रविवार, 29 जनवरी 2012

गाँधी जी के लिए !

हम ही उन्हें महात्मा गाँधी नहीं कहते थे , वे सम्पूर्ण विश्व के लिए एक प्रेरणा स्रोत थे और सम्पूर्ण विश्व को उनकी हत्या ने हिला दिया था। इस अवसर पर एक दुलभ कविता अफ्रीका के स्वातंत्र्य संग्राम के सेनानी पेड्रिस लुमुम्बा ने लिखी थी। आप सबके सामने रख कर उस महा पुरुष को श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हूँ।

महात्मा ! तुमने आदमी को
प्यार
, अहिंसा और सद्भावना देनी चाही

कैसी जुर्रत की तुमने गाँधी ?
कैसा था दुह्साहस ?
ऐसा ही दुह्साहस किया था यीशु
फिर यीशु से इतर तुम्हारी परिणति क्या होती?
यह अंत कितना अपूर्व है,
कितना मोहक?
क्या मौत इतनी मेहरबान होती है?
अगर ऐसी मौत मिलनी हो तो
मैं आज ही
आज ही नहीं अभी इसी क्षण मरना चाहूँगा
मृत्यु इतनी श्लाघ्य !
मृत्यु इतनी वरेण्य !
ऐसी ही मृत्यु मुझे भी देना मेरे अंतर्यामी

11 टिप्‍पणियां:

  1. जूझना मृत्यु से अधिक पीड़ादायक हो जाता है बहुधा..

    उत्तर देंहटाएं
  2. ऐसी मृत्‍यु की चाह केवल वे कर सकते हैं जिन्‍होंने गांधी जी या पेड्रिस लुमुम्‍बा जैसा जीवन जिया हो।

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह रेखा जी वास्तव मे दुर्लभ कृति पढवा दी………आभार्………बापू की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि .

    उत्तर देंहटाएं
  4. बापू की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि .

    उत्तर देंहटाएं
  5. यह रचना पढवाने के लिए आभार ... बापू को नमन और विनम्र श्रद्धांजलि

    उत्तर देंहटाएं
  6. ऐसी ही मृत्यु मुझे भी देना मेरे अंतर्यामी । ... इस एक पंक्ति में पूरी निष्ठा है

    उत्तर देंहटाएं
  7. यह रचना पढवाने के लिए आभार ... बापू को नमन और विनम्र श्रद्धांजलि

    उत्तर देंहटाएं
  8. उत्‍कृष्‍ठ अभिव्‍यक्ति ... शत् शत् नमन

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

    उत्तर देंहटाएं

ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जो मन में होता है आपसे उजागर कर देते हैं. आपकी राय , आलोचना और समालोचना मेरा मार्गदर्शन और त्रुटियों को सुधारने का सबसे बड़ा रास्ताहै.