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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

चुनौती जिन्दगी की: संघर्ष भरे वे दिन (७)


अनीता कुमार


संघर्ष के अलग अलग स्वरूपों को हम देख रहे हें औरों की आँखों और अनुभवों से , कभी तो लगाने लगता है कि कहीं ये हमारी कहानी ही तो नहीं है क्योंकि जिन्दगी के कुछ पहलू ऐसे होते हैं जो सामने से एक जैसे ही होते हैं वह उनके रंग अलग हो जाते हैं। कभी वे रंग बहुत गहरे और कभी बहुत हल्के होते हैं लेकिन ये संघर्ष के पल इंसान की परीक्षा लेते हैं - उनसे लड़ने की क्षमता तो वह ईश्वर ही देता है और हम उसके सामने नत होते हैं।


रेखा जी ने अनुरोध किया कि कुछ लिखूं इस नये स्तंभ के लिए और मैं तब से पीछे मुड़ कर जिन्दगी को देख रही हूँ
, सोच रही हूँ कि क्या बताऊं? जो मेरे लिए संघर्ष रहा वो शायद नितांत व्यक्तिगत है, उसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है और जो मेरे लिए एक हादसा था वो शायद संघर्ष की परिभाषा में आता ही नहीं। फ़िर भी एक ऐसी घटना जिसने मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव डाला वो आप के साथ बांट रही हूँ, अगर वो संघर्ष की परिभाषा में न बैठता हो तो रेखा जी से अग्रिम माफ़ी मांग रही हूँ।

बात उन दिनों की है जब कॉलेज में नौकरी लगे एक दो साल हुए थे, बेटा चार पांच साल का था। कई साल इंडस्ट्री में काम करने के बाद हम अध्यापन क्षेत्र में आये थे और आते ही समझ गये थे कि अगर इस क्षेत्र में आगे बढ़ना है तो पी एच डी करनी चाहिए, जरूरी नहीं था लेकिन कैरियर के लिए अच्छा था। सो हमने पी एच डी करना शुरु कर दिया। काम लगभग पूरा होने को आया। डेटा एकत्र कर लिया गया था और अब उसका विश्लेषण करना बाकी था। उन दिनों कंप्युटर इतने आम नहीं थे। किसी के घर में होना तो दूर बहुत कम दफ़तरों में भी कंप्युटर पाये जाते थे। मेरे पिता के एक मित्र ने हमारी सहायता करने का वादा किया और अपने एक दोस्त को फ़ोन किया। तय ये हुआ कि इतवार के दिन मैं और मेरे अंकल उस व्यक्ति के दफ़तर जायेगें और वहां काम करेगें ताकि उसके दफ़तर की आम रूटीन में भी खलल न पड़े।

उस इतवार हम खुशी खुशी अपना पूरा डेटा समेटे डबल डेकर बस में सवार हो लिए, घर से करीब 25 कि मी की दूरी पर वो दफ़्तर था जहां हमें जाना था। बम्बई की सड़कें तब भी हमें चांद पर होने का एहसास दिलाती थीं और आज भी। खैर हाथी जैसी भारी भरकम बस के ऊपरी तल पर बैठे ऐसे हिचकोले खा रहे थे जैसे हाथी पर ही बैठे हों। दो घंटे लगे हमें उस सफ़र पार करने में।

काम शुरु हुआ, कुछ हमने समझाया कि हम क्या करना चाहते हैं कुछ उन लोगों ने समझाया कि कंप्युटर क्या कर सकता है। आधा घंटा भी न गुजरा होगा कि हमें लगा जैसे कुर्सी की सीट गीली हो रही है। हम आश्चर्यचकित रह गये और तुरंत अपनी सीट से उठ खड़े हुए। हमने पूछा क्या यहां बाथरूम है? और हाँ सुनते ही उस तरफ़ दौड़ लिये। आधा घंटा गुजर गया, अंकल परेशान कि हम बाथरूम से बाहर नहीं आये, अब आगे क्या काम करना है वो कैसे निश्चित हो, जिस व्यक्ति का दफ़तर है उसे भी खाना खाने घर जाना है उसे इतवार के दिन इस तरह रोकना ठीक नहीं, पर हमें भी कैसे आवाज दे इसी उपापोह में थे कि इतने में दफ़तर मालिक की पत्नि वहां आ गयी। उन दोनों की जान में जान आयी और उन्हों ने उसे पता करने भेजा कि हम बाथरूम से बाहर क्युं नहीं आ रहे।

उस महिला ने आकर पूछा हमने अपना हाल बताया उसने सोचा कि अचानक महिला को जो इमरजेंसी आन पड़ती है वो आन पड़ी होगी, उसने कहा वहीं आले में सेनिटरी नैपकिन रखें हैं ले लो। हमने कहा कि बात उस से कहीं आगे बढ़ चुकी है और हमारे पूरे कपड़े भीग चुके हैं और हम बाहर नहीं आ सकते, हमारे घर फ़ोन लगाया जाये और पति देव से कहा जाये कि वो दूसरा जोड़ा कपड़ों का ले कर आयें और अगर हो सके तो काली साड़ी ले कर आयें तब उस महिला के कान खड़े हुए उसने पूछा कि क्या बात है? दरअसल मेरी प्रेंगनेंसी का तीसरा महीना था और माहवारी होने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था। उन दिनों मोबाइल नहीं हुआ करते थे। एक घंटे में हम अस्पताल पहुंच गये। डॉक्टर ने कहा बस के झटके लगने से नुकसान तो हुआ है लेकिन ऐसा नहीं कि बचाया न जा सके। शर्त ये थी कि हम कम से कम सात दिन अस्तपताल में सीधे लेटे रहें करवट भी न बदलें।

उसी समय पता चला कि मेरे ससुर जो रूटीन चैक अप के लिए अस्पताल गये थे उन्हें वहीं भर्ती कर लिया गया है।( यहां मैं बताती चलूं कि मेरे ससुर आर्मी में थे और बहुत ही छोटी उम्र में उनका एक फ़ेफ़ड़ा दूसरे विश्वयुद्ध की बली चढ़ गया था। आठ गोलियां लगने के बावजूद उन्हें आर्मी डॉक्टर्स ने बचा तो लिया था लेकिन उन्हें सेवानिवृत होना पड़ा था।)

अब ससुर उस समय भर्ती थे नेवी अस्पताल में कोलाबा में और मैं पड़ी थी चैम्बूर के अस्पताल में। पति देव के लिए अपना दफ़तर और दोनों अस्पताल के चक्कर काटना बहुत भारी पड़ रहा था। हमने कहा आप ससुर जी को देखिये मेरे पास मेरे माता पिता हैं ही। पर इस तरह बिना कुछ किये बिस्तर पर पड़े रहना मेरे लिए बहुत ही असहनीय था। खास कर तब जब अस्पताल से छुट्टी देते समय डॉक्टर ने कहा कि और पंदरह दिन घर पर भी ऐसे ही लेटे रहना पड़ेगा। हम अपनी माँ के घर पर थे। पांच साल के बेटे को बड़ा अजीब लगता था कि मां हर समय लेटी रहती है, वो चाहता था कि हम उसे घुमाने नीचे ले कर जायें उसके साथ खेलेंइतने में हमारे घर कुछ मेहमान भी आ गये और माँ पर बोझ दोहरा हो गया। अब हमसे लेटा नहीं जा रहा था।

हमने एक रात माँ से कहा कि चाहे कुछ भी हो जाये कल हम ससुर को देखने जरूर जायेगें वो अपने मन में क्या सोचते होगें, आखिरकार प्रेगनेंसी कोई बिमारी थोड़े है जो मुझे देखने भी न आयी और अपनी मां के घर जा कर बैठ गयी। माँ ने हलका सा विरोध किया और तय हुआ कि कल डॉकटर को फ़ोन किया जायेगा। हम सब सो गये।

रात तीन बजे फ़ोन की घंटी घनघना उठी। हड़बड़ा कर मेरे पिता ने फ़ोन उठाया। दूसरी तरफ़ मेरे पति थे, कह रहे थे कि अभी अभी मेरे ससुर का देहांत हो गया है और ये खबर वो अपनी मम्मी को फ़ोन पर नहीं देना चाहते। उन्हें अस्पताल से निकलने में काफ़ी समय लगेगा और वो चाहते हैं कि मैं खुद जा कर ये खबर अपनी सास को सुनाऊं। अब तो कुछ सोचने का समय ही नहीं था। मैं, मेरे माता पिता तीनों झटपट सड़क पर आ गये और टेक्सी तलाशने लगे। करीब पौने चार बजे हम खार( मेरी ससुराल) पहुंचे। उस दिन विशु का पर्व था, मलयालियों का नववर्ष, उस में ग्रहणी सुबह अंधेरे मुंह साल भर घर में काम आने वाला सारा सामान एक जगह सजाती है, दीप जलाती है और फ़िर घर के एक एक सदस्य को नींद से उठा कर सबसे पहले उन सब चीजों का दर्शन कराती है। मेरी सास उसी की तैयारी कर रही थीं। दरवाजे की घंटी बजी तो उन्हें लगा शायद मेरे पति अस्पताल से लौटे होगें। जैसे ही उन्हों ने दरवाजा खोला और हम तीनों को देखा तो उन्हें समझते और फ़िर बेहोश होते वक्त नहीं लगा। पूरे घर में हाहाकार मच गया।

मेरे जैठ अस्पताल भागे, मेरी जैठानी सास को संभालने में जुट गयीं और सब को इत्तला करने का सिलसिला शुरु हो गया। केरला से मेरे ससुर के भाई का फ़ोन आ गया कि उनके आने तक इंतजार किया जाये, मतलब ससुर जी के शरीर को करीब चौबीस घंटे रखना होगा। आने वालों का तांता लग गया।

हमने अपनी जैठानी से कहा कि वो मेहमानों को संभालें क्युं कि हमें मलयालम बोलनी नहीं आती और हम किचन संभालेगें। तीन दिन तक कई कई घंटे खड़े रह कर खाना बनाने से ले कर बर्तन मांजने तक का काम हम अथक करते रहे। तीसरे दिन मेरी मम्मी ने बहुत हिचकते हुए हमारी हालत का जिक्र किया। ये बात तो मैं और मम्मी पहले दिन ही समझ गये थे हमारा अजन्मा बच्चा भी उसी दिन चला गया जिस दिन हमारे ससुर गये थे। जैसे ही बात मेरे पति की ताई तक पहुंची उन्हों ने मेरे पति को आदेश दिया कि सब काम छोड़ अभी का अभी हमें अस्पताल ले कर जाया जाये। दूसरे दिन सुबह हम अस्पताल पहुचें डी एन सी करवाने। डॉक्टर ने खूब फ़टकार लगायी और पति देव से कहा कि अगर एक दिन की भी और देरी होती तो जहर हमारे पूरे शरीर में फ़ैल जाता और फ़िर हमें भी बचाना मुश्किल हो जाता।

उसके बाद दो महीने आलम ये था कि ऐसा लगता था जैसे हमारे शरीर में कोई नल लगा हुआ हो और हम दो महीने तक जमीन पर सोते रहे। दो महीने बाद जब कॉलेज पहुंचे तो सब को लगा कि हमें जोरदार पीलीया या टी बी हो गयी है।

पति देव ने ऐसी तौबा की कि निश्चय कर लिया कि अब कभी मुझे ऐसी मुसीबत में नहीं डालेगें…:) बस, कुछ सिलसिला ऐसा बना कि हम अपनी पी एच डी भी पूरी न कर सके, अब छोटा सा परिवार मैं वो और मेरा एक पुत्र्

खुशी की बात ये है कि अब वो भी पिता बनने जा रहा है :)

सोमवार, 4 जुलाई 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (२१)


कौन नहीं चाहता है की फिर से अपने बचपन में झांक लें लेकिन कहाँ जिन्दगी इतनी रफ्तार से भागी चली जा रही है कीपलट कर देखने की फुरसत कहाँ है? आज के काम निपट गए तो रात में सोने से पहले ही कल की रूपरेखा तैयार कर लेतेहैंलेकिन मैंने सबको मजबूर कर दिया की चलिए अपने बचपन में झांकिए और फिर सोच कर मुस्करा लीजिएअपनी शरारतें और अपनी कारस्तानियों को फिर से आईने में देखा तो खुद को लगता है की हम ऐसा करते थेलेकिनफिर भी प्यारा लगता है कितने बचपन के चरित्र बिछुड़ गए और इतिहास में सिमट गए लेकिन एक क्षण के लिएलिखते समय याद बहुत आये
उन्हीं यादों को समेटे खड़ी हैं अनीता कुमार जी

अनीता कुमार :




वो बचपन की यादें ........


बहुत दिन के बाद ब्लॉग पर आई हूँ और आपका संस्मरण पढ़ कर मजा आह गयावो कहते हैं कि खरबूजेको देख कर खरबूजा रंग बदलता है वैसे ही संस्मरण पढ़ कर यादों का काफिला चल निकला तो सोचा कि इसको मंजिल तक पहुंचा ही दूं सो ये आपके लिए........
सबके संस्मरण पढ़ते हुए एक बात मेरे दिमाग में ये कौंधी थी कि गर्मियों की छुट्टी में सभी गाँव की ओर कूच करते थे और देहात की प्राकृतिक सम्पदा का मजा लूटते थेहम इस मामले में गरीब ही रहे , शहरी जो ठहरेफिर भी गर्मी की छुट्टियाँ हमारे लिए कुछ काम रोमांचक होती थींहर गर्मियों की छुट्टी में दो ही जगह जाना होता था या तो दिल्ली (ददिहाल) या फिर मुरादाबाद (नौनिहाल) दोनों ही जगह के अपने मजे थे
मुरादाबाद में मेरे नाना का सिनेमा हाल था और घर और सिनेमा हॉल के बीच में एक छोटा सा मैदान थागाना शुरू होता तो आवाज घर तक आती थीसिनेमा हाल में नाना जी ने एक कमरा सिर्फ अपने परिवार के लिए बनवाया हुआ थाजिसमें बड़ा सा सोफा झूले के रूप में लगा हुआ थाइधर पिक्चर शुरू हुई और उधर हम नाश्ता पानी सब छोड़ कर भागे चले जाते थेकभी फैमिली बॉक्स में झूले पर बैठ कर और कभी प्रोजेक्टर रूम में ओपेरटर की नाक में दम करके पिक्चर देखा करते थेमुरादाबाद छोटा शहर था एक ही सड़क पर थियेटर थे
सभी थियेटरों में हमें विशेषाधिकार प्राप्त थे। पांच छः बरस के रहे होंगे. एक लेमन वाला (मेरा मतलब सिर्फ कोल्ड ड्रिंक ही बेचा करता था) जिसकी दुकान नाना के सिनेमा हाल के पास थी. घर आता था और मेरी जिद पर अपने साथ ले जाता था. एक हाथ गाड़ी और उसपर बोरी से ढकी रखी बर्फ की सिल्ली और उस पर बैठ कर मैं पूरे शहर का नजारा देखा करती थी.उसी के साथ जाकर पहली बार बर्फ बनाने की फैक्टरी देखी. उस अँधेरे कमरे में ऊँचाई से गिरती पानी की रिमझिम बूँदें आज भी जेहन में ताजा हैं. मेरी नानी जैसे पराठे तो कोई बना ही नहीं सकता था. जिस दिन घर में मांस बनता हम बच्चों के लिए बड़ा रोमांचक होता था. नानी शुद्ध शाकाहारी, नाना मीट बनाने का काम करते थे. वो भी रसोई के बाहर - उन्हें एक अंगीठी जला कर दे दी जाती थी. और जब वे मसाले माँगते तो नानी उन्हें मसालादानी में हाथ नहीं लगाने देती और हम बच्चों से मसाले की कागज की पुडिया बनाकर भेजी जाती. नानी और नाना के शाकाहारी और मांसाहारी होने की तनातनी देखने में बड़ा मजा आता था.
हर साल गर्मियों की छुट्टी में दिल्ली जाना तय था. अलीगढ से दिल्ली पापा के चाचा के घर जाने के लिए हम छुट्टियाँ होते ही पीछे पद जाते. हमारा ददिहाल वही था. जैसे ही हमारा स्कूटर कोठी के गेट पर रुकता शशि दीदी जल्दी से नीचे उतर कर आती और हमें बाँहों में भर लेती. शशि दीदी यूँ तो पापा की चचेरी बहन थीं लेकिन वे हमारी हमउम्र थीं. उनका छोटा भाई राहुल जिसे हम आज भी काके कहकर बुलाते हैं गजब का उधमी था. उसका जोड़ मेरे छोटे भाई के साथ था. रात को बिस्तर छत पर लगते थे और छत पर पानी डाल कर उसको ठंडा करना मुझे बहुत अच्छा लगता था. रात में जिद करके हम और शशि दीदी एक ही बिस्तर पर सोते थे. देर रात तक हम लोग न जाने क्या खुसुर पुसुर किया करते थे और बीच बीच में चाची की आवाज सुनाई देती अब सो जाओ सुबह सैर को जाना है. सुबह उठते ही हम बच्चे और घर के मर्द पांच बजे अजमल खां रोड की ओर चल पड़ते थे. इतबार को दुकान बंद रहती थी सो उस दिन नाश्ता छोले और पूरी का होता था. हम बच्चों को भेजा जाता था स्टैण्डर्ड की दुकान से छोले और पूरी और दही लाने के लिए.घर पहुँचाने तक हम बच्चे दही के ऊपर की मोटी मलाई चट कर चुके होते थे. दोपहर से फेरी वाले फेरी लगाने लगते और मजाल है की कोई फेरी वाला हमारे घर रुके बिना चला जाए -- फालसे, उबली हुई मसालेदार छल्ली, और न जाने क्या क्या? गर्मियों के दिन होते - दिल्ली में ये रिवाज था की सभी गृहणियां तंदूर पर रोटी लगवाने भिजवा देती. शाम पड़ते ही मैं और दीदी परत में आता गीले कपड़े से और फिर थाली से ढाका हुआ लेकर तंदूर पर रोटी लगवाने के लिए लेकर जाते. वहाँ बहुत भीड़ होती थी ज्यादातर बच्चे ही आते थे आता लेकर. फिर क्या था की तंदूर वाले को बता कर की कितनी रोटी बनानी और हम झूले पर चढ़ जाते और तब तक झूलते रहते जब तक की तंदूर वाला आवाज न दे की अपनी रोटियां ले जाओ. लाल बहादुर शास्त्री का जमाना था. देश में अज्ज की किल्लत थी. शास्त्री जी के कहे अनुसार रविवार की रात को खाना नहीं बनता था. घर के बड़े लोग एक वक्त का फाका करते थे लेकिन बच्चे कब मनाने वाले थे सो बच्चों के लिए ढेर सारे फल ,चाट पकौड़ियों का इंतजाम किया जाता था.
शाम को खाना खाने के बाद सब बैठक में बैठ कर गपियाते थे. मेरी मम्मी चाचा जी के सामने घूंघट किये रहती थी. अगर चाचा जी कमरे में होते तो बहुत धीमी आवाज में बोला करती थी. चाची जी अक्सर कहा करती थी की निर्मला छड परे हुन ए घूंघट वूंघट पर मम्मी उनकी बात टाल जाया करती थीं. हम सब बच्चों के लिए मम्मी का घूंघट खींचना एक खेल हो जाता था. जब हम ज्यादा परेशान करते तो चाचा जी खुद उठ कर छत पर सोने चले जाया करते थे. मेरे पापा के छोटे चाचा भी उसी मकान के ऊपरी हिस्से में रहते थे. उनकी पत्नी मलयाली थी ( हाँ पचास के दशक में उनके चाचा ने लव मैरिज की थी.) छोटी चाची हम सब बच्चों की सबसे चहेती आंटी थी - अनीता आंटी. मुझे उनका नाम इतना पसंद था की मैंने जिद की की मेरा नाम भी अनीता होना चाहिए मुझे क्या पता था की नियति अपना खेल खेल रही है और आज मैं भी एक मलयाली की पत्नी हूँ. अनीता आंटी के घुंघराले बाल चाँदी सा रंग और सुरीला गला आज भी मेरे जेहन में उतना ही ताजा है जितना की उस समय हुआ करता था. उनके हाथों का बन राइ और जीरे के तड़के वाला आम का अचार का स्वाद आज भी मेरी जिव्हा पर है. और मैं कभी वैसा अचार नहीं बन पायी. इतवार के दिन हमारे घर सुबह से ही लोगों के आने का तांता शुरू हो जाता . हमारे छोटे चाचा सत्संग के लिए मशहूर थे. हम सबको हिदायत रहती की दो घंटे किसी की हंसी की आवाज नहीं निकालनी चाहिए. हम हाल में बैठे सत्संग के अंत में अनीता चाची के भजनों में इतना डूब जाते की शैतानी का सवाल ही नहीं उठता था. इतवार छोड़ कर बाकी सब दिन हम बच्चों का घर पर राज रहता था. बरामदे में एक तरफ एक हौज में हैंडपंप लगा हुआ था. नहाने के नाम पर हम बच्चे हौज की नाली में कपड़ा फंसा कर बारी बारी से हैंडपंप चला कर हौज को पानी से भर लेते और फिर उसमें नहाने में स्विमिंग पूल की कमी न लगती. बड़ी चाची हमें झूठा गुस्सा दिखा कर जब एक डेढ़ घंटे तक बाहर आने के लिए कहती रहती और हम उनकी बात न सुनते तो वे हमें धमकी देती की फिर जब उनको लगता की ये नहीं मानेगे तो आखिरी हथियार फेंका जाता की मैं अभी ऊपर से अनीता चाची को बुलाती हूँ. हम अनीता चाची से जितना प्यार करते थे उतना डरते भी थे.वे मरती नहीं थी लेकिन कह देती की ऊपर नहीं आना और अगर हम ऊपर नहीं जायेंगे तो फिर गाना कैसे सुनेंगे और केरल के किस्से कैसे सुनेंगे? और उनके हाथ का डोसा कैसे छोड़ देते सो हम एक एक करके बाहर आ जाते. बरामदे के दूसरे तरफ सीमेंट का डिब्बा बन हुआ था वो शायद कचरे के लिए बनाया गया था. हम उस पर खड़े होकर दूर गंदे नाले के ऊपर से जाती हुई रेलगाड़ी देखा करते थे. बचपन में हम सब बच्चों को गंदे नाले की तरफ जाने की मनाही थी. नाला भी एक नहर जितना बड़ा था. उस गंदे नाले के उस पार कौन लोग रहते हैं इस रहस्य को न तब किसी ने खोला और न आज तक हमें पता चल पाया. अजीब अजीब कल्पनाएँ मन में उठती थीं. नाले की विशालता देख कर हमारा बाल मन भयभीत हो जाया करता था. दोपहर को गेंद , गोते और कैरम खेलते और शाम को चाट पकौड़ी उड़ाते महिना कब गुजर जाता हमें पता ही नहीं लगता था. हमारे वापस जाने के दिन आ जाते और हमारे साथ सभी लोग उदास हो जाते . चाची हमारे साथ ढेरों समान बांध देती.
एक बार शशि दीदी ने जिद पकड़ ली की वे भी हमारे साथ अलीगढ जायेंगी. चाचा जी ने बहुत समझाया की तुम कभी घर से दूर नहीं रही हो तुम नहीं रह सकोगी. (हमारे अलीगढ के किराये के मकान और कोठी में बहुत अंतर था. ) पर हमारे साथ कुछ और दिन बिताने के लालच में वे बोली की मैं एडजस्ट कर लूंगी हम लोग अलीगढ आ गए . अलीगढ में हमारा मकान पहले माले पर था. दो कमरे और बीच में बड़ा सा आँगन आगन के दूसरे छोर पर टायलेट . सुबह जब उनको जाना था तो वे उसको देख कर डर गयी क्योंकि दिल्ली में तो पाश्चात्य टाइप का टायलेट था और अलीगढ में ऊपर के माले पर टायलेट के नाम पर एक छेद था और ग्राउंड फ्लोर पर एक छोटे से पतले से कमरे में एक बड़ा सा घड़ा रखा होता था. ग्राउंड फ्लोर के कमरे का दरवाजा गाली में खुलता था. और मेहतर हाथगाड़ी में मैला खाली करके ले जाते थे. लेकिन जब कोई उस शौच को इस्तेमाल करता था तो नीचे घड़े से इतनी जोर की आवाज आती थी जैसे कोई बम फूट रहा हो. शशि दीदी ने उसी दिन वापसी की गाड़ी पकड़ ली. ) ही ही ही ही ..........
ये यादें तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही हैं और मुझे तो कहीं न कहीं रुकना ही है न.................