शुक्रवार, 17 जून 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (१३)

हालात कुछ ऐसे नहीं कि कुछ कह सकूं , बस आपने भेजा और मैंने आप लोगों के सामने रख दियाइससे अधिक कुछ भी कहने लायक नहींआपके अनुभव प्रस्तुति में विलम्ब हो सकता है इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँलेकिन अपना स्नेह बनाये रखें और मुझे भेज अवश्य दें












रश्मि
प्रभा:


गर्मी की छुट्टियां ??????????? छुट्टी तो हमेशा होती थी . पर लगातार घर में रहना गर्मियों में
ही संभव होता . तो उसका ज़िक्र चलिए मैं कर देती हूँ , पर इसके लिए तो मेरी माँ को कलम देनाअधिक
बेहतर होता . .
घटना कहूँ या हादसा या अपनी टोली का हसीन लम्हा ...... छुट्टियों में तो एक तरफ हर वक़्त भूख लगी होती ,
दूसरी तरफ चीजों को अस्त व्यस्त करने की साझेदारी ,और जब माँ की आँख लग रही होती , उसी वक़्त गुत्थम गुत्थी
मारापीटी और एक दर्दीली चीख लगाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार था ! याद है एक वाक्या ... तंग आकर एक दिन माँ
ने हमें भण्डार में बन्द कर दिया . ओह, बहुत खुश थी हमें सबक सिखाते.... पर उसे क्या पता था कि हमारे चेहरे परकैसी मुस्कान
खिल रही थी. दरवाजे की कुण्डी लगते हम भाई-बहन ग्राहक दुकानदार बन गए . पाँच की टीम थी तो एक दुकानदार, एक उसका सेवक
और तीन ग्राहक . सेर तराजू बटखरा सब मौजूद .... जमीन पर एक तरफ चावल की बोरी उल्टी गई, एक तरफ गेंहू , एकतरफ दाल...
और शुरू हुई हमारी एक्टिंग ... 'कितना चाहिए भईया चावल ?' .... 10 सेर ?
'लो भईया ...एके राम एक एके राम एक .......दू -. दुए राम दू दुए राम.........'
माँ ने जब दरवाज़ा खोला , दृश्य और माँ - दोनों देखने लायक थे ... चावल, दाल, गेंहू लगभग मिल गए थे और हममासूमियत से खड़े थे .
माँ समझ नहीं पा रही थी कि सामान उठाये - वो भी अलग अलग या हमारे कान उमेठे , और वह रोने लगी , हम उसेघेरकर खड़े हो गए उस वक़्त
इस दिलासे के साथ कि आगे से ऐसा नहीं करेंगे . .......
ऐसी छुट्टी की छुट्टी कर देनेवाली कई कहानियाँ पिटारी में हैं , सुनना है ???

हाँ सुनना है रश्मि जी, आप हमें भेजिए हम सब को सुनाते हैं

(सफर अभी जारी रहेगा )

17 टिप्‍पणियां:

  1. रेखा जी आप तो उस लड़की में चाभी भर रही हैं , कहने लगी तो आप थक जाएँगी न

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  2. हा हा!! इस पर तो पहले कान उमेठ ही देना था अम्मा को..तो न और बदमाशी होती और न ही कहानियाँ बनती. :)

    और सुनाईये किस्से!!!!रोचक है!

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  3. बाप रे कितने शैतान थे आप लोग :).

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  4. niv jee,

    apake bachpan ke sansmaranon ka yahan par svagat hai. aap mujhe bhej sakate hain.
    rekhasriva@gmail.com par.

    mujhe intjaar rahega.

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  5. बहुत रोचक ..अब चाभी भर ही दी है तो सुना दीजिए और कहानियाँ ..

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  6. रश्मि जी,
    ऐसी छुट्टी की छुट्टी कर देनेवाली कई कहानियाँ पिटारी में हैं..... हाँ, जरूर सुनना है . बेहद मजेदार पोस्ट ...आभार.

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  7. बहुत रोचक संस्मरण।मजेदार पोस्ट ...आभार.

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  8. इस पिटारी को बन्‍द मत होने दीजिये ... रोचकता का जादू आपकी शैतानियों से चेहरे पर मुस्‍कान ले आता है ..बहुत खूब ।

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  9. मै इसीलिए हमेशा कहती हूँ कि इन बच्‍चों से कभी पंगा मत लो, अब मिला दिया ना सारा ही चावल-दाल। इन्‍हें तो खुले मैदान में छोड़ देना चाहिए कि भाई तुम्‍हारी जंचे जो यहाँ कर लो। आपके संस्‍मरण सुनकर तो बेचारे माता-पिता डर जाएंगे। कहेंगे की इस शैतान की खाला को दूर ही रखो। हा हा हाहा। और क्‍या है पिटारे में?

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  10. बहुत रोचक..बचपन में शैतानी न हो ऐसा हो ही नहीं सकता..

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ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जो मन में होता है आपसे उजागर कर देते हैं. आपकी राय , आलोचना और समालोचना मेरा मार्गदर्शन और त्रुटियों को सुधारने का सबसे बड़ा रास्ताहै.