गुरुवार, 2 जून 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (६)

सबसे पहले क्षमा याचना क्योंकि पिछले दो दिन की कड़ियाँ ही नहीं सकीं क्योंकि नेटवर्क था ही नहीं
अब तो हमको भी सबकी यादों में घूम घूम कर बड़ा मजा आने लगा हैकितना प्यारा बचपन था? काश ! फिर से मिल जाये चाहे एक दिन के लिए ही सही , सच कितनी मस्ती करें? जिस के बचपन में भी हम झांक रहे हैं तो कितनी भूली बिसरी यादे शैतानियाँ, खेल और मस्ती याद रहे हैं की अरे हम भी तो इसी तरह से करते थे और फिर बगैर झांकें ही हम अपने बचपन में पहुँच जाते हैंचलिए जो नहीं पहुंचे हैं वे भी झांक लें और हमें बता दें



अरुण चन्द्र राय :




कुछ अधूरा, कुछ अनकहा

मेरा जन्म बिहार के मधुबनी जिले के एक सोते हुए गाँव रामपुर में हुआ था. सोता हुआ इस लिए क्योंकि आज भी मेरा गाँव नितांत गाँव है. जहाँ न तो पक्की सड़क पहुंची है न ही बिजली. अब भी मेरे गाँव की आधी आबादी कुएं का पानी पीती है. सरकारी चापानल भी कम ही हैं. जब मैं दस साल का हुआ तो बाबूजी अपने साथ धनबाद ले आये. तब तक तो पता ही नहीं था कि गर्मी की छुट्टी का क्या आनंद है क्योंकि गाँव में तो हर दिन छुट्टी का था. दस बजे का स्कूल था. चार बजे की छुट्टी. बीच में टिफिन में भी मौज मस्ती. पोखर में नहाना, भैसों की पीठ पर बैठ पोखर पार करना, खेतों से गन्ने तोडना, साग तोडना लगभग रोज़ का काम था. फिर दादा जी छड़ी और काका का थप्पड़. लालटेन की पीली मद्धम रौशनी में पहाड़े याद करना, दालान पर दादा जी के साथ नौ बजे बी बी सी का समाचार सुनना और ना जाने क्या क्या. इन सब मस्तियों को बाबूजी ने छीन लिया पढाई लिखाई का वास्ता देकर. तब जाकर समझ आया कि गर्मी की छुट्टी का क्या महत्व है. फिर तो इन्तजार रहने लगा मई के पहले सप्ताह का.
याद है मुझे जिस दिन धनबाद से गाँव आना होता था उस दिन सुबह से ही हम जूते पहन के तैयार रहते थे, जबकि ट्रेन होती थी रात के साढ़े दस बजे के. सोच के लगता है कि माँ कितनी परेशान होती होगी इस दौरान हम भाइयों को सँभालने में. दो दिन लगते थे धनबाद से गाँव पहुँचने में. उन दिनों ट्रेन में इतनी भीड़ नहीं दिखती थी. जसीडीह स्टेशन, जहांसे हम देवघर यानि बाबा वैद्यनाथ धाम जा सकते हैं, पर लिट्टी चोखा और पानी मिलता था. एक लिट्टी के साथ दो ग्लास पानी फ्री देता था. सालों साल हमने इस स्टेशन पर दोनों ओर से लिट्टी चोखा खाते रहे और पानी पीते रहे. दो लिट्टी लेकर पूरा परिवार पानी पी लेते थे. उन दिनों बोतल बंद पानी का इतना चलन नहीं था.

गाँव पहुँचते ही 'ब्रेक-फ्री' हो जाते थे हम. सीधे आम के बगीचे में. बात उस साल की है जब मैं नौवी में था. सन १९८७. मुझे न तो तैरने में डर लगता था न आम जामुन के पेड़ पर चढ़ने में. डर लगता था तो साइकिल चलने में. नौवी तक मैं साइकिल चलाना नहीं सीख पाया था. चूँकि बाबूजी आजीवन साइकिल नहीं चला पाए सो मुझे भी लग रहा था कि मैं भी साइकिल नहीं चला पाऊंगा. हाँ हाफ पैडल साइकिल चलानी आती थी.. जिसमे कैंची की तरह फ्रेम से लटक कर चलाते हैं साइकिल. आज की पीढ़ी उसे नहीं जान पायेगी क्योंकि अब तो हर ऊंचाई की साइकिल मिल जाती है. लेकिन हमारे समय में साइकिल एक ही हुआ करती थी. खैर.
इस बार जिस दिन हम गाँव पहुंचे उसी दिन जीवछ, जिसका परिवार पीढ़ियों से हमारे आँगन में पानी आदि भरा करते थे, की बेटी भी पंजाब से आई थी. जीवछ दस साल बाद पंजाब से लौटा था हमेशा हमेशा के लिए. उसकी बेटी मंजू चूँकि पंजाब में पैदा हुई और तेरह चौदह साल तक वही रही तो थोडा शहरी लग रही थी. गाँव भर का आकर्षण थी. मंजू साथ लेकर आई थी अपनी साइकिल.
मंजू हमसे उमर में एक आध साल ही बड़ी रही होगी या बराबर ही रही होगी. गर्मी के दिनों में जब आम पकने लगते हैं तो सुबह सुबह पके हुए आम रात को पेड़ से टपकते हैं. इन आमों का स्वाद शायद अब कभी ना मिले लेकिन अब भी याद है पूरा बगीचा महका होता था गछ्पक्कू आम से. सुबह तीन बजे से जग कर ही आम चुनते थे बगीचे बगीचे जाकर. दोपहर में हम डोल पत्ता खेल खेलते थे. ये कुछ कबड्डी की तरह था लेकिन जमीं और पेड़ दोनों पर खेला जाता था. मंजू भी डोल पत्ता खेलती थी हमारे साथ. एक दिन वह साइकिल चलने के लिए बोली. उसकी इच्छा थी कि वो मेरे पीछे साइकिल पर बैठे. लेकिन मुझे साइकिल चलने आती कहाँ थी. उसे बहुत आश्चर्य हुआ. मैंने उस से कहा कि मुझे हाफ पैडल साइकिल चलने आती है. तब से मंजू चिढाने लगी 'अरुण के हाफ पैडल'. मंजू से लड़ते झगड़ते, आम खाते खिलते, पेड़ पर चढ़ते उतरते १९८७ की गर्मी की छुट्टी बीतती रही. फिर कुछ ही दिन बचे थे हमारे धनबाद लौटने में.
मंजू एक दिन दोपहर में बोली."चलो मैं तुम्हे साइकिल चलाना सिखा देती हूँ' . और फिर उस दोपहर मेरे पीछे साइकिल पकड़ कर दौड़ती रही. शाम होते होते मैं साइकिल चलाना सीख गया था. धनबाद लौटने से एक दिन पहले मंजू मेरे साथ बहुत दूर तक साइकिल पर बैठ कर गई. उसे बहुत अच्छा लगा था.
अगली बार जब मैं गर्मी की छुट्टी में गाँव नहीं आ पाया क्योंकि दसवी में पहुच गया था. बाबूजी भी गाँव नहीं आये थे. उसके बाद १९८९ में मैं जब गाँव आया तो पता चला कि मंजू की शादी हो गई है. लड़का उस से उमर में कम से कम दस साल बड़ा रहा होगा. एक बेटी की माँ भी बन चुकी थी मंजू. अब भी जब कभी गाँव जाता हूँ और यदि मंजू को पता लग जाता है तो अपने मायके जरुर आती है. चार बेटियों के बाद बेटा हुआ उसे. शायद इस सब में उसकी सहमति नहीं रही होगी. उसकी सुनी आँखें न जाने क्या कहती हैं. मुझे देख बमुश्किल मुस्कुराती है वह. शायद कुछ कहना चाहती है अब भी वह लेकिन....
आज जब बाइक, तरह तरह के कार चला लेता हूँ , बाइक और कार मिला कर कम से कम एक लाख किलोमीटर ड्राइव तो कर ही चूका हो... तो रिअर वियु में कभी कभी मंजू गाडी के पीछे दौड़ती नज़र आती है, कुछ कहती सी. १९८७ की गर्मी की छुट्टी जीवन भर के लिए कुछ अधूरा सा दे गई.




अंजू चौधरी "अनु"



मेरा अधूरा बचपन ........
यादे बहुत है ....बाते भी बहुत है ...पर लिखने को ऐसा कुछ खास नहीं कि जो मन से याद करके लिखा जाये ....याद तो वो किया जाये जिसको कभी भूले भी हो ...ये मेरा बचपन और उस से जुडी यादे ...वो नहीं जिसको मै दिल से ख़ुशी से ब्यान करू ...पर आज फिर से दिल में है कि हां मै भी कुछ लिखूं ...कि क्यों मेरा बचपन अधूरा सा लगता था मुझे .....
जहाँ तक मुझे याद है ...कभी किसी के साथ खुल कर अपने दिल की किसी भी बात को शेयर करना मेरी आदत में नहीं रहा...इसी वजह से मैंने खुद को हमेशा अकेला ही पाया ....गर्मी की छुट्टियों में नानी के घर जाना और वहां भी चुप हो कर सब के बीच रहना ....मेरे व्यवहार में था ...चुपचाप सी अकेली मै दूर आकाश में उड़ते पंछी...चिड़िया ....कभी कबूतर गिना करती थी ...एक ...दो ...तीन.........पता नहीं कब तक अकेली बैठी खुद से बाते करती रहती.ये ''अनु ''.रात को खुली छत पर ढेरो तारे ..और तरो से बाते करती ये ''अनु'' ...अपने ही मन से सवाल करती और खुद को ही जबाब भी देती रहती ...|छुट्टियों में माँ ने कभी देर तक सोने नहीं दिया ...सुबह जल्दी उठ कर ..उनके साथ रसोई के काम और फिर बाद में और घर के कामो में कैसे वक़्त निकाल जाता था .. पता ही नहीं चलता था ...और जब कभी खुद के खेलने के लिए वक़्त मिलता तो ...मन में एक अजीब से ख़ुशी होती थी ....खूब मन से खेला करती थी ..पर वो वक़्त ज्यादा नहीं होता था मेरे पास....तीन भाईयों की मै अकेली बहन...जिम्मेवारी इतनी कि कभी कभी अकेले में खूब रोने का मन करता था ..जब मेरी उम्र की लडकियां अपना बचपन ..मेरे सामने खुल कर बिंदास जीती थी ...और मै डरी हुई ...सहमी हुई ....सुनी आँखों से उन सब को देखती थी ...अपने ही घर के गेट कड़ी दूर से सबको देखना मेरी रोज़ की आदत थी ....वो सब जानती थी की मुझे खेलने नहीं दिया जायेगा ...इसी वजह से उन सबने मुझे बुलाना ही छोड़ दिया था .....खेलने को ...उस वक़्त लूडो ....सांप सीढ़ी....स्टापू...रस्सी कूदना ...सब था...पर वो वक़्त नहीं था ..जिस में बचपन का वक़्त व्यतीत हो ...अपन घर में लडको के बीच पली बड़ी हुई ...पाबंधी से मेरा बचपन मुझ से छीन गया ...माँ पापा से ज्यादा मुझे मेरे दो बडे भाई कहीं बाहर खलेने नहीं जाने देते थे ...किसी से मिलने जुलने पर मनाही थी ..|ऐसी बहुत से बाते है जो उस बचपन के साथ बीत गई ....जो कभी भी पूरी नहीं होंगी ...एक अधूरा बचपन जो मैंने जीया ...............|
वो अकेली ''अनु''
डरी सहमी
खुद से बाते करती
अपनों के लिए
अपनों में
जीती ''अनु''
संगी ना साथी
कोई था
फिर मिला उसे
कलम का साथ
जो बन गया
उसके जीवन का
आधार...........((((अंजु............अनु...)))


मृदुला प्रधान :


वह अनमोल बचपन .....!

स्मृतियों के वन में, पीछे मुड़कर देखने पर जो-जो दृश्य दिखाई पड़ता है, उनमें गर्मी की छुट्टियों में ननिहाल में बिताया हुआ समय सबसे साफ़ है. अम्मा के साथ मोटा-मोटी हफ्ते भर के लिए जाते थे . बिहार स्थित मुज़फ्फरपूर शहर के पास ,स्टेशन- ढोली ,गाँव चन्दन पट्टी .कितनी खुशी रहती थी.......... ...कितना कौतूहल रहता था .ननिहाल में कोई नहीं था.न नाना न नानी ,न मामा न मामी.
अम्मा इकलौती संतान थीं लेकिन ज़मींदारी का रोब बहुत ज़्यादा था.सिपाहीजी,दीवानजी ,नौकर ,दाई ,धोबिन,मालिन,हजामिन सबके सब वही थे.....नाना-नानी के ज़माने के.अम्मा के सामने कोई कुर्सी पर नहीं बैठता था,कुछ लोग खड़े रहते थे,कुछ ज़मीन पर बैठते थे.उनलोगों को नाना अपनी ज़मीन में बसा दिए थे और वे 'रैयत'कहलाते थे.सब कुछ अज़ूबा सा लगता था क्योंकि दरभंगा में तो बाबूजी डॉक्टर थे इसलिए वहां का माहौल एकदम अलग था.चन्दनपट्टी में बिजली नहीं थी,शाम में ही लालटेन जला दिया जाता था.अब सोचती हूँ की गर्मी क्यों नहीं लगती थी? कूएं के पानी की मिठास और सोंधापन ....अभी तक एकदम याद है.सामने फुलवारी में तरह-तरह के फल-फूल .कभी चंपा के फूल तोड़ती तो कभी अमरुद के पेड़ पर चढ़कर
बैठ जाती , ऊपर ही तोड़ती,ऊपर ही खाती .कभी करौंदा ,कभी शहतूत तो कभी फालसा बारी-बारी से खाती .क्या मज़ा आता था.लकड़ी का बक्शा नुमा गाड़ी 'सम्पनी' कहलाता था,बैल खींचता था. इसी पर चढ़कर हमलोग किसीके घर जाते थे.एक छोटी सी कविता के साथ इस संस्मरण को समाप्त करती हूँ क्योकि यादें हैं की रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं ...........
वह ममता कितनी
प्यारी थी,
वह आँचल कितना
सुंदर था,
जिसके कोने की
गिरहों में,
थी मेरी ऊँगली
बंधी हुई.
तब बित्ते भर की
खुशियाँ थीं,
ऊँगली भर की
आकांक्षा थी,
उस आँचल की
उन गिरहों में,
बस अपनी
सारी दुनिया थी.........



11 टिप्‍पणियां:

  1. maja aa raha hai padhne me...:)
    dekhta hon, mainbhi kuchh share kar paun..

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  2. सच कुछ यादें दिल मे बसी होती हैं जो कभी नमकीन तो कभी मीठी होती हैं…………और कुछ टीस बनकर उभर आती हैं……यादो का सफ़र अच्छा चल रहा है।

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  3. यादों के झरोखों से अतीत में झाँकना भी एक अलग ही अनुभव होता है ! ज़िंदगी की धूप छाँव के सारे शेड्स दिखाई दे जाते हैं ! समय मन को कभी सुख तो कभी दुःख के आँचल से सहला कर चला जाता है और हम यादों की उन वीथियों में खो से जाते हैं जहाँ से बाहर निकलने का कभी मन नहीं होता ! सुन्दर संस्मरण हैं सभी के !

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  4. अपने आप में हर एक संस्मरण पर्याप्त था पोस्ट के लिये, आज तिगुना सुख मिल गया है।

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  5. बचपन की यादें और अनुभव को प्रस्तुत करने के लिये.... हार्दिक धन्यवाद एवं आभार।

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  6. ये सब तो एक श्रृंखला बन गये हैं। मजा आ रहा है पढने में। पहली की कुछ पोस्‍ट छूट गयी हैं अब उन्‍हें भी पढा जाएगा। अरूण की कैंची सायकिल हमने भी खूब चलायी है। चूसने वाले आमों को आज ही याद किया जा रहा था। उसका आनन्‍द ही कुछ और था।

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  7. अंजू चौधरी 'अनु' एवं मृदुला प्रधान, अरुण चन्द्र राय ,तीनों के संस्मरण एक से बढ़कर एक.इनमें बसी बचपन की यादों की खुशबू सहज ही महसूस की जा सकती है.यही वह समय होता है जब हमें अपनों के साथ अपनेपन के ढेर पर बैठने का सुअवसर प्राप्त होता है.अत्यंत सुखद और संजोने योग्य.

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  8. अनु जी का दर्द महसूस किया उस कविता के माध्यम से..समय एक बार निकल जाता है तो यादें शेष रह जाती हैं...अरुण जी एवं मृदुला जी का संस्मरण रोचक रहा.

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  9. very interesting articles . . . padhkar bahut achcha laga aur mazaa aayaa . . .

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ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जो मन में होता है आपसे उजागर कर देते हैं. आपकी राय , आलोचना और समालोचना मेरा मार्गदर्शन और त्रुटियों को सुधारने का सबसे बड़ा रास्ताहै.