रविवार, 29 मई 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (४)

हम सब सबके बचपन के संस्मरण पढ़ कर कुछ अपने भूले हुए कामों को भी याद करने लगे हैं और कितना सुखद लग रहा है ये सब पढ़ कर फिर देर किस बात की है आप अपना बचपन मुझे भेज दीजिये और मैं उसको इस श्रंखला के कड़ी बना कर सबके सामने रख देती हूँ
अब अपना आगे का सफर देखते हैं :

रुण कुमार झा:

‘छुट्टी’ शब्द मानव जीवन के लिए एक अहम शब्द है। इस शब्द में हर्ष और विषाद के दोनों भाव छिपे हुए हैं। हम इसकी गहराई में न जाकर अपने बचपन में बिताई हुई छुट्टी के दिन के उन लम्हों को याद करें, जो अब भी मेरे आपके जेहन में वर्तमान है।
मेरे जैसे करोड़ो बच्चों को अपने स्कूल से गर्मी की छुट्टी का इंतजार रहता है। फिर अपनी-अपनी तरह से वे छूट्टियों का मजा लेने का कार्यक्रम बनाते हैं। मैं भी बचपन में स्कूल से गर्मी की छुट्टी का इंतजार कर रहा था, जैसे-जैसे छुट्टी के दिन करीब आता जाता एक अजीब तरह का उत्साहं दिलो-दिमाग में भरता जा रहा था। आखिर गर्मी की छुट्टी हो गयी थी स्कूल में।
इस बार की छुट्टी कैसे मने और कहाँ मनाई जाये इस पर परिवार में मम्मी-पापा भाई-बहनों से तकरार होता था, जिसकी चलती उसी के पसंद की जगह हम जाते। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार हम सभी मम्मी की पसंद से अपने ननिहाल गये छूट्टी मनाने।
हमारा ननिहाल बिहार के एक पिछड़े इलाके में पड़ता है। गंगा के किनारे वह गाँव बसा हुआ है। मुझे कभी वहाँ अच्छा नहीं लगा। लेकिन मन मार कर हम वहाँ पहुँच गये। पहला दिन तो मैं पछता रहा था और मम्मी को मन ही मन कोस भी रहा था, कि हमें कहाँ ले आयीं , लेकिन नहीं! दूसरे दिन ही मुझे अहसास हुआ कि इससे अच्छी जगह तो छूट्टी बिताने का कोई दूसरी हो ही नहीं सकती । फिर क्या था, तो हम अपने छोटे मामा के साथ गंगा किनारे पहुँच गये, जहाँ हरा-भरा खेत था, और उसमें तरह तरह के मौसमी साग, सब्जी से लेकर तरबूज-खरबूज, ककड़ी, खीरा आदि मन को ललचा रहा था। वहीं गंगा के विशाल पेट जो अब सिर्फ रेत के टिलों से अच्छादित था, हमें अपनी ओर खिंच रहा था। मौन निमत्राण दे रहा था। वहाँ पहुँचते-पहँुचते भीषण गर्मी के कारण हम सब थक गये थे, प्यास के मारे हम सब का बुरा हाल था। अब हम पानी कहाँ से लायें, जल में रह कर मीन प्यासी वाली बात हो रही थी, गंगा के किनारे मौजूद होकर भी हम प्यासे थे, कारण यह था कि जिस कारण से भी हो, गंगा सिमटती जा रही थी, सिकुड़ती जा रही थी। और हम जहाँ पर थे वहाँ से आध किलोमिटर की दूरी पर थी गंगा, जिसमें कंचन पानी था, लेकिन हम सब वहाँ प्यास के कारण पहुँच नहीं सकते थे। अब क्या करें, इसी उहापोह थे कि इतने में एक चमत्कार हुआ। बाल मन के लिए चमत्कार ही था। मामा ने गंगा के पेट से टीले के नीचे की रेत को हाथ से एक सवा फिट गहराई मंे खोदा। खोदते ही पानी लबालब आ गया। फिर क्या था। हम लोगों ने ऐसे कई गड्ढे बनाये और खूब कूद फंाद करता रहा। गंगा के पेट के बीच पहाड़नूमा टीले पर से नीचे कूदना फिर चढ़ना और भाग-भागकर एक दूसरे पर बालू उछालना मुझे इतना अच्छा लगा कि मैं सोचने लगा कि इस से अच्छी जगह तो दूसरी कहीं और हो ही नहीं सकती। जब तक हम ननिहाल में रहे हम इसी प्रकार गंगा के किनारे रेत और खेत में लगे हुए तरबूज-खरबूजों का आनन्द लेते रहे। कभी-कभार नौका विहार का भी आनन्द हमने लिया। यह सब अलौकिक आनन्द से कम नहीं था, गर्मी की छूट्टी का। आज याद करता हूँ तो रोना आ जाता है कि क्या वह भी दिन था औ एक आज का भी दिन है। दोनो समय और दिन में कितना फर्क है! क्या वो दिन अब हमारे जीवन में कभी लौट पायेगा?




शिखा वार्ष्णेय :



गर्मियों की छुट्टियाँ ???? वो कैसी होती हैं? हमने तो कभी जाना ही नहीं ।कभी कहीं नहींजा पाते थे हम उन दिनों. बाकी मेहमान ही हमारे यहाँ आया करते थे और उन्हीं के मुँह से सुना करते थे हम ,बर्फ केगोले,कुल्फी, खस के शरवत की बातें...गरम दोपहरी, छत पर रातों को नानी की कहानियों की बातें.हमारी तो गर्मियांमेहमानों को आसपास की जगहों को घुमाने में ही निकल जाती .पर्वतों के ढलानों पर कुलांचे मार कर दूर दूर निकल जातेऔर लौटते हुए नानी याद जाती.पेड़ों से कच्चे सेब और आडू तोड़ कर खाते और फिर पेट में दर्द से रोते.चीड के पेड़ों सेउसके फूल तोड़ कर लाते और घर आकर उन्हें खूबसूरत रंगों से सजाते.पलक झपकते ही सारी गर्मियां निकल जाती.हमेंकभी गर्मियों की छुट्टियाँ मिली ही नही ...क्यों??? अरे भाई क्योंकि हमारा बचपन पहाड़ों पर बीता और वहां छुट्टियाँगर्मियों में नहीं जाड़ों में होती हैं :) ही ही ही.


चलिए शिखा ने तो गर्मियों की सर्दियों में बदल दिया , भाई वह उनके अपने मौसम के अनुसारछुट्टियाँ हो होती थीलेकिन छुट्टियाँ तो छुट्टियाँ हैकभी भी उनको एन्जॉय किया जाय


(सफर अभी जारी रहेगा।)

4 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक संस्मरण ...

    शिखा

    जाड़ों की छुट्टियों का ही ज़िक्र कर देतीं ....वैसे गर्मियों का आनंद तो सबको घुमा कर ले ही लेतीं थीं न :)

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  2. बहुत सुन्दर, शानदार और रोचक संस्मरण! उम्दा प्रस्तुती!

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  3. बहुत रोचक....वाकई वो दिन न तो लौट कर आयेंगे और न ही वो यादें जायेंगी....


    मगर उनका क्या करें जिन्होंने गर्मी की छुट्टियों जैसे बेहतरीन पल मनाये ही नहीं...:)

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