शनिवार, 18 मई 2013

उत्तर प्रदेश राजनीति के दांव पेंच !

                                     उत्तर प्रदेश की राजनीति से पूरा देश प्रभावित  है क्योंकि केंद्र में सबसे अधिक सांसद उत्तर प्रदेश से  (८० ) होते हैं तो फिर अगर प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी केंद्र पर काबिज होने का ख़्वाब देखे तो कोई गलत तो नहीं है . उसके लिए जैसा कि उत्तर प्रदेश वासियों में सोचा था कि  नयी उम्र का मुख्यमंत्री और प्रबुद्ध माने जाने वाला इंसान प्रदेश के लिए कुछ ऐसा करेगा जिसमें प्रदेश का भला नजर आएगा लेकिन यहाँ तो वही समझ आया कि सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं . सबकी नजर आगामी  लोकसभा चुनाव पर लगी है. 
                                  युवाओं को रिझाने के लिए चुनाव पूर्व किये गए वादे बेरोजगारी भत्ते को देकर पूरा किया जा रहा है . ( पैसे पार्टी के फंड से थोड़े ही देने हैं ) कुछ वाकई उसके सुपात्र थे और कुछ तो बेईमानी से ले भागे ( वैसे मुफ्त में माल मिले तो किसको परेशानी होगी ? )  जिन्हें मिल गया वो समझे कि इनका वोट तो पक्का हो गया . फिर आगे चले इससे सिर्फ काम चलने वाला नहीं है तो कुछ और पिछड़ी जातियों को आरक्षित कर दिया आखिर अधिकार जो है और फिर उससे आगे और बढे सरकारी कर्मचारियों को बहुत काम करना पड़ता है तो उनका भी तो ध्यान रखना ही पड़ेगा . एक तीर से दो शिकार हो गए . राज्य सरकार की छुट्टियों में एक और ५ अप्रैल की छुट्टी का इजाफा किया गया क्योंकि इस दिन महर्षि कश्यप और महाराजा निषाद राज  जयंती थी . ठीक उसी तरह जैसे पिछली सरकार ने कांशीराम जयंती पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की थी और दूसरी सरकार ने आकर उसको निरस्त कर दिया और अपने लाभ के लिए दूसरों की जयंती पर अवकाश घोषित कर दिया . बात कुछ भी हो वो सारी जातियां जिन्होंने इस अवकाश की मांग की थी , सरकार की मुरीद हो गयी और आगे इनके वोट भी पक्के ही समझिये . 
                       ये पिछले महीने की बात है और फिर ब्राह्मणों को रिझाने के लिए परशुराम जयंती जोर शोर के साथ मनाई गयी . जिसमें संकल्प लिया गया कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल को हटा कर इनको ही लाना है . एक समारोह से पूरा वर्ग सध गया और फिर आगे बढे . 
                        फिर उनको अल्पसंख्यकों की भी याद आ ही गयी कि  उनको कौन सा चारा डाला जाय ताकि उनको अपने हित में मोड़ा जा सके . हम मतदाता भी इतने भोले होते हैं कि लॉलिपोप दिखा कर कुछ भी करवा लीजिये . हाँ तो सरकार को याद आ गयी कि ख्वाजा के उर्स पर सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया जाय  जिससे कि एक वर्ग और अपने कब्जे में आ जाय  . खैर सब खुश हो गए और मिठाई बाँट डाली कि छुट्टी की घोषणा कर दी गयी है. एक तो सरकारी कार्यालयों में वैसे भी काम करने वाले अपने को सरकारी दामाद समझते ही हैं ऊपर से जब सार्वजनिक अवकाश मिल जाए तो क्या कहना ? सरकार के गुणगान करेंगे और उसके प्रति वफादार भी तो रहना होगा . 
                         इस समय उत्तर प्रदेश में 32 सार्वजनिक अवकाश और 18 निबंधित अवकाश घोषित हो चुके हैं . 52 रविवार होते हैं . पांच दिवसीय कार्य दिवस होने पर 52 शनिवार भी अवकाश दिवस हो गए और जहाँ ऐसा नहीं है वहां पर 12 द्वितीय शनिवार की छुट्टी होती है . इस तरह से वर्ष के 365 दिन में 154 /114 दिन अवकाश के हुए . 
                         अभी कितने और महापुरषों को इसमें शामिल किया जा सकता है क्योंकि अगर वर्ग विशेष को अपने काम के लिए आरक्षित करना है तो कुछ न कुछ लगातार ऐसा करना होगा की वे आपके प्रति वफादार रह सकें और केंद्र चुनाव में आपको ही चुनें . 
                          नयी उम्र के बच्चों को अपने पक्ष में करने के लिए (क्योंकि उन्हें तो चुनाव और सरकार के कामों से अधिक मतलब नहीं होता है बल्कि उनके व्यक्तिगत हित का काम करने वाला उनका सर्वाधिक प्रिय बन जाता है.) अभी मार्च माह में लखनऊ में लैपटॉप का वितरण हुआ और जितनी कीमत के लैपटॉप वितरित किये गए उससे कहीं अधिक धनराशि  उस समारोह को आयोजित करने में खर्च कर दी गयी  . हजारों की संख्या में लैपटॉप अभी भी स्कूलों में धूल खा रहे हैं क्योंकि आयोजन की तिथि निश्चित नहीं हो सकी है.  
       फिर लाखों रुपयों का वितरण के बहाने चूना राजकोष में लगने वाला है. फिर चाहे जिन्हें ये लैपटॉप दिए हैं वे उसको संचालित करने के लिए नेट की सुविधा भी हासिल करने में समर्थ न हों और फिर अगर वे समर्थ भी हैं तो फिर इस नयी उम्र की पौध के लिए नेट का प्रयोग कितना घातक  बनता जा रहा है इस बात को सरकार  को समझने की जरूरत होगी . 
                    हमें ये देखने की जरूरत है कि जहाँ सरकार विकास और जनहित के नाम पर राजकोष को उदारता के साथ खर्च कर रही है क्या उसका प्रयोग बेरोजगारी भत्ते की जगह नियमित रोजगार चाहे वह कम ही वेतन का होता , कम से कम उन्हें नियमित काम तो मिला होता और नियमित निश्चित धनराशि  मिल पाती जो उनके जीवनयापन में या फिर उनको आगे कुछ् करने में सहायता दे पाती . इस भीषण गर्मी में पीने के पानी की सार्वजनिक रूप से व्यवस्था हो पाती तो अधिक जनहित में होता और वह काम वाकई लोगों को एक जनहित को महत्व देने वाली सरकार का समर्थन कर रहे होते . ऐसा नहीं कि इन्हें नहीं मालूम में कि प्रदेश में बिजली  सड़कें , आवास और सफाई की कितनी अधिक जरूरत है और राजकोष को अगर इस दिशा में खर्च कर दिया जाता तो प्रदेश का हर व्यक्ति शुक्रगुजार होता . लेकिन नहीं सत्ता का इतना उपयोग तो कर ही सकते हैं कि  हम वह करें जिसमें आम आदमी लाभान्वित  हो सके . तभी उनको यहां से कुछ मिलने की उम्मीद करनी चहिए. राजकोष की बरबादी को आम आदमी भी समझता है और उसके ही पैसे को अपनी मर्जी से खर्च कर देने भर से अच्छी सरकार नहीं कहला  सकती है. 

5 टिप्‍पणियां:

  1. सबके अपने अपने हथकंडे अपनाते हैं सत्ता को पाने के लिए ...जनता चुने भी तो किसे चुने ..विकल्प कहाँ है ...
    बढ़िया जानकारी के साथ चिंतन कराती सार्थक प्रस्तुति

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  2. राजनीति तो वोटनीति बन गयी है।

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  3. जब तक जनता समझदार नहीं होगी, राजनेता ऐसा ही करते रहेंगे।

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  4. राजनेता और राजनीति अब गन्दी और भ्रष्ट हो चुकी है

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