता चुकी थी कि मैं आ रही हूँ। उनकी कुछ अस्वस्थतावश हम दिन में नहीं मिल सके और मैं चाचीजी के घर चली गयी और वहां तो सारे दिन रहना ही था। अतः हमने समय शाम को मिलने का रखा।
हमारी मुलाकात तो पहले भी हो चुकी हैं, और हर बार मिलना हमें पापा और चाचा के ज़माने में ले जाता है। उनसे पुरानी यादें सुन कर लगता है कि मैं फिर उसी काल में पहुँच गयी हूँ।
इतने बुजुर्ग होने पर भी उन पर माँ सरस्वती का वरद हस्त सदैव रहा है और आज भी उनकी सक्रियता नमनीय है। हमारे लिए वे प्रेरणा के स्रोत हैं। वे सुबह अस्वस्थ थे और शाम जब मैं पहुंची तो वे हमें अपनी आने वाली किताब की प्रूफ रीडिंग करते मिले। लैपटॉप या ऑनलाइन काम करने के वे अभ्यस्त नहीं है, इसलिए वे प्रिंट आउट से प्रूफ रीडिंग करते हैं। उनके चारों तरफ ईंट की दीवारों के साथ किताबों के दीवारे में खड़ी थीं। सिर्फ किताबें और किताबें लेकिन बहुत ही संयोजित।
हमारे साथ बैठ कर वे अपने ज़माने की बातें हमें बताते रहे। बांग्ला भाषा के प्रति उनका समर्पण कैसे हुआ? ये किस्सा भी उन्होंने हमें सुनाया कि जब वे कानपुर में पढ़ने के लिए गए तो उनका एक सहपाठी बंगाल से से था , जिसने उन्हें "बांग्ला कैसे सीखें " नामक किताब दी थी। एक हिंदी भाषी की कितनी रूचि होगी? उन्होंने ले तो ली लेकिन इस भाव से कौन पढ़ता है? फिर पता नहीं कौन सी प्रेरणा से उन्होंने उसे पढ़ा ही नहीं बल्कि पूरी तरह से आत्मसात कर लिया और फिर उनका शोध भी बांग्ला भाषा पर ही था। फिर भविष्य में भी उन्होंने बांग्ला भाषा की कितनी किताबों का अनुवाद किया और कार्य सतत रूप से जारी है। सबसे स्मरण रखने वाली बात ये हैं कि वह सहपाठी उन्हें फिर कभी मिला नहीं लेकिन अपने से जोड़ कर रखा है। यह प्रसंग मुझे बहुत ही स्मरणीय लगा।
हमारी चर्चा में पुराने साहित्कारों की बैठकों और उनसे जुड़े संस्मरण भी रहे। अपने कॉलेज के सहकर्मियों चाहे वे वरिष्ठ हों या फिर कनिष्ठ, जिन्हें मैं भी जानती रही , के बारे में बातें होती रहीं। उन्हें भी बहुत अच्छा लगा क्योंकि घर के लोगों के रूटीन अलग होते हैं और मिलने आने वाले अपनों के साथ जो वार्ता होती है उसके विषय अच्छे होते हैं और फिर अतीत को जी लेने का सुख जो होता है वह बड़ा ही सुकून देता है।
घर से छोटी बहन का फोन आना शुरू जो गया कि उनकी सहेली आशा आयी है और दीदी से मिलने के लिए बैठी है। हम चाचाजी से विदा लेकर चल दिए, आशा मेरा इन्तजार कर रही थी क्योंकि मैं ही उससे बहुत सालों से नहीं मिली थी। उसने कह दिया कि आज दीदी से मिलकर ही जाऊँगी। मुझे तो याद नहीं अब लेकिन उसी ने बताया कि मैंने उसके हाईस्कूल के लिए होमसाइंस का टी सेट ( कपडे का बना टेबल क्लॉथ ,ट्रे कवर और टीकोज़ी) बनाई थी। वह समय कुछ और ही था। मैं निश्छल भाव से सबके कामों के लिए उपलब्ध होती थी। चाहे किसी बच्चे की टीचर की फेयरवेल के लिए कविता लिखनी हो या लेख लिखना हो। तब कोई अंकल आंटी वाली बात नहीं थी। पूरा मोहल्ला , माँ की सहेलियाँ हों या पापा के मित्र चाचाजी,चाचीजी थे और उरई की बेटियाँ बुआ। वैसे हमारी उरई में आज भी ये शेष है। मैं बुआ वालों के लिए बुआ हूँ और दीदी वालों के लिए दीदी।
एक पूरे दिन को मैंने इसी तरह से खुले वातावरण में जी कर दूसरे दिन सुबह ही कानपूर के लिए निकल लिए। व्यस्तता थी इसीलिए काफी लोगों को बता ही नहीं पाई कि मैं आ रही हूँ। सबसे क्षमा के साथ फिर से आने का अवसर तलाशती हूँ।