सोमवार, 23 जुलाई 2012

नाग पंचमी पर विशेष !

                               





  आज नाग पंचमी पर विशेष रूप से नाग पूजा की परंपरा को सब की तरह से मैंने भी निभाया. वह जीव जिसे हम सबसे खतरनाक समझते हें क्या वास्तव में वह उतना ही खतरनाक है ?
ऐसा कुछ भी नहीं है, वह एक जीव है हमारी ही तरह से आत्मरक्षा के लिए वह डस लेता है. जब उसको लगता है कि इस जीव से मेरे जीवन को खतरा है तो वह डस लेता है अन्यथा वह भी बेवजह किसी को नहीं काटता है. इंसान कसम खाता है और दूसरे पल अपने स्वार्थ के लिए उसको तोड़ने में हिचकता नहीं है लेकिन इस जीव के वंशजों ने जो वचन दिया था ये सांप आज भी उस कसम से बंधे हुए हें और उसको निभा रहे हें. सपेरा जब इनको जंगल में से पकड़ कर लाते हें तो वे वचनबद्ध होते हैं कि इतने समय के बाद उन्हें वापस जंगल में छोड़ देंगे. वे अपने उस वचन के खातिर जंगलों में और भूमि के अन्दर विचरने वाले प्राणी टोकरी में बंद घूमते रहते हें.
                           आजतक वे  महाभारत के युग के बाद से  वचनबद्ध है और उसको निभा रहे हें. वीर अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को महर्षि श्रृंगी ने शाप दिया था कि सात दिन के अन्दर उनको सांप के काटने से मृत्यु हो जायेगी.  जब बात से परीक्षित  भिज्ञ हुए तो उन्होंने अपने सात दिन तक भागवत सुनाने कि बात सोची क्योंकि उनको सातवे दिन ही सर्प दंश से मृत्यु होनी निश्चित थी. यद्यपि सांप से सुरक्षा पूरी तरह से रखी गयी थी लेकिन पूजा के लिए लाये गए फूलों के साथ सांप भी आया और उसके काटने से उनकी मृत्यु हुई. परीक्षित की मृत्यु के बाद उनके पुत्र जनमेजय जब शासक बने तो उन्हें बाद में ज्ञात हुआ कि उनके पिता की मृत्यु का कारण क्या था? तब उन्होंने पृथ्वी से सर्प जाति के सर्वनाश के लिए सर्प यज्ञ करने का संकल्प लिया. यज्ञ के आरम्भ होने पर मंत्रो के आवाहन के साथ ही पृथ्वी पर उपस्थित सारे सर्प विभिन्न दिशायों से आकर यज्ञ कुण्ड में गिरने आरम्भ हो गए.  तब तक्षक ( सर्पों के राजा ) ने जनमेजय के गुरु मुनि आस्तीक की शरण ली और उनसे प्रार्थना की कि उनकी जाति को जीवन दान चाहिए. मुनि आस्तीक ने जनमेजय से अपनी गुरु दक्षिणा के नाम पर सर्पों को जीवन दान देने का वचन लिया और जनमेजय ने उनसे सर्पों से वचन लेने को कहा कि अगर कोई उनके गुरु की सौगंध दे और फिर उनके मंत्र का स्मरण करे तो सर्प उस इंसान को कभी नहीं काटेगा भले ही वह अपने प्रतिशोध के लिए ही क्यों न गया हो? सर्पों की ओर से ये वचन दिया गया और वे आज भी इस वचन से बंधे हुए हें.
                         इस वचन को मैं स्वयं अनुभूत कर चुकी हूँ. ये मंत्र मुझे अपने गुरु से मिला था क्योंकि मेरे पतिदेव को सर्प से फोबिया था और अगर वे सपने में भी सांप को देख लेते थे तो चीख कर जाग जाते थे. जीवित देखने की तो बात कौन कहे? उस अनुभव को इस लिए बता रही हूँ क्योंकि जीव अनावश्यक किसी को परेशान नहीं करता है. तब मेरे नए घर में आने पर आवागमन के साधन उचित रूप से न थे और मैं करीब ५ किमी पैदल चल कर जी टी रोड पर पहुँचती और उसके बाद वहाँ से टेम्पो लेकर आई आई टी. पैदल रास्ते में कृषि विश्वविद्यालय के खेत  थे और बीच में सड़क थी. उसके नीचे ही पानी जाने के लिएय नहर से जुड़े हुए नाले थे. एक दिन मैं ऑफिस से पैदल आ रही थी तो देख कि एक काला  नाग बीच सड़क पर फन  फैला कर बैठा हुआ है और उसके पीछे लोगों के एक हुजूम रुका था और आगे भी . मेरी दृष्टि गयी तो मैंने मंत्र का स्मरण मात्र किया और वह नाग सर झुका कर चुपचाप सड़क से एक ओर नाले में चला गया और दोनों ओर के लोग अपने गंतव्य की ओर निकल गए. ये मेरा पहला अनुभव था. उसके बाद तो एक बार सांप मेरे कमरे में घुस आया और सोफे के नीच बैठ गया. मैंने देखा निकालने की कोशिश की लेकिन वह निकला नहीं . किसी को बता नहीं सकती थी नहीं तो वे लोग किसी को बुला कर उसको मरवा ही देते. मैंने अपनी दोनों बेटियों को लेकर पलंग पर सो गयी और मंत्र के साथ उनसे कहा कि दरवाजा खुला  है निकला जाइएगा. सुबह वह निकल कर जा चुका था. 
                      ये नागपंचमी का पर्व भी इस घटना से जुड़ा है कि इस दिन नाग की पूजा अर्चना और उनसे अभय रहने का दिन होता है. अगर हम उनको हानि न पहुंचाएं तो वह भी मनुष्य को हानि नहीं पहुंचाते हें.

10 टिप्‍पणियां:

  1. Bahut sundar baat kahi ha apne... koie bhi prani kise ko bewajah pareshan nahi karta sirf manav alaw.

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  2. आपकी बात से सहमत हूँ ... बहुत ही अच्‍छी लगी आपकी यह प्रस्‍तुति ...आभार

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  3. आदरणीय रेखा जी और पाठक गण!
    कृपया ऐसे अंधविश्वास को इतने अच्छे पर्व पर मत फैलाईये
    बस जन्मेजय के सर्प यज्ञ तक तो ठीक था -
    नाग बहुत ही खतरनाक सांप है -और मन्त्र तंत्र का उस पर कोई असर नहीं है
    भले ही इसे मत मारिये मगर घर में घुस आने पर इसके चैन की नींद मत सोयिये ...जब तक इसे निकाल बाहर न करा दीजिये
    अन्यथा इश्वर न करे -चैन की नींद चिर नींद हो सकती है

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    1. अरविन्द जी,

      हो सकता है कि आप मेरे इस बात से सहमत न हों लेकिन मंत्र शक्ति को मैंने खुद ही अनुभव किया है, जीवन में सिर्फ एक बार नहीं बल्कि कई बार. आप के लिए अन्धविश्वास हो सकता है लेकिन इसे मैंने किसी को इसी लिए नहीं देती कि पता नहीं कौन कैसे इसका प्रयोग करे? ये अपने अपने अनुभव है. इसको विज्ञान से सिद्ध नहीं किया जा सकता है लेकिन इसके अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता है. इंसान से जहरीला नाग नहीं हो सकता है, इंसान के कटे का कोई इलाज नहीं होता.
      --

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  4. सर्पों से ज्यादा विषैले तो आजकल इंसान हैं !
    रोचक संस्मरण !

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  5. बिलकुल, यही सच है यदि आप किसी जीव को कोई नुकसान नहीं पहुंचायेंगे तो वो भी बेवजह किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचता मेरे नाना जी भी यही कहा करते थे।

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    1. पल्लवी जी, बेवजह से पहले यदि प्राय: लगा देतीं तो बेहतर होता. जब हम ऐसा वक्तव्य देते हैं तो सोचिए जिसके परिवार के किसी सोते सदस्य को साँप ने काट लिया हो या ऐसा ही कुछ हुआ हो उसे कैसा लगेगा?
      घुघूतीबासूती

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