मंगलवार, 18 जून 2013

गंगा दशहरा : कैसी गंगा ?

                                 


                       गंगा दशहरा का हमारे पौराणिक साहित्य में और हमारे धार्मिक भावनाओं से जुडा महत्व यह है कि गंगा जी का अवतरण ज्येष्ठ माह की दशमी और हस्त नक्षत्र में पृथ्वी पर हुआ था और इस बार वही संयोग पुन बना हुआ है यानि इस बार दशमी के साथ हस्त नक्षत्र भी इसी दिन पड  रहा है और इससे इसका महत्व बढ़ गया है . इस पर्व का महत्व गंगा किनारे बसे शहरों में अधिक माना जाता है . इस दिन लाखों श्रद्धालु गंगा में दुबकी लगाते  हैं और अपने पापों से मुक्ति पाते  हैं . 
                               लेकिन इस पावन  नदी में डुबकी  लगाने वाले ये भी करते हैं कि  वे गंगा की पूजा करके फूलों को अर्पित करने के बाद पॉलिथीन वगैरह उसी में प्रवाहित कर देते हैं . उसके किनारे बने मंदिरों में पूजा सामग्री इकट्ठी होती है तो उसे भी इसी में डाल  दिया जाता है . गंगा कितनी मैली हो चुकी हैं इसके बारे में कोई ऐसे ही जान सकते हैं कि  गंगा की धारा  निर्मल तो अब कहीं भी नहीं रही . बल्कि अब तो विषैली भी हो चुकी है . 
इसके लिए आई आई टी कानपूर द्वारा की गयी जांच से पता  चला है कि कानपूर में गंगा जल में प्रदूषण और जहरीले तत्वों की मात्रा कई गुना ज्यादा हो चुकी है . इस जांच को केंद्र सरकार के द्वारा आई आई टी को सौंपा गया था . गंगा के प्रदूषण को जांचने के लिए आई आई टी बीच बीच में उसका परीक्षण करती रहती है . एक परिक्षण जो पिछले वर्ष फरवरी में लिए गए नमूने के आधार पर किया गया था और उसके अनुसार गंगा के एक लीटर पानी में मानक के अनुसार क्रोमियम की मात्रा 2 मिलीग्राम होनी चाहिए और वर्तमान में यह 148 मिलीग्राम पायी गयी है . 
                     इस परीक्षण के लिए नमूना आई आई टी के द्वारा जल निगम के ट्रीटमेंट प्लांट जाने के पहले और ट्रीट होने के बाद निकले जल को लिया गया . सरकारी प्रयासों के बाद भी गंगा में कानपूर की टेनरियों का प्रदूषित पानी बराबर जा रहा है . जिस पानी से हम आचमन , स्नान और अन्य धार्मिक क्रियाएं करते हैं उसमें गंगा के कितने प्रतिशत गंगा जल को पाते  हैं इस विषय में हमें खुद भी पता नहीं है .  हम में से सभी कभी न कभी इस जल का किसी न किसी रूप में प्रयोग लाते हैं . इसको निर्मल रखने के लिए कल गंगा  की पूर्व संध्या पर संकल्प लिया गया . हम संकल्प में सहयोग इस तरह से दे सकते हैं कि  हम अगर टेनरी मालिक हैं तो अपने निस्तारित पानी को मानकों के अनुसार ट्रीट करके बाहर  निकालें या फिर किसी और तरीके से उसको गंगा में जाने से रोकें . अगर आम शहरी हैं तो पूजा सामग्री को उसको 
प्रवाहित करने के स्थान पर भूमिगत करें तो अधिक उत्तम रहेगा .  गंगा के महत्व को सभी जानते हैं तो फिर उसकी महत्ता का बनाये रखने के लिए सहयोग करें . 

शनिवार, 15 जून 2013

विश्व वयोवृद्ध दुर्व्यवहार विरोध दिवस !

                            हमारे देश  में तो संयुक्त  परिवार की अवधारणा  के कारण आज जो वृद्धावस्था में है अपने   परिवार में उन लोगों ने अपने बुजुर्गों  बहुत इज्जत दी होगी और उनके सामने तो घर की पूरी की पूरी  कमान बुजुर्गों के हाथ में ही रहती थी . मैंने  देखा है अपने घर में दादी से पूछ कर सारे काम होते थे . खेती से मिले नकद राशि  उनके पास ही रहती थी . लेकिन  उनके सम्मान से पैसे के होने न होने का  कोई सम्बन्ध नहीं था . 

 १. वृद्ध माँ  आँखों से भी कम दिखलाई  देता है , अपने पेट में एक बड़े फोड़े होने के कारण एक नीम हकीम डॉक्टर के पास जाकर उसको  ऑपरेट  करवाती है . उस समय  पास कोई अपना नहीं होता बल्किपड़ोस   में रहने वाली  होती है . वह ही उसको अपने घर दो घंटे   लिटा कर रखती है और फिर अपने बेटे के साथ हाथ  कर घर तक छोड़ देती है . *
२.  74 वर्षीय माँ घर में झाडू पौंछा करती है क्योंकि बहू के पैरों में दर्द रहता है तो वो नहीं कर सकती है . उस घर में उनका बेटा , पोता  और पोती 3 सदस्य कमाने वाले हैं   किसी को भी उस महिला के काम करने पर कोई ऐतराज नहीं है . एक मेट आराम से रखी जा सकती है लेकिन  ?????????? *
3. बूढ़े माँ - बाप को एकलौता बेटा अकेला छोड़ कर दूसरी जगह मकान लेकर रहने लगा क्योंकि पत्नी को उसके माता - पिता पसंद नहीं थे और फिर जायदाद वह सिर पर रख कर तो नहीं ले जायेंगे . मरने पर मिलेगा तो हमीं को फिर क्यों जीते जी अपना जीवन नर्क बनायें .*


                            आज हम पश्चिमी संस्कृति के  जिस रूप के पीछे  भाग रहे हैं उसमें हम वह नहीं अपना रहे हैं जो हमें अपनाना चाहिए  अपनी सुख और सुविधा के लिए अनुरूप  बातों को अपना रहे हैं . आज मैंने  में पढ़ा कि 24 शहरों  में वृद्ध दुर्व्यवहार के लिए मदुरै  सबसे ऊपर है और कानपुर दूसरे नंबर पर है . कानपूर में हर दूसरा बुजुर्ग अपने ही घर में अत्याचार का  शिकार हैं . एक गैर सरकारी संगठन  कराये गए सर्वे के अनुसार ये  परिणाम   हैं .
                 हर घर में बुजुर्ग हैं और कुछ लोग तो समाज के डर  से उन्हें घर से बेघर नहीं कर   हैं लेकिन कुछ  लोग ये भी  कर देते हैं . एक से अधिक संतान वाले बुजुर्गों के लिए अपना कोई घर नहीं होता है बल्कि कुछ दिन इधर  और कुछ दिन  उधर में जीवन गुजरता रहता है . उस पर भी अगर उनके पास अपनी पेंशन या  संपत्ति है तो बच्चे ये आकलन  करते रहते हैं कि  कहीं दूसरे को तो  ज्यादा नहीं दिया है और अगर ऐसा है तो  उनका जीना दूभर कर देते हैं . उनके प्रति अपशब्द , गालियाँ या कटाक्ष आम बात मानी जा सकती है . कहीं कहीं तो उनको मार पीट का शिकार भी होना पड़ता है . 
                      इसके कारणों को देखने की कोशिश की तो पाया कि  आर्थिक तौर पर बच्चों पर  निर्भर माता - पिता अधिक उत्पीडित होते हैं . इसका सीधा सा कारण  ये है कि उस समय के अनुसार आय बहुत अधिक नहीं होती थी और बच्चे 2 - 3 या फिर 3 से भी अधिक होते थे . अपनी  आय में अपने माता - पिता के साथ अपने बच्चों के भरण पोषण  में सब कुछ खर्च  देते थे . खुद के लिए कुछ भी नहीं रखते थे . घर में सुविधायों  की  ओर भी ध्यान  देने का समय और  उनके पास नहीं होता था . बच्चों की स्कूल यूनिफार्म के अतिरिक्त दो चार जोड़ कपडे ही हुआ करते थे . किसी तरह से खर्च पूरा करते थे ,  पत्नी के लिए जेवर  और कपडे बाद की बात होती थी . घर में कोई नौकर या मेट  नहीं हुआ करते थे सारे  काम गृहिणी ही देखती थी . सरकारी नौकरी भी थी तो  बहुत कम पेंशन  मिल रही है और वह भी बच्चों को सौप  पड़ती है . . कुछ बुजुर्ग रिटायर्ड होने के बाद पैसे मकान  बनवाने में लगा देते हैं  . बेटों में बराबर बराबर बाँट दिया . फिर  हाथ एक एक पैसे के लिए मुहताज होते हैं और जरूरत पर माँगने पर बेइज्जत किये जाते हैं . 
                      आज जब की आय बच्चों की कई कई गुना बढ़ गयी है ( भले ही इस जगह तक पहुँचाने के लिए पिता ने अपना कुछ भी अर्पित  किया हो ) और ये उनकी पत्नी की मेहरबानी मानी जाती है .
-- आप के पास था क्या ? सब कुछ  हमने जुटाया है . 
--अपने जिन्दगी भर सिर्फ  खाने और खिलाने में उडा  दिया .  
-- इतने बच्चे पैदा करने की जरूरत  क्या थी ? 
--हम अपने बच्चों की जरूरतें पूरी  करें या फिर आपको देखें .
-- इनको तो सिर्फ दिन भर खाने को चाहिए , कहाँ से आएगा इतना ?
--कुछ तो अपने बुढ़ापे के लिए सोचा होता , खाने , कपडे से लेकर दवा दारू तक का खर्च हम कहाँ से पूरा करें ? 
--बेटियां आ जायेंगी तो बीमार नहीं होती नहीं तो बीमार ही बनी रहती हैं .
-- पता नहीं कब तक हमारा खून पियेंगे  ये , शायद  हमें खा कर ही मरेंगे . 
                          अधिकतर घरों में अगर बेटियां हैं तो बहुओं को उनका आना जाना फूटी आँखों नहीं  सुहाता है . अपनी माँ - बाप  से मिलने आने के लिए भी उनको सोचना पड़ता है . 
                   बुजुर्गों का शिथिल  होता हुआ शरीर भी उनके लिए एक समस्या बन जाता है . अगर वे उनके चार काम करने में सहायक हों तो बहुत  अच्छा,  नहीं तो पड़े रोटियां  तोड़ना उनके लिए राम नाम की तरह होता है . जिसे बहू और बेटा  दुहराते रहते हैं . अब जीवन स्तर बढ़ने के साथ साथ जरूरतें इतनी बढ़ चुकी हैं कि उनके बेटे पूरा नहीं कर पा  रहे हैं . घर से बाहर  की सारी  खीज घर में अगर पत्नी पर तो उतर नहीं सकती है तो माँ -बाप मिलते हैं तो किसी न किसी  से वह कुंठा उन पर ही उतर जाती है . 
                     वे फिर भी चुपचाप सब कुछ सहते रहते हैं , अपने ऊपर हो रहे दुर्व्यवहार की बात किसी से कम ही  हैं क्योंकि कहते हैं - 'चाहे जो पैर उघाड़ो इज्जत तो अपनी ही जायेगी न .' फिर कहने से क्या  फायदा ? बल्कि कहने से अगर ये बात उनके पास तक पहुँच गयी तो स्थिति और बदतर हो जायेगी . हम चुपचाप सब सह लेते हैं . घर में शांति बनी रहे . ज्यादातर घरों में बहुओं की कहर अधिक होता है और फिर शाम को बेटे के घर आने पर कान भरने की दिनचर्या से माँ बाप के लिए और भी जीना दूभर कर देता है . पा नहीं क्यों बेटे को अपने दिमाग का इस्तेमाल करने की आदत क्यों ख़त्म हो चुकी है ? 
                       माता  पिता को बीमार होने  पर दिखाने  के लिए उनके पास छुट्टी नहीं होती है और वहीँ पत्नी के लिए छुट्टी भी ली जाती है और फिर खाना भी बाहर से ही खा कर  आते हैं . अगर घर में  वाले बनाना आता है तो बना कर खा ले नहीं तो भूखा पड़ा रहे  वह तो बीमार होती है . 
                     हमारी संवेदनाएं कहाँ  गयीं हैं या फिर बिलकुल मर चुकी हैं . कह नहीं सकती हूँ . लेकिन इतना तो है कि हमारी संस्कृति पूरी तरह से पश्चिमी संस्कृति हॉवी हो चुकी है . रिश्ते ढोए जा रहे हैं . वे भी रहना नहीं चाहते हैं लेकिन उनकी मजबूरी है कि  उनके लिए कोई ठिकाना नहीं है . 
                    * सारे  मामले मेरे अपने देखे हुए हैं . 

शुक्रवार, 14 जून 2013

विश्व रक्तदाता दिवस !

चित्र गूगल के साभार 
                              

                      हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण होते हैं रक्त सम्बन्ध और उनके लिए हम कुछ भी करने को तैयार होते हैं लेकिन अगर उन्हीं को रक्त देने का मौका आ जाय तो डर कर पीछे हट जाते हैं .  कुछ भ्रांतियों से शिकार हम अपने आप में इतना  नहीं जुटा पाते हैं .लेकिन जो रक्तदान करते हैं वे उन रिश्तों से अधिक गहरे रिश्ते बनाते हैं क्योंकि वे जीवनदाता होते हैं और वह भी बिना किसी स्वार्थ के . 

                                 आज का दिन (१४ जून ) विश्व रक्तदाता दिवस के रूप में मनाया जाता  है . वैसे तो कहते हैं कि  जीवन देने और लेने वाला इश्वर होता है लेकिन इस धरती पर भी भगवान रहते हैं जो जरूरत पर जीवन दान में सहायक होते हैं . वे भगवान  हम और आप ही हैं बस अपनी सोच और इस विषय में जानकारी को अच्छी तरह जान लेना ही काफी होता है .
                                 मुझे के घटना याद है , मैं अपने पति के सभी मित्रों से परिचित तो नहीं हूँ क्योंकि उनका दायरा  बहुत बड़ा है . हम लोग कहीं जा रहे थे तो हमारे  एक परिचित मिले और इनको धन्यवाद देने लगे और बोले यार अब तो हमारा खून का रिश्ता हो चूका है . वैसे इस तरह के काम करके आने पर ये हमें कभी नहीं बताते हैं . हम लोग उनसे मिल कर आगे चल दिए . घर आने पर मैंने उनकी कही बात को पूछा कि  उन्होंने ऐसा क्यों कहा ?
                   तब इन्होने बताया कि इनके छोटे भाई की आंतें उलझ गयी थी और उनको हॉस्पिटल लाया गया उस समय तुरंत ऑपरेशन होना था . उसकी पत्नी बेहोश पड़ी थी , दो छोटे छोटे बच्चे है. बड़े भाई को शुगर होने के कारण  वे नहीं दे सकते थे . उनके ससुराल वाले आये और ब्लड के नाम पर खिसक लिए . ये उस समय वहां पर थे और ये संयोग था कि  इनका ब्लड ग्रुप उनसे मिलता था . इन्हें सोचने की जरूरत नहीं पडी  और इन्होने एक यूनिट खून उनको दिया और उनका ऑपरेशन हो गया और वे आज अपने परिवार के साथ स्वस्थ हैं . बस उसके बाद  ये उस बात को भूल गए थे .
                  मेरे बताने का मतलब सिर्फ इतना है की कभी कभी जब खून की जरूरत होती है तो वह ग्रुप नहीं मिलता है या फिर ताजे खून की जरूरत होती और कम मिलने वाले ग्रुप के लिए एक बड़ी समस्या हो जाती है . एक बार मैं भी अपनी बेटी के लिए फँसी थी उसका ग्रुप AB + था और उसके प्लेटलेट्स बड़ी तेजी से गिर रहे थे उसके लिए प्लाज्मा की जरूरत थी . मुझे फख्र इस बात का है कि आई आई टी के कई बच्चों ने आकर अपना खून दिया था और तब हम उसको बचा पाए थे . मैं उन बच्चों की आजीवन शुक्रगुजार  रहूंगी .
                   आज एक अपील  उस वर्ग से जो रक्तदान के लिए सक्षम हैं . अपने अपने क्षेत्र में युवाओं को इस बात के लिए प्रेरित करें कि वक्त पर रक्त देने के लिए संकल्पित रहें . ये न पैसे से खरीदा जा सकता है और न दौलत इसका निर्माण कर सकती हैं . कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं का निर्माण भी इस काम में सहयोग प्रदान कर सकती हैं . वे युवाओं के ब्लड ग्रुप के साथ उनकी पूरी जानकारी रखें ताकि उनसे संपर्क करके इच्छुक युवाओं से संपर्क किया जा सके . 
रक्तदान के लिए पात्रता : 
१. रक्तदान करने वाले की आयु १८  वर्ष से अधिक हो .
२. रक्तदाता को शुगर , BP या अन्य कोई घातक रोग की शिकायत नहीं होनी चाहिए  . गर्भवती महिलायें भी रक्तदान के लिए उचित पत्र नहीं होती हैं . 
३. एक बार में सिर्फ एक यूनिट रक्त ही दिया जा सकता है और शरीर की स्थिति २४  घंटे में सामान्य हो जाती है . 
४. किसी प्रकार के नशे के आदि व्यक्ति भी इसके लिए सही सिद्ध नहीं हो पाते है .
५.  पेशेवर रक्तदाता के रक्त को नहीं लेना चाहिए क्योंकि ये अपने खून का व्यापार करते हैं 

 

बुधवार, 12 जून 2013

बाल श्रमिक दिवस !


          
                ये बचपन जो भूखा है और ये बचपन जिंसकी भूख  किसी और को मिटानी चाहिए अपने नन्हें नन्हें हाथों से काम कर असहाय माता - पिता  भूख मिटाने के लिए काम  कर रहे हैं और कहीं कहीं तो नाकारा बाप के अत्याचारों से तंग आकर उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी . 
                मैं अपनी बहन के यहाँ गयी तो उसकी सास ने कहा - कोई लड़की काम करने के लिए आपके जानकारी में हो तो बताना . घर में रखना है कोई तकलीफ नहीं होगी , घर वालों को हर महीने पैसे भेजती रहूंगी . क्या कहती उनसे ? उनकी बहू और बेटियां बहुत नाजुक है कि  वह अपने बच्चों को तक नहीं संभाल  सकती हैं और घर के काम के लिए उन्हें कोई बच्ची चाहिए क्योंकि उसको डरा धमका कर काम करवाया जा सकता है और अगर बाहर  की होगी तो उसके कहीं जाने का सवाल भी नहीं रहेगा . 
                ये घरेलु काम करने वालों का हाल है . होटलों , ठेकों , भट्ठों और भवन निर्माण में ऐसे बच्चे काम करे हुए देखे जा सकते हैं और वे नन्हे हाथ कितनी तेजी से काम करते हैं ? यहाँ मुफ्त शिक्षा भी क्यों नहीं ले पा  रहे हैं ये बच्चे ? क्योंकि माँ बाप को दो पैसे कमा कर लाने वाले बच्चे चाहिए जिससे खर्च में हाथ बंटा सके . माँ बीमार हो तो बेटी काम करके आएगी . स्कूल जाने पर क्या मिलेगा? 

                  इनके लिए सरकारी नीतियां तो हैं लेकिन उन नीतियों को लागू करवाने के लिए जिम्मेदार लोग शोषण करने वालों से ही पैसे खाकर सब कुछ  नजर अन्दाज करके कागजों में खाना पूरी करते रहते हैं . घर में काम करने वाली कम उम्र लड़कियाँ अक्सर यौन शोषण का शिकार होती हैं और वे अपनी मजबूरी के कारण  कुछ कह नहीं पाती हैं . 
           होटलों में मुंह अँधेरे से उठ कर काम करते हुए बच्चे और आधी रात  तक होटल बंद होने तक काम करते रहते हैं और खाने को क्या मिलता है ? बचा हुए खाना या नाश्ता . वहीँ से वह कभी कभी अपराधों में भी लिप्त हो जाते हैं . ढाबे और सड़क किनारे बने हुए चाय के होटल तो ऐसे बच्चों को ही रखते हैं ताकि उन्हें कम पैसों में अधिक काम करने वाले हाथ मिल सकें . 

             आज के दिन इन बच्चों को कोई छुट्टी देने वाला भी नहीं होगा . वे बिचारे क्या जाने इस लोकतान्त्रिक देश में उनको पढ़ने लिखने और और बच्चों की तरह से खेलने का पूरा अधिकार है . हम इस दिन को मना कर और कुछ लिख कर अपने दिल में तसल्ली कर लेते हैं कि  हमारा फर्ज पूरा हो गया लेकिन हम भी उतने ही दोषी है क्योंकि कहीं भी काम करते हुए बच्चों से काम लेने वालों को समझाने का काम करने का प्रयास तो कर सकते हैं . ये भी निश्चित है की जिन्हें ये मुफ्त में काम करने वाले मिले हैं वह हमें भाषण और कहीं जगर दीजिये कह कर वहां से चले जाने के लिए मजबूर कर देंगे . लेकिन प्रयास तो कर ही सकते हैं कहीं कोई एक बच्चा भी माँ बाप के समझने से , मालिक कों  समझाने से उसके बचपन को बचाने   में सफल हो सके तो आज का दिन सार्थक समझेंगे .  

*सभी चित्र गूगल के साभार  

गुरुवार, 6 जून 2013

एक अनोखी शादी : विधा सौम्या संग अली अकबर मेहता !

                   कहाँ से शुरू करूँ ? हम राजनीति  में धर्मनिरपेक्ष होने की बड़ी बड़ी बातें करते हैं लेकिन निजी जिन्दगी में झांक कर देखिये - वह सब कहने की बात और अमल करने की और ही होती है . लेकिन जो कुछ  बोले ही नहीं और करके गुजर गए . हम तो उनके दिल में झांक कर देख ही नहीं पाए कि वो इतना विशाल कैसे है ? इसमें दोनों ही परिवार के बड़े सदस्यों और फिर इस नयी पीढी के निर्णय का सम्मान करने के लिए वाकई बधाई के पात्र हैं .



                          ये शादी है विधा सौम्या ( पुत्री विभा रानी और अजय ब्रह्मात्मज ) अली अकबर मेहता ( पुत्र फातिमा एवं युसुफ मेहता ) . यहाँ बताते चले कि  दोनों ही  कलाकार हैं और अली तो प्रसिद्द कलाकार तैयब मेहता के पोते हैं . वह भी हर तरीके से अनोखी जहाँ दोनों की भावनाओं का सम्मान करते हुए हर रस्म पूरी की गयी . सबसे पहले शादी के कार्ड से शुरू करते हैं . हमने आपने दोनों ने दोनों धर्म के शादी के कार्ड देखे लेकिन ये कार्ड सबसे अलग - न इसमें ईश्वर का नाम और न अल्लाह का . कोई तस्वीर भी नहीं है . कुछ ऐसा है कार्ड --


     
                                                               June 1, 2013 

                                                              Madh Island , Mumbai 


                           

                                बस शादी की तारीख  के साथ कुल एक चित्र से सजा अनोखा कार्ड भी है . जिसमें अन्दर भी एकदम सादे ढंग  कन्या और वर के साथ सिर्फ उनके माता -पिता के नाम हैं . सबसे अलग और सबसे अनोखा सा कार्ड .  उसके ऊपर का चित्र भी पुराने ज़माने के कैमरे ( जिसमें कला कपड़ा ओढ़ कर फोटोग्राफर मुस्कराने के लिए कह कर ढक्कन घुमाया और बस हो गयी फोटो ). से निकलवाया गया है . वह भी एकदम ज़माने की दौड़ से अलग विशेष चित्र . 

           अब हम परिचय कर लें कन्या और वर से - जिन्हें हम सगाई के अवसर पर कैसे लगे देख रहे हैं ? 




          हमारे घर में हमारे घर जैसी सारी  रस्में हुईं क्योंकि शादी से पहले की सारी  रस्में तो हम अपने ढंग से कर रहे हैं . घर में सभी मेहमानों के आने के साथ शुभंकर और तेल हल्दी और मंडप की सारे  कार्यक्रम तो होने ही चाहिए और वह हुए भी .........



 मुंबई के घर और गाँव  के घरों में कुछ तो अंतर होता ही है और फिर मंडप की उपलब्धि भी एक बात है लेकिन आज कल प्रतीकात्मक साधन भी दिल को पूरी तसल्ली देने वाले होते हैं क्योंकि अपने अपने घर के सारे  शगुन पूरे कर लिए . शुभ काम में कोई कमी न रह जाए . सो मंडप भी अपने पूरे लाव लश्कर के साथ स्थापित किया गया .


    मंडप गाड़ने की रस्म पूरी हुई तो फिर कन्या के लिए तेल हल्दी की रस्में भी पूरी की गयीं . हम अपने तरफ से कोई कमी तो छोड़ नहीं सकते हैं . हमारी मान्यताएं और परम्पराए हमारे साथ जुडी जो रहती हैं . फिर विवाह जैसा काम हो और हम अपने घर में शगुन के सारे  काम न करें ये तो हो नहीं सकता है . पीली साडी में सजी विधा को शादी के एक दिन पहले  हल्दी चढ़ाई गयी . मैं भी शामिल थी इस कार्यक्रम में .

                       फिर रचाई गयी मेहंदी हम सब के हाथों में भी . दुल्हन की मेंहदी तो पहले ही रच गयी थी . घर में उपस्थित सभी महिलाओं के हाथ में मेंहदी लगी और उस सबसे निबट कर रखा गया था लेडीज संगीत का कार्यक्रम वैसे ये सिर्फ लेडीज संगीत ही नहीं था  बल्कि ये तो जेंट्स संगीत भी था क्योंकि इसमें सभी को पकड़ पकड़ कर नचाया गया था . सभी शामिल भी थे इसमें घर में आये हुए सारे  मेहमान इसका आनंद दे रहे थे.

               अब शुरू करने से पहले कन्या के मम्मी  पापा की एक तस्वीर भी तो देखते चलें 


                            और एक तस्वीर विधा की भी .............



                            शादी के लिए जो जगह चुनी गयी थी , वह किसी फिल्मी दुनियां के सेट जैसी ही थी . मड  आइलैंड में The Club @ Raheja Exotica को चुन गया था . उस स्थान की आतंरिक और बाह्य सज्जा सिर्फ कुछ शब्दों में या पंक्तियों में बयां करना संभव नहीं है . एक विशाल क्षेत्र में फैला हुआ वह कार्य स्थल प्राकृतिक सौंदर्य और सजावट से लग रहा था कि  जैसे हम किसी फिल्मी  के सेट पर आ गए हों .  कुछ ही चित्रों से इसको सजाया जा सकता है . इससे ही अनुमान लगाया जा सकता है कि  कितना अनुपम वातावरण वहां होगा .
                      मेहमानों को बैठने के लिए चारों तरफ से नारियल के पेड़ों से घिरा और फूल और अन्य पेड़ों से सज्जित कार्यस्थल   अपने आप में अनोखा दृश्य प्रस्तुत कर रहा था . मेहमानों को बैठने के लिए बड़े से स्टेडियम की तरह से गोल घेरे में बनी जगह को बड़ी खूबसूरती के साथ सफेद चादर से ढंके हुए गद्दे और मसनद के साथ लगे हुए सजीले कुशन लगा कर आसन तैयार किये गए थे . ताकि सभी कार्यक्रम के आनंद को उठा सकें .


                   ये तो आने वाले मेहमानों के लिए नियत स्थान हुआ और जहाँ पर कार्यक्रम होने थे वह स्थान भी अपने आप में अलग ढंग से  किया गया था .

                         बस कुछ कुर्सियां और एक सोफा  दूल्हा और दुल्हन के लिए रखा गया था .
यहाँ पर शादी दो अलग अलग धर्म से  जुड़े लोगों के  हो रही थी लेकिन इसमें ऐसा कुछ भी नहीं था कि जिसे कट्टरता के साथ जोड़ा जा सके . इसमें दोनों ही परिवारों के विशाल हृदयता का परिचय मिल रहा था बल्कि कहूं अली का परिवार हमारे साथ जुड़ कर हमें ही अनुग्रहित कर रहा था क्योकि उन्होंने हमारी हर रस्म को उतना ही मान दिया जितना की हम देते हैं और वो रस्में उनके अनुसार शायद नहीं होती है . हाँ अगर कुछ नहीं था तो हमारे अनुसार वहां कोई पंडित नहीं था और उनके अनुसार कोई मौलवी या निकाह संपन्न करवाने वाला व्यक्ति नहीं था .
                     वहां कार्य स्थल पर सिर्फ दोनों परिवारों के प्रमुख लोग ही थे और उनकी उपस्थिति में ही कार्य सम्पादित हुआ .
                  बरात आने पर हमने उस बारात का दिल से स्वागत किया और उनको समुचित स्थान पर बिठाया गया . कुछ ऐसा दृश्य था वहां ---

                                         वर के माता -पिता , वर वधु एवं वधु के माता -पिता


                       
                     शादी का आरम्भ तो अब होना था . सबसे पहले कन्यादान की रस्म हुई लेकिन यहाँ कन्या वर के हाथ नहीं सौंपी गयी बल्कि कन्या के माता - पिता ने कन्या को वर के माता -पिता को उनकी बेटी के रूप में सौप दिया और फिर वर के माता - पिता ने वर को बेटे के रूप में कन्या के माता - पिता कोसौंप  दिया  और फिर दोनों का स्थान बदल कर बिठा दिया गया . एक अलग सा विचार उठा मन में वाकई अगर दोनों परिवार बहू न समझ कर बेटी समझ कर स्वीकार करने लगें तो शायद समाज में हो रहे महिला उत्पीडन को एक विराम न सही कुछ अंकुश तो लगाया ही जा सकता है . दामाद भी बेटे के रूप में परिवार के साथ व्यवहार करे नहीं तो मैंने दामादों का नाटक कई घरों में देखा है . बेटा बन कर अधिक  प्रिय बना जा सकता है .

                    कन्यादान के बाद रस्म  हुई जयमाल की . सभी विवाहों की तरह इसमें भी वर और वधु  एक दूसरे को जयमाल पहनाई . जब कि ये रस्म अली के परिवार लिए बहुत सामान्य नहीं ही होती है . लेकिन  हमारी परम्पराओं और रस्मों को पूरा सम्मान दिया गया . और उसके बाद सिन्दूर दान जो सिर्फ और सिर्फ हिन्दू धर्म में ही मान्यता प्राप्त एक वधु के लिए सबसे जरूरी रस्म होती है उसको सम्पन्न किया गया . वर ने वधु की मांग में सिन्दूर भरा और हमारी परंपरा के अनुसार ये विवाह की सबसे महत्वपूर्ण रस्म भी मानी जाती है . जो जीवन भर उसको एक अलग स्थान प्रदान करती है . उसके बाद मंगलसूत्र पहनने की रस्म भी अली ने पूरी की . इन सब के बाद वर और वधु का चित्र जयमाल , सिन्दूर दान और मंगलसूत्र के पहनने का साक्षी बना हुआ है . 
                      

                   इसके बाद अली के परिवार के अनुसार बधावन की रस्म पूरी की गयी जिसमें वर पक्ष ने वधु को उपहार आदि प्रदान किये और बिहारी परंपरा के अनुसार चुमावन की रस्म भी पूरी की गयी जिसमें सुहागन महिलायें कन्या को सिन्दूर लगा कर आशीर्वाद देती हैं और वर को अक्षत का विभिन्न स्थानों पर स्पर्श करते हुए उसके सर पर अक्षत छिड़क कर आशीष देती है .  इसकी एक छवि भी देख लें . 
             

हाँ इस विवाह में सिर्फ दो काम नहीं हुए - एक तो अली के परिवार की परंपरा के अनुसार निकाह नहीं हुआ और हमारी परंपरा के अनुसार सात फेरे नहीं लिए गए . इस विवाह में कोई मौलवी या कोई पंडित उपस्थित नहीं था . हाँ इन सारी  रस्मों के बाद शादी का कानूनीतौर पर पंजीकरण हुआ . वहां पर रजिस्ट्रार के प्रतिनिधि उपस्थित थे और गवाह के तौर पर अली के पक्ष से उनके छोटे भाई और पिता ने साइन किये और विधा की और से उसकी बहन और पिता ने . शादी को वैधता भी प्राप्त हो गयी .   उसके बाद कुछ ख़ुशी के पलों को दिल से ख़ुशी छलकते हुए पल में विधा और उनकी सासु मान फातिमा मेहता नृत्य करती हुईं .फातिमा जी ने सफेद साड़ी के साथ लाल ब्लाउज और माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी और जूड़े  में लाल फूलों के गजरे से सजा कर अपने को हमारे रंग में ही रंग डाला था  जो हम सबको बहुत ही अच्छा लग रहा था .


इन सब से अलग एक और चीज थी यहाँ की विवाह की समस्त रस्मों के पूरा होने के बाद सूफी संगीत का कार्यक्रम रखा गया था . जिसमें प्रसिद्द सूफी गायक ने एक से एक बढ़कर सूफी गीत गाकर माहौल को बहुत ही खुशनुमा बना दिया था .  
फिर वाही जो सब मौकों पर होता है डिनर का प्रोग्राम , जिसमें सभी ने देर रात तक सब तरीके के व्यंजनों का लुफ्त उठाया और वर और कन्या को ढेरों आशीष देते हुए अपने अपने घर को विदा हो गए और कन्या को उसके ससुराल के लिए रवाना  कर दिया . इन मंगल कामनाओं के साथ  की ये नव दंपत्ति सदैव फलते फूलते रहें और खुशियाँ उनके दरवाजे पर हर सुबह सूरज की किरणों के साथ दस्तक दें .  
                                      

बुधवार, 5 जून 2013

विश्व पर्यावरण दिवस !



                               दिन पर दिन बढती जा रही  हमारी वैज्ञानिक प्रगति और नए संसाधनों से हम सुख तो उठा रहे हैं लेकिन अपने लिए पर्यावरण में विष भी घोल रहे हैं . हाँ हम ही घोल रहे हैं . प्रकृति के कहर से बचने के लिए हम अब कूलर को छोड़ कर किसी तरह से ए सी खरीद कर ठंडक का सुख उठाने लगे हैं लेकिन उस ए सी  से निकलने वाली विपरीत दिशा में जाने वाली गैस के उत्सर्जन  से पर्यावरण को और प्रदूषित कर रहे हैं . सभी तो ए सी नहीं लगवा  सकते हैं . इस भयंकर गर्मी से और वृक्षों के लगातार कम होने से पशु और पक्षी भी अपने जीवन से हाथ धोते चले जा रहे हैं . 
                        मैं  लम्बे लम्बे भाषणों को सुनती चली आ रही हूँ  और सरकार भी प्रकृति को बचने के लिए मीटिंग करती है और लम्बे चौड़े प्लान बनाते है और फिर वह फाइलों में दब कर दम तोड़ जाते है क्योंकि शहर और गाँव से लगे हुए खेत और बाग़ अब अपार्टमेंट और फैक्ट्री लगाने के लिए उजाड़े  जाने लगे हैं और अगर उनका मालिक नहीं भी बेचता है तो उनको इसके लिए विभिन्न तरीकों  से मजबूर कर दिया जाता है कि वे उनको बेच दें और मुआवजा लेकर हमेशा के लिए अपनी रोजी-रोटी और अपनी धरती माँ से नाता तोड़ लें. कुछ ख़ुशी से और कुछ मजबूर हो कर ऐसा कर रहे है। ऊंची ऊंची इमारतें और इन इमारतों में जितने भी हिस्से या फ्लैट बने होते हैं उतने ही ए सी लगे होते हैं . उनकी क्षमता के अनुरूप उनसे गैस उत्सर्जित होती है और वायुमंडल में फैल जाती है . हम सौदा करते हैं अपने फायदे के लिए, लेकिन ये भूल रहे है कि हम उसी पर्यावरण में  विष घोल रहे है ,जिसमें उन्हें ही नहीं बल्कि हमें भी रहना है, 
                    मोबाइल के लिए टावर लगवाने का धंधा भी खूब तेजी से पनपा  और प्लाट , खेत और घर की छतों पर काबिज हो गए लोग बगैर ये जाने कि इसका जन सामान्य के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है ? उससे मिलने वाले लाभ को देखते हैं और फिर रोते भी हैं कि  ये गर्मी पता नहीं क्या करेगी ? इन टावरों निकलने वाली तरंगें स्वास्थ्य के लिए कितनी घातक है ? ये भी हर इंसान नहीं जानता है लेकिन जब इन टावरों में आग लगने लगी तो पूरी की पूरी बिल्डिंग के लोगों का जीवन दांव पर लग जाता है . इन बड़ी बड़ी बिल्डिंगों में पेड़ पौधे लगाने के बारे में कुछ ही लोग सोचते हैं और जो सोचते हैं वे छतों पर ही बगीचा  बना कर हरियाली  फैला रहे है . 
                     हम औरों को दोष क्यों दें ? अगर हम बहुत बारीकी से देखें तो ये पायेंगे कि  हम पर्यावरण को किस तरह प्रदूषित कर रहे हैं और इसको कैसे रोक सकते हैं ? सिर्फ और सिर्फ अपने ही प्रयास से कुछ तो कर ही सकते हैं . यहाँ ये सोचने की जरूरत नहीं है कि  और लोगों को चिंता नहीं है तो फिर हम ही क्यों करें? क्योंकि आपका घर और वातावरण आप ही देखेंगे न . चलिए कुछ सामान्य से प्रयास कर पर्यावरण दिवस पर उसको सार्थक बना ही लें ------

* अगर हमारे घर में जगह है तो वहां नहीं तो जहाँ पर बेकार जमीन दिखे वहां पर पौधे लगाने के बारे में सोचें . सरकार वृक्षारोपण के नाम पर बहुत कुछ करती है लेकिन वे सिर्फ खाना पूरी करते हैं और सिर्फ फाइलों में आंकड़े दिखने के लिए . आप लगे हुए वृक्षों को सुरक्षित रखने के लिए प्रयास कर सकते है . 
* अगर आपके पास खुली जगह है तो फिर गर्मियों में ए सी चला कर सोने के स्थान पर बाहर  खुले में सोने का आनंद लेना सीखें तो फिर कितनी ऊर्जा और गैस उत्सर्जन से प्रकृति और पर्यावरण को बचाया जा सकता है .
*  डिस्पोजल वस्तुओं का प्रयोग करने से बेहतर होगा कि  पहले की तरह से धातु बर्तनों का प्रयोग किया जाए या फिर मिट्टी से बने पात्रों को , जो वास्तव में शुद्धता को कायम रखते हैं,  प्रयोग कर सकते हैं . वे प्रयोग के बाद भी पर्यावरण के लिए घातक नहीं होते हैं . 
* अगर संभव है तो सौर उर्जा का प्रयोग करने का प्रयास किया जाय जिससे हमारी जरूरत तो पूरी होती ही है और साथ ही प्राकृतिक ऊर्जा का सदुपयोग भी होता है . 
* फल और सब्जी के छिलकों को बहार सड़ने  के लिए नहीं बल्कि उन्हें एक बर्तन में इकठ्ठा कर जानवरों को खिला दें . या फिर उनको एक बड़े गमले में मिट्टी  के साथ डालती जाएँ कुछ दिनों में वह खाद बन कर हमारे हमारे पौधों को जीवन देने लगेगा . 
* गाड़ी जहाँ तक हो डीजल और पेट्रोल के साथ CNG और LPG से चलने के विकल्प वाली लें ताकि कुछ प्रदूषण को रोक जा सके .  अगर थोड़े दूर जाने के लिए पैदल या फिर सार्वजनिक साधनों का प्रयोग करें तो पर्यावरण के हित में होगा और आपके हित में भी . 
* अपने घर के आस पास अगर पार्क हो तो उसको हरा भरा बनाये रखने में सहयोग दें न कि  उन्हें उजाड़ने में . पौधे सूख रहे हों तो उनके स्थान पर आप पौधे लगा दें . सुबह शाम टहलने के साथ उनमें पानी भी डालने का काम कर सकते हैं .