गुरुवार, 14 जुलाई 2011

गर्मियों की छुट्टिय और अपना बचपन (२२)




घर , परिवार और सामाजिक दायित्वों के बोझ तले दब कर कलम भी रुक गयी और फिर हमारी ये संस्मरणों कि यात्रा भी पड़ाव के लिए मजबूर हो गयी. ये तो सब चलता ही रहता है तो फिर डेरे उठाये और आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं . इस बार प्रस्तुत कर रहे हैं पवन मिश्रा के संस्मरणोंको.





पवन मिश्रा





दीदी मेरी गर्मियों की छूट्टियाँ जानना चाहेंगी तो भद्दर गाँव के एक लड़के की गर्मियों की छुट्टियों के बारे में ही जानने को मिलेगा फिर भी मै कुछ ब्यौरा दे रहा हूँ

"अप्रैल के अंतिम सप्ताह में स्कूल में ग्रीष्मावकाश हो जाता था. यह हम बच्चों का सुखद और मस्ती भरा समय होता था. ना होमवर्क ना मास्टरजी की छडी ना स्कूल जाने का झंझट. लेकिन घर में खूब सारे काम होते थे. खेतो में गेहू की मड़ाई से सम्बंधित काम ख़तम होने के बाद ही हमारी असली छुट्टी होती थी. मड़ाई के बाद अनाज का भंडारण भूसे का प्रबंध जायद फसल से सम्बंधित काम मेरे बड़े भाइयों के हिस्से में आता. मै घर का सबसे छोटा सदस्य था मुझे मेरा पसंदीदा काम घर के गोरू बछेरू चराने को मिलता. गर्मियों में मेरे फुफेरे भाई हमारे यहाँ आ जाते. गाँव में सभी लोग जानवर चराने जाते. जानवरों का बटवारा होता था मै अपने हिस्से में भैसों को चराने का जिम्मा ले लेता था क्योंकि भैंसे शांत भाव से चरती और तालाब में मजे से डूबती उतराती. गायों के साथ ऐसी बात ना थी गाये पानी से तो बिदकती ही थी दौडाती बहुत ज्यादा थी. हम आराम से चरवाहों के साथ चोरपत्ती का खेल खेलते और हमारे भाई लोग गायों के पीछे पीछे दौड़ते रहते. चोर पत्ती के खेल से एक मजेदार वाकया याद आया. मुझे याद है हम पेड़ों पर बंदरो की तरह चढ़ जाते इस डाल से उस डाल पर कूद फांद करते रहते. कभी जामुन के पेड़ पर कभी आम के पेड़ पर. हमारे यहाँ साझे का बाग़ हुआ करता था अब तो खैर बिक गया है वहाँ आम खाने सुबह सुबह हम लोग पहुच जाते. एक दिन हमने देखा कि सारे पके आम पेड़ से गायब हैं. इसका मतलब था कि कोई पहले से आकर आमो को झूर ले गया था. रात में तो एक आदमी आमो की रखवाली करने के लिए बाग़ में सोता है फिर आम कौन ले गया हमने रखवाले से पूछा तो बोला बिटवा आम सब चिरई चिरोमन ले के चले जाते है. दो तीन दिन हम लोगो को महज शाम को आम मिल पाते थे. हम भाईयों ने हकीकत का पता लगाने की सोची. हम चार पांच लोग थे. सुबह तडके लगभग ३ से ४ बजे का समय होगा बाग़ में चुपचाप आये और देखा रखवाला पेड़ों के नीचे टपके आम बीन रहा था. आम बीनने के बाद वह खेत में पड़े भूसे के ढेर के पास गया और वहा उसने आम छुपा दिए. इसके बाद फिर आया और पेड़ों पर चढ़कर डालियों को जोर जोर हिलाता और पके आम फिर टपक जाते. हम लोगो ने आम बीनने शुरू कर दिए आम बीन कर एक झोले में इकठ्ठा कर लिया जब उसने नीचे देखा तो आम गायब और बच्चे दिखे वह जल्दी नीचे उतरने लगा तो जिसके पास झोला था वह भागा रखवाले ने उसका पीछा किया इधर हमारे भाई ने भूसे का आम निकाल कर झोले में भरा मैंने उसकी खटिया को पास के तालाब में फेंक दिया. रखवाला थोड़ी दूर तक पीछा किया फिर वापस आया तो ना खटिया थी ना आम. सुबह वह बाबूजी के पास चोरी की रपट लिखाने आया पर हमने सारी बाते पहले बता दी थी उसका तबादला बाग़ से खेतो में हो गया जहा उसे हल चलाने का काम मिला. गर्मियों में दोपहर को चाचाजी के यहाँ ताश की महफ़िल सजती. मजा आ जाता. शाम को गुल्ली डंडा या आईस पाईस या बगल में बच्चा लाल पहलवान के यहाँ कुश्ती लड़ने चला जाता. हमारे मझले भईया कामिक्स ले के आते थे हम मजे से पढ़ते थे. ना कोई चिंता कैरियर या समर असाईनमेंट की ना कोई फिकर रिजल्ट की. मालूम था कि पास हो ही जायेगे.मजे की बात तो यह है कि बाबूजी ने कभी भी पूछा नहीं कि तुम्हारा रिजल्ट कैसा आयेगा. रिजल्ट आता रहा पास होते रहे एक दिन टी वी में मेरे गाँव वालों ने देखा कि रिंकू (गाँव में लोग मुझे इसी नाम से जानते है) को सोने का पदक पहनाया जा रहा है. पूरे गाँव में मिठाई बंटी.

4 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया रहा...रिंकू को टीवी पर देख गांव वालों की खुशी की कल्पना की जा सकती है....

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  2. वाह रिंकू वाह . अब कोई नहीं कहेगा "काली अक्षर भैंस बराबर " मस्त रहा .

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