गुरुवार, 6 अगस्त 2015

बेटियों का दंश (२)

                  लोगों के इस व्यवहार से लगा मानो हमने कोई गुनाह किया है। अरे हमारी तो पहली संतान थी और लोग क्यों मातम मना रहे थे? कुछ दिनों बाद सब शान्ति रही।  अब जिठानी जी को नसीहतें मिलनी शुरू हो गयीं।
--अरे तीन बेटियां हो गयीं घर में ,अब एक बेटा घर में होना ही चाहिए।
--अरे अब तीन तीन बहनों में एक तो राखी बाँधने वाला चाहिए।
--बाबूजी के तो दो बेटे हैं इनमें तो एक लड़का तो होना ही चाहिए वर्ना आगे नाम कैसे चलेगा ?
--अभी बाबा दादी के सामने एक लड़का हो जाए तो उनको भी शांति मिले।
--कल जब इन लड़कियों की शादी के लिए जाओगे तो सब ये पूछेंगे कि लड़कियों के भाई भी नहीं है , तब क्या कहेंगे ?
--एक लड़का होता है तो दामादों में कोई झगड़ों की बात नहीं होती , इस तरह से आपके दामादों के बीच ही विवाद खड़ा होगा। 
                 बेटियां हमारी अभी छोटी छोटी थीं लेकिन सोचने वालों और सलाहकारों का दिमाग कहाँ से कहाँ तक सोच चुका था ?                 यही सब नसीहतें और रोज रोज का सुनना साथ ही जिठानी जी का गाँव से जुड़ा होना। सबने मिल कर उनको हिम्मत दी और उन्होंने फिर चांस लिया। किन्ही कारणों से उनको उसी दौरान पीलिया हो गया। उनके घुटने में दर्द रहने लगा। लोगों की राय के अनुसार कभी कभी बच्चा गुनाह होता है तो ऐसी परेशानियां हो जाती हैं जो बच्चे के होने के बाद ठीक हो जाएगी. उनकी पूरा पूरा चेकअप हुआ। आखिर उनको वही हुआ जिसका इन्तजार था। घर में बेटे ने जन्म लिया। खूब खुशियां मनाई गयीं। लेकिन दो दिन बाद ही पता चला कि बच्चे को पीलिया है। तीन चार दिन तक उसको पूरे चिकित्सीय संरक्षण में रखने के बाद भी डॉक्टर बचा नहीं सके। कष्ट तो बहुत हुआ लेकिन भवितव्यता से किसी से कोई जोर नहीं होता। उसके बाद पता चला कि जिठानी जी बोन टी बी से ग्रस्त थीं और उनका टी बी का इलाज शुरू हुआ।
              कैम्पस की सभी महिलायें मुझसे बड़ी ही थीं।गाहे बगाहे उनकी जमाकड़ी लग ही जाती। इस बीच बी एड और एम एड करने की योजना बना डाली। किसी के टोकने या कुछ कहने पर एक फुल स्टॉप सा लग गया। मैंने कुछ साल शांति पूर्वक गुजारे । मैं जॉब करने लगी तो रिश्तेदार और दूसरे मोहल्ले वालों से साबका पड़ना कम हो गया। जब मेरी बड़ी बेटी 4 साल की हो गयी तो हमने भी सोचा कि दो बच्चे होने चाहिए लेकिन कोई भी दूसरी अवधारणा हमारे मन में नहीं रही। अब हमारे`परिवार में भी कोई इस तरह की बात नहीं करता था। सबसे छोटी बेटी जो होती वो बाबा के लिए सबसे दुलारी रहती वो उसके साथ सारे दिन व्यस्त रहते। मेरे ऊपर कोई मानसिक दबाव भी नहीं था क्योंकि भावी बच्चे के बारे में सब यही कहते कि  जो भी हो दोनों स्वस्थ रहें।
                खैर लोग कुछ भी कहें बच्चे बड़े भोले होते हैं। जब मेरी दूसरी बेटी हुई तो उस नर्सिंग होम की डॉक्टर जिनके बच्चे नहीं थे ,वह हमारी रिश्तेदार भी थी। उन्होंने कहा कि आपके पास एक बेटी है इसे आप हमें दे दीजिये। यह बात इन्होने घर में बतलाई और घर से तीनों बड़ी बेटियां नर्सिंग होम इनके साथ देखने के लिए गयीं और फिर वहां से वापस नहीं आई क्योंकि उन्हें डर था कि डॉक्टर उनकी बहन को ले लेंगी और दो दिन वे वहीं रुकी रहीं। जब मैं वहां से घर आई तो मेरे साथ ही घर आयीं। 
                                   कई साल बाद फिर जेठानी जी के मन में एक बेटे की चाह जागी और उन्होंने एक बार फिर चांस लिया लेकिन इस बार भी बेटी हुई। शायद वह पूरी तरह से आश्वस्त थी कि अब की बार बेटा ही होगा। लेकिन जब फिर बेटी हुई तो वह सुनकर बेहोश हो गयीं। जब होश में आयीं तो बेटी को देखने से इंकार कर दिया। एक दिन जब उनको समझाया गया तो समझ आया। घर में तो हमें फिर छोटा सा खिलौना मिल गया। सबसे यादगार चीज ये है कि वो मेरे से कुछ ज्यादा जुडी और अपनी मम्मी को मम्मी और मुझे अम्मा कहती (जबकि उसकी दोनों बड़ी बहनें चाची ही कहती थी )फिर उसने अपने मन से अन्नू कहना शुरू कर दिया वह आज भी मुझे अन्नू ही कहती है। 
                              हमारी पांचवी बेटी शायद रिश्तेदारों के लिए कोई मोल नहीं रखती थी। शुरू के संस्कारों में कुछ जरूरी रस्में होती हैं और उसमें उसके ननिहाल वालों ने कुछ भी नहीं किया। अगर लड़का होता तो शायद वो बहुत कुछ करते। उनके व्यवहार से कोई आहत हुआ हो या न हुआ हो मेरा मन बहुत आहत हुआ था। 
                             मेरी पाँचों बेटियां आपस में बहुत जुडी थीं। संयुक्त परिवार में रहने के कारण भी। कोई भी उनकी आपस की समस्या हम लोगों तक तब आती थी जब उनके वश से बाहर की बात होती। वे एक दूसरे के होमवर्क से लेकर सारे काम आपस में कर डालती। बहुत अच्छी ट्यूनिंग थी उनके बीच। उनकी पढाई अपनी अपनी उम्र के साथ सही चल रही थी। उनके अपने सपनों के अनुकूल करियर बनाने के लिए प्रयास चल रहे थे। 
जेठ जी की बड़ी दोनों बेटियां कंप्यूटर के क्षेत्र में जाना चाहती थीं और उन दोनों ने एमसीए करने की तैयारी शुरू की। बड़ी दोनों की पढाई एक साथ चल रही थी। एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए थोड़ा कठिन था लेकिन संयुक्त परिवार में कुछ कशमकश तो हुई लेकिन बड़ी बेटी को गोरखपुर में सरकारी इंस्टिट्यूट मिला और पहली अपने सपने को पूरा करने में लग गयी। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (07.08.2015) को "बेटी है समाज की धरोहर"(चर्चा अंक-2060) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. आपकी ये कहानी कई भारतीय परिवारों की कहानी है ... पता नही कब बदलेंगी सोच बेटियों के प्रति ...

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ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जो मन में होता है आपसे उजागर कर देते हैं. आपकी राय , आलोचना और समालोचना मेरा मार्गदर्शन और त्रुटियों को सुधारने का सबसे बड़ा रास्ताहै.