बुधवार, 1 मई 2013

आज मजदूर दिवस है!





आज मजदूर दिवस है और मजदूर अपने दिवस को कैसे मना रहे हैं ? सरकारी मजदूरों की बात नहीं करेंगे , बड़े बड़े कारखानों के मजदूरों की भी बात नहीं होगी क्योंकि वे वहां के कर्मचारी के रूप में जाने जाते है . वास्तव में मजदूर वे हैं जो इस समय खेतों में फसल काट रहे हैं और वे हैं जो सड़क निर्माण में लगे हैं . जिन्हें एक कतरा  छाँव का नसीब नहीं है .
                           मेरे घर के सामने सड़क और नालियों का निर्माण हो रहा है , जहाँ पर चालीस डिग्री तापमान में बेचारे मजदूर आज भी काम करने आये हैं . काम करवाने वाला ठेकेदार परिचित होने के नाते घर में आकर चाय और ठंडा पानी पीकर छाँव में बैठे रहते हैं और वे अपने काम में लगे रहते हैं . ईमानदारी से कहूं मैं उन लोगों के लिए ठन्डे पानी की बोतल अतिरिक्त लगा कर रखती हूँ और जब वे खाना खाने के लिए जाते हैं तो हमसे पानी ले लेते हैं सिर्फ इतना ही तो कर सकती हूँ उनके हिस्से का काम तो नहीं कर सकती .
                          आज भी शर्मा जी सुबह आ गये क्योंकि निर्माण सामग्री भी उन्होंने सुरक्षा की दृष्टि से मेरे घर में रखवा  दी है . चाय पीते हुए शर्मा जी से मैंने सवाल किया - क्या आज आप मजदूरों को छुट्टी नहीं दे सके ? '
'काहे की छुट्टी  भाभी ?'
'आज श्रमिक दिवस है , एक दिन उन्हें भी छुट्टी का अधिकार होना चाहिए .'
'छुट्टी कर लेंगे तो खायेंगे क्या? '
'आज उन्हें सवेतन छुट्टी दे दीजिये .'
'क्यों मजाक करती हैं , हम तो बरबाद हो जायेंगे . आप कहेंगी कि  काम पूरा नहीं हो रहा है . फिर वे हमारे स्थायी मजदूर तो हैं नहीं  , हम तो रोज बाजार से जाकर ले आते हैं .'
' एक दिन में कितना काम रुक जाएगा ?'
'ये सब व्यवहार में नहीं होता - ये कलम की बातें है . बतलाइये आज कौन सी फैक्ट्री बंद रहती है . सरकारी की बात नहीं कहूँगा .'
'मतलब ये मजदूर दिवस कागजी है , इसमें मजदूरों का कुछ लेना देना  नहीं है .' 
                    रुकिए मैं अभी काम देखकर आता हूँ , कहते हुए शर्मा जी वहां से जान छुड़ा कर भागे लेकिन अपने पीछे कितने सारे  प्रश्न छोड़ गए . ये सिर्फ एक शर्मा जी से जुड़े नहीं हैं बल्कि खुद हम सब से जुड़े हैं . 
छोटे स्तर  पर काम करने वाले ढेरों लोग हैं , जिन्हें एक दिन भी छुट्टी नहीं मिलती है. कुछ पैसे उन्हें जरूरत पर दे कर हम उनका शोषण करने से पीछे नहीं हटते हैं . कभी हम एक दिन की छुट्टी देकर उन्हें ये अहसास करवा सकते हैं कि वे भी इंसान हैं और उनसे काम लेने वाले भी सिर्फ व्यापारी नहीं बल्कि इंसान ही है . एक दिन की छुट्टी जो उन्हें बिना किसी बीमारी , घर के काम या फिर मजबूरी के बदले न लेनी पड़े बल्कि हम उन्हें खुद दे सके . आज के दिन अपने घर में काम करने वालों को छुट्टी देकर देखिये कितनी तसल्ली मिलती है और उनके चेहरे पर कितने  सुकून के भाव नजर आते है .  बस एक ही दिन की तो बात है. 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्‍कुल सच कहा आपने ....
    बस एक ही दिन की तो बात है ....
    ...................... सार्थकता लिये सशक्‍त प्रस्‍तुति

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  2. जो रोज़ पर काम करते हैं, उनके लिए अगर एक दिन छुट्टी हो जाए तो खाएँगे क्या? वैसे श्रमिक जिनकी पगार बंधी हुई है उनकी छुट्टी हो तो कोई बात नहीं. छुट्टी होने से ज्यादा ज़रूरी है उनकी सुविधा और सहूलियत और काम के हिसाब से पैसे मिले. वैसे वेतन के साथ एक दिन छुट्टी दे दी जाए तो उनकी ख़ुशी का पारावार न हो.

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