सोमवार, 31 मई 2010

मेरा लेखन का सफर : स्मृतियाँ कुछ तिक्त कुछ मधुर !

                            जब ब्लॉग तक पहुंची हूँ, तो मन हुआ कि संस्मरण की एक श्रृंखला जो यादों में बसी है और मेरे लेखन से जुड़ी है सब से बाँट लूं. बहुत कुछ सीखा और बहुत कुछ पाया इस लेखन से , किन्तु कैसे शुरू हुआ और कैसे कैसे लोगों से निपट कर यहाँ तक हूँ, यह भी एक महत्वपूर्ण दास्ताँ है.


                                 पढ़ना मेरे परिवार में एक व्यसन की तरह से था. पापा , माँ और दादी सभी पढ़ने के शौक़ीन थे. सबसे बड़ी बात ये थी कि मेरी दादी पढ़ लेती थी लेकिन अगर पृष्ठ शेष हो तो उसे नहीं ढूढ़ पाती थी हमसे कहती कि इसका पृष्ठ ढूढ़ दो. मेरे पापा के एक मित्र के पास पत्रिकाओं की एजेंसी थी सो वे सारी पत्रिकाएं मुफ्त में दिया करते थे और उस समय जो आज भी मेरी स्मृति में हैं - साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, सारिका, माया, कादम्बिनी, नवनीत, हिंदी डाइजेस्ट, साथी, अरुण थी जो साहित्यिक और स्तरीय पत्रिकाएं थी. फिल्मी में पहले सुचित्रा ( जो बाद में "माधुरी" के नाम से आई), फिल्मी कलियाँ, सुषमा, रंगभूमि, फिल्मफेयर थी जो मुझे याद हैं. इनको चाटते चाटते अच्छे खासे ज्ञानी हो गए थे. अपनी उम्र से अधिक समझदार और दुनियादार.
                              मेरी लेखनी चली जब मैं १० साल की थी. मेरी पहली कहानी "ऋण " दैनिक जागरण के बाल जगत स्तम्भ में छपी थी, गरिमियों कि छुट्टी में हम सभी ननिहाल चले जाते थे. वहाँ से लौट कर आये तो पापा ने मुझे वह अखबार दिया और मेरी पीठ थपथपाई क्योंकि ये काम मैं बिना बताये ही किया करती थी. फिर मुझे भी बहुत ख़ुशी हुई. फिर इसी तरह से कई कहानियां निकलीं. जिनमें शेष स्वतंत्रता सेनानियों पर अधिक थी, जिनमें उसके महत्वपूर्ण संस्मरण मैंने बाल जगत के लिए ही लिखे थे.
                            जब स्कूल में पहुँची तो आदत तो नहीं छूटी थी, १५ अगस्त को स्कूल में डिबेट प्रतियोगिता रखी गयी. उस समय खाद्य समस्या एक बहुत बड़ा प्रश्न था. यही विषय रखा, मेरी जितनी पत्रिकाएं तो किसी के यहाँ आती नहीं थी, मैंने एक लेख तैयार किया और अपने क्लास कि मोनिटर को दे दिया कि तुम इसको बोल देना. उसे पढ़कर नहीं बोलना था. इत्तफाक से १५ अगस्त बारिश होने लगी और घोषणा की गयी कि हाल में हो रहे कार्यक्रम में वही क्लास आयेंगे जो कि इस में भाग ले रहे हैं. अब इज्जत का प्रश्न था. सब ने कहा चलते हैं देखेंगे. मेरी क्लास से किसी ने मेरा नाम वहाँ दे दिया. जब नाम बुलाया गया तो मुझे तो काटो खून नहीं , लेकिन मैंने पढ़ा था और लिखा था सो सब पता था, लड़कियों ने ठेलठाल कर स्टेज पर भेज दिया और  मैं वहाँ  बोल कर आ गयी , फिर नीचे बैठ कर खूब रोई तुम लोगों ने मेरा नाम क्यों दिया? लेकिन इससे मेरा नाम कॉलेज में हो गया. फिर तो हर डिबेट में भाग लेना ही होता था.
                          उन दिनों आज की तरह से कंप्यूटर तो थे नहीं , सो ऑरकुट और फेसबुक या और networking के साधन होते. हाँ पत्र ही सबसे बड़े साधन थे. मेरे यहाँ उस समय "नेशनल हेराल्ड" पेपर आता था और उसमें एक कालम होता था "पेन फ्रेंड" का उसमें रूचि आने लगी और उसे ही मेरी एक फ्रेंड बनी "प्रतिमा श्रीवास्तव" जो कानपुर की थी. मेरे पत्रों के लिखने के ढंग से उसने मुझसे कहा कि "तुम कविता लिखो, तुम कविता लिख सकती हो", वह आज भी मेरी बहुत अच्छी मित्र है और लेखिका भी है. इस विधा के बारे में मैंने पहले नहीं सोचा था. फिर लिखने की कोशिश की. और लिख लिख कर डायरी में इकठ्ठा करती जाती. वह हर साल दिसंबर कि छुट्टी में उरई मेरे पास जाती थी. फिर उनमें करेक्शन करती.
                         मेरा  पूरा घर फिल्मों के भी उतने शौक़ीन थे, शायद ही बचपन में कोई फ़िल्म जाती हो , जो हम न देखते हों. जो न देख पाते फिल्मी पत्रिकाओं में उनकी पूरी कहानी नाट्य रूप में दी जाती थी और उनसे काम चला लेती. मीनाकुमारी मेरी पसंदीदा अभिनेत्री थी. ३० मार्च १९७२ को उनका निधन हुआ और इससे मैं बहुत ही दुखी थी. मैंने माधुरी में एक संवेदना पत्र लिखा और वह पत्र छपा. उसमें पता भी छपा था फिर क्या था? बहुत सारे पत्र आने शुरू हो गए. किसी को बहन बनाना था कोई दोस्ती करना चाहता था. हम सब भाई बहन के लिए ये नया अनुभव था सब मिलकर बैठकर पत्र पढ़ते . उनमें से चार लड़के सबने चुने . एक अमर जो मथुरा का था, एक योगेन्द्र जो बीकानेर का था, एक विनोद वह भी बीकानेर का था और एक अजय जो बिहार का था.  चारों वही किशोरों वाली उम्र के मैं ही कहाँ बड़ी थी लेकिन वे सब मुझसे भी छोटे थे.  एक लड़की भी फ्रेंड बनी "उमा श्रीवास्तव" जो दोहद गुजरात से थी. जिससे वर्षों पत्र व्यवहार चला. एक बार वह सपरिवार मुझसे मिलने उरई भी आई क्योंकि उसके पापा रेलवे में थे. इसी तरह से भाइयों से भी मेरी कई साल तक राखी भेजना और पत्र व्यवहार  चलता रहा. लेकिन भाइयों से कभी मिली नहीं. उनमें से जिनके फोटो मेरे पास थे आज भी मेरे पुराने अल्बम में लगे हुए हैं. वे सब भूल गए होंगे लेकिन मुझे आज भी याद हैं.
                                                                                                                                                    { क्रमशः }

रविवार, 30 मई 2010

31 मई तम्बाकू निषेध दिवस !


                                    आज तम्बाकू निषेध दिवस - हर वर्ष आता है और हर वर्ष इसी तरह से चला जाता है, लोग अखबार में आलेख देखते हैं और रख देते हैं. 
                              पर आज ये क्रांति दिवस ब्लॉग की दुनियाँ में भी छाएगा. ऐसा नहीं है कि हमारे ब्लॉगर बन्धु इस शौक से दोस्ती न रखते हों और रखने वाले इन बातों को बेकार की दलीलें  न मानते हों  और कहते हों  कि देखो अमुक तो कुछ भी नहीं खाता था और उसको मुंह या गले का कैंसर हो गया. ये आप किसे झुठलाने की कोशिश करते हैं , खुद को या घर वालों या अपने शुभचिंतकों को. अगर आग पर चलेंगे तो आज नहीं कल पैर जरूर जलेंगे और छाले भी आपको ही पड़ेंगे उसकी तपिश आप अकेले नहीं झेलेंगे अपितु आपके घर वाले भी उसमें झुलसेंगे. अभी भी देर नहीं हुई है - जो इसके सेवन में लिप्त हैं छोड़ने का मन बना लें तो दुनियाँ में असंभव कुछ भी नहीं है. 
                            मैंने इस विभीषिका को झेला है इसलिए जानती हूँ, मेरे ससुर जी तम्बाकू खाते थे और उससे ही उन्हें कैंसर की शुरुआत हुई थी. उनके कष्ट को मैं नहीं झेल सकती थी लेकिन मैंने बहुत कुछ झेला. इस लिए यही चाहती हूँ कि कोई और क्यों झेले? अगर मेरे इस जानकारी भरे आलेख से कुछ लोगों ने भी इस का सेवन छोड़ दिया तो मेरा लेखन सार्थक हो जाएगा. इसीलिए मैं इसको आज कई ब्लॉग में डालूंगी.
                    तम्बाकू धूम्र सहित और रहित दोनों से तरीके से सेवन की जाती है. सिगरेट, बीडी, सिगार , चिलम, हुक्का आदी धूम्रपान के साधन है और तम्बाकू, चाहे उसे सीधे खाएं या पान में या पानमसाले के रूप में सब घटक हैं. इस तरह से इस बारे में अपनी जानकारी के अनुरुप आपको बतलाने की कोशिश कर रही हूँ.


आँख और कान - जब धूम्रपान करते हैं तो उसका धुंआ पूरे श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है. जिसका प्रभाव अन्धपन और श्रवण ह्रास के रूप में प्रकट हो सकता है. 
मुँह और दाँत -  इसका सीधा सम्बन्ध मुँह से ही होता है, इससे दांतों में विकार, मसूड़ों में विकार और मुख कैंसर होने की पूरी पूरी संभावना बन जाती है. अब भी देर नहीं होती है, अगर आप इसका उपयोग करते हैं और अपने मुँह को खोल कर देखें अगर वह पूरा नहीं खुल रहा है तो उसके लिए तुरंत डॉक्टर के पास जाकर सलाह ले सकते हैं. अगर मुँह के अन्दर दोनों ओर सफेद लाइने या फिर सफेदी आ रही हैं तब भी आप कैंसर की ओर कदम बढ़ा रहे हैं लेकिन रोका जा सकता है. 


फेफड़े - सिगरेट और इसी श्रेणी की तमाम चीजें सीधे फेफड़ों को प्रभावित करती हैं और इससे खांसी, टी बी, कैंसर , ब्रोंकाइटिस , इन्फैसेमा आदी रोग हो सकते हैं.

मांसपेशियां और जोड़ - धूम्रपान मांसपेशियों से आक्सीजन खीचकर आपको कमजोर बनाता है और साथ ही जोड़ों के लिए दर्द युक्त संधि शोथ के खतरे को बढ़ा सकता है.

मष्तिष्क - मानव शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग, जिससे कि सम्पूर्ण शरीर का सञ्चालन होता है. निकोटिन इन पदार्थों में होता है और ये मनुष्य को अपना आदी बना लेता है. ये जब मष्तिष्क में प्रवेश करती तो आपको लगता है की आप बहुत ही अच्छा अनुभव कर रहे हैं , तनाव मुक्त हो रहे हैं जब कि वह आपके मष्तिष्क को शिथिल कर देती है. इसके पश्चात की स्थिति में आप व्यग्र , उत्तेजित और हतोत्साहित हो जाते हैं. 

गला - सिगरेट , तम्बाकू, पानमसाला गले और स्वरयंत्र के कैंसर का कारण हो सकता है क्योकि यही से होकर तम्बाकू अंदर प्रवेश करती है या धुआं अंदर जाता है. 

ह्रदय - धूम्र  सहित या धूम्र रहित तम्बाकू की निकोटीन रक्त नलिकाओं को संकुचित करती है और जो आपके हृदय को अधिक कार्य करने के लिए मजबूर करती हैं. धूम्रपान धमनियों को भी अवरुद्ध कर सकता है जो की हार्ट अटैक तथा स्ट्रोक्स का कारण बनाता है. धूम्रपान शिराओं में जमकर उन्हें संकुचित और अवरुद्ध करता है जो की हृदयाघात का कारण बनाता है. 

अन्य रोग - धूम्रपान या अन्य वस्तुएं गुर्दे, पैन्कियाज, पेट, प्रजानना अंगों के कैंसर के खतरे को बढ़ता है इससे प्रजनन क्षमता भी क्षीण होती है कभी कभी समाप्त तक हो जाती है. 

                    मेरी करबद्ध प्रार्थना है की इसको पढ़ाने वाले सभी बन्धु अगर खुद इसके ग्रसित नहीं हैं तो जो उनके मित्र हों उनके इस बारे में जरूर अवगत कराएँ तभी मेरे इस आलेख की सार्थकता सिध्ध होगी.
 

बुधवार, 26 मई 2010

जहाँ डाल डाल पर सोने की............... !



 जहाँ  डाल डाल पर  सोने  की  चिड़ियाँ करती हैं  बसेरा  ..............

        इस सोने की चिड़िया वाले देश में अब इंसान माटी के मोल बिक रहे हैं. मध्य प्रदेश में ९ आदिवासी ने ५० हजार में खुद को बेच दिया . कभी सोचा है किसी ने क्यों?
                         पेट की आग ऐसी  होती है कि कभी अपने और कभी बच्चों के पेट की आग शांत करने के लिए - माँ खुद को बेचती है और कभी बाप अपने ही बच्चों को बेच देता है. नाबालिग लड़की किसी बूढ़े के हाथ बेच दी जाती ताकि बाकी बच्चों के लिए वे रोटी जुटा सके. ये गरीबी उनकी नियति है और हमारे देशमें विश्व के पटल पर बड़े बड़े कीर्तिमान स्थापित किये जा रहे हैं. हमारे सांसद अक्सर विदेश यात्राओं का सुख उठाते रहते हैं और लाखों रुपये खर्च करते रहते हैं. क्या किसी को अपने ही क्षेत्र की इस बात का ज्ञान नहीं है कि लोग क्यों बिक रहे हैं? और जो खरीदेगा वह उनके लिए कालीन बिछा कर नहीं बैठा है कि तुम आओ और सो जाओ. खून की बूँद तक निचोड़ लेते हैं तब मुहैया होती है रोटियां. कितने बच्चे किसी हलवाई की दुकान के आगे या पीछे खड़े होते हैं कि खाने  वाला दोने फेंके और वे उसे उठ कर चाट लें और कुछ तो पेट की आग शांत होगी.  ऐसा भूखा और नंगा है हमारा देश - हम इस सत्यता से मुंह क्यों चुराना चाहते हैं?  वे जो गद्दी लिए बैठे हैं, उनकी आँख का चश्मा उतर चुका है .
                           उन्हें न देश में पानी की त्राहि त्राहि नजर आती है और नहीं बिजली की कमी से बंद होते रोजगार के अवसर. कितने श्रमिक सडकों पर आ चुके हैं. किसी प्रदेश में इन रोजमर्रा की जरूरतों से अधिक जरूरी पार्कों और मूर्तियों की जरूरत है. एक गैर जिम्मेदार सरकार जिस पर निजाम की तरह कोई अंकुश नहीं है. अपने हाथ हम पहले ही कटवा चुके हैं और काटने वाले अब उसमें सुधार के इच्छुक भी नहीं है क्योंकि वे सब हैं एक ही थैली के चट्टे -बट्टे. देश की राजधानी में बैठे सांसदों को अपने वेतन और भत्तों में तीन गुनी बढ़त चाहिए क्योंकि उनका खर्च नहीं चल पा रहा है. अरे इन लोगों से पूछो कि जो खुद को बेचकर परिवार पालने जा रहे हैं और एक तुम हो तुम्हारा पेट सिर्फ पैसों से ही भरता है और उसमें भी कम नजर आता है.
                            इतनी बड़ी संसद में कौन सा सांसद ऐसा है जिसने कभी कहा हो की हमारे वेतन और भत्तों के कुछ प्रतिशत देश की दशा सुधारने में लगा दिया जाय. उनके वेतन और भत्तों की फेहरिस्त देख ली जाए तो लगता है कि ये धंधा अच्छा है, साम दाम दंड भेद बस एक बार संसद में पहुँच जाओ फिर तो सात पीढ़ियों के पौ बारह. कुछ तो वहाँ सिर्फ पार्टी के नमूने बने बैठे रहते हैं और कभी कभी मतदान में संख्या बढ़ाने के लिए ही होते हैं. जिस देश को चूस कर खाने के लिए इतने सारे विधायक और सांसद होंगे वहाँ इंसान खुद को बेचेगा नहीं तो क्या इन जैसों की भूख कभी शांत होगी? कभी नहीं, इनके पास कोई विकास का प्रश्न नहीं होता है ? बस संसद में बैठ कर हंगामा करने के लिए सत्र बुलाये जाते हैं .
                          इस सोने की चिड़िया देश में कुछ नौकरशाह और सांसद ही करोड़ों की संपत्ति के मालिक होते हैं.  वर्ना आम आदमी तो देश की जनगणना के लिए है और रात दिन मेहनत करके दो जून की रोटी कमाने के लिए है. ये सरकार में बैठे हुए लोग - करों के नाम पर रिक्शे वाले, छोटी दुकान वाले, पालिश वाले , सब्जी वाले सब से तो सेवाकर  उगाही कर रहे हैं. ये बेचारे सारे दिन के बाद शाम को नमक रोटी ही खा लें बहुत है क्योंकि देश की बढती मंहगाई ने इन्हें पहले से ही भूखे मारने की ठान रखी है. उन्हें कुछ देने के बजाय उनकी कमाई से छीन लेने के लिए क़ानून बनाये जाते हैं और जिन्हें लाखों में मिल रहे हैं - वे बेचारे और लाखों की जुगाड़ में भूखें हैं पता नहीं कितनों की रोटी छीन  कर ये खायेंगे तब इनका पेट भरेगा. ये सोने की चिड़िया वाला देश अपने ही नौनिहालों को भूखा मरता देख कर रो रहा है क्योंकि सोने की चिड़िया तो खाई नहीं जा सकती और खाने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं है.
      वे बिक रहे हैंं और हम खरीदार हैं
    बिकाऊ तो हम भी हैं 
लेकिन हमारी कीमत करोड़ों की होती है
ये बेईमानो!  भारत माँ अपनी किस्मत रोती है. 
ऐसे लालों से तो वो निपूती ही होती.
दूसरे के लालों को अपना कह कर 
मुस्कराते चेहरे को देख
चैन से सोती तो होती. 
    लाखों शहीद  देख कर 
  अपने बलिदान की दुर्दशा 
सोचा न था कि उनकी क़ुरबानी को
तुम इस तरह से भुनाओगे. 
देश को ही तुम बेच कर खा जाओगे.