शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

चुनौती जिन्दगी की: संघर्ष भरे वे दिन (५)

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डॉ रूपचंद शास्त्री 'मयंक ' :


जीवन में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो कि जिसको सरल सरिता की तरह से बहते हुए मिला हो। ये जीवन तो है ही कंटकाकीर्ण पाठ की तरह जिस पर कभी ठोकर खाकर , कभी लड़खड़ा कर , कभी गिरते गिरते बचते हुए चलना ही है। इस सफर में कभी किसी का सहारा मिल जाता है, कटाक्ष भी मिलते हें और नसीहतें भी लेकिन वास्तव में साथ देने वाले , कठिन वक्त में साथ चलने वाले कितने मिलते हें? ये सबके जीवन की अलग अलग कहानी है।
आज अपने ऐसे ही अनुभव को प्रस्तुत कर रहे हें डॉ रूपचंद शास्त्री 'मयंक' जी .........

संघर्ष ही जीवन है!

नर हो न निराश करो मन को

सन् 1969 की बात है। उस समय मैं आयुर्वेद महाविद्यालय, हरिद्वार में तृतीय वर्ष में पढ़ रहा था। पिता जी पटवारी के पद पर कार्यरत थे मगर उनकी परगनाधिकारी से बहस हो गई और उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इससे घर की आर्थिक स्थिति बहुत डाँवाडोल हो गई। घर में तीन बहने और माता जी के लालन-पालन की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई और मैंने हरिद्वार के पास एक गाँव में अपनी प्रैक्टिस शुरू कर दी।

हरिद्वार से नजीवावाद 50 किमी था और उस समय रास्ता भी दुर्गम था। गंगा नदी और बीच में पड़ने वाले नालों का पुल भी नहीं था। मेरे पास एक अदद साइकिल थी। अतः मुझे प्रत्येक शनिवार को सुबह 4 बजे उठकर साइकिल से नजीबाबाद घर में खर्चा देने के जाना पड़ता था। एक दिन घर में रुक कर सोमवार को फिर हरिद्वार के लिए निकल पड़ता था और 10 बजे से 2 बजे तक मेडिकल कालेज में क्लास ज्वाइन करता था।

दो बजे जब कालेज छूटता था तो बहुत भूख लगती थी। इसलिए पेट की आग बुझाने के लिए रास्ते में पड़ने वाली अमरूद की बगिया से एक आने के एक सेर अमरूद लेकर अपना पेट भर लेता था।

शाम 3 बजे से 7 बजे तक रोगियों को देखता था। उस समय सस्ता जमाना था बच्चों की एक दिन की दवा आठ आने की और बड़ों की एक दिन की दवा एक रुपये की देता था। ले-देकर प्रतिदिन पच्चीस-तीस रुपये की आमदनी हो जाती थी। जिसमें प्रति सप्ताह घर के लिए 100 रुपये भी देने होते थे। इसके बाद जो बचता था उससे मेडिकल कालेज की फीस और अपना खर्चा कर लेता था।

जैसे-तैसे ढाई साल गुजर गये और मुझे डॉक्टरी की डिग्री भी मिल गई अब मैंने घर से 16 किमी की दूरी पर एक बड़े गाँव में अपनी प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। संकट का समय ढल गया था मगर तीन बहनों के विवाह की जिम्मेदारी भी निभानी थी। 2 साल में दस हजार रुपये जमा किये और बड़ा होने के नाते 1973 में अपना विवाह किया।

मेरी धर्मपत्नी ने मुझे भरपूर हौसला दिया और दो साल बाद शान के साथ बहिन की शादी कर दी।

अब 2-3 साल का समय और मिल गया। तभी मेरे छोटे मामा जो खटीमा में प्रैक्टिस करते थे मेरे पास आये और कहने लगे कि इतना कम पैसा लेकर तुम रोगियों का इलाज करते हो मेरे साथ खटीमा चलो वहाँ रोगी से एक दिन की दवा का कम से कम 10 रुपये लेते हैं। पहले तो मैंने आनाकानी की मगर इस शर्त पर कि एक महीना मैं परीक्षण के तौर पर खटीमा में रहूँगा, यह सोच कर मैं खटीमा आ गया।

नेपाल के सीमावर्ती कस्बे बनबसा में मैंने प्रैक्टिस शुरू की। यहाँ पहले ही दिन पाँच-छः सौ रुपये की प्रैक्टिस हुई तो मैं यहीं का होकर रह गया। कष्ट का समय निकल गया और मैं आज अपने को सबसे सुखी इंसान समझता हूँ!

राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने कहा ठीक ही कहा है नर हो न निराश करो मन को!







15 टिप्‍पणियां:

  1. shastri jee,


    ye jeevan hamen bahut kuchh sikha jata hai aur ye ek pareeksha bhi hota hai jisamen ham bahut dhairy aur paarishram se hi bahar nikal pate hain aur nikal kar ekdam tape hue svarn kee tarah phir koi pareesha kathin lagati hi nahin hai.

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  2. आपकी कहानी सुनकर बहुत अच्छा लगा..

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  3. यही तो जीवन है जो दुश्वारियों से लड्ना भी सिखा देता है और कैसे जीना है वो भी सिखा देता है।

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  4. शास्त्री जी ...आपके जीवन को पढ़ कर ...बहुत कुछ अपना सा लगा
    संघर्ष ...हर किसी के जीवन का एक अटूट हिस्सा बना हुआ हैं ...बस किस्से हर किसी के अलग अलग हैं ...

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  5. अरे वाह!
    कमाल है आधे घण्टे पहले ही तो यह संस्मरण लिखकर आपको भेजा था और आपने इतनी शीघ्रता से प्रकाशित भी कर दिया।
    आपका आभार!

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  6. खुद को मजबूत करने में बहुत सहायक हैं ये संस्मरण.

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  7. बिल्कुल ... उम्मीद पे दुनिया है, सफलता है

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  8. नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक संस्मरण.सुंदर प्रस्तुति.

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  9. आपके संघर्ष को सलाम। पर यह बात कुछ ठीक नहीं लगी कि कहां आप मरीजों का इलाज एक रूपए में करते थे और बनसमा आकर आप उससे दस गुना लेने लगे।

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  10. आपके जीवन को पढ़ कर शास्त्री जी प्रेरणादायी संस्मरण

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  11. शास्त्रीजी ,

    आधा घंटे में इस लिए आ गया क्योंकि अभी 11 और 18 फरवरी को मेरी दो बेटियों की शादी है इसलिए व्यस्त हूँ लैपटॉप खोलने का समय कभी मिलता है और कभी नहीं. इसलिए आपका संस्मरण सामने आया मैंने तुरंत पेस्ट करके डाल दिया. कई बार doc फाइल होने पर खुद टैप करना पड़ता है तो समय लगता है अतः कुछ संस्मरण सहेज कर रखे हें समय मिलते ही डालूंगी

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  12. हौसले वालों की हार नहीं होती.

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  13. यूं तो सभी के संघर्षों से कुछ न कुछ प्रेरणा मिलती ही है। मगर आज यहाँ रूपचंद के बारे मे जानकर बहुत अच्छा लगा बहुत ही प्रेरणा दायक आलेख...

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ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जो मन में होता है आपसे उजागर कर देते हैं. आपकी राय , आलोचना और समालोचना मेरा मार्गदर्शन और त्रुटियों को सुधारने का सबसे बड़ा रास्ताहै.