शुक्रवार, 18 जून 2010

दाम्पत्य जीवन में दरार और मनोग्रंथियाँ !

                      सबसे पहले मैं बता दूं कि मेरी ये लेख आज से २४ साल पहले जुलाई १९८६ में  "सरिता" में प्रकाशित हुआ था. मेरी लेखन के सफर में इसका जिक्र किया था तो कुछ शुभचिंतकों ने ये सुझाव दिया कि मैं अपने उन लेखो और कहानियों को ब्लॉग पर डालूँ ताकि उन्हें पढ़ा जा सके . 

            डॉ. प्रशांत मेरे पड़ोसी हैं, उनसे हमारी पारिवारिक अंतरंगता है. डॉ. प्रशांत  और उनकी पत्नी दोनों ही उच्चशिक्षित एवं सुसभ्य व्यक्ति है. पति एम.एस.सी, पीएच.डी. और  उच्च पदस्थ अधिकारी हैं. पत्नी भी किसी महाविद्यालय में प्रवक्ता हैं , साथ ही साथ अच्छी गायिका और मंच से लेकर रेडिओ तथा टीवी तक एक जाना पहचाना व्यक्तित्व है. ३ साल से अपने पिता के घर रह रही हैं, क्योंकि वह अपने में यह उच्चता की भावना पाले हुए हैं कि वे इतनी अच्छी कलाकार हैं तो उन्हें उसी तरह से घर में भी हाथोंहाथ  लिया जाय और जैसे उनके मायके में सभी तारीफों के पुल बांधा करते थे यहाँ भी उनका ही गुणगान होता रहे. .
                      हर नारी के लिए शादी से पहले और  शादी के बाद दायित्वों में अंतर आ ही जाता है . नारी चाहे कलाकार हो, या नेता अथवा प्रशासक - घर के अन्दर वह माँ, पत्नी और बहू तीनों व्यक्तित्व एक साथ जीती है और परिवार के हर सदस्य के प्रति उसके अलग अलग दायित्व हैं और वह उनको पूर्ण रूप  से न सही कुछ अंश तक तो पूर्ति की अपेक्षा तो अवश्य ही की जा  सकती है. जहाँ इन दायित्वों की उपेक्षा हुई नहीं कि परिवार विघटन के कगार पर आ खड़ा होता है. डॉ. प्रशांत की पत्नी अपने दायित्वों को निभा नहीं सकीं या कहिये कि वे निभाना नहीं चाहती थी और एक खुशहाल परिवार आपसी कलह का शिकार हो गया. 
                     शकुंतला मेरी बहुत अच्छी सहेली है और अपनी हर बात मुझसे शेयर करती है. जब हम इंटर में पढ़ रहे थे तभी उसकी शादी कर दी गयी थी. उसके पति भी उस समय पढ़ ही रहे थे लेकिन आज से 16 साल पहले और आज के माहौल में जमीं आसमान का अंतर है. पतिदेव तो पढ़ लिख कर नौकरी करने लगे और अच्छी जगह पर हैं. लेकिन वे पत्नी अपने समय के अनुसार आगे नहीं पढ़ सकी और घर को बखूबी संभाल रही हैं. अब पतिदेव अपनी पत्नी को लेकर हीन भावना से ग्रस्त हैं और बात बात पर ताना देते हैं कि मेरे भाग्य में तो ये ही  फूहड़ लिखी थी. वह भी बेचारी अपने दो बच्चों का मुँह देखकर चुपचाप सब सहती रहती है. 
                    ऐसे ही कई अन्य दम्पति मेरी नजर में है . पति बहुत ही खूबसूरत और पत्नी साधारण भी नहीं बल्कि उससे भी कम स्तर की है. यह तो संयोग की बात है कि उनका संबंध हो गया. पत्नी अपने रंगरूप  को लेकर बड़ी हीन भावना रखती है. और अपने पति को हमेशा शक की दृष्टि से देखती रहती हैं. किसी स्त्री से यदि हँस कर बातें करते हुए देख लिया तो तुरंत उससे सम्बन्ध स्थापित कर यह जानने का प्रयत्न करेगी कि कहीं दाल में काला तो नहीं है. यदि जानपहचान की स्त्री ने उसके सामने उसके पति की प्रशंसा कर दी तो उसकी निगाह में निश्चित ही उसके पति के साथ कोई सम्बन्ध है या  रहा है. उसकी दृष्टि  में  पति खूबसूरत होना और स्वयं का न होना हमेशा ही एक तनावपूर्ण वातावरण बनाने में सहायक होता है.
                      दाम्पत्य जीवन में चाहे हम परंपरागत रीति समझें या मानव की नैसर्गिक आवश्यकता, दोनों ही हालत में पति और पत्नी के मध्य सामंजस्य आवश्यक है. सामान्य जीवन में हीनता या उच्चता की भावना या किसी तरह के अहम् की भावना एक मनोवैज्ञानिक व्याधि है. यह व्याधि यदि पति और पत्नी के मध्य आ जाती है तो निश्चित ही दांपत्य जीवन को कटुता की ओर ले जाती है. दाम्पत्य जीवन में अपने  दायित्वों से विमुख होना , एक दूसरे को संशय की दृष्टि से देखना या बेवजह किसी पर दोषारोपण करना - यह  सब  जिस पृष्ठभूमि को तैयार करते हैं वह है पारिवारिक विघटन. 

विजय पाने की कोशिश करें 
                      इस मनोग्रंथियों से ग्रस्त होकर कोई भी अपने को दोषी नहीं मानता. जैसे डॉ. प्रशांत की पत्नी को ही लें - उनका कहना है कि  वो जाहिलों का परिवार है और वहाँ उसके गुणों की क़द्र नहीं है. वे अपने को उच्चता की भावना का शिकार नहीं मानती. 
शकुंतला  का पति जब अपने सहकर्मियों की पत्नियों को अपटूडेट  देखता है तो उसको उसकी कमियां नजर आती हैं. 
                 मान लीजिये आप अपनी इन ग्रंथियों के वशीभूत होकर तलाक लेने की बात भी सोचते हैं तो यह कोई आपकी समस्या का समाधान नहीं है. यह बात तो पुनर्विवाह के बाद भी हो सकती है. सम्पूर्ण कोई भी नहीं होता वहाँ कोई और कमी मिल सकती है. हो सकता की आपकी उच्चता की भावना को दूसरा भी पसंद न करे और आपकी उपेक्षा शुरू कर दे तब क्या करेंगे? इससे बेहतर है की आप इसका निदान खोजें.
                  यह नहीं की मानव में जो ग्रंथि बन गयी वह मिट नहीं सकती या उसका कोई निदान नहीं है. उन पर विजय पाई जा सकती है. अपने आसपास दृष्टिपात  करें तो किन्हीं लोगों को ऐसा पायेंगे जो आपके लिए प्रमाण हो सकते हैं, व्यक्ति  के रंगरूप की नहीं बल्कि उसके गुणों की क़द्र करनी चाहिए. हम कवि , कलाकार या नेता कोई भी हों उनके साथ परिवार में पति - पत्नी, पिता-संतान या माँ संतान , बहू और सास ससुर के रिश्ते कमतर नहीं होते हैं. यदि आप अपनी हीन भावना या उच्चता की भावना इस हद तक ग्रस्त हो चुके/चुकी हैं तो आप मनोचिकित्सक से सलाह ले सकते हैं. इसका बेहतर निदान उसके पास हो सकता है. 
                              कभी कभी इसके परिणाम इतने घटक हो जाते हैं की व्यक्ति किसी गंभीर मानसिक रोग का शिकार या आत्महत्या तक कर सकता है. 
                     एक  अभिभावक मेरे पास आये और अपने बच्चे के बारे में बोले की इस बच्चे को पढ़ाई के दौरान डांटा न जाये, क्योंकि इससे बच्चा एकदम सहम जाता है. कारण पूछने पर पता चला कि  बच्चे की माँ नौकरी करती है, पिता संयुक्त परिवार में हैं, माँ बाप और तीन कुंवारी बहने हैं. बच्चे की  माँ हर समय आक्रोश से भरी रहती है और अपना  गुस्सा बच्चे पर पीट कर निकालती है. परिणामतः पिता का व्यक्तित्व अंतर्मुखी हो गया और बच्चे भी अन्तर्मुखी हो गए. 
                    परिवार का एक सदस्य भी यदि किसी मानसिक व्याधि का शिकार है , तो यह नहीं कि पूरा परिवार अप्रभावित रहता हो, सब उसके ग्रसित रहते हैं. यदि पुरुष इसका शिकार है तो वह अपनी पत्नी और बच्चों पर अनावश्यक दबाव डालेगा या बात बेबात उन्हें प्रताड़ित करेगा. यदि पत्नी इसका शिकार है तो वह अपनी कुंठाओं को बच्चों पर ही किसी न किसी रूप में व्यक्त करेगी. परिणाम यह होगा कि बच्चे भी कुंठित हो जायेंगे, उनका व्यक्तित्व अन्तर्मुखी जो जाएगा. ऐसे बच्चे कभी  कभी अपराध प्रवृत्ति की ओर भी उन्मुख  हो जाते हैं. 
                         परिवार की सुख शांति की जिम्मेदारी दोनों पर ही होती है, हर परिवार पर ये बात लागू  होती  है. ये मनोवैज्ञानिक समस्याएं अस्थायी होती हैं और हर समस्या का कोई न कोई समाधान  होती है. यदि इन मनोग्रंथियों का कारण जीवनसाथी हो तो उसकी बुराइयों को नजरअंदाज करके उसमें अच्छाइयों को खोजें.
                       समायोजित परिवार को बिखरने से बचाने का दायित्व आप पर ही है. परिवार कोई ऐसी अस्थायी संस्था नहीं है कि  जीवन की समस्याओं के हल्के से थपेड़ों में उड़ जाए. पति और पत्नी दोनों  का ही ये दायित्व है कि वे अपनी मनोग्रंथियों पर नियंत्रण करके परिवार को मानसिक शांति और सुरक्षा प्रदान करें.

24 टिप्‍पणियां:

  1. आपका नज़रिया यथार्थ के नज़्दीक और बेबाक है बधाई

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  2. अच्छा मनोवैज्ञानिक आलेख ..सामजस्य और बेलेंस अगर ये दोनों बात समझ में आ जाएँ तो बहुत ही समस्याएं सुलझ सकती हैं .

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  3. itna achchha margdarshan ke liye dhanyawaad...! waise aapke baato se purntaya sahmat hoon!!

    Rahi baat parenting ki......isliye main khud sharmsaar rahta hoon........kabhi kabhi hamara gussa bebajah apne dono shaitano pe nikal deta hoon.......beshak baad me dukh hota hai......lekin har baar aisa hi hota hai.......:(

    anyway koshish jaari hai........ham bhi sudhrenge.......:)

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  4. बहुत सारगर्भित लेख....दाम्पत्य जीवन के लिए आपसी सहयोग ज़रूरी है

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  5. interesting blog, i will visit ur blog very often, hope u go for this site
    to increase visitor.Happy Blogging!!!

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  6. बहुत अच्छा सार्थक आलेख..पसंद आया.

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  7. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करती !!अच्छी रचना प्रेरणा देने वाली ..समय हो तो पढ़ें जीने का तमाशा http://shahroz-ka-rachna-sansaar.blogspot.com/2010/06/blog-post_18.html

    शहरोज़

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  8. बहुत सार्गर्भित सार्थक आलेख है 24 साल पहले की स्थिती मे अब भी अधिक सुधार नही हुयी है शायद हमारे पास आत्ममंथन के लिये समय ही नही है तब ऐसे आलेखों की बहुत आवश्यक्ता होती है। धन्यवाद और शुभकामनायें

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  9. बहुत ही सारगर्भित आलेख..,इतना अच्छा मनोवैज्ञानिक विश्लेष्ण किया है...और सही सुझाव भी दिए हैं...अगर इन सब बातों पर अच्छी तरह ध्यान दिया जाए तो कितने ही घर विघटन से बच जाएँ...और एक खुशहाल मौहल कायम हो जाए,घरों में .

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  10. बहुत बढ़िया आलेख. वाकई थोड़ी सी आपसी समझदारी से हम टूटते रिश्तो को जोड़े रख सकते हे. सिर्फ़ हमारे अहम और हीन भावना दोनो को ही अलग रखना होगा. धन्यवाद इतना अच्छा लेख हमारे साथ बाँटने के लिए.

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  11. आपने बहुत अच्छा लिखा है लेकिन कम शब्द्धों में ही बता दे तो मेडम ये अहं की लङाई है जो कभी नही खत्म हो सकती है आदमी जितना सादगी का जीवन व्यतीत करता था उसके अंदर अंह घर नही करता था। जितना आधुनिकता की दोङ में भागा है उतना ही इस घातक बीमारी की चपेट में आ रहा है। आप कृपा मेरा ब्लोग भी एक बार जरूर पढें
    http://jatshiva.blogspot.com/
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  12. रेखा जी , आपके इस लेख मेँ जो सार छिपा हूआ हैँ । अगर उसे कोई भी दम्पति समझ ले और आपसी सामाजस्य बना ले तो जीवन सफल हो जाये।

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  13. A post which should be read by both partners
    to enjoy bliss full married life.

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ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जो मन में होता है आपसे उजागर कर देते हैं. आपकी राय , आलोचना और समालोचना मेरा मार्गदर्शन और त्रुटियों को सुधारने का सबसे बड़ा रास्ताहै.