शुक्रवार, 27 मई 2011

गर्मियों की छुट्टी और अपना बचपन !

कितना अच्छा लगता है जब कोई हमसे कह दे कि आप फिर से एक बार अपना बचपन जी लें। क्या वह दिन वापस मिल सकते हैं - नहीं लेकिन फिर भी लगता है कि कोई लौटा दे मुझे बीते हुए दिन बीते हुए दिन और वह पल छिन आज जब सोचती हूँ तो लगता है कि हमने अपने जीवन में कितनी मस्ती की है और फिर आज के बच्चों पर नजर डालते हैं तो लगता है कि ये तो अपना बचपन पैदा होते ही खो देते हैं। माँ बाप को ये जल्दी रहती है कि किस स्कूल में इनका अभी से रजिस्ट्रेशन करवा लें। हमारे ज़माने में तो २० मई को रिजल्ट मिला नहीं कि फिर छुट्टी सीधे जुलाई को को स्कूल खुलेंगे और सके बाद ही नई किताबें और नए क्लास कि पढ़ाई शुरू होती थी। गर्मियों में कोई टेंशन नहीं। भाई बहनों के साथ मस्ती और धामा चौकड़ी। पता ही नहीं चलता था कि कब वे दिन निकाल जाते थे।
आज तो स्कूल बंद ही तब होते हैं जब बच्चों के नए क्लास कि पढ़ाई शुरू हो जाती है और मिल जाता है ढेर सा होम वर्क और प्रोजेक्ट जो बच्चों का काम बड़ों का सिर दर्द ज्यादा हो जाता है। वैसे ये सिर दर्द मैंने नहीं झेला है सो नहीं जानती कि कैसे निपटा जाता है? हम बचपन में ही स्वतन्त्र रहे और अपने बच्चों के बारे में भी। चलिए इसी विचार के चलते अपने कुछ ब्लोगर साथियों को भी मैंने बचपन में वापस जाने के लिए बहुत बहुत कहा तो वे उसमें चले गए और अपने संस्मरण मुझे लिख कर भेज दिए आपके साथ सब शेयर कर लेते हैं। इसे पढ़ कर आप भी अपने बचपन में विचर आईये।

मगर मुझको लौटा दो वो बचपन का.....

हमारे साथ के किस्से, लगे हैं बात कल की हो..

बढ़ी यह दूरियाँ मेरी, न जाने कब जवानी से

जब बचपन की धुँधली यादों के बीच झँकना शुरु किया तो कुछ सुनहरी और कुछ गुदगुदाती तस्वीरें भी नजर आईं. जबकि उन तस्वीरों का मुख्य अंग मैं स्वयं था किन्तु फिर भी सुनहरी कहना पड़ रहा है. यही साहित्यिक कायदा हैं पुरानी अच्छी यादों को जतलाने का जैसे किसी भी मृत आत्मा जिसने जीते जी भले ही सबका जीना हराम कर रखा हो, उसके नाम के आगे स्वर्गीय लगाने का कायदा है. आजकल तो हमारे नेताओं के बीच एक नई परिपाटी शुरु हो गई हैं कि मृत आतंकवादी के नाम के बाद भी सम्मान के साथ 'जी' लगाने लगे हैं. अब जो कायदा चल निकले, निभाना तो पड़ता है वरना कहाँ हम और कहाँ सुनहरी तस्वीर.

गर्मी की छुट्टियाँ लगते ही सब दोस्त शाम को कॉलोनी में खेला करते थे. छोटी सी सरकारी कॉलोनी थी मात्र २० से २२ घरों की. चारों तरफ पहाड़ों के बीच घिरी. सब घर अपने से. दिन भर तेज धूप की वजह से घर से निकलने की मनाही थी. तो घर में लोटपोट, चंपक, चन्दामामा, कॉमिक्स आदि लि बैठे रहते थे. बोरियत तो होती थी. जी ललचाता था कि किसी तरह बाहर निकला जाये. माँ दोपहर में खाना खाकर सो जाती थीं मगर जरा हम दरवाजा खोलें कि झट जाग कर पूछती थीं कि क्या हुआ? और हम उल्टे पैर कमरे में वापस.

बड़ी जुगत के बाद रास्ता निकला कि अब से सब दोस्त किसी दिन किसी के घर, किसी दिन किसी के घर सारी दोपहर रहा करेंगे ताकि सब साथ भी हो जायें और धूप की बात भी न उठे. पहले दिन सब दोस्तों को अपने ही घर पर रोका. माँ ने देखा भी सब दिन भर लुडो, सांप सीढ़ी, कैरम खेलने में कमरे में मस्त हैं, तो उनको क्या आपत्ति हो सकती थी. सबको उन्होंने बेल का शरबत भी पिलाया और सूजी का हलवा भी खिलाया.

अगले दिन दूसरे दोस्त के घर सब इक्कठे हुए. सिलसिला चल निकला. लेकिन लाख सब एक जगह जमा हो जाये मगर दिल तो बाहर धूप में निकल कर नजदीक में एक तालाब था, वहाँ जा तैरने का ही रहता था. हम सबको वहाँ न जाने और न तैरने की सख्त हिदायत थी क्यूँकि मान्यता यह थी कि वो तालाब हर साल एक बलि लेता है. इसी वजह से सब ललायित रहते कि वहाँ चला जाये. बुजुर्गों के अनुभव को काट अपने को ज्यादा अक्लमंद साबित करने की जो उम्र होती है, उसी के शुरुवात में रहे होंगे हम सब तब.

तो सब दोस्तों ने अपने घर मेरे घर जाने की बात की और मैने घर में उन दोस्तों में एक के घर जाने का बता दिया. तयशुदा कार्यक्रम से सब तालाब पर मिले. दिन भर बिना कपड़ों के खूब तैरे, वरना गीले कपड़े लिए कैसे घर लौटते. अब तो हर रोज ऐसी ही मस्ती में कटने लगा. अपनी बात को वजन देने के लिए, जिसके घर का पता बता कर जाते, शाम को आकर घर पर बताते कि आज आँटी ने श्क्कर के पराठें खिलाये. तो कभी पोहे खिलाये., तो कभी कि गज़ब का सैण्डविच बना था.

काठ की हांडी कब तक चढ़ती. एक रोज जिस दोस्त के घर का बता कर निकले थे, उसकी मम्मी याने श्रीमती शर्मा जल्दी शाम हमारे घर आ पहुँची. हम मित्र अभी तालाब से लौटे भी न थे. माँ ने बात करते करते उनसे पूछ लिया कि आपने परसों सेण्डविच में क्या क्या डाला था, मेरा बेटा तो दीवाना हो गया है उसका. अब शर्मा आँटी ने सैण्डविच खिलाई हो तो बतायें? वो हाँ हूँ करती रहीं और पू बैठीं कि बच्चे नहीं दिखाई दे रहे? माँ ने बताया कि वो तो आपके घर में हैं. फिर जो भी बात हुई हो, पोल पट्टी खुल गई. बात सबके घरों तक पहुँच गई.

शाम घर लौटे तो सबकी जो धुनाई हुई कि कई दिन तक याद बनी रही. आज भी जब कभी हम दोस्त मिलते हैं तो तालाब पर तैरने चलने की बात कर उस दिन को याद करते हैं. अब तक तैरने के नाम पर वो पिटाई ही याद आती है, तैरना तो मानो हम सब भूल ही गये हैं

यह अलग बात है कि अब स्विमिंग पूल में तैरते हैं मगर तालाब में तैरने के हुनर जुदा होते हैं, वैसे ही जैसे ए सी कमरे में बैठ गरीबों की परेशानियों को नहीं आंका जा सकता मगर हो वही रहा है.

-समीर लाल 'समीर'


विभा रानी:

गर्मी के दिन और गर्मी की रातें, बचपन की यादें, छुटपन की बातें.

कहां से याद करें और कैसे याद करें बचपन की गर्मी के दिन और रातें! न जाने कितनी मुश्किलें थीं उन दिनों. फिर भी, तब बिजली इतनी आंख मिचौली नहीं खेलती थी. शाम में स्ट्रीट लाइट भी जलती और सुबह सुबह नाली साफ करने और कचरा उठाने नगरपालिका के कर्मी भी आते. घर के पिछवाडे का पोखरा तब इतना साफ था कि हम छहो भाई-बहनों ने अपनी तैराकी वहीं सीखी. एक साथ जब छहों तैरते, तब सब अपना काम छोडकर हमें देखने लगते. सब वहीं नहाते, वहीं पूजा करते. उसी में गाय और भैस भी नहातीं और हम भी शलवार में हवा भर भर कर उसके सहारे पोखरे में तैरते. वह फूली शलवार जीवन रक्षक चक्के का काम करती. कुमुदिनी के फूल भी रात में उसमें खिलते और हम उसकी बैगनी आभा निहारते मुग्ध होते रहते. दो तरफ कच्चा और एक ओर पक्का घाट थे और कच्चे से तैराकी सीखने की शुरुआत का अंत पक्के घाट पर तैरने की परीक्षा पास करने के बाद पूरी होती.

गर्मी की छुट्टियों में हम कहीं नहीं जाते. ऐसा नहीं था कि रिश्तेदार नहीं थे. बस, रिश्तों की गर्मी नहीं थी. इससे, हम सब अमूमन घर पर ही रहते. गर्मी में स्कूल कॉलेज सुबह के हो जाते. मां और हम सब स्कूल-कॉलेज से दोपहर में लौटते, खाना खाते. गर्मी में सत्तू का चोखा, खीरे का रायता और आम की चटनी खाने का मुख्य आकर्षण होते. उनके सहारे खाना तनिक चटखदार हो जाता. फिर, भरी दोपहर काटने की चिंता? ना जी ना, कोई चिंता नहीं होती. हम भर गर्मी सिलाई-कढाई का कम करते. तब लडकियों की सिलाई-कढाई उअंके गुण का एक हिस्सा मानाजाता. उनके द्वारा कढाई किए गए तकिए,चादर, टेबल क्लॉथ आदि उनके दहेजकी सामग्री बनते और कई सालों तक वे ससुराल की शोभा बढाते रहते. जिन लडकियों को यह सब नहींआता, उनकी माताओंके अनुरोध पर जानेकितने तकिए,चादर, टेबल क्लॉथ आदि बनाकर हमने उनकी जान बचाई.

तो जी, गर्मी की छुट्टी में हमारे पास अपने रुटीन खाने पीने के अलावा कई आकर्षणों में प्रमुख था, ताश खेलना. अनुशासन की गांठ में रखनेवाली मेरी मां इस समय एकदम उदार हो जाती. मां-बेटी के बीच का फर्क़ मिट जाता. मैं, मेरी बडी बहन, मेरी दो चचेरी बहनें दोपहर में जुटतीं और फिर जो 3-2-5, कोट पीस और 29 की बाज़ी जमती तो पता ही नहीं चलता, कब दिया-बाती का समय हो गया. बडे बेमन से हम उठते. उस समय कोई घूमने-घामने आ जाता तो बहुत बुरा लगता कि नाहक, हमारी ताश की बाज़ी छिन गई.

दूसरा आकर्षण था- आम. तब 2 रुपए, 5 रुपए सैकडा आम बिकते थे. हमारा आमों का बाग भी था. वहां से लंग़डा आम आते. सुबह-शाम, दोपहर और रात हम आमों का भोग लगाते, वह भी भर पेट नाश्ता-खाना खाने के बाद. जबतक थाली में गुठली और छिलके के पहाड न उठा, तबतक आम खाना क्या हुआ? बाउजी बीजू (रसवाले) आम बाल्टी में पानी भरकर और उसमें आम डालकर हम भाई-बहनों के पास रख देते और हम सब उसे चूस चूस कर मिनटों में साफ कर देते. मुजफ्फरपुरवाली लीची बाज़ार में आ जाती. उसका भी हश्र आमों की तरह ही करते. यही नहीं, उस समय का हर मौसमी फल, चाहे तरबूज हो या खरबूज, खीरा हो या ककडी, हम जी भरकर इनका आनंद लेते.

इन्हीं फलों में एक था तडकुन (ताड के फल). मां के स्कूल की एक कर्मचारी थी- जलेश्वरी.उनके यहां ताड का बाग था. वह वहां से एकदम कौले (नरम) फल लाती. उसके भीतर से निकले रस को चूसते वक्त जो आनंद मिलता, उसे सिर्फ महसूसा जा सकता है. जामुन खाकर हम अपनी बैगनी हुई जीभ सभी को दिखाते. पके कटहल से घर गनगनाता रहता. खजुआ कोए हम खाते. नेढा और गुठली की सब्जी आम के आम, गुठली के दाम कहावत को चरितार्थ करते.

गर्मी की दोपहरी का एक और आकर्षण होता, नीम्बू, बेल और सौंफ के शर्बत. चीनी की अधिक खपत के कारण यह तनिक मंहगा था. हम इंतज़ार करते किसी मेहमान का. उनके कारण अपनी दोपहरी भी शर्बतमई. इसके अलावा शाम में आंगन में खाट, चौकी डालकर, मच्छरदानी लगा कर सोना. गर्मी छुट्टी कैसे बीत जाती, पता ही नहीं चलता।
(सफर जारी है )

7 टिप्‍पणियां:

  1. वो बचपन उस मे हमी राजा होते थे, कोई डर नही, कोई रोक टोक नही...फ़िर से एक बार यह दिन लोट आये.... बहुत सुंदर जी धन्यवाद

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  2. मजेदार मासूमियत भर संस्मरण ..वाकई क्या दिन थे वे भी आपके इस प्रयास से एक बार घूम आये सब .......वो गलियां .....
    बहुत अच्छे लगे दोनों ही संस्मरण.

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  3. बचपन की यादें ... और बचपन के दिन ...बहुत अच्छा लगा पढ़ कर समीर जी तो इतनी सहजता से व्यंग कर देते हैं की बस पढते ही रह जाते हैं ...बचपन की बात में भी कायदा लगा दिया आतंकवादी के नाम के बाद जी लगने का :):)

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  4. समयानुकूल चर्चा.. अच्छा लगा...

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  5. ये बचपन की यादें ऐसी ही होती हैं शोख, चंचल और नट्ख़ट्।

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  6. यह अच्छा और सुखद आयोजन है. खुद के बचपन में झांकने से साथ साथ साथियों के बचपन में भी झांकने का मौका...और लगता है जैसे सभी बचपन एक से ही होते हैं..निश्छल...


    साधुवाद इस हेतु!!

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  7. बहुत ही मजेदार संस्मरण ! बचपन के तो चांटे भी सुखद लगते हैं अब कोई ज़रा सा ऊँचे स्वर में भी बोल देता है तो हफ़्तों मूड खराब रहता है ! कितना मासूम होता है ना बचपन का यह समय ! ना कोई पूर्वाग्रह, ना किसीसे नाराज़गी और ना किसी से कोई शिकायत !

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