गुरुवार, 2 जून 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (७)

हम तो माँगने निकले हैं और जिसने जो दे दिया वह हमारे लिए नियामत है, किसी ने यादेँ दीं, किसी ने शैतानियाँ , किसी ने दुस्साहसपूर्ण कार्यों का व्योरा थमा दियाहमारे पवन चन्दन जी ने आग्रह तालानहीं बल्कि उस समय जो भी उनके पास था उन्होंने मेरे नजर कर दियामुझे बहुत अच्छा लग रहा है अपने सभीमित्रों का ये सहयोगपूर प्यार जो मेरे इस सफर को आगे ले जाने में मेरे सहायक हैं बल्कि कहिये आधार हैं






अजय कुमार झा :

बचपन कभी लौट के नहीं आता


बचपन , और उसकी यादें । सच कहूं तो बचपन खुद ही यादों का टोकरा होता है , कमाल की बात ये है कि बचपन न सिर्फ़ हमारे लिए बल्कि हमारे अपनों के लिए भी हमारा बचपन उनकी यादों का टोकरा ही होता है । एक ऐसा टोकरा , जो समय के साथ और भी भरता जाता है , नई यादें जुडती जाती हैं लेकिन फ़िर भी बचपन की यादों का तो जैसे एक अलग ही सैक्शन होता है । और बचपन की बातें जब आप बडे होकर याद करते हैं , तो बहुत सी मीठी खट्टी यादें आपके आसपास तैरने लगती हैं ।


मुझे अगर बचपन की सारी यादों में कुछ चुनिंदा यादें अलग करने को कहा जाए तो मैं यकीनन , ही गर्मियों की छुट्टियों के उन दिनों को याद करता हूं जो हम अक्सर नानी गांव में बिताया करते थे । पिताजी फ़ौजी थे और हम सेंट्रल स्कूल के बच्चे , हमारे दो महीने की गर्मियों की छुट्टियां पापा के लिए दो महीने की एनुअल लीव में कंवर्ट हो जाती थी । उन दिनों रेल में सफ़र करने की जो यादें , वो पुराने स्टेशन , चारबाग लखनऊ का , तांगों से खचाखच भरा हुआ ,वहां से सफ़र शुरू होकर खत्म होता था बिहार के मधुबनी जंक्शन पर । आह क्या सफ़र होता था कमाल का , सुराही और छागल का जमाना था वो , स्टेशन पर गाडी रुकते ही पानी के लिए भागमभाग, सुराही में डाल कर उसके खिडकी के किनारे रख देना , सुना था कि जितनी हवा लगती है सुराही को पानी उतना ठंडा हो जाता है , और वाह क्या होता था ठंडा । उफ़्फ़ वो मिट्टी की सौंधी खुशबू , फ़िर पूरी जिंदगी मयस्सर नहीं हुआ वो अमृत । मधुबनी पहुंचते पहुंचते हालत ऐसी हो चुकी होती थी कि मानो दंगल लड के आ रहे हैं ।

स्टेशन पर पहला काम होता था , मां का , हमें प्लेटफ़ॉर्म पर लगे चापाकल पर जितना हो सके मांज के पहचाने जाने लायक करना , अगर पापा का मूड ठीक है और वे बक्से को दोबारा से खोल बंद करने में गुस्सा नहीं किए जाने जैसे दिख रहे हैं तो फ़िर आपको एक अदद जोडी हाफ़ पैंट और टीशर्ट भी प्रदान की जा सकती है । स्टेशन से आगे का सफ़र तय होता था कटही गाडी (हां ये बैलगाडी जैसा होता था लेकिन पीछे की बॉडी और यहां तक कि उसके पहिए भी सिर्फ़ लकडी का बना होता था ), समय लगता था तकरीबन चार या सवा चार घंटे । ओह क्या सफ़र होता था वो , नदिया के पार का कोन दिसा में ले के चला रे बटोहिया का गाना याद है आपको , बस वही सिनेमा चलता था समझिए , रेत वाले और मिट्टी वाले रास्तों में जब वो कटही गाडी फ़ंसती थी तो हमारे मौसेरे भाई जो उसके डरेवर हुआ करते थे , वे कूद के आगे से बैलों को आव आव आव आव आव आव करते थे और हम बच्चे , नीचे उतर के मस्ती करने लगते थे । रास्ते में लगे हुए आम के पेडों में वो लदे फ़दे आम । कई बार इतने लदे हुए कि नीचे से सोंगड (डाली को अबांस या लाठी का सहारा देना ) तक लगे रहते थे । हम ऐसे हुलस जाते थे कि कूद के तोड लिया जाए या कि मार जाए मिट्टी का ढेला और आम हाथ में । कई बार कर भी डालते थे , आम तो क्या खाक आना था , बगीचे वाले जरूर आ जाते थे फ़िर देखते तो कहते , अरे ई सहरूआ सब है , दे दो , आम दो , गोपी आम सब (गोपी आम वो जो उन दिनों सबसे पहले पेडों पर पकते थे ) , और बस रास्ते में ही पेट पूजा का जुगाड हो जाता था । रास्ते में पडने वाले जाने कितने ही कमल गाछी , बगीचे , ताल , तलैये , पोखरे , मंदिर , कुंएं , ढिहबाड स्थान , सब एक एक करके यादों का कोना पकड लेते थे , और जिन कोनों को हम शहर में जाकर हम टटोला करते थे ..........

और अब तक टटोला करते हैं ॥







पवन चन्दन :

रेखा जी नमस्‍कार
बचपन की तो बहुत सी घटनाएं हैं। किस को लिखूं यही सोच रहा था । अचानक मुझे याद आया कि मैंने बचपन के दिनों की गांव के माहौल की एक रचना लिखी थी। उसे भेज रहा हूं। समय मिल पाया तो कोई किस्‍सा जरूर भेजूंगा।

क्‍या
जीवन था....



जब
चलती चक्की घोर घोर, सब बोले हो गयी भोर भोर
फिर चून पीस कर चार किलो, गिड़गम पर रखा दूध बिलो
नेती से जब जब रई चली फिर छाछ बटी यूं गली गली
यूं बांट बांट कर स्वाद लिया, बचपन को हमने खूब जिया
क्या जीवन था वो ता...ता...धिन
मैं ढूंढ़ रहा हूं वो पल छिन
जीवन जीने के झगड़े में नंगे पांवों दगड़े में
चलते चलते रेतों में पहुंच गये हम खेतों में
फिर एक भरोटा चारा ले ज्वार बाजरा सारा ले
सूखा सूखा छांट दिया लिया गंडासा काट दिया
गाय भैंस की सानी में यूं बीत गया फिर सारा दिन
मैं ढूंढ़ रहा हूं वो पल छिन


सांझ घिरी जब धुएं से, फिर आयी पड़ोसन कुएं से
लीप पोत कर चूल्हे को ज्यों सजा रहे हों दूल्हे को
फिर झींना उसमें लगवाया, फोड़ अंगारी सुलगाया
जब लगी फूंकनी आग जली, यूं चूल्हे चूल्हे आग चली
कितने चूल्हे जले गांव में दर्द भरा है ये मत गिन
मैं ढूंढ़ रहा हूं वो पल छिन




अविनाश वाचस्पति:

बचपन क्या एक धरोहर है ?

बचपन में गर्मियों का गर्म अहसास तो कभी हुआ ही नहीं। न फ्रिज होते थे और न एसी अथवा कूलर। पर गर्मियों में धूप में घूमने से एक अजीब सा सुकून मिलता था। मैं जहां पर रहता हूं, वहां पर मेरे बचपन में चारों ओर जंगल, खाईयां और पहाडि़यां हुआ करते थे और मैं अपने एक दो मित्रों अथवा छोटे भाई के साथ वहां पर बेरियां छानने निकल पड़ता था। लाल बेरी की झाडि़यां खूब होती थीं जिनसे हाथ बचाकर लाल पीले बेरफल तोड़ने और उन्‍हें खाने में खूब स्‍वाद आता था। भरी तपती दोपहरी में दो तीन घंटे कैसे बीते जाते थे। याद नहीं है परंतु तब न तो पानी की जरूरत होती थी। और यूं ही जंगलनुमा जगहों पर मित्रमंडली मारी मारी फिरती थी।

स्‍कूल की छुट्टियों में बुआ चाची के बच्‍चे घर आया करते थे या हम जाया करते थे और खूब धमा चौकड़ी मचाया करते थे। बावजूद इसके कि हमें कहा जाता था कि बाहर बहुत धूप है सो जाओ परंतु नींद आंखों से गायब रहती थी। यहां घर के लोग सोए कि हम बाहर खिसक लिए।

शाम होते होते आसपास के घरों में छिपन छिपाई खेलना, खो खो खेलना चलता था। परंतु सबसे अधिक आनंद छिपन छिपाई में मिलता था। जब थप्‍पा या ....... यह शब्‍द तो याद ही नहीं आ रहा है, कहा जाता था। वैसे पढ़ने का शुरू से भूत रहा हूं। नंदन, चंपक, पराग, चंदामामा, लोटपोट, दीवाना और समाचारपत्र में नवभारत टाइम्‍स जैसे ही घर में आता था कि एक सीटिंग में पूरा पढ़ जाता था।

कई गर्मियों में जब किशोर हुआ तो जासूसी उपन्‍यास भी खूब पढ़े हैं। बहुत चस्‍का लगा था। उन दिनों वेदप्रकाश कम्‍बोज के जासूसी उपन्‍यास बहुत पढ़े। पर यह सब काम एक सीटिंग का ही होता था। और उसी का नतीजा है कि आज पढ़ने में गजब की गति है और आज ब्‍लॉगिंग में खूब काम आ रही है।

तभी ग्‍यारह बरस की उम्र में लिखने का शौक लग गया था और चार पांच बरस बाद छपने का आनंद भी लूटना शुरू कर दिया था। प्रकाशन के नाम पर उन दिनों संपादक के नाम पर खूब पत्र छपे हैं। सब संभाले हुए हैं। इसी लिखने के शौक के चलते हिन्‍दी टाइपिंग सीखी और एक माह से अधिक सीखने का पैसा नहीं दिया। टाइपिंग कॉलेज का हिन्‍दी टाइपिंग का काम मेरे से करा लिया जाता था और देने के बदले राशि मिलती थी।

कई बरस सुबह उठकर अखबार बांटने का कार्य भी किया पर मैं छुट्टियों की गर्मी का बखान करते करते यह कौन सी खान खोदने लग गया।

अभी इतना ही बाकी ....... फिर कभी। वैसे ऐसी स्‍मृतियां तो खूब हैं पर इसमें भला किसको दिलचस्‍पी हो सकती है कि गर्मियों की गर्मी में खूब लट्टू चलाए हैं, कंचे भी खेले हैं चाहे कम ही। काफी बरस पहले अशोक चक्रधर जी के आवास पर काका हाथरसी जी ने मेरा नाम जानकर पूछा था कि अविनाश खूब खेलते होगे ताश, प्रश्‍न पर मैंने कहा था कि ताश को कभी नहीं लगाया हाथ।

शुभ वर्तमान।


6 टिप्‍पणियां:

  1. सभी ब्लॉगरों के संस्मरण बहुत रोचक और प्रेरक हैं!

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  2. बचपन की यह मुलाक़ात भी बढ़िया रही ..

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  3. बहुत ही रोचक प्रसंग हैं।

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  4. मजा आ गया..अजय जी तो बहा ले गये...अविनाश जी खुद ही उन दिनों की यादों में बह गये और पवन जी, क्या कविता रची है उन दिनों में भी...

    बहुत बढ़िया.

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