बुधवार, 1 जनवरी 2020

वो सर्दी और ये सर्दी !

संस्मरण
          आज के तापमान को देखते हुए अखबार में 1961- 62 की सर्दियों का जिक्र किया गया तो याद आया कि वह सर्दियां आज की तरह साधनों से सम्पन्न न थी और न ही उस समय  तापमान नापा जा सकता था । ना इतने सारे साधन थे कि इंसान सर्दी से अपने को सुरक्षित रख सके।
             मुझे अच्छी तरह याद है उस समय मेरी दो बहनों का जन्म हुआ था। 1 महीने पहले मेरे चाचा की बेटी मंजू और एक महीने बाद मेरी बहना सुनीता का जन्म हुआ था। जहाँ माँ और चाची को लिटाया जाता था एक बड़ा हॉल था।  घर में छोटा बच्चा होने के कारण हॉल में जिसमें कि जच्चा और बच्चा रहते थे पापा लकड़ी के बड़े-बड़े जड़ों वाले टुकड़े ले आते थे और उस कमरे में 24 घंटे आग जला करती थी। प्रसूता और नवजात के पास एक बोरसी में कंडे की आग जलाकर रखी जाती थी । मुझे नहीं याद लकड़ी उस दौरान कब तक  जलाई गई होगी और भयंकर सर्दी में किस तरह से छोटे बच्चे और उसकी मां को बचाया गया होगा।
         उस समय सर्दी में स्कूल की छुट्टियाँ नहीं होती थीं । दादी तैयार कर देती और हम स्कूल चले जाते । बाहर खुले में रखी बाल्टियों में बर्फ जम जाती थी ।
     उसी समय चीन के साथ भारत की लड़ाई हुई थी और घर में यह चर्चा हुआ करती थी कि सीमा पर लड़ने वाले सैनिकों को किन हालातों का सामना करना पड़ रहा होगा। देश के मैदानी इलाकों में यह हालात थे और वहां पर हालातों की सिर्फ कल्पना की जा सकती थी ।
       दादी हम भाई बहनों से कहती कि भगवान का कीर्तन करो तो ये सर्दी खत्म होगी । हम सब उनकी बात मानकर सुबह शाम आरती में शामिल होते । आज बहुत सारे साधन है लेकिन वह परिवार का सुख नहीं है । 

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