सोमवार, 7 मार्च 2011

महिला दिवस (8 March)



महिला दिवस सिर्फ एक वो दिन है जब की अखबारों में समाजसेवी संस्थाएं और हमारे ब्लॉग जगत में नए नए लेख सजे होते हैं और वास्तव में आम महिला किस स्थिति में है? इसको देखने की किसी को फुरसत नहीं हैं. हमें अच्छा लगता है जब कोई महिला एक नया इतिहास लिखती है. कोई कल्पना चावला , कोई किरण बेदी , कोई सानिया मिर्जा या फिर साइना नेहवाल का नाम लेते हैं. हम गर्व से सर उठा कर बोलते हैं कि
हमें कम न आँकों . हम कम आंकने काबिल भी नहीं है, लेकिन अगर हमें वह मंच मिले, वह माहौल मिले तो आसमान के तारे में तोड़ कर ला सकती हैं. हम असली वास्तविकता से आँखें मूँद कर बैठे रहते हैं. ये चंद उदाहरण सम्पूर्ण आधी आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं. उसकी तस्वीर देखें तो समझ आता है की आज भी वह भेदभाव की शिकार है.
सामाजिक विकास का उद्देश्य सामाजिक न्याय , सद्भाव, समानता और एकजुटता से ही संभव है. अगर विश्व की बात छोड़ कर हम सिर्फ अपने ही देश की बात करें तो आधी आबादी का बड़ा हिस्सा कुपोषण , लैंगिक और सामाजिक भेदभाव, गरीबी और अशिक्षा के दुष्चक्र में फंसा हुआ है. भारतीय समाज में भेद का एक प्रमुख कारण लैंगिक है, विश्व आर्थिक मंच द्वारा नवम्बर २००८ में जारी की गयी रिपोर्ट 'ग्लोबल जेंडर गैप' में भारत का स्थान १३० देशों की सूची में ११३ वें स्थान पर है. गाँवों और शहरों दोनों ही स्थानों में महिलायें दोयम दर्जे पर हैं. एसोचैम की रिपोर्ट बतलाती है की भारतीय महिलायें घर और ऑफिस दोनों जगह भेदभाव का शिकार हैं, न उन्हें काम के बेहतर अवसर मिलते हैं और न ही पदोन्नति के समान अवसर.
जीवन की सबसे पहली आवश्यकता पौष्टिक भोजन है क्योंकि वह आने वाली पीढ़ी के जन्मदात्री होती है और अधिकतर वह परिवार के खाने के बाद जो भी बचता है उसे खाकर सोने में ही ख़ुशी अनुभव करती है. जब की शारीरिक श्रम और अन्य कार्यो में सर्वाधिक परिश्रम वही करती हैं जिससे वह कुपोषण और बीमारी का शिकार हो जाती हैं. इसका निदान खोजना होगा .
शिक्षा की बात करें तो अभी भी ये हालात है कि देश में एक बड़ा प्रतिशत ऐसे लड़कियों का भी है जिन्होंने कभी स्कूल का मुँह ही नहीं देखा है. सरकारी योजनाओं का आधार कुछ भी नहीं होता है. सिर्फ दस्तावेजों में जारी कर दिया उसके फायदे को कितनी लड़कियाँ उठा रही हैं या फिर ठेकेदार कागजों पर चला रहे हैं. इसको देखने वाला कोई भी नहीं होता है.
काम के घंटों की तरफ देखें तो जो घर में रहती हैं वे तो करीब १८-२० घंटे तक काम करती हैं और जो घर में नहीं रहती हैं काम पर जाती हैं वे भी इतने ही घंटे काम करती हैं. वे घर और बाहर दोनों को जब एक साथ सभालती हैं तो उनकी नजर सिर्फ घड़ी की सुइयों पर ही होती है. ऑफिस को देर न हो जाये , वहाँ देर हुई तो अधिकारी की टेढ़ी नजरें, शाम घर में देर हुई तो घर वालों के सवाल. अगर अकेली है तो फिर उसको बच्चों की चिंता खाए जाती है.
महिला सशक्तिकरण तभी सम्पूर्ण हो सकता है, जब महिलाएं रोजगार असुरक्षा , अपर्याप्त भोजन, पारिवारिक चिंताओं और सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से अपने को निश्चिन्त अनुभव कर सकें. अपनी बच्चियों को सुरक्षित महसूस कर सकें. जो आये दिन होने वाली घटनायों से स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है कि वह कितनी सशक्त बन कर उभर रही है?
अगर हम महिला राज्य प्रमुख वाले राज्य की गणना करें तो पाते हैं कि १६ करोड़ के लगभग आबादी वाले उ. प्र. में महिलाओं की संख्या ७.८७ करोड़ है, वर्ष २००१ की जनगणना के अनुसार प्रदेश की कुल जनसंख्या में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या ९० लाख कम है. वर्तमान समय में विविध प्रशासनिक क्षेत्रों में भी महिलायें आधी आबादी के अनुपात में न के बराबर हैं. प्रदेश के ७० जिलों में महिला जिलाधिकारी मात्र ८ हैं. प्रदेश के १७ मंडलों में एक भी महिला मंडलायुक्त नहीं है. उ. प्र. के किसी भी विश्वविद्यालय में न महिला रजिस्ट्रार है, न ही प्राक्टर. प्रदेश के किसी भी विश्वविद्यालय में महिला कुलपति नहीं है. *
अब महिला सशक्तिकरण के लिए अभी क्या और बाकी है? इस पर विचार करना और उसको अमल में लाने के लिए आवाज उठाना ही महिला दिवस की प्राथमिकता होनी चाहिए. जो हासिल है उसको सम्पूर्ण रूप से न देख कर उसे सम्पूर्ण रूप से देखा जाय जो अभी तक मिला ही नहीं है. अपने दायित्वों से वह कभी विमुख नहीं है लेकिन उसके मूल अधिकारों के प्रति तो जागरूक होना है. वह महिला जो आज भी रात में ३ बजे उठकर रोटी बनकर बच्चों को रख कर और खुद सूखी रोटी बाँध कर आलू के खेतों में काम करने ८ किमी पैदल चल कर आती है और वह भी
सुबह आठ बजे खेतों तक आ जाती है. दोपहर में सिर्फ नामक रोटी खाकर फिर आलू खोदने लगती है , शाम ६ बजे छूट कर फिर २ धनते में पैदल चलकर घर पहुँचती है और फिर रात का खाना बनाकर सोती है. वह क्या खाती है? कैसे जीती है? इस दर्द को अपनी आँखों से देख कर ही जाना है. उनके बीच बैठ कर भुने आलू नामक और रोटी खाकर भी देखा है. कहाँ की पौष्टिकता और कहाँ का आराम? ये उसके भाग्य में नहीं है. काम के घंटे भी नहीं है. फिर सशक्तिकरण किसके लिए? कैसा महिला दिवस?
ये काम वहाँ से शुरू करें जहाँ से हमारी जड़ें निकली हैं. अगर हम जड़ों तक नहीं पहुंचे हैं तो हम उस भोगे हुए यथार्थ को नहीं समझ सकते हैं. उसकी बात नहीं कर सकते हैं. इस दिन की सार्थकता तभी है जब इसको हम गाँव में मना कर बता सकें की ये दिन उनका है और क्यों है किसलिए है? इसको भी बताना होगा. सिर्फ लेखों और किताबों से समाज नहीं बदलता है.

5 टिप्‍पणियां:

  1. अधिकतर वह परिवार के खाने के बाद जो भी बचता है उसे खाकर सोने में ही ख़ुशी अनुभव करती है.बाप रे???परिवार वालो को चाहिये कि सब इकट्टे बेठ कर खाना खाये,ओर वेसे भी नारी को नोकरी करने कि जरुरत ही क्या हे? जब पति कमा रहा हे?आज दोनो कमाने जाते हे ओर घर मे शांति नही रहती वजह यही हे, जिन घरो मे सिर्फ़ पति कमाता हे, बीबी घर समभालती हे, उन के पास धन चाहे कम हो, लेकिन चेहरे पर पुरे परिवार के खुशी चमकती हे, ओर परिवार मे प्यार भी खुब होता हे, सब मिल कर खाना भी खाते हे... अब या तो बांसुरी बजा लो या चने चबा लो... अगर दोनो काम कोई इकट्टॆ करेगा तो ना ही चने चबाने का स्वाद आयेगा ओर ना ही बांसुरी का सुर मिलेगा

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  2. राज जी,
    ये आधे पेट सोने वाली महिलाएं कामकाजी नहीं होती बल्कि घर में रहने वाली होती हैं. अपने सीमित साधनों से पहले तो अपने पति और बच्चों को खिलाती हैं बाद में खुद खाती हैं. अभी साथ साथ खाने का कार्य बहुत से परिवारों में नहीं होता है. एक के कमाने में अधिक सुख है लेकिन कुछ वर्ग ऐसा भी है कि एक कि कमाई से पेट भी नहीं भर पाते हैं. जिनमें घरों में काम करने वाली महिलाएं (घरेलु बाईयां) बहुतायत में होती हैं.

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  3. अभी बहुत चलना है साथी, अभी बहुत चलना है।

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  4. आप को सपरिवार होली की हार्दिक शुभ कामनाएं.

    सादर

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  5. bahut sundar likha hai aapne, badhai....

    nari divas par maine bhi likha hai, aap www.jan-pahal.blogspot.com par dekh sakti hai.....

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ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जो मन में होता है आपसे उजागर कर देते हैं. आपकी राय , आलोचना और समालोचना मेरा मार्गदर्शन और त्रुटियों को सुधारने का सबसे बड़ा रास्ताहै.