गुरुवार, 25 अगस्त 2016

यादों के झरोखे से ःः जन्माष्टमी !

   जीवन के तमाम पर्वों में एक जन्माष्टमी सबसे ज्यादा उत्साह से मनाते थे । इसका कारण यह था कि इसकी झाँकी सजाने का सारा दारोमदार बच्चों पर ही होता था । हर घर में तब झाँकी सजाई जाती थी . थोड़ी तैयारी करके सहेली के घर जाकर देख आते और नये आइडिया लेकर आ जाते ।
       रक्षा बंधन में जो पैसे मिलते थे , उनसे छोटे छोटे खिलौने जैसे बस , हवाई जहाज खरीद लाते थे । माँ से सजाने के लिए साड़ियाँ ली जाती और फिर दरबार बनता । गिट्टियाँ इकट्ठा करके पहाड़ बनाये जाते और उन पर डालियाँ लगा कर पेड़ बनाते और छोटे छोटे चमकीले लट्टू लगाते । बालू रंग कर सड़कें बना कर बस रखी जाती थी । परात में पानी भर कर उसमें वसुदेव सिर पर टोकरी में कृष्ण को लिए होते । चोकर रंग कर रंगोली बनायी जाती , तब आज की तरह कलात्मक रंगोली नहीं बना पाते थे । परम्परागत चौक को ही सजाया जाता था ।
          सब भाई बहन अपने अपने आइडिया देते और हैड होते थे भाई साहब । यही एक त्योहार होता था जिसमें हमारी मर्जी चलती थी । तैयार होने पर पड़ोसियों की झाँकी से तुलना होती थी । हम आज के बच्चों की तरह पढ़ाई के बोझ तले न दबे थे । हर पर्व का पूरा मजा उठाते थे ।
       आज हम अकेले ही सारी तैयारी करते हैं , प्रसाद से लेकर मंदिर सजाने तक और व्रत भी होते हैं । अब सिर्फ परम्परा भर रह गयी है क्योंकि पर्व तो बच्चों से होता है । आज मैं ही नहीं बल्कि बच्चों के घर से निकलते ही सबकी यही कहानी रह जाती है । चलो चलें पूजा के लिए समय हो रहा है ।


4 टिप्‍पणियां:

  1. हां दीदी. कोई भी त्यौहार हो, बच्चों के बिना अधूरा ही रह जाता है.

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  2. हार्दिक शुभकामनाएं .... सारे रंग उन्हीं से हैं

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  3. मन को छूती बात कही है वाकई बच्चों के बिना त्यौहार सूने लगते हैं
    अब केवल ओपचारिकता रह गयी है
    सादर

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