गुरुवार, 13 अगस्त 2015

बेटियों का दंश (३) !

                  लिखते लिखते कितनी यादें छूट जाती हैं लेकिन उनका तारतम्य तो कहीं न कहीं बिठाना पड़ता है।  जब मेरी छोटी बेटी हुई तो लगा लोगों पर पहाड़ टूट पड़ा।  मेरे घर में तो नहीं हुआ ऐसा। वह ६ महीने की ही थी कि मुझे आई आई टी में जॉब मिल गयी। उस समय जॉब मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। संयुक्त परिवार में बेटी को सासु माँ देख लेती   थीं और मेरी बेटी बहुत ही सीधी थी ( अब नहीं है , कहती है मुझे पता है कि आप मुझे छोड़ कर ऑफिस चली जाती थीं और मैं रोती रह जाती थी। ) आठ घंटे ऑफिस में और आने जाने का समय कुल मिलकर ९ घंटे तो बच्ची को छोड़ना ही पड़ता था।
                  एक बार हमारे एक रिश्तेदार का घर पर आना हुआ , मैं ऑफिस में थी , वह मेरे आने तक रुके रहे।  मेरे आते ही सवाल किया 'ये जागती कब है ? तुम ऑफिस जाती हो तो परेशान तो करती ही होगी ?'
मैंने कहा - 'नहीं ये बिलकुल भी नहीं रोती है , दादी और ताई जी के साथ मस्त रहती है । '
         इस पर बोले - ' हाँ हाँ उसको पता है न कि अभी चैन से रहने दें , फिर तो रुलाना ही है।  दहेज़ जुटाते जुटाते बुढ़ापा आ जाएगा। '
                     ये तंज हमें अन्दर तक चीर गया।  इसलिए नहीं कि हमारे चार चार बेटियां थी बल्कि इस लिए की बेटियां भी अपना अपना भाग्य लेकर आती हैं। कल का क्या भरोसा ? विधाता जो रचता है कुछ सोच कर ही रचता है। हमारी बेटियां हमारी नहीं बल्कि दूसरे के लिए सिर दर्द बनती जा रही थीं।
                   इसके बाद जिठानी की तीसरी बेटी का जन्म हुआ था।  कोई कल्पना  नहीं कर सकता है कि हमारे घर में कितनी रौनक थी। इसी बीच हमने अपना रहने काबिल मकान बनवा लिया।  नया नया इलाका था आने जाने की कोई सुविधा नहीं थी।  बड़ी तीन बेटियां पढ़ने जाती थीं और छोटी दोनों घर गुलजार किए  रहती थीं।
                               हमारे लिए हमारी बेटियां ही हमारा सपना थी और उनके बीच की ट्यूनिंग देखते बनती थी।  मुझे समय बिलकुल नहीं मिलता था।  सुबह सबका नाश्ता और बच्चों के लंच के साथ अपना टिफिन बना कर ऑफिस भागो और शाम को खाने बनाने की ड्यूटी मेरी होती थी सो लौट कर उसमें लग जाओ , दिन में तो घर में खाने के लिए कोई नहीं होता सिर्फ घर में रहने वाले लोग लेकिन शाम पूरे ११ लोग होते थे । 
           बेटियों की पढाई में  क्या हो रहा है ? उनके यूनिट टेस्ट कब होने हैं ? होम वर्क क्या मिला ? वह पूरा हो पता है या नहीं ? इन सबके लिए बिलकुल भी समय नहीं रहता था।  सब एक दूसरे को देख लेती थीं बड़ी दोनों छोटी बहनों के होम वर्क या प्रॉब्लम सॉल्व कर लेती थी।  हाँ हिंदी की कोई प्रॉब्लम हो तो जेठानी जी से पढ़ लेती और इंग्लिश हो तो मैं रात में खाना बनाती जाती और वे अपनी प्रॉब्लम लेकर किचेन के दरवाजे पर खड़े होकर बोलती जाती और मैं सॉल्व करती जाती।
                          उस समय लाइट की समस्या बहुत ज्यादा थी तो तीनों एक लैंप बीच में रख कर पढाई कर लेती थी। जैसे उनका जूनून सिर्फ अपने लक्ष्य को पाना था।  कभी कोई फरमाइश नहीं की। एक एक करके सबने हाई स्कूल से  ग्रेजुएशन तक अच्छे नंबरों से पास किया।
                    अपने अपने कम्पटीशन में लग गयी।  बड़ी दोनों को एम सी ए करना था सो उनको गोरखपुर का सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज मिल गया।  एक मध्यम वर्गीय परिवार में जेठजी हमारे रक्षा मंत्रालय की फैक्ट्री में क्लर्क थे और पतिदेव उस समय दवा कंपनी में मैनेजर। लेकिन संयुक्त परिवार की गरिमा में कशमकश हुई भी तो संयुक्त परिवार की छाया में  मिलकर झेल लिया, लेकिन बच्चों के सपनों को पंख मिल गए थे।
                    मेरी बड़ी बेटी मेडिकल की तैयारी  कर रही थी लेकिन जब उसको वहां सफलता न मिली तो  बीपीटी ( बेचलर ऑफ़ फिजियोथेरेपी ) में दिल्ली में IPH जो सरकारी संस्थान ही है प्रवेश मिला।बेटी को बाहर भेजते समय क्या दर्द होता है ? ये बहुत  शिद्दत से जाना , मैं उसके घर से जाते समय नहीं रोती  थी, लेकिन बाद में खूब रोती  थी।  घर और ऑफिस के बीच में बँटी  हुई जिंदगी सब कुछ सिखा देती है। 
                     अब तक बड़ी वाली अपना एमसीए पूरा करके वापस आ गयी थी। उसको प्रोजेक्ट करने के लिए अपने ही प्रोजेक्ट में ही एक टॉपिक दिलवा दिया।   वहां  से निकल कर उसे सत्यम कंपनी जॉब मिल गयी और कुछ रिश्तेदारों को ख़ुशी हुई किसी ने हमारे प्रयासों को सराहा और किसी ने भविष्य में आने वाली विवाह की समस्याओं से आगाह करना शुरू किया।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (14.08.2015) को "आज भी हमें याद है वो"(चर्चा अंक-2067) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. तीनों कड़ियाँ एक साथ पढ़ीं ....बेटियाँ और बहनें होना एक वरदान है ...उनका आपसी प्यार सारी मुश्किलें हर लेती है.
    समाज का क्या ,वे लोग तो बस दोष निकालना ,नीचा दिखाना चाहते हैं

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  3. बहुत सुन्दर और रोचक संस्मरण काफी कुछ सीख देता हुआ , हम भारतीयों की मानसिकता ही ऐसी है की जानबूझकर दूसरों को अहसास करतें हैं उनकी समस्या के बारे में जो समस्या ही नहीं होती है।

    बैसे मैं ये भी बताना चाहूंगा की भगबान ने मुझे भी दो प्यारी बेटियां दी हैं।

    सुन्दर आलेख के लिए बधाई

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  4. हमारे लिए हमारी बेटियां ही हमारा सपना हैं1 मेरा भी 1 मेरी प्रेरन भी वही हैं आच्छा आलेख 1

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ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जो मन में होता है आपसे उजागर कर देते हैं. आपकी राय , आलोचना और समालोचना मेरा मार्गदर्शन और त्रुटियों को सुधारने का सबसे बड़ा रास्ताहै.