बुधवार, 7 दिसंबर 2011

ये जनसेवक हें !

कभी कभी अख़बार की कुछ हैडिंग ऐसा कुछ सोचने के लिए मजबूर कर देती हें कि न मन मानता है और न ही कलम। इस समाचार का शीर्षक है - "ट्रेन में मनमाफिक सीट न मिलने पर बिफरे सांसद" । ये जनसेवक कहे जाते हें और अपने क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए संसद में जाते हें। उनका व्यवहार और आचरण ऐसा कि जनता अपना सिर पीट ले। सारा सरकारी तंत्र इनके इशारों पर चलने के लिए बना है।
इन सांसदों को मुगलसराय स्टेशन पर पटना-नई दिल्ली राजधानी में ए सी वन में सीट न मिलकर ए सी टू में सीट मिली थी। फिर क्या था - सांसद बिफर ही तो पड़े। उनका कहना था कि जब रेलवे प्रशासन को ये पता था कि हम संसद सत्र में भाग लेने के लिए जा रहे हें तो अलग से कोच की व्यवस्था क्यों नहीं की गयी? बाद में वे काफी मान-मनोव्वल के बाद उसी में गए लेकिन रेल मंत्री से बात करने की बात की धमकी देकर।
हमें सांसद समूह से सिर्फ ये पूछना है कि सांसद बनने से पहले कभी भी उन्होंने ए सी वन के अतिरिक्त रेल में सफर नहीं की है। जब आम आदमी टिकट लेने के बाद भी सीट नहीं ले पाता है, वेटिंग में टिकट लेकर भी वह टी टी के पीछे भागता है कि उसको कहीं एक सीट दिलवा दे और वे सुविधा शुल्क वसूल करके कहीं बैठने की जगह दे देते हें। यहाँ तक कि स्लीपर के डिब्बे में जमीन पर लेटने की अनुमति के लिए भी पैसा चुकाते हें। ऐसा नहीं है कि आम लोगों की इस स्थिति से वे वाकिफ नहीं है लेकिन कभी इस बारे में उन्होंने अतिरिक्त कोच लगाने या फिर रेल प्रशासन से बात करने की कोशिश की है। अगर नहीं तो क्यों? जब खुद को मनचाही सीट न मिले तो हंगामा खड़ा करें जैसे ए सी टू उनकी इज्जत से बहुत नीचे का स्थान है। संसद सत्र के लिए जा रहे हें तो वे रेलवे प्रशासन या फिर देश पर अहसान करने नहीं जा रहे हें। साल में कितने महीने वे अपने घरों में बैठ कर मोटा वेतन और भत्ते लेते रहते हें , वे इन सबके अधिकारी है इसके लिए वे अपने क्षेत्र के कार्यों के द्वारा साबित करें। ये तेवर संसद में अपने क्षेत्र के विकास के कार्यों के लिए दिखाएँ तो शोभा देता है।
जिन सुविधायों से आपका चयन करने वाला वंचित है - उसे हासिल करने के लिए हंगामा करने का आपको कोई हक नहीं बनता है। हमें शर्म अआती है ऐसे सांसदों पर । वैसे अख़बार में अपना नाम देख कर खुश तो होंगे ही - काम तो ऐसे नहीं किये कि सुर्ख़ियों में आये इस तरह नाम तो हुआ।

8 टिप्‍पणियां:

  1. सांसद जनसेवक नहीं बल्कि जन इनके सेवक हैं ..

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  2. अपने संसारों में मुदित सब के सब।

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  3. ऐसे सांसदों ने ही तो देश का बेडा गर्क किया है ! भारत माँ की गरिमा को तार तार करने वाले यह कभी नहीं सोचते कि वो जनता के सेवक हैं !

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  4. हाय रे किस्‍मत। अब कोई क्‍या करे? राजाजी की शान में गुस्‍ताखी हो गयी। इसकी सजा जनता को मिलेगी जरूर मिलेगी।

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  5. आजकल जनसेवक की परिभाषा बदल गई है!
    अब तो जो जन-जन से सेवा कराए वही जन सेवक है!

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  6. aapke saath-saath sangita aunty ki baat se bhi poorntah sahamat hoon ...bahut accha likhti hain aap kam shabdon men poori baat ... best wishes

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