मंगलवार, 2 जून 2015

पंचायतें और अँधा न्याय !

                                           पंचायती राज का सपना जिस रूप में दशकों पूर्व देखा गया था , मुझे नहीं लगता कि वह साकार हो सका है। जिस रूप में उसको परिभाषित किया गया था वह अपने अस्तित्व को खो चुका  है क्योंकि वहां भी तो सञ्चालन दबंगों की इच्छानुसार ही होता है। आज स्वतन्त्र भारत में पंचायतों की विकृत न्याय प्रणाली ने शर्मसार कर दिया है। वहां भी दबंगों का राज है क्योंकि पद हथियाने वाले राजनैतिक दलों के आकाओं की छत्रछाया  संरक्षण प्राप्त होते हैं, बल्कि कहें ये पद उन्हें काबिलियत के बदौलत नहीं बल्कि वे अपनी हनक के बल पर हथियाते हैं। और फिर कठपुतली बन कर काम भी करते हैं। पंचायत सदस्य उनकी अंटी  में रहते है. गाँव वालों के लिए पंचायत का निर्णय वेद वाक्य होता है। निर्णय चाहे उचित हो या अनुचित , मान - मर्यादा जैसी कोई चीज वहां नहीं होती है। उस निर्णय के खिलाफ कोई और विकल्प या प्रतिरोध करने वाला  नहीं होता है। 
             कितनी घटनाएँ और शर्मसार होती हुई मानवता के उदाहरण निरंतर सामने आ रहे हैं और पढने के बाद विवश से बैठे हम हाथ मल कर रह जाते हैं। आपको भी परिचित होने का पूरा पूरा अधिकार है और अपनी राय देने का भी ---
1. एक गाँव की पंचायत ने सास बहू के झगड़े में बहुओं को पेड़ से बाँध कर पीटने का निर्णय दिया और वैसा ही किया गया।पूरा गाँव तमाशा देखता रहा और जब तक वे बेहोश नहीं हो गयीं। घर की दीवारों से बाहर मामला न्याय के लिए आता है तब  पहला प्रयास होता है कि परिवार की लड़ाई में समझौते का प्रयास किया जाय , न कि उसे तमाशा बना कर हैवानियत का रूप दे दिया जाय। 

2 . एक पंचायत ने बेटे को एक विधवा से विवाह करने के कारण उसे बस्ती से निकल दिया गया और माँ की मृत्यु पर भी उसको बस्ती में नहीं घुसने दिया गया। वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बस्ती के बाहर रात भर बैठा रहा कि शायद लोगों को उसको तरस आ जाय और उसे अंतिम दर्शन करने को मिल जाए। फिर पता नहीं उस अभागन माँ को अपने बेटे के हाथ से अंतिम संस्कार का सौभाग्य प्राप्त भी हुआ होगा या वह भी तुगलकी फरमान की बलि चढ़ गया होगा। 

3 . एक गाँव में गैर जाति के लडके के संग शादी करने पर पंचायत ने उस लडके की बहन की शादी दूसरे परिवार के पुरुष के साथ करने का फरमान सुनाया। जो उससे उम्र में दोगुना और विधुर भी था। 

4 . पंचायत के आदेश पर 60 वर्षीया महिला और 80 वर्षीय पुरुष का निकाह करवा कर गाँव के बाहर निकाल दिया गया। पंचायत का अंदेशा था कि दोनों के मध्य अवैध सम्बन्ध थे और महिला की बेटी की मृत्यु के पीछे यही कारण रहा होगा। कोई गवाह नहीं कोई सबूत नहीं और सीधे निर्णय। 
                                  इन पंचायतों द्वारा दिए गए निर्णय के खिलाफ कहाँ सुनवाई हो सकती है ? पुलिस कोई रूचि नहीं लेती है और उन्हें जब तक तहरीर न मिले तो वो कुछ करने वाले नहीं और फिर दबंगों के चलते पीड़ित कहीं गुहार लगा ही नहीं सकते हैं। ये कैसा लोकतंत्र और कैसी स्वतन्त्रता  का खुला मखौल है ?

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (04-06-2015) को "हम भारतीयों का डी एन ए - दिल का अजीब रिश्ता" (चर्चा अंक-1996) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जयंती - बालकृष्ण भट्ट और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. पंचायती राज्य की अवधारणा देश में छोटी से छोटी इकाई तक विकास की थी मगर अनेक मामलों में यह दबंगई को भी पुष्ट करता है.
    कानून का दखल अनिवार्य है.

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  4. पंचायती निर्णयों के अंधकारमय अध्याय।

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