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गुरुवार, 23 जून 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (१७)




नीरज गोस्वामी :

फिर लौटना बचपन में !

गर्मियों
की छुट्टियों का जिक्र आते ही मन चालीस साल पीछे लौट गया है. यूँ तो छुट्टियों के बहुत से किस्से ज़ेहन में हैं लेकिन उनमें से एक विशेष है जो आपको सुनाता हूँ. हम दो भाई हैं .हमारा ननिहाल जगाधरी यमुना नगर में था. माताजी हर गर्मियों की छुट्टियों में हमें ननिहाल हमें लेजाया करती थीं. ननिहाल में नानी नाना दो मामा मामियां दो मौसियाँ थीं. मौसियाँ शादी शुदा थीं लेकिन रहती यमुना नगर में ही थीं. उनके और हमें मिला कर कुल मिला कर बारह तेरह बच्चे हो जाया करते थे. नाना का खूब बड़ा सा घर जिसमें आम अमरुद लीची जामुन नीम्बू नीम के कई पेड़ थे. अंगूरों की बेल की छत के नीचे एक बड़ा सा पानी का हौद था जिसे हम बच्चे पहले रगड़ रगड़ कर साफ़ किया करते और शाम को पानी भर के घंटों नहाया करते. सारे दिन सिवा धमा चौकड़ी मचाने और खाने के और कोई काम नहीं हुआ करता था.

मैं शायद आठवीं में था जब गर्मियों की छुट्टियाँ आने पर पिताजी ने कहा के तुम इस बार अपनी माताजी के साथ ननिहाल न जा कर यहीं जयपुर में मेरे साथ रहो. मुझे उनकी बात रुचिकर नहीं लगी, लेकिन उन्हें मना करने का साहस नहीं था. मेरे उतरे चेहरे को पिताजी ने भांप लिया और बोले अच्छा ये बताओ तुम मेरे क्या करने पर यहाँ रुक जाओगे. मैंने सोचने के बाद जवाब दिया के अगर आप मुझे एक महीने में तीन फ़िल्में दिखायेंगे तो मैं ननिहाल नहीं जाऊंगा. कहाँ तो हम साल में एक आध फिल्म देखते थे और कहाँ मैंने एक महीने में तीन फ़िल्में देखने की बात कह दी. मुझे यकीन था के पिताजी मेरी इस बात को कभी नहीं मानेंगे लेकिन हुआ इसके ठीक उल्टा, पिताजी ने मेरी शर्त मान ली. मैं पिताजी के इस निर्णय से खुश होऊं या दुखी ये सोच नहीं पा रहा था एक तरफ ननिहाल की मस्ती और दूसरी तरफ फिल्मों का आकर्षण दोनों ही मेरे प्रिय थे. खैर मेरे पास सिवा जयपुर में रुकने के दूसरा कोई रास्ता नहीं बचा था. छोटे भाई और माताजी को रोते रोते स्टेशन से विदा किया और घर आ गया. दिन बीतते गए और फिल्मों का कोई जिक्र पिताजी की तरफ से जब नहीं हुआ तो मुझे लगा के मुझे रोकने के लिए ही ये शाजिश की गयी थी.

एक दिन शाम के पांच बजे थे पिताजी घर आये और बोले नहा धो कर तैयार हो जाओ बाहर जाना है. कहाँ जाना है पूछने की हिम्मत नहीं पड़ी .फटाफट नहा धो कर तैयार हो गया. उन्होंने अपनी साइकिल पर मुझे आगे बिठाया और इधर उधर की बातें करते हुए बाज़ार की और बढ़ने लगे. मेरी उत्सुकता चरम सीमा पर थी मैंने पूछ ही लिया के हम कहाँ जा रहे हैं वो मुस्कुराते हुए बोले अभी खुद ही देख लेना.पंद्रह मिनट के बाद हम जयपुर के प्रेम प्रकाश सिनेमा के बाहर थे. सिनेमा के बाहर मुगले आज़म फिल्म के बड़े बड़े पोस्टर लगे थे. मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था के मैं फिल्म देखने आया हूँ. साइकिल स्टेंड पर रखने के बाद टिकट ली गयी और जब हम हाल में अन्दर घुसे तो मारे ख़ुशी के मैं रो ही पड़ा. उस वक्त फिल्म देख कर समझ तो ज्यादा नहीं आई लेकिन मज़ा बहुत आया. खास तौर पर सलीम और अकबर की लड़ाई वाले दृश्यों को देख कर.रात को बाहर आ कर होटल पर जा कर कुलचे छोले और आलू की टिकिया खाई. मेरे मन में अपने पिता को लेकर जो डर था वो इस यादगार शाम के बाद काफूर हो गया. बाद में उन्होंने मुझे सुनील दत्त वाली "गुमराह " और " आज और कल" फ़िल्में भी दिखाईं. मेरे पिता उन गर्मियों की छुट्टियों के बाद से मेरे सबसे अच्छे दोस्त बन चुके थे.

बुधवार, 22 जून 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (१५)

अनवर जमाल भाई की बचपन की यादों का मजा आप भी उठाइए और अपनी यादों को हम तक तो लेआइये, तभी तो सभी उसके साझीदार बनेंगे। आप सभी से जो अभी तक इसमें शामिल नहीं हुए या फिर जिनकीस्मृतियों का पिटारा अभी खाली नहीं हुआ है मुझे सहयोग दे सकते हैं.






डॉ अनवर जमाल



छुट्टियाँ तो गाँव में ही ..........

गर्मियों की छुट्टियों का मज़ा तो बस गांव में आता है
गर्मी की छुट्टियां हमारे लिए स्कूल से आज़ादी का पैग़ाम लाती थीं। इन
छुट्टियों में हम अपनी ननिहाल जाया करते थे जो कि ज़िला सहारनपुर के
क़स्बा नानौता से तक़रीबन 5 किलोमीटर दूर स्थित है। इस गांव का नाम है
छछरौली। यह गांव क़ुदरती मंज़र की दौलत से मालामाल है। हरे भरे खेत और
बाग़ों के दरम्यान बहते हुए छोटे-बड़े राजबाहे इस इलाक़े की रौनक़ हैं।
बच्चों की छलांगों से और उनके शोर-पुकार से सारा माहौल गूंजता रहता है।
इन्हीं बच्चों के बीच में हम भी शामिल रहा करते थे। एक दूसरे के पीछे
भागना और फिर पुल पर चढ़कर छपाक से पानी में कूद जाना और फिर पानी में भी
तैर तैर कर पकड़म पकड़ाई खेलना।
हमारे नाना पुराने ज़माने के नंबरदार हैं। उनके वालिद ने जब ज़मीनें
ख़रीदी थीं तो उनका पेमेंट अशर्फ़ियों से किया था जो कि तौलकर दी गई थीं
और गधों पर लादकर भेजी गई थीं।
सीलिंग और भाईयों में बंटवारे के बाद खेती की ज़मीन के अलावा 55 बीघे में
उनके बाग़ आज भी हैं। जिनमें आम, बेर, जामुन और नाशपाती से लेकर तरह तरह
के पेड़ लगे हुए हैं। बुनियादी तौर पर ये आम के बाग़ ही कहलाते हैं। जब
तेज़ हवा चलती थी तो हम ख़ुश होकर दूसरे बच्चों के साथ बाग़ों की तरफ़
भागा करते थे और छोटी छोटी आमियां चुन लाते थे अपने खाने के लिए। हम तो
दस-बीस कैरियां ही लाते थे बाक़ी सब समेटकर कूड़े पर फेंक दी जाती थीं।
शहरों में इन्हें आज महंगे भाव बिकते देख कर मुझे ताज्जुब भी होता है और
पुराने दिन भी याद आते हैं।
हमारी नानी का घर भी बहुत बड़ा था और उनकी पशुशाला भी। उनकी मुर्ग़ियां
जहां-तहां अंडे देती फिरती थीं और हम उन्हें ढूंढते फिरते थे। जो अंडा
जिस बच्चे को मिलता था। उसे अंडे पर उसी बच्चे का हक़ मान लिया जाता था।
कभी भूसे के कमरे में तो कभी गेहूं स्टोर करने वाले कमरों में, हर जगह हम
अंडों की टोह लिया करते थे।
हमारे नाना के पास पहले तो बहुत गाय भैंसे थीं। इतनी थीं कि कभी उन्हें
खूंटे पर बांधने की नौबत ही नहीं आई। बस बाड़े में हांक कर दरवाज़ा बंद
कर दिया। नाना और नानी बीमार हुए तो बस 5 भैंसे और कुछ बकरियां ही रह गई
थीं। अपने लिए तो ये भी बहुत थीं। उनके मक्खन और घी का ज़ायका हमारी
छुट्टियों की लज़्ज़त को बहुत ज़्यादा बढ़ा देता था। आंगन के नीम तले
कढ़ते हुए लाल लाल दूध को उसकी मोटी मलाई के साथ पीना, वाह...। सोचकर आज
भी मज़ा आ जाता है।
हमारी एक ख़ाला और दो मामू हैं। हमारे बचपन में हमारे दोनों मामू की शादी
नहीं हुई थी लिहाज़ा उनका पूरा लाड प्यार हम पर ही बरसता था। ख़ाला की
शादी हमारे चाचा से ही हुई है। वह भी वहीं आ जाती थीं। या तो नाना का घर
पूरे साल सुनसान पड़ा रहता था या फिर एक दम ही धमाचैकड़ी मच जाती थी।
नाना बेचारे हमारे पीछे पीछे यही देखते रहते थे कि कौन बच्चा छत पर है और
कौन बच्चा घास काटने वाली मशीन पर ?
उनकी सांसे अटकी रहती थीं, जब तक कि हमारी छुट्टियां पूरी नहीं हो जाती
थीं। हमारी सलामती की वजह से ही हमें हमारे मामू घोड़ों की सवारी भी नहीं
करने दिया करते थे। फिर भी हम ज़िद करके और कभी मिन्नत करके उनकी सवारी
गांठ ही लिया करते थे। इसी दरम्यान हम छोटे मामू साबिर खां साहब के साथ
मछली के शिकार के लिए भी जाया करते थे। जाल वाल लेकर गांव के बहुत से
आदमियों के साथ मछली पकड़ने का रोमांच भी अलग ही है। कभी यही टीम अपने
शिकारी कुत्तों के साथ ख़रगोश के शिकार के लिए जाया करती थी। ग़र्ज़ यह
कि तफ़रीह बेतहाशा थी।
इसी बीच आम खाने लायक़ हो जाया करते थे। बाग़ से आम तुड़वाकर टोकरों और
बोरियों में भी हमारे सामने भरा जाता था और इस तुड़ाई में हम भी हिस्सा
लेते था। फिर उसे मज़दूर भैंसा बुग्गी या ट्रैक्टर पर लाद देते और एक
ख़ास तरीक़े से उन्हें तीन दिन तक रज़ाईयों के नीचे ढक दिया जाता। तीसरे
दिन से हमारी नानी हमें छांट छांट कर आम देतीं और हम बच्चे अपने अपने आम
बाल्टियों में भिगो कर खाते। आम इन छुट्टियों का ख़ास आकर्षण हुआ करते
थे। आज भी हम यही कोशिश करते हैं कि बाज़ार से आम लाएं तो टोकरे में ही
लाएं। लेकिन इस कोशिश के बावजूद हमें बचपन वाला वह मज़ा नहीं आता।
हम आज भी सोचते हैं कि जिन लोगों की ननिहाल किसी गांव में नहीं है,
उन्हें गर्मियों की छुट्टियों का मज़ा भला क्या आता होगा ?

शुक्रवार, 17 जून 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (१४)








डॉ डंडा लखनवी:



घटना सन १९६० की है। उस समय मेरी आयु लगभग दस वर्ष की थी। प्रायः इस आयु में बच्चों की जिज्ञासु प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति के कारण वे संसार को अपनी ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा जानना , समझना और परखना चाहते हैं। इससे उनका अनुभव बढ़ता है और जिज्ञासाएं शांत हो जाती हैं। प्रयोग करके सीखने की प्रवृत्ति अन्य बच्चों की तरह मेरे मन में भी थी। उन दिनों लखनऊ में मलेरिया का प्रकोप फैला और घर में कई लोग ज्वर से पीड़ित थे। डॉक्टर ने सलाह दी कि रोगियों का बुखार नाप कर उसके बारे में उसको बताया जाय। इसी लिए पिताजी एक अच्छा सा थर्मामीटर खरीद कर घर लाये। उसे मुख में डाल कर शरीर का ताप नापा गया। मैंने ताप नापने की क्रिया को बड़े ध्यान से देखा। मेरे बाल मन में जिसे देख कर एक कौतूहल जाग उठा कि इससे शरीर के ताप की तरह दीपक की लौ का ताप भी नापा जा सकता है। अतः दीपक की लौ का ताप नापने की इच्छा मन में घर कर गयी। उपचार के बाद थर्मामीटर घर के अन्य सामानों की तरह से सभाल कर रख दिया गया। इसी बीच गर्मियों की छुट्टियाँ आ गयी और एक दिन दोपहर में जब घर के अन्य सदस्य आराम कर रहे थे। मैंने चुपके से थर्मामीटर निकला , एक मोमबत्ती जलाई और उसकी लौ से थर्मामीटर स्पर्श करवा दिया। थर्मामीटर चट की आवाज के साथ तुरंत टूट गया। मैं इस परिणाम से बेखबर था। अतः जो होना था सो हो ही गया। उसके अन्दर भरा हुआ पारा ओस की बूंदों की तरह से फर्श पर बिखर गया। मैं ज्यों ज्यों उन्हें समेटने का प्रयास करता वे त्यों त्यों और छोटे छोटे कणों में बिखरती चली गयीं। मेरा समेटने का प्रयास व्यर्थ चला गया। इस प्रयोग से मैं हक्का बक्का रह गया। इस घटना की जानकारी जब पिताजी को हुई तो बड़ी डांट पड़ी थी।
उस घटना से मुझे ये सबक मिला की प्रयोग से पहले सावधानियों की पूरी जानकारी पहले से कर लेनी चाहिए।

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (१३)

हालात कुछ ऐसे नहीं कि कुछ कह सकूं , बस आपने भेजा और मैंने आप लोगों के सामने रख दिया। इससे अधिक कुछ भी कहने लायक नहीं। आपके अनुभव प्रस्तुति में विलम्ब हो सकता है इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। लेकिन अपना स्नेह बनाये रखें और मुझे भेज अवश्य दें।












रश्मि
प्रभा:


गर्मी की छुट्टियां ??????????? छुट्टी तो हमेशा होती थी . पर लगातार घर में रहना गर्मियों में
ही संभव होता . तो उसका ज़िक्र चलिए मैं कर देती हूँ , पर इसके लिए तो मेरी माँ को कलम देनाअधिक
बेहतर होता . .
घटना कहूँ या हादसा या अपनी टोली का हसीन लम्हा ...... छुट्टियों में तो एक तरफ हर वक़्त भूख लगी होती ,
दूसरी तरफ चीजों को अस्त व्यस्त करने की साझेदारी ,और जब माँ की आँख लग रही होती , उसी वक़्त गुत्थम गुत्थी
मारापीटी और एक दर्दीली चीख लगाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार था ! याद है एक वाक्या ... तंग आकर एक दिन माँ
ने हमें भण्डार में बन्द कर दिया . ओह, बहुत खुश थी हमें सबक सिखाते.... पर उसे क्या पता था कि हमारे चेहरे परकैसी मुस्कान
खिल रही थी. दरवाजे की कुण्डी लगते हम भाई-बहन ग्राहक दुकानदार बन गए . पाँच की टीम थी तो एक दुकानदार, एक उसका सेवक
और तीन ग्राहक . सेर तराजू बटखरा सब मौजूद .... जमीन पर एक तरफ चावल की बोरी उल्टी गई, एक तरफ गेंहू , एकतरफ दाल...
और शुरू हुई हमारी एक्टिंग ... 'कितना चाहिए भईया चावल ?' .... 10 सेर ?
'लो भईया ...एके राम एक एके राम एक .......दू -. दुए राम दू दुए राम.........'
माँ ने जब दरवाज़ा खोला , दृश्य और माँ - दोनों देखने लायक थे ... चावल, दाल, गेंहू लगभग मिल गए थे और हममासूमियत से खड़े थे .
माँ समझ नहीं पा रही थी कि सामान उठाये - वो भी अलग अलग या हमारे कान उमेठे , और वह रोने लगी , हम उसेघेरकर खड़े हो गए उस वक़्त
इस दिलासे के साथ कि आगे से ऐसा नहीं करेंगे . .......
ऐसी छुट्टी की छुट्टी कर देनेवाली कई कहानियाँ पिटारी में हैं , सुनना है ???

हाँ सुनना है रश्मि जी, आप हमें भेजिए हम सब को सुनाते हैं।

(सफर अभी जारी रहेगा )

बुधवार, 8 जून 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (११)


श्यामल सुमन :




ये था मेरा बचपन !



यूँ
तो मेरा बचपन पूरी तरह गाँव में ही बीता बल्कि यूँ कहें की पूरी पढाई ही गाँव में हुई क्योंकि मैट्रिक की पढाई ख़त्म होते ही पेट की आग बुझाने के लिए मुझे नौकरी का नया आयाम चुनना ही था और मैंने चुना भी. खैर-- बात बचपन की यादों और खासकर के गर्मी की छुट्टियों में बिताये गए समय की है तो चलिए वहीँ चलता हूँ. आज जब हमारे बच्चे "समर वेकेशन इंजॉय" करते हैं शहरों में, उन दिनों वैसा वातावरण गाँव में कहाँ? यदि कहीं कुछ संभावनाएं बन भी सकतीं थीं तो अर्थाभाव बहुत बड़ी बाधा थी.

शहर
हो या गाँव गर्मी की छुट्टियाँ तो सबकी तरह मुझे भी मिलतीं थीं साथ में विद्यालय से अच्छा खासा होम वर्क भी. मैं सबसे पहले बिशेष मेहनत करके उस होम वर्क को पूरा कर लेता था ताकि आगे किसी प्रकार का कोई मानसिक बोझ न रहे. फिर शुरू हो जाती थी बाल-सुलभ धमा-चौकड़ी, खेल-कूद और ग्रामीण परिवेश में उपलब्ध कई प्रकार के मनोरंजन. उन दिनों में "गुल्ली-कौड़ी" का खेल बहुत प्रचलित था हमलोगों के बीच में. इसके अतिरिक्त "लुका-छिपी", कबड्डी, गिल्ली-डंडा और कई प्रकार के खेलों में हम उम्र साथियों के साथ लगे रहने में काफी मज़ा आता था. न खाने की सुध न नहाने की और न ही डांट-डपट का भय. बस मस्त रहना. युद्ध जीतने पर किसी कमांडर को जितनी ख़ुशी मिलती है किंचित उससे अधिक ख़ुशी मिलती थी खेल में अपने प्रतिद्वंदियों को पराजित करने में. मन ही मन कई तरह की योजनायें बनाता अपनी जीत की निश्चितता के लिए और सफलीभूत होने पर तो अपने को "चाणक्य" या "चर्चिल" से कम समझने का कोई प्रश्न ही नहीं पैदा होता था.

आजकल
की तरह आधुनिक "स्विमिंग पूल" के बदले हमलोगों ने प्राकृतिक रूप से नदी और तालाब में तैरने का खास आनंद भी उठाया करता था गर्मी की छुट्टियों में वो भी काफी देर तक. चूँकि मैं बिहार के कोशी प्रभावित इलाके से आता हूँ. अतः नदी और तालाब की निकटता और साहचर्य स्वाभाविक है. यह भी एक मनोरंजक किन्तु स्वासथ्यवर्धक क्रीडा सामान्य रूप से स्वीकृत थी हम बच्चों के बीच जिसका आनंद हमलोग सम्मिलित रूप से उठाते थे. इस तैरने के क्रम में भी पानी के अन्दर भी कई प्रकार के खेलों का ईजाद हम लोग स्वयं कर लिया करते थे.

अक्सर
गाँव, शहर के वनिस्बत प्रकृति के अधिक करीब होता है. इन्हीं छुट्टियों के दरमियान आम, जामुन, लीची आदि जैसे ललचाने वाले बार्षिक फलों का पेड़ों में लगना प्राकृतिक घटना है जिसे नजदीक से देखने का, तोड़ के खाने का एक अलग आनंद मिलता था . यह बताना उचित लगता है कि चोरी करके आम तोड़ने का एक खास आनंद मिलता था और मज़े कि बात है कि उन दिनों से आज तक भी गाँव में आम कि चोरी को को चोरी माना ही नहीं जाता. पकडे जाने पर मामूली डांट-डपट से मामला ख़तम. साथ ही याद करता हूँ कि जब भी आंधी-तूफान के आसार भर नज़र आते थे कि साथियों के साथ गाँव के किसी के बगीचे या पास के ही जंगल की तरफ दौड़ शुरू ताकि अधिक से अधिक आम चुन कर ला सकूँ. कुछ इसी तरह से गर्मी की छुट्टियों का आनंद उठाया करता था.

सारी बातें तो लिखना संभव नहीं लेकिन आज आपने रेखा जी बहुत लिखवा लिया. मैंने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत गद्य लेखन से ही किया था लेकिन अधिक लिखने के डर से मैंने पद्य लिखने का रास्ता चुना लेकिन आपके बिशेष आग्रह के कारण आज बच नहीं पाया. चूँकि कवि हूँ अतः कभी बचपन के ऊपर एक कविता लिखी थी उसे भी प्रेषित कर रहा हूँ.

बचपन

आती याद बहुत बचपन की।
उमर हुई है जब पचपन की।।

बरगद, पीपल, छोटा पाखर।
जहाँ बैठकर सीखा आखर।।

संभव न था बिजली मिलना।
बहुत सुखद पत्तों का हिलना।।

नहीं बेंच, था फर्श भी कच्चा।
खुशी खुशी पढ़ता था बच्चा।।

खेल कूद और रगड़म रगड़ा।
जो प्यारा था उसी से झगड़ा।।

बोझ नहीं था सर पर कोई।
पुलकित मन रूई की लोई।।

हर बालू-घर होता अपना।
शेष अभीतक घर का सपना।।

रोज बदलता मौसम जैसे।
क्यों न आता बचपन वैसे।।

बचपन की यादों में खोया।
सु-मन सुमन का फिर से रोया।।