बुधवार, 11 जुलाई 2012

आम आदमी कौन है ?



                   आम आदमी कौन है? 


                               माननीय गृह मंत्री जी  का बयान  उन्हें एक गैर जिम्मेदार मंत्री और लोक से दूर रह कर उसको परिभाषित करने पर एक गैर जिम्मेदार जन प्रतिनिधि   भी ठहरा रहा है। उन्होंने अपने वक्तव्य में किस वर्ग की बात की है?  किस आम आदमी की बात की है?  जो 15 रुपये की मिनरल वाटर की बोतल  और 20 रूपये की आइसक्रीम खाता है और गेहूं और चावल में एक रुपये के बढ़ने पर चिल्लाता है।
                              महोदय आप अपने मंत्रित्व के चश्में को  उतारिये और आम आदमी के बीच में आइये  तब आपको पता चलेगा कि  -- वो हजारों किसान जो ख़ुदकुशी कर रहे हैं और कर चुके हैं , वे अगर आइसक्रीम खाने की हालत में होते  तो अपने परिवार को अनाथ छोड़ कर ख़ुदकुशी करने पर मजबूर न होते। आप संसद में बैठ कर लाखों रूपये हर महीने लेकर ऐसा बयान  दे सकते हैं लेकिन अगर आपसे   पूछा जाय कि  आम आदमी लौकी और तरोई जैसी  सब्जियां किस भाव खरीद कर खा रहा है? ये आपको पता नहीं होगा। कितने लोग सिर्फ एक वक़्त खाकर सोते हैं इसके आंकड़े आपके पास नहीं होंगे .  सड़क के किनारे लगे सरकारी नलों से बदबूदार पानी भर कर पीने वालों की संख्या आप तो क्या आपका मंत्रालय भी नहीं बता सकेगा.  दिन 12 से 14 घंटे काम करके रोटी जुटाने वाला आइसक्रीम नहीं खा सकता  . आपको पता भी है कि  कितने साठ  साल के ऊपर के व्यक्ति  श्रम करके अपने परिवार को पाल रहे हैं - नहीं और बिलकुल भी नहीं।
                        आप खुद ए सी गाड़ियों में चलते हैं तो आपको सिर्फ गाड़ियों में घूमते  हुए लोगों को ही देखने की आदत है और उन तक ही आपकी पहुँच भी है,  तभी आप गाड़ी के खिड़की से फेंकी गयीं मिनरल वाटर की बोतल देख पाते  हैं। भारत आज भी गरीबी से जूझता हुआ गरीब देश ही कहा जाएगा क्योंकि यहाँ पर उन्नति और प्रगति तो सिर्फ सरकार के नुमाइंदों की हो रही है और सरकारी नीतियां बनती भी उन्हीं के हित के लिए है। वर्तमान सरकार और उसकी नीतियां अगर ऐसी ही चलती रहीं तो वह दिन दूर नहीं जब कि  भूख से भरे हुए लोगों की लाशें सड़क पर पड़ी मिल रही होंगी
                  आपकी सरकार 24 रुपये से ऊपर कमाने वाले को गरीब मानती ही नहीं है तो फिर आप सब को लाखों र्मिलने पर भी खर्च पूरा क्यों नहीं होता और आप सबको भत्ते बढवाने की दरकार क्यों बनी रहती है? इसका उत्तर आपके पास हो तो दीजिये। 
                     गेहूं और चावल पर एक रूपये आप बढ़ाते हैं और पेट्रोल , डीज़ल और गैस पर कितना बढ़ाते हैं? गेहूं और वावल कच्चा नहीं चबाया जाता है,  उसे पकाने के लिए वह क्या करेगा? आम आदमी की पीड़ा संसद में  पैर रखते ही हर आम से खास बना वह जनप्रतिनिधि भूल जाता है और फिर वहां बैठ कर वह सावन के अंधे की तरह होता है कि  जिसे हर जगह हरियाली ही दिखलाई देती है।
                     जिस सरकार के पास सिर्फ धांधली ही धांधली हों वह आम आदमी की परेशानी की बात करे भी क्यों?  जहाँ पर सुरेश कलमाड़ी और राजा  जैसे लोग होते हैं उन्हें सिर्फ बयानबाजी से ही मतलब होता है। गृहमंत्रालय जो देश के बारे में फाइलों में विवरण रखता है वह सिर्फ केन्द्रीय और राज्य मंत्रियों , सांसदों और विधायकों  तथा सरकारी कर्मचारियों का होता है। आम आदमी की तस्वीर से तो वह खुद वाकिफ नहीं है।
                    आम आदमी की तस्वीर दिखाती हूँ -- एक रिक्शा वाला जब दिन भर  रिक्शा चलाता  है, टूटी फूटी सडकों  पर सवारी लेकर मीलों चलता है  तो उसकी कमर टूट जाती है, पैर जवाब दे जाते हैं और शाम को वह पानी की बोतल या आइसक्रीम नहीं बल्कि छोटी सी परचून की दुकान से 5 रुपये की दाल , 10रु का आटा , नमक और मशाले के छोटे छोटे पाउच , 5 रुपये का दूध लेकर घर जाता हैऔर उसके पास गैस नहीं होती है उसकी पत्नी या बेटी ईंट  के चूल्हे पर सूखी और गीली लड़कियाँ जला कर घंटे भर धुंए से जूझती है तब पेट भरने के लिए कुछ पका पाती  है। क्या यह 24 रुपये में पालने वाला एक अमीर परिवार है अगर  तो आपकी गरीबी रेखा किन लोगों के लिए खींची गयी है? 
                      कभी पैदल चल कर इन बस्तियों में जाइए तब गृह मंत्री बनने का और बनकर बयानबाजी करने का शौक पूरा कीजिये . एक गैर जिम्मेदार सरकार के गैर जिम्मेदार गृहमंत्री से सिर्फ और सिर्फ आसमान  में उड़ते हुए नीचे झांकने  जो ऊंची  ऊँची अट्टालिकाएं  दिखलाई देती  वही नजर आती हैं और वह उन्हीं को भारत समझते हैं। वे अपने चैंबर में बैठ कर और बड़े बड़े स्थानों पर जाकर बयानबाजी करने के बजाय अगर पूरे कार्यकाल में एक बार भी सभी नहीं तो कुछ राज्यों का दौरा किये होते तो आपकी आखों का चश्मा अपने आप उतर जाता और नंगी आँखों से भारत की तस्वीर आप देख पाते .

10 टिप्‍पणियां:

  1. सही कह रही हैं आप... ये लोग जहाँ से जाते हैं वहः..उस रास्ते से आम आदमी को खाली करवा दिया जाता है.. इन्हें क्या पता...

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  2. रेखा जी आपने बिल्कुल सही कहा है ये कहाँ जानते हैं आम जनता का दुख दर्द ये तो सिर्फ़ इतना जानते हैं कि कैसे घोटाले किये जायें और देश को और जनता को कैसे खाया जाये। क्या मै आपकी ये पोस्ट शेयर कर सकती हूँ?

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  3. यह मोती चमड़ी वाले लोग खिन्नता में आकर कुछ भी बयान दे देतें हैं,बाद में खंडन करते हैं,कोई इनसे पूछे की आप जो बोल रहें हैं उसकी रेकॉर्डिंग यह बात साफ़ बता रही है तो जवाब आता है की उसे गलत समझा गया,समझदारी तो इन नेताओं में ही है आम आदमी तो मुर्ख है जो उन्हें चुनता है.इन्हें कोई शर्म नहीं आती सत्ता के नशे में यह सब भूल चुके हैं,

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  4. यह लेख भी आम आदमी ही पढ़ पाएगा ...काश यह खतनुमा पोस्ट मंत्री जी पढ़ पाते .... यही आक्रोश जन जन में समाना चाहिए और मंत्री जी को कुर्सी से उतार उनकी औकात बतानी चाहिए ।

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  5. सबको समझने का उपक्रम ही देश को बचा पायेगा।

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  6. आपकी पोस्ट कल 12/7/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 938 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  7. खास आदमी पूछता, आम आदमी कौन।
    खास-खास को पूछते, आम हो रहा गौण।।

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  8. rekha

    i dont think what chidambarm said had this meaning what you have interpreted

    middle class , upper middle class , lower middle class

    below the poverty line bpl

    he was talking about the upper middle class which has enough money to buy things but they start a hue and cry the moment even 1 rupee escalation is there

    you are talking about BPl

    there are ample of schemes for them , the issue is not poverty , the issue is the number of children they have ,

    they can never rise above the poverty line what ever the govt may do

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  9. मेरे घर के सामने दो-तीन परचून की दुकाने तो इन्‍हीं मजदूरों के भरोसे चलती है जो रोज शाम को पुड़िया में बांधकर आटा-दाल और मसाले ले जाता है। मेरे घर से दस किलोमीटर दूर एक गाँव है, हम 26 जनवरी को वहां गए थे। बच्‍चों के लिए साथ में केले लेकर गए थे। बच्‍चों ने केले खाकर छिलके वहीं फेंक दिए। मैंने उनसे कहा कि छिलके ऐसे नहीं फेंकते, पास में गाय बैठी है, उसके सामने डाल दो। एक वृद्ध व्‍यक्ति ने मेरी तरफ देखा और कहा कि क्‍या गाय केले के छिलके को पहचानती है जो वह खा लेगी? मुझे उनकी बात समझ नहीं आयी लेकिन मैंने बच्‍चों को जोर देकर कहा कि नहीं छिलके गाय के सामने ही डालो। गाय ने छिलके नहीं खाये। मैं हक्‍का बक्‍की थी, तब सामने बैठी बकरियों पर मेरी निगाह गयी और मैंने बच्‍चों से बकरी के सामने छिलके डालने को कहा तब बकरियों ने तो मुंह ही फेर लिया। मैं सोच में पड़ गयी और उस वृद्ध व्‍यक्ति के कथन का अर्थ समझ में आने लगा कि इस गाँव के जानवर केले के छिलके को पहचानते नहीं है। यदि शहर से लगे हुए गाँव में भी सबसे सस्‍ता फल नहीं आ पाता तब हम आइसक्रीम और मिनरल वाटर की बात कैसे कर सकते हैं? मध्‍यम वर्ग की संख्‍या कितनी है इस देश में, जो आइसक्रीम खा पा रहा है? केवल दो प्रतिशत लोग है इस देश में जो ऐश कर रहे हैं। बाकि तो जैसे-तैसे अपना जीवन काट रहे हैं।

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  10. सूचनाः

    "साहित्य प्रेमी संघ" www.sahityapremisangh.com की आगामी पत्रिका हेतु आपकी इस साहित्यीक प्रविष्टि को चुना गया है।पत्रिका में आपके नाम और तस्वीर के साथ इस रचना को ससम्मान स्थान दिया जायेगा।आप चाहे तो अपना संक्षिप्त परिचय भी भेज दे।यह संदेश बस आपको सूचित करने हेतु है।हमारा कार्य है साहित्य की सुंदरतम रचनाओं को एक जगह संग्रहीत करना।यदि आपको कोई आपति हो तो हमे जरुर बताये।

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