शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

दलित की परिभाषा !

कुछ लोग अपनी सोच से ये परिचय दे देते हैं कि वे किस काबिल हैं और उनकी सोच क्या है? उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री वैसे तो दलित प्रेमी हैं और वे सिर्फ और सिर्फ दलितों का ही भला करने वाली अपने को कहती हैं लेकिन जहाँ वाकई दलित हैं वहाँ के बारे में उनको कितना ज्ञान है? वे वहाँ के लोगों के जीवन के बारे में कितना जानती हैंखुद को दलितों का मसीहा कहलाने में उनको फख्र होता होगा लेकिन हर जगह और हर मुद्दे पर जाति को लेकर हितैषी होने का तमगा उनको नहीं मिल जाताहै
उनका आरोप है कि अन्ना ने कमेटी में किसी दलित को शामिल नहीं किया है. उसमें दलित होनेचाहिए. यहाँ कोई जातिवाद पर बंटवारा नहीं होने वाला है कि इसमें दलितों के होने से उनका अहित होने वालाहैमुद्दा यहाँ भ्रष्टाचार से निपटने का हैफिर दलित ही क्यों? देश में रहने वाले हर धर्म और वर्ग के लोगों को येबात उठानी चाहिए कि उस समिति में हमारा प्रतिनिधित्व नहीं हैवहाँ हम कोई विरासत बांटने नहीं जा रहे हैं किउससे दलित या अनुसूचित या फिर पिछड़े वर्ग के लोग वंचित रह जायेंगेयहाँ सिर्फ प्रबुद्ध व्यक्तियों की जरूरत हैऔर वहाँ जो विचार होना है वो सर्वहित का है
जब बात उठ ही गयी है तो फिर ये दूर तक जाती है क्योंकि देश और प्रदेश में जिस वर्ग के लोगों कावे प्रतिनिधि बन कर अपने को प्रस्तुत कर रही हैं तो वे हमें दलितों की परिभाषा बतलाएंक्या सारे अनुसूचितजाति के लोग दलित की श्रेणी में आते हैंस्वतंत्रता के इतने वर्षों के बाद स्थितियां बहुत बदल चुकी हैंअब येआरक्षण की आग को बुझाना होगानहीं तो देश के अन्दर ही अन्दर कभी मीणा, कभी जाट , कभी मुसलमान औरकभी इसाई अपनी जातिगत आरक्षण का झंडा लिए खड़े दिखाई दे जाते हैंआख़िर कब तक हम इनको इस तरहसे तवज्जो देकर उन लोगों के हक पर डाका डालते रहेंगे जो वास्तव में कमजोर वर्ग के हैंइस वर्ग के लिए जातिकोई मायने नहीं रखती है आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग ही इसका हकदार होना चाहिएमेधा किसी जाति या वर्गकी मुहताज नहीं होती है और जिनमें मेधा है वे किसी आरक्षण के लिए भूखे नहीं हैंआरक्षण आप दीजिये कमजोरवर्ग के लिए - ये कमजोर वर्ग ब्राह्मण , कायस्थ, वैश्य और शूद्र कोई भी हो सकते हैंउनको जरूरत है कि उनकोआरक्षण दिया जायगाँवों में बंधुआ मजदूर आज भी हैं, उनकी कोई जाति नहीं होतीरिक्शा चला कर पेट भरनेवालों की कोई जाति नहीं होती हैबोझा ढोने वालों की कोई जाति नहीं होतीसड़क के किनारे खोमचा लगाने वालोंकी कोई जाति नहीं होतीसड़क के किनारे बैठ कर भीख माँगने वालों की कोई जाति नहीं होतीगरीब किसान जोखेतों में हल चला कर ( हाँ आज भी सबके पास ट्रेक्टर उपलब्ध नहीं है) खेतों में पसीना बहा कर अनाज पैदा करतेहैं और उनके बच्चों की सारी जिम्मेदारी उसी के ऊपर निर्भर रहती है उनकी कोई जाति नहीं होतीमजदूर जो दिनमें -१० घंटे काम करता है उसकी कोई जाति नहीं होती
इन सबके बारे में कभी मायावती ने सोचा हैएक दलित शब्द को उठा कर पूरा का पूरा इतिहासरचना चाहती हैंइस देश में रहने वाले हर उस व्यक्ति को जो आर्थिक रूप से कमजोर है, आरक्षण का हक चाहिएउनके बच्चों को भी नौकरी का हक चाहिएये जाति या वर्ग के नाम पर होने वाले तमाशे को ख़त्म करने के बारे मेंसोचना होगाअब तो दलित होना एक हथियार हो चुका है - गलत काम करते पकड़ जाएँ तो आप उनको कुछ कहनहीं सकते क्योंकि तुरंत ही वे दलित उत्पीड़न के नाम पर आपको भी कटघरे में खड़ा कर देंगेआज सब सक्षम हैऔर अपने अपने स्तर पर बहुत ऊपर पहुँच चुके हैं
एक पीढ़ी को आरक्षण देने के बाद अगली पीढ़ी को इससे वंचित कर देना चाहिए क्योंकि अगर पिताआरक्षण का फायदा उठा चुका है तो बेटे को किसी प्रकार की कमी नहीं होनी चाहिए की वे औरों के अधिकार को मारकर पीढ़ी डर पीढ़ी आरक्षण के हक़दार बने रहें और वे जो दूर दराज गाँव में रहते हैंवे कभी यहाँ तक पहुँच ही पायेंइस लिए भ्रष्टाचार के मुद्दे के बाद अगला मुद्दा जो देश में सबसे अधिक विसंगतियां पैदा करने वाला है वह हैआरक्षण का मुद्दा - जिसमें योग्य और वरिष्ठ व्यक्ति बैठे रहते हैं और आरक्षित वर्ग योग्यता होने के बाद भीप्रोन्नति लेकर ऊपर बढ़ जाता है भले ही उसको उस पद पर करने कि क्षमता होपढ़ाई में आरक्षण, नौकरी में , प्रोन्नति में और फिर परिणाम कि मेधा बाहर निकलती जा रही हैहम अपनी नीतियों को नहीं बदलेंगे तो मेधायहाँ काम करके अपने को हीनता से ग्रसित नहीं करना चाहती हैअगर हम रोते हैं कि मेधा बाहर क्यों जाती है? सिर्फ रोने से तो काम नहीं चलता है अब तो हमें सजग हो कर इस दिशा में सोच लेना चाहिए
बड़े बड़े राजनीतिज्ञ है, संविधान के विशेषज्ञ है और राजनेता है लेकिन क्यों मूल समस्याओं के हलसे मुँह चुराते रहते हैं क्योंकि उन्हें सत्ता चाहिए और जिनके बल पर उन्हें सत्ता मिलती हैं उन्हें वे उस जगह से ऊपरउठने नहीं देना चाहते क्योंकि अगर वे बौद्धिक रूप से सक्षम होने लगे तो बरगला कर वोट लेने की उनकी नीति काक्या होगा? उनकी दलगत नीति का क्या होगा? वोट खरीद कर राजनीति करने वाले लोगों का भविष्य तो अंधकारमें डूब जाएगाअब अगला कदम इस आरक्षण की गलत नीति में परिवर्तन लाने के लिए क्रांति का ही होगा

8 टिप्‍पणियां:

  1. परिभाषाओं से परे जाती दलित राजनीति।

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  2. मेरे ख्याल मे जब बिल बन जाये तो सब से पहले इस की ही गर्दन को नापा जाये....

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  3. बिलकुल सही कहा है आपने ,पर शायद दलितों के तथाकथित मसीहाओं को ये बात हजम नहीं होगी ....सादर !

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  4. वहा वहा क्या कहे आपके हर शब्द के बारे में जितनी आपकी तारीफ की जाये उतनी कम होगी
    आप मेरे ब्लॉग पे पधारे इस के लिए बहुत बहुत धन्यवाद अपने अपना कीमती वक़्त मेरे लिए निकला इस के लिए आपको बहुत बहुत धन्वाद देना चाहुगा में आपको
    बस शिकायत है तो १ की आप अभी तक मेरे ब्लॉग में सम्लित नहीं हुए और नहीं आपका मुझे सहयोग प्राप्त हुआ है जिसका मैं हक दर था
    अब मैं आशा करता हु की आगे मुझे आप शिकायत का मोका नहीं देगे
    आपका मित्र दिनेश पारीक

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ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जो मन में होता है आपसे उजागर कर देते हैं. आपकी राय , आलोचना और समालोचना मेरा मार्गदर्शन और त्रुटियों को सुधारने का सबसे बड़ा रास्ताहै.