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सोमवार, 15 जुलाई 2013

डाक तार सेवायें !




                           हमारे देश में डाक तार विभाग बहुत ही महतवपूर्ण विभाग है और उसकी सेवायें कितनों के जीवन के महत्वपूर्ण कार्यों को सम्पन्न करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं . शायद रोज सम्पन्न होने वाली सबसे महत्वपूर्ण सेवा है और  सरकारी पत्रों के लिए तो इसी विभाग को प्रयोग किया जाता है और इसमें भी त्वरित सेवा के लिए स्पीड पोस्ट जैसी सुविधा प्रदान की जा रही है .
                           यहाँ सवाल यह है कि क्या यह विभाग अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रहा है ? शायद नहीं क्योंकि आज जितनी भी कोरियर सेवाएं फल फूल रही है उनके पीछे इस विभाग की जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाही है . आम लोग जब डाक तार से भेजे गए पत्रों का इन्तजार करते रह जाते हैं और परीक्षा का दिन आ जाता है उनको प्रवेश पत्र नहीं मिलाता है और आज कल तो नेट के द्वारा प्रवेश पत्र डाउन लोड करके प्राप्त करने का विकल्प मिल गया है लेकिन कुछ ऐसी भी चीजें हैं जिनके लिए सरकारी विभाग सिर्फ इसी विभाग को प्रयोग करते हैं और प्राप्त करने वाला रोज इन्तजार करता रह  भी जाता है . वैसे निजी  कम्पनियाँ और निजी सेवाएं अपनी प्रसारण सेवा के लिए कोरियर का प्रयोग कर रहे हैं लेकिन सरकारी विभागों की मजबूरी है नहीं तो ये विभाग शायद बंद ही हो जाय . हम रोज ही  विभाग  द्वारा जारी  की जा रही नयी नयी सेवाओं के विषय में पढ़ते हैं और खुश हो लेते हैं कि  हम प्रगति के पथ पर जा रहे हैं .
                            इस विभाग की मैं भुक्तभोगी हूँ और शायद ये मेरे ही साथ होता है जो मुझमें  बार बार इसके प्रति आक्रोश पैदा हो जाता है . फिर इस विषय में की गयी आपत्ति पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाता है बल्कि उसके बाद तो और भी परेशान  करने लग सकते हैं .
                           कुछ दिन पहले मेरे नाम से बुक का एक पार्सल आया . पहले तो कई दिनों तक पता ही नहीं चला भेजने वाला बार बार इस विषय में पूछ रहा है लेकिन मैं क्या उत्तर दूं ? इतना समय भी नहीं की पोस्ट ऑफिस में जाकर बार बार पता करूँ . फिर एक दिन फ़ोन आता है कि  आपका एक पार्सल आया है और काफी  भारी  है आकर ले लें . पतिदेव जाकर ले आये लेकिन मुझे बहुत क्रोध आया . फिर पता चला कि आधार कार्ड एक साथ बण्डल बना कर यहाँ  के एक तथाकथित नेता जी के  एक स्कूल में पोस्टमैन रख कर गया है और जिसको पता चल रहा था जाकर वहां से अपना आधार कार्ड खोज कर ला रहा था . ( मेरा आज  नहीं आया , जब की घर के और सदस्यों के आ चुके हैं . वहां पर जाकर पता किया गया तो कहा गया अभी बोरे  में भरे रखे हैं आप स्लिप की फोटो कॉपी दे जाइये . खोज कर आपको भेज दिया जाएगा उस कॉपी को दिए हुए दस महीने हो चुके हैं और आज तक आधार कार्ड नहीं मिला है .
                   बीच में एक बार कंप्लेंट की तो कुछ असर हुआ लेकिन  बेकार . पिछले दिनों बेटी के PAN कार्ड के लिए नेट पर देख रहे हैं और वहां पर डेलिवर्ड  देखा रहा था  और वह कार्ड मेरे घर तक नहीं आया था  . बतलाइए इसका क्या उपाय है ? करीब दस दिन बाद शाम ६ बजे फ़ोन आता है कि  हम यहाँ  खड़े हैं (लोकेशन बता रहे हैं ), आपका एक पत्र है आकर ले जाइये  और मेरे पतिदेव ने वहां से जाकर ले आये (लेकिन मुझे ये बात बाद में पता चली थी ) तो कुछ इनाम की फरमाइश हुई तो वो बोले की इस समय तो कुछ नहीं है . घर आकर ले लीजियेगा .
                  इसी बीच बेटी का बैंक अकाउंट हमने कानपूर में खुलवाया और उसके सम्बन्धी सूचना डाक से ही आती है . बैंक ने 18 तारीख को भेजा  22 को पोस्ट ऑफिस में ये कमेंट लिख कर लिफाफा रख दिया गया कि अंकित पते की जानकारी नहीं मिली . बैंक से फोन आया कि पेपर आपको भेज दिए गए हैं और पेपर  मिले  ही नहीं . आखिर 26 को एकपोस्टमैन उस पत्र को लेकर आ ही गया लेकिन ये वह सज्जन नहीं थे जो फोन करके बुलाते हैं . अगर पता उपलब्ध नहीं था तो दूसरे पोस्टमैन को कैसे मिल गया ?
                 इस बात की कंप्लेंट भी की गयी लेकिन वह तो ठन्डे बस्ते में डाल  दी गयी क्योंकि वे उनके विभाग के कर्मचारी है और हम आम आदमी . आज नहीं तो कल फिर हमारा कोई पत्र आएगा और इसी तरह से फिर कभी नहीं मिलेगा क्योंकि पत्रिकाएं , निमंत्रण पत्र आदि तो कभी मिलते ही नहीं है .  हम तो किसी भी शादी में फोन को ही निमंत्रण पत्र का पर्याय मान  चुके हैं .
                 ये सबसे महत्वपूर्ण और जिम्मेदार विभाग है और इसकी सेवाएं कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है जैसे की मैं .
                 आज से टेलीग्राम इतिहास बन चूका है और लगता है कि कल को डाक तार विभाग भी इतिहास न बन जाए .

किस्सा ए लाइक औ' कमेंट !



                         फेसबुक की महिमा  अपार है क्योंकि मैं तो आज तक इसके रहस्य  समझ ही नहीं पायी वैसे  के  समझने के लिए जितना समय चाहिए  उतना दे भी नहीं पाती हूँ . आज काजल जी का स्टेटस  जिसमें उन्होंने 14 सेकंड में 10 लाइक और 2 कमेंट वाली बात कही थी , सिर्फ कही ही नहीं थी बल्कि उसको प्रमाण सहित प्रस्तुत भी किया था .

                        काजल जी तो फेसबुक पर बहुत समय बिताने वालों में है लेकिन मैं जो नहीं बिता पाती हूँ लेकिन जाती तो हूँ और जहाँ कमेंट दे पाती  हूँ वह देती हूँ और लाइक भी करती हूँ लेकिन जिसपर देती हूँ उसको पढ़ती जरूर हूँ . कम लोगों का पढ़ पाऊं चलेगा लेकिन सिर्फ इसलिए कि लाइक करना ही है नहीं कर पाती हूँ या कहिये ये लाइक और कमेंट पाने के लिए बहुत लोकप्रिय होना पड़ता है जिससे अगर आप स्टेटस पर सिर्फ "वाह       .........." लिख दें और उसके लाइक करने वाले और कमेंट करने वालों की संख्या गिनना मुश्किल हो जाए . कई जगह पर मैं ये समझ नहीं पाती  हूँ कि  क्या वाकई प्रस्तुत की  हुई चीज इतनी अच्छी है कि उसको इतने सारे  लोगों के द्वारा लाइक कर लिया गया है . ये भी हो सकता है कि मुझे अभी फेसबुक के रूल्स ही पता न हों . वैसे ये बात तो मैं इमानदारी से स्वीकार कराती हूँ कि फेसबुक की बहुत सारी एप्लीकेशन आज भी मेरी समझ से परे हैं . कभी कभी बेटियों से पूछ लेती हूँ लेकिन सब कुछ क्या बहुत कुछ आता ही नहीं है .
                        लेकिन इतना जरूर है कि इसमें हमारे एक मित्र ने कहा कि  अगर काजल कुमार जी कुमारी होते तो उन्हें भी इसी तरह से कमेंट मिल रहे होते . ये कटाक्ष सच नहीं है क्योंकि बहुत सारी  महिलायें और लड़कियाँ फेसबुक पर हैं सब को इतने लिखे और कमेंट तो नहीं मिलते हैं .  मुझे नहीं लगता है कि सारे लाइक  करने वाले उस स्टेटस को पढ़ कर ही लाइक और कमेंट करते हैं .

रविवार, 14 जुलाई 2013

सतर्क और सावधान रहें !

चूंकि ये एक सत्य घटना है और जिसने मुझे अन्दर तक हिला दिया है , इसीलिए आप सबके साथ शेयर कर रही हूँ ताकि आप भी अगर कभी ऐसे हालात देखें तो कम से कम पुलिस को इन्फॉर्म तो जरूर कर सकें .


पिछले दिनों मेरे एक पारिवारिक मित्र की बेटी जो आई आई टी से पी एच डी कर रही थी , वह मेरे साथ रोज ही जब तक मैं वहां थी मेरे साथ बस से आती थी . वह ही शांत , गंभीर और इंटेलीजेंट है . एक दिन अचानक अखबार में खबर मिली कि वह घर से दिल्ली जाने के लिए स्टेशन गयी थी और उसके बाद जैसे वह हमेशा ट्रेन चलने से पहले घर वालों को बता देती थी की वह ठीक से बह गयी और ट्रेन चल दी है और फिर गंतव्य पर पहुँचाने के बाद भी घर में बात करती थी . लेकिन उसके घर से जाने के बाद ओइ खबर नहीं मिली और न कोई संपर्क हो रहा था . उसका मोबाइल बंद आ रहा था . . घर वालों ने पुलिस को सूचना दी . सब तरफ खलबली मच गयी . पुलिस भी सक्रिय रही और उसकी भूमिका इस मामले में सराहनीय लगी क्योंकि उसके प्रयास से वह गुजरात से बरामद कर ली गयी जहाँ पर उसको बेचने का सौदा किया जा रहा था .



वह लड़की जो आई आई टी से पढाई कर रही थी अब इतनी अधिक भयभीत हो चुकी है कि वह घर से बाहर कदम रखने में डरने लगी है .घर में कैद होकर रह गयी है . घर से बहार निकलने के नाम पर वह रोने लगती है कि वह लोग हमें फिर पकड़ लेंगे .

घटनाक्रम कुछ इस तरह से है कि वह दिल्ली जाने के लिए स्टेशन पर थी और वही खड़ी हुई एक ट्रेन के AC 2 के कम्पार्टमेंट में उसको मुंह दबा कर खीच लिया गया और ट्रेन चलने लगी थी . फिर वह बेहोश हो चुकी थी . वह कई लोग थे शायद , उसके मोबाइल का सिम उन लोगों ने तोड़ कर फ़ेंक दिया था . उसके साथ क्या हुआ ? ये न पूछने की हमारी हिम्मत थी और न पूछा लेकिन लड़कियों के लिए खतरे का एक और तरीका सामने आया जिसको सुनकर स्तब्ध रह गयी हूँ .

वैसे सामाजिक तत्वों की हरकतों से हम अखबार से रोज ही दो चार होते रहते हैं और हमारा मन अपनी बेटियों और बहनों के लिए आशंका से भर उठता है . फिर हम सभी एक जागरूक नागरिक और सबसे पहले इंसान है और इंसानियत हमारा धर्म है . अगर हम सभी सफर भी करें , बाजार में हों या फिर स्टेशन पर खुद को सजग रखें और अगर ऐसी किसी अनहोनी होने की आशंका भी लगे तो पुलिस को सूचना अवश्य दें . शायद हम किसी की बेटी , बहन के जीवन को ऐसे हाथों में आने से बचा सकें .   

मंगलवार, 18 जून 2013

गंगा दशहरा : कैसी गंगा ?

                                 


                       गंगा दशहरा का हमारे पौराणिक साहित्य में और हमारे धार्मिक भावनाओं से जुडा महत्व यह है कि गंगा जी का अवतरण ज्येष्ठ माह की दशमी और हस्त नक्षत्र में पृथ्वी पर हुआ था और इस बार वही संयोग पुन बना हुआ है यानि इस बार दशमी के साथ हस्त नक्षत्र भी इसी दिन पड  रहा है और इससे इसका महत्व बढ़ गया है . इस पर्व का महत्व गंगा किनारे बसे शहरों में अधिक माना जाता है . इस दिन लाखों श्रद्धालु गंगा में दुबकी लगाते  हैं और अपने पापों से मुक्ति पाते  हैं . 
                               लेकिन इस पावन  नदी में डुबकी  लगाने वाले ये भी करते हैं कि  वे गंगा की पूजा करके फूलों को अर्पित करने के बाद पॉलिथीन वगैरह उसी में प्रवाहित कर देते हैं . उसके किनारे बने मंदिरों में पूजा सामग्री इकट्ठी होती है तो उसे भी इसी में डाल  दिया जाता है . गंगा कितनी मैली हो चुकी हैं इसके बारे में कोई ऐसे ही जान सकते हैं कि  गंगा की धारा  निर्मल तो अब कहीं भी नहीं रही . बल्कि अब तो विषैली भी हो चुकी है . 
इसके लिए आई आई टी कानपूर द्वारा की गयी जांच से पता  चला है कि कानपूर में गंगा जल में प्रदूषण और जहरीले तत्वों की मात्रा कई गुना ज्यादा हो चुकी है . इस जांच को केंद्र सरकार के द्वारा आई आई टी को सौंपा गया था . गंगा के प्रदूषण को जांचने के लिए आई आई टी बीच बीच में उसका परीक्षण करती रहती है . एक परिक्षण जो पिछले वर्ष फरवरी में लिए गए नमूने के आधार पर किया गया था और उसके अनुसार गंगा के एक लीटर पानी में मानक के अनुसार क्रोमियम की मात्रा 2 मिलीग्राम होनी चाहिए और वर्तमान में यह 148 मिलीग्राम पायी गयी है . 
                     इस परीक्षण के लिए नमूना आई आई टी के द्वारा जल निगम के ट्रीटमेंट प्लांट जाने के पहले और ट्रीट होने के बाद निकले जल को लिया गया . सरकारी प्रयासों के बाद भी गंगा में कानपूर की टेनरियों का प्रदूषित पानी बराबर जा रहा है . जिस पानी से हम आचमन , स्नान और अन्य धार्मिक क्रियाएं करते हैं उसमें गंगा के कितने प्रतिशत गंगा जल को पाते  हैं इस विषय में हमें खुद भी पता नहीं है .  हम में से सभी कभी न कभी इस जल का किसी न किसी रूप में प्रयोग लाते हैं . इसको निर्मल रखने के लिए कल गंगा  की पूर्व संध्या पर संकल्प लिया गया . हम संकल्प में सहयोग इस तरह से दे सकते हैं कि  हम अगर टेनरी मालिक हैं तो अपने निस्तारित पानी को मानकों के अनुसार ट्रीट करके बाहर  निकालें या फिर किसी और तरीके से उसको गंगा में जाने से रोकें . अगर आम शहरी हैं तो पूजा सामग्री को उसको 
प्रवाहित करने के स्थान पर भूमिगत करें तो अधिक उत्तम रहेगा .  गंगा के महत्व को सभी जानते हैं तो फिर उसकी महत्ता का बनाये रखने के लिए सहयोग करें . 

शनिवार, 15 जून 2013

विश्व वयोवृद्ध दुर्व्यवहार विरोध दिवस !

                            हमारे देश  में तो संयुक्त  परिवार की अवधारणा  के कारण आज जो वृद्धावस्था में है अपने   परिवार में उन लोगों ने अपने बुजुर्गों  बहुत इज्जत दी होगी और उनके सामने तो घर की पूरी की पूरी  कमान बुजुर्गों के हाथ में ही रहती थी . मैंने  देखा है अपने घर में दादी से पूछ कर सारे काम होते थे . खेती से मिले नकद राशि  उनके पास ही रहती थी . लेकिन  उनके सम्मान से पैसे के होने न होने का  कोई सम्बन्ध नहीं था . 

 १. वृद्ध माँ  आँखों से भी कम दिखलाई  देता है , अपने पेट में एक बड़े फोड़े होने के कारण एक नीम हकीम डॉक्टर के पास जाकर उसको  ऑपरेट  करवाती है . उस समय  पास कोई अपना नहीं होता बल्किपड़ोस   में रहने वाली  होती है . वह ही उसको अपने घर दो घंटे   लिटा कर रखती है और फिर अपने बेटे के साथ हाथ  कर घर तक छोड़ देती है . *
 
२.  74 वर्षीय माँ घर में झाडू पौंछा करती है क्योंकि बहू के पैरों में दर्द रहता है तो वो नहीं कर सकती है . उस घर में उनका बेटा , पोता  और पोती 3 सदस्य कमाने वाले हैं   किसी को भी उस महिला के काम करने पर कोई ऐतराज नहीं है . एक मेट आराम से रखी जा सकती है लेकिन  ?????????? *
3. बूढ़े माँ - बाप को एकलौता बेटा अकेला छोड़ कर दूसरी जगह मकान लेकर रहने लगा क्योंकि पत्नी को उसके माता - पिता पसंद नहीं थे और फिर जायदाद वह सिर पर रख कर तो नहीं ले जायेंगे . मरने पर मिलेगा तो हमीं को फिर क्यों जीते जी अपना जीवन नर्क बनायें .*


                            आज हम पश्चिमी संस्कृति के  जिस रूप के पीछे  भाग रहे हैं उसमें हम वह नहीं अपना रहे हैं जो हमें अपनाना चाहिए  अपनी सुख और सुविधा के लिए अनुरूप  बातों को अपना रहे हैं . आज मैंने  में पढ़ा कि 24 शहरों  में वृद्ध दुर्व्यवहार के लिए मदुरै  सबसे ऊपर है और कानपुर दूसरे नंबर पर है . कानपूर में हर दूसरा बुजुर्ग अपने ही घर में अत्याचार का  शिकार हैं . एक गैर सरकारी संगठन  कराये गए सर्वे के अनुसार ये  परिणाम   हैं .
                 हर घर में बुजुर्ग हैं और कुछ लोग तो समाज के डर  से उन्हें घर से बेघर नहीं कर   हैं लेकिन कुछ  लोग ये भी  कर देते हैं . एक से अधिक संतान वाले बुजुर्गों के लिए अपना कोई घर नहीं होता है बल्कि कुछ दिन इधर  और कुछ दिन  उधर में जीवन गुजरता रहता है . उस पर भी अगर उनके पास अपनी पेंशन या  संपत्ति है तो बच्चे ये आकलन  करते रहते हैं कि  कहीं दूसरे को तो  ज्यादा नहीं दिया है और अगर ऐसा है तो  उनका जीना दूभर कर देते हैं . उनके प्रति अपशब्द , गालियाँ या कटाक्ष आम बात मानी जा सकती है . कहीं कहीं तो उनको मार पीट का शिकार भी होना पड़ता है . 
                      इसके कारणों को देखने की कोशिश की तो पाया कि  आर्थिक तौर पर बच्चों पर  निर्भर माता - पिता अधिक उत्पीडित होते हैं . इसका सीधा सा कारण  ये है कि उस समय के अनुसार आय बहुत अधिक नहीं होती थी और बच्चे 2 - 3 या फिर 3 से भी अधिक होते थे . अपनी  आय में अपने माता - पिता के साथ अपने बच्चों के भरण पोषण  में सब कुछ खर्च  देते थे . खुद के लिए कुछ भी नहीं रखते थे . घर में सुविधायों  की  ओर भी ध्यान  देने का समय और  उनके पास नहीं होता था . बच्चों की स्कूल यूनिफार्म के अतिरिक्त दो चार जोड़ कपडे ही हुआ करते थे . किसी तरह से खर्च पूरा करते थे ,  पत्नी के लिए जेवर  और कपडे बाद की बात होती थी . घर में कोई नौकर या मेट  नहीं हुआ करते थे सारे  काम गृहिणी ही देखती थी . सरकारी नौकरी भी थी तो  बहुत कम पेंशन  मिल रही है और वह भी बच्चों को सौप  पड़ती है . . कुछ बुजुर्ग रिटायर्ड होने के बाद पैसे मकान  बनवाने में लगा देते हैं  . बेटों में बराबर बराबर बाँट दिया . फिर  हाथ एक एक पैसे के लिए मुहताज होते हैं और जरूरत पर माँगने पर बेइज्जत किये जाते हैं . 
                      आज जब की आय बच्चों की कई कई गुना बढ़ गयी है ( भले ही इस जगह तक पहुँचाने के लिए पिता ने अपना कुछ भी अर्पित  किया हो ) और ये उनकी पत्नी की मेहरबानी मानी जाती है .
-- आप के पास था क्या ? सब कुछ  हमने जुटाया है . 
--अपने जिन्दगी भर सिर्फ  खाने और खिलाने में उडा  दिया .  
-- इतने बच्चे पैदा करने की जरूरत  क्या थी ? 
--हम अपने बच्चों की जरूरतें पूरी  करें या फिर आपको देखें .
-- इनको तो सिर्फ दिन भर खाने को चाहिए , कहाँ से आएगा इतना ?
--कुछ तो अपने बुढ़ापे के लिए सोचा होता , खाने , कपडे से लेकर दवा दारू तक का खर्च हम कहाँ से पूरा करें ? 
--बेटियां आ जायेंगी तो बीमार नहीं होती नहीं तो बीमार ही बनी रहती हैं .
-- पता नहीं कब तक हमारा खून पियेंगे  ये , शायद  हमें खा कर ही मरेंगे . 
                          अधिकतर घरों में अगर बेटियां हैं तो बहुओं को उनका आना जाना फूटी आँखों नहीं  सुहाता है . अपनी माँ - बाप  से मिलने आने के लिए भी उनको सोचना पड़ता है . 
                   बुजुर्गों का शिथिल  होता हुआ शरीर भी उनके लिए एक समस्या बन जाता है . अगर वे उनके चार काम करने में सहायक हों तो बहुत  अच्छा,  नहीं तो पड़े रोटियां  तोड़ना उनके लिए राम नाम की तरह होता है . जिसे बहू और बेटा  दुहराते रहते हैं . अब जीवन स्तर बढ़ने के साथ साथ जरूरतें इतनी बढ़ चुकी हैं कि उनके बेटे पूरा नहीं कर पा  रहे हैं . घर से बाहर  की सारी  खीज घर में अगर पत्नी पर तो उतर नहीं सकती है तो माँ -बाप मिलते हैं तो किसी न किसी  से वह कुंठा उन पर ही उतर जाती है . 
                     वे फिर भी चुपचाप सब कुछ सहते रहते हैं , अपने ऊपर हो रहे दुर्व्यवहार की बात किसी से कम ही  हैं क्योंकि कहते हैं - 'चाहे जो पैर उघाड़ो इज्जत तो अपनी ही जायेगी न .' फिर कहने से क्या  फायदा ? बल्कि कहने से अगर ये बात उनके पास तक पहुँच गयी तो स्थिति और बदतर हो जायेगी . हम चुपचाप सब सह लेते हैं . घर में शांति बनी रहे . ज्यादातर घरों में बहुओं की कहर अधिक होता है और फिर शाम को बेटे के घर आने पर कान भरने की दिनचर्या से माँ बाप के लिए और भी जीना दूभर कर देता है . पा नहीं क्यों बेटे को अपने दिमाग का इस्तेमाल करने की आदत क्यों ख़त्म हो चुकी है ? 
                       माता  पिता को बीमार होने  पर दिखाने  के लिए उनके पास छुट्टी नहीं होती है और वहीँ पत्नी के लिए छुट्टी भी ली जाती है और फिर खाना भी बाहर से ही खा कर  आते हैं . अगर घर में  वाले बनाना आता है तो बना कर खा ले नहीं तो भूखा पड़ा रहे  वह तो बीमार होती है . 
                     हमारी संवेदनाएं कहाँ  गयीं हैं या फिर बिलकुल मर चुकी हैं . कह नहीं सकती हूँ . लेकिन इतना तो है कि हमारी संस्कृति पूरी तरह से पश्चिमी संस्कृति हॉवी हो चुकी है . रिश्ते ढोए जा रहे हैं . वे भी रहना नहीं चाहते हैं लेकिन उनकी मजबूरी है कि  उनके लिए कोई ठिकाना नहीं है . 
                    * सारे  मामले मेरे अपने देखे हुए हैं . 

शुक्रवार, 14 जून 2013

विश्व रक्तदाता दिवस !

चित्र गूगल के साभार 
                              

                      हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण होते हैं रक्त सम्बन्ध और उनके लिए हम कुछ भी करने को तैयार होते हैं लेकिन अगर उन्हीं को रक्त देने का मौका आ जाय तो डर कर पीछे हट जाते हैं .  कुछ भ्रांतियों से शिकार हम अपने आप में इतना  नहीं जुटा पाते हैं .लेकिन जो रक्तदान करते हैं वे उन रिश्तों से अधिक गहरे रिश्ते बनाते हैं क्योंकि वे जीवनदाता होते हैं और वह भी बिना किसी स्वार्थ के . 

                                 आज का दिन (१४ जून ) विश्व रक्तदाता दिवस के रूप में मनाया जाता  है . वैसे तो कहते हैं कि  जीवन देने और लेने वाला इश्वर होता है लेकिन इस धरती पर भी भगवान रहते हैं जो जरूरत पर जीवन दान में सहायक होते हैं . वे भगवान  हम और आप ही हैं बस अपनी सोच और इस विषय में जानकारी को अच्छी तरह जान लेना ही काफी होता है .
                                 मुझे के घटना याद है , मैं अपने पति के सभी मित्रों से परिचित तो नहीं हूँ क्योंकि उनका दायरा  बहुत बड़ा है . हम लोग कहीं जा रहे थे तो हमारे  एक परिचित मिले और इनको धन्यवाद देने लगे और बोले यार अब तो हमारा खून का रिश्ता हो चूका है . वैसे इस तरह के काम करके आने पर ये हमें कभी नहीं बताते हैं . हम लोग उनसे मिल कर आगे चल दिए . घर आने पर मैंने उनकी कही बात को पूछा कि  उन्होंने ऐसा क्यों कहा ?
                   तब इन्होने बताया कि इनके छोटे भाई की आंतें उलझ गयी थी और उनको हॉस्पिटल लाया गया उस समय तुरंत ऑपरेशन होना था . उसकी पत्नी बेहोश पड़ी थी , दो छोटे छोटे बच्चे है. बड़े भाई को शुगर होने के कारण  वे नहीं दे सकते थे . उनके ससुराल वाले आये और ब्लड के नाम पर खिसक लिए . ये उस समय वहां पर थे और ये संयोग था कि  इनका ब्लड ग्रुप उनसे मिलता था . इन्हें सोचने की जरूरत नहीं पडी  और इन्होने एक यूनिट खून उनको दिया और उनका ऑपरेशन हो गया और वे आज अपने परिवार के साथ स्वस्थ हैं . बस उसके बाद  ये उस बात को भूल गए थे .
                  मेरे बताने का मतलब सिर्फ इतना है की कभी कभी जब खून की जरूरत होती है तो वह ग्रुप नहीं मिलता है या फिर ताजे खून की जरूरत होती और कम मिलने वाले ग्रुप के लिए एक बड़ी समस्या हो जाती है . एक बार मैं भी अपनी बेटी के लिए फँसी थी उसका ग्रुप AB + था और उसके प्लेटलेट्स बड़ी तेजी से गिर रहे थे उसके लिए प्लाज्मा की जरूरत थी . मुझे फख्र इस बात का है कि आई आई टी के कई बच्चों ने आकर अपना खून दिया था और तब हम उसको बचा पाए थे . मैं उन बच्चों की आजीवन शुक्रगुजार  रहूंगी .
                   आज एक अपील  उस वर्ग से जो रक्तदान के लिए सक्षम हैं . अपने अपने क्षेत्र में युवाओं को इस बात के लिए प्रेरित करें कि वक्त पर रक्त देने के लिए संकल्पित रहें . ये न पैसे से खरीदा जा सकता है और न दौलत इसका निर्माण कर सकती हैं . कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं का निर्माण भी इस काम में सहयोग प्रदान कर सकती हैं . वे युवाओं के ब्लड ग्रुप के साथ उनकी पूरी जानकारी रखें ताकि उनसे संपर्क करके इच्छुक युवाओं से संपर्क किया जा सके . 
रक्तदान के लिए पात्रता : 
१. रक्तदान करने वाले की आयु १८  वर्ष से अधिक हो .
२. रक्तदाता को शुगर , BP या अन्य कोई घातक रोग की शिकायत नहीं होनी चाहिए  . गर्भवती महिलायें भी रक्तदान के लिए उचित पत्र नहीं होती हैं . 
३. एक बार में सिर्फ एक यूनिट रक्त ही दिया जा सकता है और शरीर की स्थिति २४  घंटे में सामान्य हो जाती है . 
४. किसी प्रकार के नशे के आदि व्यक्ति भी इसके लिए सही सिद्ध नहीं हो पाते है .
५.  पेशेवर रक्तदाता के रक्त को नहीं लेना चाहिए क्योंकि ये अपने खून का व्यापार करते हैं 

 

बुधवार, 12 जून 2013

बाल श्रमिक निषेध दिवस !

 विश्व बाल श्रमिक निषेध दिवस ! 

                        बच्चों को वैश्विक मुद्दा बनाये जाने का भी जन मानस के मन में जागती मानवीय भावनाओं और उनके प्रति संवेदनशीलता है और कितने एनजीओ इस दिशा में काम कर रहे हैं। हर बच्चे को स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा का अधिकार है और हर समाज का जीवन में बच्चों के लिए अवसरों का विस्तार करने का दायित्व भी है।  फिर भी दुनियां भर में लाखों बच्चों को किन्हीं कारणों से उचित अवसर नहीं मिल पाते हैं और वह बाल श्रम की जद में आते हैं।  पूरे विश्व में 160 मिलियन बच्चे बाल श्रम में लिप्त हैं।

 

          
                ये बचपन जो भूखा है और ये बचपन जिसकी भूख  किसी और को मिटानी चाहिए अपने नन्हें नन्हें हाथों से काम कर असहाय माता - पिता की  भूख मिटाने के लिए काम  कर रहे हैं और कहीं कहीं तो नाकारा बाप के अत्याचारों से तंग आकर उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी मजदूरी करने लगते हैं और कहीं कहीं माँ बाप के द्वारा ही बेच दिए जाते हैं।
                मैं अपनी बहन के यहाँ गयी तो उसकी सास ने कहा - कोई लड़की काम करने के लिए आपके जानकारी में हो तो बताना . घर में रखना है कोई तकलीफ नहीं होगी , घर वालों को हर महीने पैसे भेजती रहूंगी . क्या कहती उनसे ? उनकी बहू और बेटियां बहुत नाजुक है कि  वह अपने बच्चों को तक नहीं संभाल  सकती हैं और घर के काम के लिए उन्हें कोई बच्ची चाहिए क्योंकि उसको डरा धमका कर काम करवाया जा सकता है और अगर बाहर की होगी तो उसके कहीं जाने का सवाल भी नहीं रहेगा, स्थानीय होगी तो राज घर जायेगी तो सीमित समय तक ही काम करेगी। 
 
 
                ये घरेलू  काम करने वालों का हाल है . होटलों , ठेकों , भट्ठों और भवन निर्माण में ऐसे बच्चे काम करे हुए देखे जा सकते हैं और उनके नन्हे हाथ कितनी तेजी से काम करते हैं ? यहाँ मुफ्त शिक्षा भी क्यों नहीं ले पा  रहे हैं ये बच्चे ? क्योंकि माँ बाप को दो पैसे कमा कर लाने वाले बच्चे चाहिए जिससे खर्च में हाथ बँटा सके। माँ बीमार हो तो बेटी काम करके आएगी। स्कूल जाने पर क्या मिलेगा? 
 

                  इनके लिए सरकारी नीतियाँ तो हैं लेकिन उन नीतियों को लागू करवाने के लिए जिम्मेदार लोग शोषण करने वालों से ही पैसे खाकर सब कुछ नजर अन्दाज करके कागजों में खाना पूरी करते रहते हैं।  घर में काम करने वाली कम उम्र लड़कियाँ अक्सर यौन शोषण का शिकार होती हैं और वे अपनी मजबूरी के कारण  कुछ कह नहीं पाती हैं।  घर की मालकिन भी पति के डर से अपना मुँह बंद रखती हैं। 
 
           होटलों में मुँह अँधेरे से उठ कर काम करते हुए बच्चे और आधी रात  तक होटल बंद होने तक काम करते रहते हैं और खाने को क्या मिलता है ? बचा हुए खाना या नाश्ता। वहीं से वह कभी कभी अपराधों में भी लिप्त हो जाते हैं। ढाबे और सड़क किनारे बने हुए चाय के होटल तो ऐसे बच्चों को ही रखते हैं ताकि उन्हें कम पैसों में अधिक काम करने वाले हाथ मिल सकें। जहाँ पर दौड़ दौड़ कर काम करने वाले नौनिहाल होंगे वहाँ पर अत्याचार का शिकार भी होंगे। 
 

             
आज के दिन इन बच्चों को कोई छुट्टी देने वाला भी नहीं होगा। वे बिचारे क्या जाने इस लोकतान्त्रिक देश में उनको पढ़ने लिखने और और बच्चों की तरह से खेलने का पूरा अधिकार ही नहीं है बल्कि सरकारी तौर पर उनके लिए मुफ़्त शिक्षा और खाने पीने की व्यवस्था भी है। हम इस दिन को मना कर और कुछ लिख कर अपने दिल में तसल्ली कर लेते हैं कि  हमारा फर्ज पूरा हो गया लेकिन हम भी उतने ही दोषी है क्योंकि कहीं भी काम करते हुए बच्चों से काम लेने वालों को समझाने का काम करने का प्रयास तो कर ही सकते हैं। ये भी निश्चित है की जिन्हें ये मुफ्त में काम करने वाले मिले हैं, वह हमें 'भाषण और कहीं जाकर दीजिये।' कह कर वहाँ से चले जाने के लिए मजबूर कर देंगे। 
 
         अभी पिछले दिनों ही एनसीआर के एक स्लॉटर हाउस में कितने नाबालिग बच्चे काम करते हुए पकड़े गए। फिर आगे क्या होगा? इसके बारे में कोई भी जानकारी नहीं है। लेकिन अगर उनको कार्यस्थल से बाहर लाया गया है तो जरूर उनको वहाँ से मुक्ति मिलेगी। लेकिन ऐसे बच्चों की पारिवारिक और सामाजिक परिस्थियों का भी अध्ययन होना चाहिए।  सरकार द्वारा गरीबी रेखा से नीचे पाए जाने वाले परिवारों को वो सुविधाएँ दिलवाने का प्रयास हो ताकि इन बच्चों के भविष्य के बारे में कुछ सार्थक सोचा जा सके।
 
        सरकारी प्रयास कभी तो अच्छे अफसर पाकर सफल हो जाते हैं और कभी वे भी बिक़े होते हैं,  लेकिन हम प्रयास तो कर ही सकते हैं, और हो भी रहे हैं।  कहीं कोई एक बच्चा भी माँ बाप को  समझाने से, मालिक को  समझाने से, उसके बचपन को बचाने   में सफल हो सके तो आज का दिन सार्थक समझेंगे 
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*सभी चित्र गूगल के साभार