मंगलवार, 8 जून 2010

मेरे लेखन का सफर : स्मृतियाँ कुछ तिक्त कुछ मधुर (५)

                               खैर शादी के तय होने तक सब सही रहा, मेरे प्रकाशन को सबसे अधिक गति १९७८-७९ में ही मिली. खूब लिख और प्रकाशित भी हुआ. पर शादी एक ऐसा बैरियर साबित हुआ कि गति को विराम लग गया. कुछ तो नए घर में आकर अपने को समायोजित करने का समय था और कुछ विरोध के बाद भी शादी होने का आक्रोश था. उसके बीच जीना और खुद को स्थापित करना भी एक बड़ा काम था.
                     खैर कलम तो उठा कर रख दी, करीब एक साल बाद अपनी सारी पूँजी मैं उरई से उठा कर कानपुर ले आई. जिनमें मेरी प्रकाशित रचनाएँ थी , सभी पत्रिकाएं और भी जिनमें कभी पूरा उपन्यास छपा था, कहानी विशेषांक थे, कुछ ऐसे धारावाहिक थी - आज दुर्लभ है. - ललिता शात्री का : मेरे पति मेरे देवता ' नाम से प्रकाशित पूरी गाथा. राजेंद्र राव की प्रस्तुति - सूली ऊपर सेज पिया की / कोयला भाई न राख . सभी मेरी अनमोल निधि थी. इस के साथ ही प्रकाशित और अप्रकाशित सभी रचनाएँ भी थी.
                    एक बार मैं कुछ दिनों के लिए बाहर गयी और वो सारी रद्दी में बेच दी गयीं. जब मैं वापस आई तो मेरी अलमारी खाली थी. पूछा तो पता चला की रद्दी वाले को बेच दिया. बेकार का कूड़ा इकठ्ठा था. अब मैं किससे  क्या कहती? कैसे समझाती कि वो मेरी जीवन की अनमोल निधि थी - जो एक बार लिख जाता है वो दुबारा नहीं लिखा जाता. ये मेरी जिन्दगी का सबसे बड़ा सदमा था . मैं उस दिन बहुत रोई थी और पतिदेव सांत्वना देते रहे किन्तु हो कुछ भी नहीं सकता था.
                  घर में कुछ विद्वेषक भी बन गए. सुनने को मिल जाता कि अगर ये लिख सकती है तो तुम क्यों नहीं? तुम भी कविता लिख करो आखिर तुमने तो हिंदी में M .A . किया है. पतिदेव तो थे टूरिंग जॉब वाले सो हफ्ते में २ या ३ दिन उनके बाहर होते और तब सारे काम के बाद मैं अपने लेखन के लग जाती थी. लेकिन वे बस लिख भर पाती उनको फिर से लिख कर भेजने का काम नहीं कर पाती थी. फिर भी कभी कभी तो कर ही लेती थी.
                  अब  घर में यह भी सुनाई देने लगा की क्या ये लिखने विखने की हवा फैला रखी थी. छपा तो आज तक कुछ भी नहीं. क्या शादी के लिए हवा उड़ा रखी थी.  समझा जा सकता है कि इस तरह के व्यंग्य कोई नई बात नहीं होती.
                   इत्तेफाक से उसी महीने 'सरिता' में मेरा लेख छपा सो लाकर मैंने पत्रिका उनके सामने रख दी. जब पढ़ा तो शांत हो गए.
इस लेख में एक दंपत्ति  का उल्लेख था . जिसमें पहले हमारा परिचय उनकी पत्नी से हुआ था और बाद में पता चला कि पतिदेव तो हमारे घर के ठीक पीछे वाले मकान में रहते हैं. हमने उनका विवाद सुलझाने के लिए सोचा और दोनों लोगों से बात हुई. दोनों ने अपनी सहमति जताई कि विवाद को सुलझा लिया जाय. पत्नी ने कहा कि मैं उनकी ओर से बोलूगीं  और मेरे पतिदेव उनके पतिदेव कि ओर से. जब मैं दिन नियत करने के लिए उनके घर पहुंची तो उनके पिता ने हमसे कहा - 'देखिये इसका नॅशनल टीवी से अभी कॉल आई है और अगर इसका मूड ख़राब हो गया तो इसका प्रोग्राम बिगाड़ जाएगा. इसलिए बेहतर होगा कि आप उसी पागल को समझाये मेरी बेटी को  नहीं. '
मुझे उनके शब्द आज भी याद हैं और फिर मैं समझ गयी कि बेटों से उपेक्षित ये सोने के अंडे देने वाली बेटी को उसके घर नहीं जाने देना चाहता. और फिर मैंने उस अध्याय को वही बंद कर दिया.
                    मेरे लेखन  को एक बड़ा सार्वजनिक ब्रेक तब मिला जब मैं एम.एड. कर रही थी. अपने लघु शोध के लिए मैं जो भी लिखती और अपनी गाइड को चैक कराने जाती तो उन्होंने पढ़ा तो पूछा कि  कविता लिखती हो क्या? मैंने स्वीकार किया तो उन्होंने एक दो कविताएँ मांगी.
           उसी वर्ष कानपुर विश्वविद्यालय में नए उपकुलपति की नियुक्ति हुई और उन्हें कालेज में आमंत्रित किया गया. गाइड ने प्रिंसिपल से बता दिया कि रेखा कविता लिखकर बोल सकती है. मुझे कविता लिख कर पढ़ने को कहा गया. आज तक मैंने कभी इस तरह से फरमाइश पर कविता नहीं लिखी थी. लेकिन लिखने को कहा गया तो लिखा और फिर समारोह में मंच पर जाकर पढ़ा भी. ये मैंने जीवन में पहली बार किसी मंच पर जाकर कविता पढ़ी थी. मैं विश्वविद्यालय कैम्पस में ही रहती भी थी तो ये बात पूरे कैम्पस  में फैल  गयी. अब तो कैम्पस के बच्चे आ जाते कि मेरी टीचर जा रही हैं एक कविता लिख दीजिये. किसी को कॉलेज कि मैगजीन में देनी है तो कुछ लिख दीजिये. इतने दिन बाद मेरे ससुराल वालों को लगा कि ये कुछ अलग है. मेरे पास कवि सम्मलेन के प्रस्ताव आने लगे लेकिन मेरे ससुर जी को ये पसंद न था तो मैंने जाने से मना कर दिया.


इसके बाद मुझे आई आई टी में नौकरी का अवसर मिला. आरम्भ में तो मानविकी विभाग में समाजशात्र में मिला किन्तु वहाँ सिर्फ एक वर्ष का अनुबंध था. वहाँ पर सभी विषयों के प्रोफेसरों से मेरी जान पहचान हो गयी थी. उनमें ही थी डॉ. बी. एन . पटनायक जो अंग्रेजी भाषा में थे और वे इस बात से वाकिफ हुए कि मैं लिखती हूँ और हिंदी का अच्छा ज्ञान है . वह कंप्यूटर साइंस विभाग में आरंभ होने जा रहे 'मशीन अनुवाद' परियोजना में भाषाविज्ञ की हैसियत से सहयोगी थी. उन्होंने ही मुझे यहाँ आने का आमंत्रण दिया और फिर इससे जुड़ी हूँ तो ये सफर जारी है १९८७ से लेकर आज तक और आज हम गूगल और अन्य अनुवाद के साधन को टक्कर देने के लिए तैयार हैं . आज भी इसको और सटीक और ग्राह्य अनुवाद प्राप्त करने के लिए प्रयास कर रहे हैं. ये वह क्षेत्र है जो कभी ख़त्म नहीं होने वाला. और ये भी मेरे लिए मेरे लेखन की ही देन है.
                                 बहुत वर्षों तक मैं यहाँ भी गुमनाम ही रही, सिर्फ मेरी सहयोगी जो आरम्भ से ही मेरे साथ रही . उनको पता था की मैं लिखती हूँ और मेरी डायरियां यहाँ पर रही रहती थी. जिनमें कविताएँ और आलेख होते थे. घर में लिखने का समय कम ही मिल पाता था.

               

16 टिप्‍पणियां:

  1. अति सुन्दर लिखा है। बधाई।

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  2. हमारे समाज में शादी के बाद लड़की का अपना करियर बढ़ाना एक जटिल कार्य है आज भी फिर भी आपने हिम्मत नहीं हारी ये कबीले तारीफ है .

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  3. बुलन्द होसले वाले ही ज़िन्दगी मे कोई मुकाम पाते हैं और आपने ये साबित कर दिया।

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  4. घोर विसंगतियों के बीच आज इधर आया हूँ..आते ही पढ़ डाला.अत्यंत प्रेरणाप्रद .
    लेखन ही हमारे जीवन्तता का परिचायक है.
    शहरोज़

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  5. आपकी जीवनी प्रेरक है...आप की इस झुझारू प्रकृति को नमन...
    नीरज

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  6. sampoorn yatra ne hi lekhan ko paripakw kiya hai aur aaj aapke saath is safar ke sahyatri hum bhi hain ..........

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  7. आईये जानें ....मानव धर्म क्या है।

    आचार्य जी

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  8. आपके सफर के साथ साथ चल रहे हैं.....बहुत अच्छी प्रस्तुति....आपके हौसले की दाद देती हूँ...

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  9. दिल गर्व से भर उठा...इतनी विषम परिस्थितियों में भी आपने अपनी लिखने की लौ जलाए रखी...सच नमन है , आपके जज्बे को...और कहते हैं, ना देर हैं अंधेर नहीं...आखिर अब आपका लिखा ,सबके सामने आ रहा है...और सब आपके विचारों को पढ़कर बहुत प्रभावित हैं...ऐसे ही लिखती रहें....शुभकामनाएं

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  10. रोचक संस्मरण ...बहुत लोगों को हौसला मिलेगा आपके जज्बे से ...!!

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  11. सच कहूँ तो मे आप को ये टिप्पणी कल ही करने वाला था मगर हिम्मत नहीं हुई |

    आखो मे आसू आ गये जो मेरे जेसे इन्सान के लिए बहुत ही कठिन होता है | जब मैने आप की वो लाइन पड़ी "एक बार मैं कुछ दिनों के लिए बाहर गयी और वो सारी रद्दी में बेच दी गयीं. जब मैं वापस आई तो मेरी अलमारी खाली थी. पूछा तो पता चला की रद्दी वाले को बेच दिया "

    सच मानिये आखो मे पानी की बुँदे दिखाई देने लगी क्यूँ की जब कोई इतनी महनत से कुछ लिखे और बाद मे पता चले रद्दी के भाव बेच दिया तो जो दर्द आप को उस वक़्त महसूस हुवा मे उसकी तुलना तो नहीं कर सकता किन्तु हा मे समझ जरुर सकता की क्या बीती होगी आप पर |

    आप के बाद मेरे जहन मे पापा का ख्याल आया जो जिन्दगी भर शाहित्य लिखते रहे, और कभी कभी गुस्से मे आकर माँ कहती रहती है की मे इन्हें बेच दूंगी रद्दी वाले को | सच मानिये मुझे उस वक़्त बहुत गुस्सा आता है |

    खेर जो हो चूका वो हो चूका मगर हा उस गटना घटना से जो आप ने सिखा या आगे बदने का होसला आप को मिला वो भी काम नहीं है |

    हमारी शुभ: कामनाए आप के संगर्ष पूर्ण जीवन के लिए |

    --
    शेखर कुमावत
    http://www.amritwani.com/
    http://kavyawani.blogspot.com/

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  12. "himmat-e-mardan, madad-e-khuda" ye kuchh sach sa nahi hai......ab dekhiye na, jab aapki puri sanchit nidhi......aapka sahitya raddi me chala gaya to aapke pariwar ko biswas dilane ke liye Sarita ka wo prakashit ank saamne aa gaya.......:)

    So touching story ...........aap sach me bahut bade ho.........umar me nahi, wo to ho hi...........karm se bhi..........:)

    ek aur baat aapko follow kar raha hoon, yahan bhi........:D, ab har samay khud pahuch jaunga.........:)

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  13. आप सभी लोगों को बहुत बहुत धन्यवाद जो मेरे इस सफर में शामिल हुए और आशा है कि ये सफर कभी ख़त्म नहीं होगा और हम ऐसे ही आप लोगों के साथ चलते हुए आपसे प्रेरणा और मार्गदर्शन पाते रहेंगे.

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  14. शेखर,

    ऐसा नहीं है, माँ को किसी काम में पापा कि जरूरत होती होगी और वे लेखन में लगे होंगे तो वे ऐसा कह देती होंगी. नहीं तो वे भी इस पर गर्व करती होंगी. ये कागज़ के टुकड़े ही तो हमारी सबसे बड़ी पूँजी होती है. अक्षर तो वही होते हैं बस उनसे बने शब्दों का संयोजन बदल जाता है.

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  15. रेखाजी
    कल सुबह सेही नेट बंद था |जगह जगह खुदाई के कारण कभी भी नेट बंद हो जाता है अभी आपका आलेख पढ़ पाई हूँ
    आप अपनी इस लेखन यात्रा की कई बाधाओ को पार कर निरंतर आगे बढती रही ये सबके लिए प्रेरणा स्त्रोत्र रहेगा |आपके इस जुझारू पन को सलाम |

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ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जो मन में होता है आपसे उजागर कर देते हैं. आपकी राय , आलोचना और समालोचना मेरा मार्गदर्शन और त्रुटियों को सुधारने का सबसे बड़ा रास्ताहै.