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शनिवार, 21 सितंबर 2013

पांच वर्ष ब्लोगिंग के !

                                      जीवन में लेखन के तो लगभग  पांच दशक होने वाले हैं।  वह बचपन की बाल जगत की कहानियों और कविताओं के काल से जोड़ रही हूँ।   छोटी जगह का आदमी अधिक जानकारी भी नहीं रखता है।  हाँ घर में पिता पढ़ने के  शौक़ीन थे सो सारी पत्र पत्रिकाएं घर में आती थीं।  लिखने की कला तो  विरासत में मिली और प्रोत्साहन भी मिला लेकिन ये मुझे बहुत बाद में पता चला कि  पापा भी लिखते थे लेकिन उनका लिखा कभी पढने  को नहीं मिला।  
                                      लिखने और छपने का काम भी जल्दी ही शुरू हो गया था। लेकिन पत्र पत्रिकाओं में छपने का मजा भी कुछ और ही था क्योंकि तब और कुछ तो था नहीं। मध्यमवर्गीय परिवार में बगैर नौकरी के अर्जन  आपने आप में एक  अलग सुख था। लेकिन तब इतना नहीं जानती थी कि  ये अपनी लिखी हुई हर चीज संभालकर रखनी चाहिए सो काफी  छपा हुआ इधर उधर हो गया और जो शादी के बाद साथ लायी थी वो मेरी अनुपस्थिति में रद्दी की भेंट चढ़ गया।  मेरी अप्रकाशित रचनाएँ भी।  तब मुक्तक नहीं भेजती थी ढेर  सारे मुक्तक और शेर सब कुछ।  
                                     जब ब्लॉग बनाया तो इतना रोना आया कि  काश मेरी सारी डायरी होती तो पता नहीं कितना डालने को मेरे पास होता।  खैर जो भी बचा था और जो भी फिर लिखा गया वह तो ब्लॉग में है।  ऐसा नहीं है मेरी बहनें  अब भी कहती हैं कि  क्या ब्लॉग पर लिखा करती हो ? पत्रिकाओं में क्यों नहीं भेजती ? पहले कितना अच्छा था ? सच तो ये है की पत्रिका उन्हें आसानी से हासिल हो जाती है और ब्लॉग पर जाना और पढना अभी तक सबको आता नहीं है और फिर समय भी नहीं है।  लेकिन अब भेजने में झंझट लगने लगा है क्योंकि ब्लॉग पर तुरंत लिखो और तुरंत प्रकाशित  कर दिया।  अभिव्यक्ति का एक अलग माध्यम है , जिसमें किसी संपादक की पसंद या नापसंद का कोई झंझट ही नहीं ( संपादक बंधुओं से क्षमा याचना सहित ) . वैसे प्रिंट मीडिया में भी अपनी अलग राजनीति होती है।  अब वो जमाना नहीं है - पहले मैंने कभी संपादक को कवर लैटर भी नहीं लिखा।  अपनी रचना लिफाफे में बंद की और सीधे भेज दी।  वहां से स्वीकृति पत्र मिला बस और उसके बाद चेक।  इसमें कुछ भी न सही लेकिन सब कुछ अपने हाथ में है।  लिखो डालो और पब्लिश कर दो.  ढेर सारे  मंच भी  हैं जहाँ अपने और साथियों की रचनाओं के विषय में जानकारी  मिलती रहती है।  
                                  आज अपने पांच वर्ष पूरे करने पर मैं ब्लॉग के बारे अधिक जानकारी देने के लिए अपनी मित्रों रश्मि रविजा , रचना सिंह , संगीता स्वरूप को धन्यवाद कहना चाहूंगी , जिनसे मैंने बहुत कुछ सीख कर आगे कदम रखे।  फिर लेखन में और मेरी श्रृंखलाओं में मेरे सभी मित्रों ने समय समय पर मेरे विषय को लेकर जो अपने विचार या अनुभव दिए उन सबके को भी मेरा हार्दिक धन्यवाद ! 
                                 मेरी कविताओं को लेकर अपने संपादन में छपने वाले संग्रह में स्थान देने के लिए मुकेश कुमार  सिन्हा,सत्यम शिवम् और रश्मि प्रभा जी को मेरा हार्दिक धन्यवाद ! 
                                
                                  चेहरा तो मेरा मेरे पास था जन्म से ही ,
                                  भाव भरे मन में विधाता ही था शायद ,
                                  थामी कलम इन हाथों में वो पिता ने दी ,
                                  तराशा किसी ने नहीं , बस जो लिखा था 
                                  उसी तरह पन्नों पर उतरा और रख दिया। 
                                   ये वक़्त ही था  पहले पन्ने से पन्नों पर 
                                   फिर पन्नों से इस मंच तक चली आई। 
                                    पढ़ा, सराहा या फिर पोस्ट मार्टम किया
                                   साथ रहे मेरे सभी मित्र और बहन- भाई।  


                    बस आपके साथ , स्नेह और सहयोग से शेष जीवन में ब्लॉग पर लिखने की प्रेरणा देते रहें और आलोचना या समालोचना हो भी  निःसंकोच अपने विचार हम तक जरूर भेजें।

शनिवार, 14 सितंबर 2013

हिंदी दिवस : औपचारिकता भर !

                                      १४ सितम्बर हिंदी  दिवस  घोषित किसने किया -  हमारी सरकार ने क्योंकि  आजादी के इतने वर्षों बाद भी सरकारी स्तर पर उसको उसकी जगह दिला पाने में असमर्थ रही  है  और रही  नहीं है बल्कि आज भी है. तभी अपनी नाकामी पर परदा डालने के लिए हिंदी माह , हिंदी पखवारा , हिंदी सप्ताह और हिंदी दिवस अपने प्रयासों को प्रदर्शित करने का एक प्रयास मात्र है।जब कि देश को राजभाषा की दुर्दशा पर कहने का एक  अवसर प्रदान किया जाता है।  
                                      सरकारी प्रयासों से इसमें कुछ  होने वाला नहीं  है ,  वह सिर्फ एक औपचारिकता मात्र है। अभी पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय  ने किसी जानकारी को हिंदी में देने से इनकार  कर दिया ,  आखिर क्यों ?  क्या हमारे लिए अपनी राजभाषा में कोई सरकारी  सूचना प्राप्त करने की मांग करना न्यायसंगत  नहीं है।  जब हमारे सरकारी तंत्र में यह रवैया चल रहा है  फिर इस हिंदी के दिवस , सप्ताह , पखवारा या माह का क्या औचित्य है ?
                           आज के दिन  हिंदी की वकालत  करते हुए हिंदी में  काम  करने को बढ़ावा देने की बात करते हैं और दिवस के गुजरते ही  सब बातें एक साल के लिए दफन कर  जाती है। जब हमारी सरकारी  नीतियां ऐसी हैं  हिंदी की दुर्दशा के लिए किसी और को दोषी कैसे  कह सकते हैं ? कम वाले आमदनी वाले अभिभावक भी बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से पढाना पसंद करते हैं और फिर उसके लिए ट्यूशन भी रखने के लिए मजबूर  होते हैं।   क्यों करते हैं ऐसा क्योंकि वे अंग्रेजी के महिमा मंडन से  परिचित होते हैं।  अंग्रेजी माध्यम से  बुरा  नहीं है लेकिन स्कूल में हिंदी की उपेक्षा और पाठ्यक्रम में उसके विषयवस्तु का ठीक से चयन न करना ही इसका सबसे बड़ा कारण है .  जब संसद में हिंदी  भाषी प्रदेश के सांसद अंग्रेजी में बोल कर अपने आपको विद्वान सिद्ध करने की कोशिश करते हैं और प्रधानमंत्री अपनी मेधा से हिंदी में  भाषण देने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं  तो फिर हिंदी भाषी लोग अपने लिए कहाँ जगह खोजें ? आम आदमी चिल्लाता रहे कि  हिंदी को  आगे लाओ लेकिन सरकारी तंत्र आज भी अंग्रेजों का मुंहताज है।  जहाँ तक मुझे पता है की करीब करीब सभी संस्थानों में हिंदी प्रभाग और हिंदी अधिकारी का पद होता है लेकिन वहां वह हिंदी को बढ़ावा देने के लिए होता है यह तो वहां  पता चल सकेगा ?
                        सरकार क्या कर रही है और उसके क्या करना चाहिए ?  बस इतना कि अपने बच्चों को घर में हिंदी ही बोलने को कहें और उनको इसा भाषा में अपने ज्ञान को भी बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें।  वे स्कूल या कॉलेज के अलावा घर में अधिक सुधारे जा सकते हैं।  
                        स्कूल में हिंदी ज्ञान के  नाम पर  चुटकुला नहीं कहेंगे बल्कि ये वास्तविकता है कि प्राइमरी स्कूल में कुछ अधिकारी औचक निरीक्षण के लिए गए तो वहां पर बच्चे मातृभूमि शब्द शुद्ध नहीं लिख पाए और फिर जब  शिक्षिका जी ने लिखा तो वह भी गलत था।  अधिकारी ने  खुद लिख कर कहा - मैडम आप तो सही  जानकारी रखिये नहीं तो इन बच्चों को क्या पढ़ाएंगी? 
                       ये हमारी शिक्षा  के नाम पर  एक बदनुमा दाग के अलावा कुछ भी नहीं है।  

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

भिक्षुक एक वर्ग !

                        


              भिक्षा वृत्ति सबसे निकृष्ट और हेय रही है लेकिन फिर भी हम माँगने वालों को पालते ही  रहते हैं ( वैसे मैं शारीरिक रूप से सक्षम , युवा वर्ग और बच्चों को कभी  भीख नहीं देती ) . हम ही उन्हें इस वृत्ति के लिए बढ़ावा  देते हैं।  उनकी कमाई एक मेहनतकश से कई गुना ज्यादा है।  उन्हें वो सारी चीजें सहज उपलब्ध है जिन्हें एक मेहनतकश पूरे माह  के बाद भी हासिल नहीं कर पाता है।
                                कानपुर में ७ भिक्षुक गृह है और वे सारे के सारे खाली हैं।   सरकारी सहायता बदस्तूर मिल रही है लेकिन वह जा कहाँ रही है ? इसके बारे मे  मुझे पता नहीं है लेकिन एक बात बता दूं कि ये भिक्षुक अपने अपने घरों में रहते हैं और इनके घर कोई  झोपड़ी नहीं है बल्कि अच्छे खासे मकान  हैं और वह भी सारी  सुख सुविधाओं से युक्त भी हैं।ऐसे ही नहीं जागा ये विचार --  कई घटनाओं और लोगों को देखने के बाद सोचा कि कैसा है ये वर्ग जो औरों की मेहनत या फिर किसी भी तरीके  किये गए पैसे पर ये लोग ऐश कर रहे हैं। 

                    कानपुर का एक प्रसिद्ध मंदिर पनकी की बात कर रही हूँ।  जहाँ पर मंगलवार को हजारों की संख्या में दर्शनार्थी आते हैं और रोज भी जाते हैं।  इस मंदिर में सैकड़ों की संख्या में भिखारी बैठे होते हैं वह भी सपरिवार -   माँ - बाप , बेटे - बेटी , नाती - पोते सभी।   मेरी नजर एक लड़की पर पड़ी , वह नव विवाहिता  लेकिन कम उम्र की अच्छी साड़ी पहने , पूरे साज श्रृंगार से और एक छोटे के बच्चे को गोद में लिए बैठी भीख  मांग थी . वही पास में उसके घर के लोग थे।  चूंकि  लम्बी लाइन थी और दर्शन मुझे भी करने ही थे सो खड़े खड़े ये भी देख रही थी।  तब लगा कि  यहाँ आने वाला हर व्यक्ति तो नहीं लेकिन १० में से ४ तो  पैसे , प्रसाद , लंच पैक , कपडे आदि देते हैं।  मैं नहीं कहती कि  ये सब न किया जाय लेकिन दान या इस तरह की चीजें देने के लिए पात्रता भी  देखनी चाहिए।  इन सभी भिखारियों में करीब करीब ८० प्रतिशत बिलकुल स्वस्थ और कार्य करने की दशा में होते हैं लेकिन वे कार्य नहीं करना चाहते क्योंकि अगर उनको एक जगह पर बैठे हुए एक दिन में कई सौ रुपये , आटा , फल , मिठाई और अन्य खाद्य पदार्थ मिल रहे हैं तो फिर -- 'अल्लाह दे खाने को तो ठेंगा जाय कमाने को ' यह  कहावत चरितार्थ होती है. 
                  नवरात्रि में माता जी के हर मंदिर में लाखों लोग रोज दर्शन करते हैं , जहाँ पर करोड़ों का प्रसाद रोज बिकता है और वही पर लाखों भिखारी भी अपनी थैली भर रहे होते हैं।  ऐसे एक मंदिर के बाहर माँगने वाले सड़क के  दोनों और बैठे होते हैं।   बच्चे बूढ़े और जवान सभी होते हैं , ऐसा नहीं है उनमें अपाहिज ,  कुष्ठ रोगी , अत्यंत वृद्ध और असमर्थ बेसहारा लोग भी होते हैं।  इनके घर में बाकायदा खाना पका कर आने वाले सदस्य और उनके स्थान को घेर कर पहले से बैठे हुए लोग होते हैं। एक परिवार का वार्तालाप ऐसे ही माहौल में  मैंने सुना था -- 
लड़की - चल तू जा , मैं खाना कर रख आई हूँ तब तक मैं यहाँ बैठती हूँ। 
 लड़का - कहे की तरकारी बनायीं है ?
लड़की - आलू   टमाटर की। डब्बा में रोटी और चावल रखा है , जल्दी खा कर आ फिर बप्पा जइहें। 
                                  उस लड़की की उम्र २० साल की रही होगी और जाने वाले लड़के की १५ साल।  उनके बप्पा किस उम्र के होंगे ? यानि की सभी के सभी मेहनत करके कमाने काबिल लेकिन जब उनको दूसरे की कमाई  का सुख लेना ही नसीब में हो तो फिर क्यों हाथ पैर हिलाए जाएँ।  
                      ऐसा नहीं है इनके  घूम घूम कर भीख मांगने वालों के बीच भी इलाके का करार होता है कि  ये हमारा इलाका है और इसमें इन दिनों में हम भीख माँगने हम ही जायेंगे।  कोई दूसरा नहीं जा सकता है।  इनके साथ आता रखने के लिए अलग थैला , चावल रखने के लिए अलग और कभी कभी तो ये  आलू दे दो कह कर सब्जी का भी इंतजाम कर लेते हैं।  जितना आटा  एक आदमी एक महीने में खाता होगा उतनी इनकी एक दिन की कमाई हो जाती है।  वर्षों से सुनती आ रही हूँ - एक भिखारी सड़क से निकलेगा - बेटा रूपया दो रुपया दे इस गरीब को।  धीरे धीरे ये माँगने की सीमा अब ५ से १० रुपये की हो गयी है।  हम तो घर में बैठे ही उनकी आवाज सुना करते हैं।  वैसे भाई मंहगाई का जमाना है तो उनकी मांग भी तो बढ़ेगी न , नहीं तो गुजर कैसे होगी ? 
                           सच कहूं इनको भिखारी हमने बनाया है , जिनकी रोज की आमदनी एक मजदूर से या कहो की एक बाबू से अधिक हो तो वह क्यों परिश्रम करेंगे ? हमारी धार्मिक भावनाओं का फायदा उठा कर ये हरामखोरी की आदत का  शिकार हो गए हैं।  रोज ही दिन में एक आध बार जवान औरतें , अधेड़ औरतें अपने बच्चों के भूखे होने का हवाला देकर रोटी मांगती हैं , पैसे मांगती हैं लेकिन अगर उनसे कहा की कुछ काम क्यों नहीं करती ? तो इस विषय में कुछ भी नहीं बोलना होता है काम के नाम पर चुपचाप अपना झोला उठा कर चल देंगी।  इनमें गैरत जैसी कोई चीज होती ही नहीं है , नहीं तो कितने बूढ़े और बच्चों को रिक्शा चलते देखा है , बोझ ढोते देखा है। इस मुफ्त की खाने वाले वर्ग के प्रति तो सोचने की जरूरत है - किसी और से क्यों कहें ? सिर्फ हम अपने को ही इसा दिशा में जागरूक बना लें।  अगर कुछ देना ही है तो फिर ऐसे व्यक्ति को दें जो कमाने के काबिल न हो।  चलने फिरने में लाचार हो , अत्यंत बूढा , अपाहिज हो।  बच्चों को तो भीख कभी न दें।  इनमें से बहुत  से बच्चे गिरोह द्वारा अपहृत करके उनको भीख मंगवाने का काम करवाते हैं।  वे लोग तो और उच्च कोटि के भिखारी हैं जो दूसरों को प्रयोग करके खुद आलिशान घरों में रहकर हमारी भावनाओं का फायदा उठाया करते हैं।  इस तरफ भी सजग होकर कुछ सामाजिक दायित्वों के प्रति जिम्मेदार बनें।  लोगों को भीख देकर अकर्मण्य न बनायें बल्कि उनको अगर काम के लिए प्रोत्साहित किया जाय तो समाज में कुछ तो  परिवर्तन लाया जा सकता है।  लोगों की खून पसीने की कमी दूसरे तो न खाएं ( वैसे खिलाने वाले हम ही होते हैं। )  

रविवार, 25 अगस्त 2013

काउंसलिंग जरूरी है लेकिन किसकी ?

                         हम प्रगति करते हुए अंतरिक्ष  तक पहुँच गए है और वहां तक पहुँचाने वाले शोध में देश के हर कोने के वैज्ञानिक जुटे हुए हैं और हम विश्व पटल पर भारतीय मूल की मेधा  को भी जब चमकते हुए तारे की तरह देखते हैं तो गर्व से हमारा सिर ऊँचा उठ जाता है . वहां हर हाथ सिर्फ अपने काम में जुटा होता है  क्योंकि   मेधा किसी जाति , धर्म या  या फिर वर्ग की धरोहर नहीं होती है और न हम उस जगह ये पूछते हैं कि अमुख वैज्ञानिक किस "जाति " का है . लेकिन हम इस जाति के चक्रव्यूह में कुछ ऐसे फंसे दिखते है कि हमारी शिक्षा , सोच और प्रगतिशील होने के सारे मायने बेकार हो जाते हैं .
                     हम अपने एक मित्र परिवार के यहाँ आये हुए थे क्योंकि उन्होंने हमें एक विशेष मुद्दे पर विचार विमर्श के लिए ही हमें बुलाया था .  अच्छी पढा लिखा और प्रतिष्ठित परिवार है .  उनके परिवार के सभी बच्चे उच्च शिक्षित और अच्छे पदों पर कार्य कर रहे हैं . युवा सोच और हमारी सोच अगर मिलती नहीं है तो ये दोष हमारी सोच का है . हमें समय के अनुसार बदलना जरूरी है . झूठी  मान प्रतिष्ठा को सम्मान का प्रश्न बना कर कुछ हासिल तो नहीं किया जा सकता है लेकिन खो बहुत कुछ सकते हैं . उस परिवार का एक बेटा अपनी पसंद की लड़की से शादी करने  के लिए परिवार की  सहमति चाह रहा था।   लड़की उनकी जाति  की नहीं है  और किसी उच्च जाति की भी नहीं है ।  बस यही छोटी जाति की  दीवार उस परिवार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना हुआ है ।  लोग क्या कहेंगे ?  सबको मुंह कैसे दिखायेंगे ? समाज में क्या इज्जत रह जायेगी ? आदि आदि। 
उस परिवार के लोगों की सोच पर मैं कुछ कहने की स्थिति में नहीं थी।  उस लड़की का परिवार प्रतिष्ठित परिवार था।  लड़की स्वयं इंजीनियर थी , पिता एक डॉक्टर और माँ एक कॉलेज में प्रिंसिपल, लेकिन वे इस समाज में उच्च कही जाने वाली जाति से नहीं थे। मैं सब कुछ समझ चुकी थी लेकिन अपने मित्र परिवार की सोच को बदलने के लिए पूरा प्रयास कर उन्हें इस शादी के लिए राजी करना मैंने अपने लिए एक चुनौती समझ कर ले लिया।  
                      किसी दकियानूसी सोच को  बदलना इतना आसन नहीं होता है लेकिन असंभव भी तो नहीं होता है। उनके लिए कितना मुश्किल है  ये समझना और मेरे लिए समझाना। फिर भी पूरी भूमिका तैयार करनी है और इसके लिए एक या दो बार नहीं बल्कि कई बार अपने तर्कों से उनको सहमत करने का प्रयास करना पड़ेगा और मैं इसके लिए तैयार भी हूँ।  
                  मैंने इस जाति व्यवस्था के उद्भव से लेकर  आज तक के आधार को ही उन्हें समझाने  के लिए सोची।  मैंने उनके घर हफ्ते में एक बार जाती हूँ  और पहले उस बच्चे से मिलती लेकिन अकेले में उनकी नजर में समझाने की दृष्टि - लेकिन मेरी नजर से उसे कुछ समझाना ही नहीं था।  फिर उनके साथ बैठती।  
             इस जाति व्यवस्था का आधार प्राचीन काल में कर्म के अनुसार ही बनाया गया था।  समाज का विभाजन इसी तरह से किया गया था लेकिन सभी जातियां एक दूसरे पर निर्भर रहा करती थी किसी का किसी के बिना काम नहीं  चल सकता था।  चाहे ब्राहमण हो या वैश्य या क्षत्रिय - सभी के चप्पल और जूते चर्मकार ही तैयार करते थे।  सफाई का काम करने वाले जमादार कहे जाते थे।  कुम्हार से ही मिटटी के पात्र  मिलते थे , उन्हें कोई और नहीं बना सकता था और ये कला  उन्हें अपने परिवार से ही प्राप्त होती थी और वे अपने पैतृक कार्य को करते हुए अपने जीवन को चलाते थे।  उनका कर्म क्योंकि सबकी सेवा से जुड़ा था इसलिए वे शूद्र की श्रेणी में रखे गए।  उनको गाँव या बस्ती से बाहर रहने के लिए जगह दी जाती थी।  लेकिन उस काल में भी ये जन्म से जुड़ा हुआ काम नहीं था .  सिर्फ कर्म से जुडा हुआ था।  कालांतर में इसको जातिवाद के रूप में उच्च जातियों ने जब उनको हेय  दृष्टि से देखना आरभ्य कर दिया . उनका शोषण और उनको अस्पृश्य बनाने की चाल भी इसी का परिणाम बनी।  
                    हम कर्म की दृष्टि से आज भी देख सकते हैं।  आज एक ब्राहमण परिवार का बेटा लेदर टेक्नोलॉजी में पढाई करता है और फिर बड़ी बड़ी कंपनी में काम करने लगते हैं।  वहां वे काम क्या करते हैं ? उसी चमड़े का काम न - जिस चमड़े का काम करते हुए चर्मकार हमेशा के लिए निम्न जाति में शामिल कर दिए गए।  आज हजारों लोग सभी जातियों के टेनरी में काम कर रहे हैं।  शू कंपनी में काम करते हैं और उनका सारा काम उसी से जुडा हुआ है फिर वे क्यों और कैसे उच्च जाति  के कहे जाते हैं?  उन्हें कर्म के अनुसार चर्मकार ही कहना चाहिए न।  आज  सफाईकर्मियों की भर्ती  होती है तो वहां पर काम के लिए आने वाले हर जाति के लोग होते हैं और नियुक्ति होने पर वही काम करते हैं लेकिन हम उन्हें शूद्र या जमादार क्यों नहीं कहते हैं ? वे उस काम को करते हुए भी ब्राहमण बने रहते हैं और जो काम पीढ़ियों पहले छोड़ चुके हैं उन्हें  ये समाज और हम आज भी अछूत या अनुसूचित जाति  की श्रेणी में क्यों रखे हुए हैं ? हम प्रगतिशील होने का दावा करते हैं और कल की तरह अपनी  बेटियों को घर में बंद रखने की बजाय कॉलेज से लेकर विदेश तक पढ़ने के लिए भेजने में कोई ऐतराज नहीं करते हैं , इस जगह हमारी सोच प्रगतिशील हो जाती है लेकिन  अपनी पसंद से शादी करने की बात करती है तो हमें उस लडके की जाति  से इतना सरोकार होता है कि  हमारी  प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं।
              हम खुद पढ़े लिखे हैं लेकिन इस बात पर हम पिछड़े हुए कैसे बन जाते हैं ? हमारी सोच क्यों नहीं बदल पाती है ? अंतरजातीय विवाह तो कर सकते हैं लेकिन अगर लड़का या लड़की अपने से उच्च जाति  की हो - यहाँ उच्च से उनका आशय अपने से ऊँची जाति यानि कि ब्राह्मण हो तो चलेगा, यानि कि जिन्हें वे अपने से ऊँचा समझते हैं।  मुझे तरस आता है अपने इस समाज के लोगों की इस स्वार्थी सोच पर - हम कहाँ प्रगतिशील कहें और कहाँ पिछड़ा हुआ इसको जानना बहुत मुश्किल ही है।  फिर इस फर्क को दूर करने में हमारी राजनीति और राजनैतिक दल भी बहुत कुछ भूमिका निभा रहे  है.  जिसने जन्म से ही अनुसूचित होने की प्रथा को बरक़रार रखा है।  मेरी दृष्टि से वास्तव में वे इस श्रेणी में आते हैं जो इस तरह के कर्म करते हैं।  अगर रोजी की दृष्टि से ब्राह्मण रेलवे में नौकरी पाने के लिए सफाई कर्मी का काम करता है तो वह वास्तव में अनुसूचित कहा जाना चाहिए क्योंकि वह वही काम कर रहा है जिसे सदियों पहले करने वालों के वंशज आज भी उस कलंक को धो नहीं पाए हैं।  अब अवसरवादिता के चलते हमें ब्राहमण तो बने रहना चाहते हैं लेकिन उनकी जगहों पर काबिज होने का लोभ संभरण नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि हमें सरकारी नौकरी चाहिए।  फिर काम चाहे जो भी हो लेकिन उस काम को करने वाले पर लगा हुआ तमगा उन्हें स्वीकार नहीं है।  यही दोहरी सोच हमारे समाज को आगे नहीं बढ़ने दे रही है।  
      अब आप बतलाइए कि हमारे मित्र परिवार को काउंसिलिंग की जरूरत है या फिर उनके बेटे को।  मैं तो उन्हें इसी आईने से उनको समझाने  की सोच रही हूँ और अगर उनको समझाने में सफल रही तब भी उस बेटे की शादी के बाद आप सबको बताऊँगी। और अगर असफल हुई तब भी बताऊँगी .
                    
                        

बुधवार, 14 अगस्त 2013

स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर !

                                       


                    देश  राजनीतिक गतिविधियों से कुछ सरोकार रखना हर देशवासी का हक है . देश हमारा है और जमीन हमारी माँ है . इस माँ की आन, बान और शान की रक्षा  हजारों सैनिक सिर्फ अपने राज्य की नहीं रक्षा के लिए नहीं बल्कि पूरे देश की  सरहदों पर रात दिन आखें टिकाये खड़े  रहते हैं . सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि देश की आतंरिक आपदाओं , प्राकृतिक आपदाओं , आतंकी घटनाओं के होने पर अपने जीवन को दांव पर लगा कर अनगिनत जीवनों को बचाने में लगे रहते हैं . हम भी अपने देश के सैनिकों जैसे भावनाएं अपने मन में विकसित क्यों नहीं कर पाते  हैं .

                                     हमारा प्रयास अपने देश को बचाने  का होना चाहिए . क्या देश और देशवासियों के हित में है  ये निर्णय संसद में बैठे चंद जनप्रतिनिधि करते हैं  भले ही वह जन के हित में हो  न हो . वे  चंद ताकतवर लोगों  के हाथ में अपनी कमान देकर बैठे होते है और वे सिर्फ कठपुतली होते हैं . कितने तो कभी देश या जनहित के प्रश्न को लेकर संसद में कभी खड़े भी नहीं होते हैं . देश के भविष्य पर एक प्रश्न चिह्न सा लग जाता है . किसी भी दृष्टि से देखें -- हम अनुसन्धान बहुत बड़े बड़े भले कर लें लेकिन अगर देश का आम आदमी भूख , अत्याचार और भ्रष्टाचार से त्राहि त्राहि कर रही हो तो देश सम्पन्न नहीं कहा जा सकता है . जो क़ानून बनाते हैं वे नहीं जानते हैं की आम आदमी कैसे जी रहा है ? वो क्या सोचता है - इससे उनको वास्ता नहीं है . और तो और जिस देश की जनता के बल पर संसद में बैठे हैं क्या उन्हें देश वासियों की भावनाओं से कोई लेना देना है ? शायद कुछ लोगों को तो बिलकुल ही नहीं , मैं सबकी बात नहीं  कुछ तो लगता है की इस दुनियां में जीते ही नहीं है और भाषा तो उनकी इतनी अधिक मधुर होती हैं कि उनको मंच से उठा कर बाहर  करने का मन करता है .
                                   आजादी के 66   बाद भी हम एक अच्छे पडोसी होने के धर्म को निभाते चले आ रहे हैं और इस धर्म के निर्वाह में अपने कितने सैनिकों को गवां चुके हैं और कितने वहां की जेलों में आतनाएं सह रहे हैं और हमें उनके वहां होने की खबर तक नहीं है और अगर खबर है तो उनके वापस लाने से कोई वास्ता नहीं है . इस दिशा में पहल करने की कोई जरूरत ही नहीं समझती है हमारी सरकारें . जब भी पाकिस्तान सीमाओं पर कोई घिनौनी हरकत अंजाम देता है तो ये हमारे रक्षामंत्री सही और जिम्मेदार मंत्री पडोसी होने के धर्म को निभाने की बात करते और कुछ तो उसे पाकिस्तान कीगलती मानते ही नहीं है । ये बयानों को सुनकर सिर शर्म से झुक जाता है .  इन लोगों ने हमारे सैनिकों को सीमा पर हाथ बांध कर  खड़ा कर रखा है कि  मर जाना लेकिन हमारे आदेश न हो अपने हाथ भी मत हिलाना . दुश्मन के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं , जब सीमा पर हम कठपुतली की तरह अपनी सेना का प्रयोग कर रहे हैं तो वे हमारी कायरता समझते हैं . वे सैनिकों को मार रहे होते हैं और हम उन्हें रियायती गैस देने के बारे में सोच कर अपने अच्छे पडोसी होने के धर्म का निर्वाह करने की सोच रहे होते हैं . हमारे पडोसी चाहे पाकिस्तान हो, चीन हो अपनी नापाक हरकतों से हमारे सब्र की परीक्षा लेते रहते हैं और हम सिर्फ उनके काम की 'भर्त्सना ' कर पाते हैं या फिर उनके कामों की कड़े शब्दों में विरोध दर्ज कर लेते हैं वो भी अपने ही रजिस्टर में . इस के बाद देश के संचालकों की जिम्मेदारी ख़त्म . 
            देश की रक्षा की कमान अगर सेना के हाथ में है तो उन्हें अपनी परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेने का पूरा पूरा अधिकार होना चाहिये  ताकि उनकी शहादत व्यर्थ न जाए . वे बता दें कि  हम कठपुतली नहीं है . अरे हमारे नेताओं और मंत्रियों को तो उनकी शहादत का सम्मान करना तक नहीं आता है . जिम्मेदार मत्री पद संभालने वाले शायद सर्वाधिक संवेदनाहीन होते हैं क्योंकि बिहार के मंत्री महोदय का वक्तव्य कितनी सैनिकों की माताओं के दिल को छलनी कर गया इसे वह क्या समझेंगे क्योंकि मरने वालों में कोई उनका बेटा  नहीं था और अगर उनमें कोई उनकी बिरादरी वाले का बेटा  भी होता तो शायद ऐसे शब्द उनके मुंह से न निकलते . इस दुनियां में सिर्फ जवान ही मरने के लिए पैदा नहीं होते नेता जी मरना तो आपको भी है और इस धरती पर पैदा होने वाला हर इंसान  मरेगा,  लेकिन कुछ सड़क हादसों में मरते हैं , कुछ अस्पतालों और कुछ प्राकृतिक आपदाओं में गुम हो जाते हैं . लेकिन ऐसे वीर जब सीमा पर अपनी शहादत देते हैं तो ये अमर हो जाते हैं और इन्हें इस देश का हर नागरिक सम्मान के साथ सिर झुक कर नमन करता है . 

                  स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर अपने सभी शहीद जवानों को शत शत नमन और श्रद्धांजलि !.        

रविवार, 11 अगस्त 2013

नाग पंचमी और बाबूजी का जन्मदिन !

               नाग पंचमी पौराणिक  महत्व रखनेवाला पर्व है और इसको हम सदियों से मनाते चले  आ रहे हैं , लेकिन जैसा की नाम से ज्ञात होता है कि इसका सीधा सम्बन्ध नागों से ही है लेकिन कहीं कहीं इसको दूसरे रूप में भी मानते आ रहे हैं -- एक वह रूप जो सदियों से लड़कियों की तिरस्कार की भावना को प्रकट करता है और इसमें "गुडियाँ पीटने की प्रथा ." प्रचलित है . वैसे तो ये प्रथा अलग अलग क्षेत्रों से जुडी हुई है क्योंकि मेरे जन्मस्थली बुंदेलखंड में ये विशुद्ध रूप से नागों का त्यौहार ही माना जाता था जो कि एक सार्थक सन्देश लिए होता था कि वे भी हमारे लिए पूज्य हैं और कहीं न कहीं हमारे हित का संरक्षण करते हैं . इनका खेतों में निवास फसलों को संरक्षित करने के लिए भी होता है .
                    मैंने कानपुर  में ही गुड़ियाँ पीटने का त्यौहार मानते देखा है जिसका सीधा सीधा सम्बन्ध लड़कियों के तिरस्कार से जुडा है . लड़कियाँ आज लड़कों से कई गुना आगे  हैं सिर्फ कार्य में नहीं बल्कि आचार - विचार , गुणों और पारिवारिक मूल्यों के प्रति भी अधिक संवेदनशील रहती हैं और हम  प्रथा की सार्थकता को जाने बिना आज भी पीट रहे हैं . 


बाबूजी और मेरी छोटी बेटी प्रियंका
                    मेरे जीवन में इस पर्व का एक और महत्वपुर कारण से विशेष महत्व रखता है क्योंकि आज के दिन हमारे बाबूजी (ससुरजी ) का जन्मदिन होता था और जब तक वे रहे हम इसको उनके साथ मानते थे और अब जब नहीं है तो उनकी यादों के साथ . कानपुर  के होते हुए भी गुड़ियाँ पीटने की प्रथा हमारे परिवार में नहीं रही क्योंकि इस परिवार में कई पीढ़ियों से लड़कियाँ थीं ही नहीं . फिर जब लड़कियों ने आना शुरू किया तो उनके दोनों बेटों  को पांच बेटियां हुई और बेटा एक भी नहीं . लेकिन उन्हें इस बात का कभी कोई मलाल नहीं था . उन्होंने कभी हम दोनों ( मैं और मेरी जेठानी ) को कभी कुछ नहीं कहा . न ही उनका मन कभी दुखी नजर आया . हर बेटी के होने पर सारे संस्कारों को  धूम धाम से करते रहे . जो बच्ची छोटी होती वह उनकी रानी रानी होती और बाकि सब तो प्यारी होती थी . वह भी अपनी पोतियों को बहुत प्यारे थे . 
                       मेरे लिए आज का दिन उनके जन्मदिन के रूप में अधिक प्रिय है . हम आज उन्हें याद करके ही उनकी अप्रत्यक्ष उपस्थिति का अहसास कर लेते हैं .

शनिवार, 10 अगस्त 2013

समाज क्या कहेगा ?




                     समाज क्या कहेगा? ये एक जुमला है जो सदियों से सुनते चले आ रहे हैं और युगों से ये समाज नाम की संस्था विद्यमान है और आज भी है ।  सीता का परित्याग हुआ किस लिए ? सिर्फ समाज के कहने के भय से - क्योंकि राम मर्यादा पुरुषोत्तम थे और वे ऐसा कुछ कर  ही नहीं सकते थे क्योंकि  उन्हें समाज के आक्षेप का प्रतिकार करना ही नहीं था। सीता को निर्वासित जीवन जीने के लिए इस समाज ने मजबूर किया और फिर सीता का निर्वाण ।
                   ये समाज क्या कहेगा ? का ही परिणाम था की कुंती का दानवीर कर्ण का सामाजिक तौर पर  पुत्र के रूप में स्वीकार न कर पाना . समाज का स्वरूप तब भी यही था और आज भी यही है । कितने अजन्मे बच्चे मार दिए जाते है , लावारिस फेंक दिए जाते हैं और तब भी यह समाज चुप नहीं रहता है । सामाजिक मूल्यों में कुछ  परिवर्तन लगातार हो रहा है और यह परिवर्तन आज समाज के स्वरूप में क्रान्तिकारी  परिवर्तन परिलक्षित  होने लगा है।
                   युग बीता और युग के साथ ही  समाज में बदलते जीवन मूल्यों को लोगों ने धीमी गति से ही सही स्वीकार करना आरम्भ कर दिया है . लेकिन इस समाज का हौवा आज भी इतना बड़ा है कि इसके भय से समाज के ही अंग मानव कहाँ से कहाँ तक सोच कर क्या कुछ नहीं कर डालता है ? कभी इस विषय में हमने सोचने की जरूरत समझी  ही नहीं सामाजिक परिवर्तन जरूरी है और हो रहे हैं लेकिन जो इस परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं उनके लिए क्या करना होगा ? जिनके लिए झूठी मान मर्यादा और शान उनके लिए जीने मरने का प्रश्न बन जाता है। जाति और धर्म की बेड़ियों में जकड़े हम अपने ही अंशों की हत्या कर रहे हैं , समाज तब भी नहीं छोड़ेगा ।
                    ये समाज क्या कहेगा ? के प्रश्न को हम अपने मन से ही एक हौवा बना कर सामने रखते है और फिर उससे डर डर कर खुद ही कुछ कल्पनाएँ करके परेशान  होते रहते हैं। मैंने इस बात को सोच सोच कर परेशान  होने  वाले लोगों की काउंसलिंग की और कुछ तो उनमें से समझ सके कि ये समाज हमसे ही बना है और इसकी  जिन मान्यताओं और धारणाओं में परिवर्तन हो रहा है उसको करने वाले हमारे जैसे ही इस समाज के सदस्य है और ऐसा नहीं कि  उन्हें समाज की परवाह नहीं है बल्कि वे अपने विवेक  से सामाजिक मूल्यों अपने परिवार के सदस्यों के प्रति समान रूप से संवेदनशील होकर सोचते हैं। जहाँ मूल्यों के खातिर घर की  ख़ुशी कुर्बान होती नजर आती है, वहाँँ वे समाज की परवाह नहीं करते हैं क्योंकि ये समाज कल उनका साथ नहीं देगा। उनके अपने बच्चे , पत्नी ही उनके साथ होंगे। अगर वे अपने बेटे को 'समाज क्या कहेगा ?' सोचकर  घर से निकाल लेते हैं या अपने सम्बन्ध उससे ख़त्म कर लेते हैं तो समाज उनकी पीठ नहीं थपथपाएगा बल्कि उनको ही दोष देगा कि अपने अहम् के पीछे अपनी औलाद को छोड़ दिया। आप बचेंगे किसी भी तरीके से नहीं क्योकि समाज को कुछ तो कहना है और वह कहेगा ही!
                            समाज क्या कहेगा ? को लेकर कुछ  अपनी रातों की नीद गवां बैठते हैं , अगर वे खुद स्ट्राँँग नहीं है तो फिर वे उससे बचने के लिए नशे का सहारा भी  लगते हैं और खुद को धोखा देते हैं। कभी कभी तो इसके लिए वे डिप्रेशन का शिकार भी हो जाते हैं।हाँ आज भी अंतर्जातीय और अंतर्धर्मीय विवाह लोगों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन कर खड़ा हो जाता है।  पता नहीं लोग किस प्रतिष्ठा की बात करते हैं , ये प्रतिष्ठा का प्रश्न सिर्फ उन लोगों के लिए होता है जो अपने मन से कमजोर होते हैं। अगर आपके बेटे ने अंतर्जातीय विवाह कर लििया कौन सा गुनाह किया है ? उसका जीवन उसके सामने होता है और अगर उसको कोई लड़की अपने विचारों के अनुरूप समझ आती है तो विचार और संस्कार किसी जाति या धर्म की बपौती नहीं है। वह लड़की दूसरे धर्म और जाति के होते हुए भी समझदार और सामंजस्य स्थापित करने वाली हो सकती है। 
        आप अपना जीवन अपने तरीके से जी चुके फिर अपने बेटे को उसके तरीके से जीने दीजिये। आप की भी यही कामना  होती है कि  वह अपने जीवन में सुखी रहे फिर उस सुख का आधार खोजने के लिए आप उसको अधिकृत क्यों नहीं कर पाते हैं ? क्यों चाहते हैं कि  वह आपकी पसंद से ही शादी करे ताकि आप अपने समाज में सिर  उठा कर कह सकें कि  देखा मेरा बेटा  इतना पढ़ लिख कर भी मेरी बात मानता था लेकिन क्या आपकी पसंद गलत नहीं हो सकती है। उनकी पसंद अगर गलत होती है तो वे उसको निभाने के लिए पूरा पूरा प्रयास करते हैं लेकिन अगर आपकी पसंद गलत निकलती है तो वे आपको उसका जिम्मेदार ठहराने में जरा सी भी देर नहीं लगाते  हैं। अगर उसका घर टूटा तो दुखी आप होंगे , समाज तब भी कुछ न कुछ कहेगा लेकिन आपकी को शाबाशी देने नहीं आएगा और न ही आपके दुःख को बाँँटने के लिए आगे आएगा वह तब भी कुछ न कुछ कहेगा अवश्य ही . 
                                   मैंने लोगों को ये भी कहते सुना है कि  मैं समाज में लोगों को या मुंह दिखाऊंगा ? आप ने कौन सी चोरी की है ?  किसके घर को लूटा है या फिर किसी की हत्या की है ? अपने निर्णय के लिए खुद को मजबूत बना कर खड़ा करने का काम आपका ही है। ये समाज उसका साथ देता है जो खुद मजबूत होते हैं और किसी के सवाल के उत्तर में अपने आत्मविश्वास और दृढ़ता को बनाये रखते हैं। कमजोर लोगों का साथ ये समाज नहीं देता - ये कमजोर पैसे से कमजोर वाली बात नहीं है बल्कि अपनी दृढ़ता और आत्मविश्वास वाली बात है। आप दृढ हो तो कोई आपसे सवाल ही नहीं करेगा बल्कि आपके निर्णय की तारीफ ही करेगा और वाकई इस समाज में जो समझदार सदस्य है, वे सदैव लोगों के सुखी जीवन की कामना करते हैं। वे भी इस समाज के सदस्य होने के नाते आप सभी से जुड़े होते है।

                       ये समाज क्या कहेगा ? जन्म देता है --लोगों को आत्महत्या करने की भावना को। अपनी चाहतों को पूरा न कर पाने की मजबूरी कभी माता -पिता के इज्जत का वास्ता देने और कभी इस समाज और परिवार का डर  दिखाने पर वे अपनी बात को कहने का साहस  ही नहीं कर पाते हैं और विरोध की बात सोच कर ही वे अंतर्मुखी होने के कारण  खुद को आत्महत्या के निर्णय तक पहुंचा देते हैं। तब भी ये समाज तमाम सारे  प्रश्न करता है और उसके जाने के बाद कितने लांछन लगाने  में भी पीछे नहीं हटता है तब क्या मिलता है ? सिर्फ अपनी बात न कह पाने से और समाज के डर से एक जिन्दगी असमय ही ख़त्म हो जाती है। आपके हाथ अफसोस आता है ।

                     ये समाज क्या कहेगा ? जन्म देता है ऑनर किलिंग को , इसके पीछे अपने को बहुत प्रतिष्ठित मानने वाले लोग अपने बेटी या बेटे के लिए अनुचित स्तर  का वर या वधू देखने पर अपनी इज्जत को धूमिल होते देखते हैं और फिर उस इज्जत को बचाने  के लिए वे बेटे के लिए उस लड़की को , बेटी के लिए उस लड़के को और कभी कभी दोनों को ही ख़त्म करवा  देते हैं। ऐसा नहीं है कि  तब समाज उनकी पीठ ठोकता है कि उन्होंने समाज की खातिर बहुत अच्छा किया , वे बदनाम तब भी होते हैं अपने स्वजन को खोकर भी और उसकी भरपाई ये समाज कभी नहीं करेगा। लोग कितनी देर आलोचना करेंगे ? थोड़ी देर न या अगर वे रोज रोज करेंगे तब भी वे आपके बच्चों को वापस नहीं ला सकते हैं। आपके निर्णय से पूरा परिवार ही सहमत नहीं होता खासतौर पर बच्चों की माँ तो कभी नहीं। आप समाज के बहुत हिमायती है तो उन लोगों को अपनी जिन्दगी जीने के लिए छोड़ दीजिये। आप अगर किसी को जिन्दगी दे नहीं सकते तो लेने का आपको कोई हक नहीं होता। इसके उत्तर में मैंने लोगों के मुंह से सुना है कि उनको जिन्दगी भी हमने ही दी थी और अगर वे हमारी मर्जी से नहीं जी सकते तो उन्हें जीने का कोई हक नहीं है लेकिन आप ये भूल जाते हैं कि जिन लोगों ने आपको जिन्दगी दी थी क्या आप ने ठीक वैसे ही जिया जैसे कि वे चाहते थे ? हरगिज नहीं क्योंकि जनरेशन गैप को कभी ख़त्म नहीं कर सकते हैं। 
                      ये समाज वह कहता है जो आप चाहते हैं , सामाजिक मूल्यों की अवमानना मत कीजिये लेकिन सामाजिक रूढ़ियों , पुरातन सोच और अन्धविश्वास को अपने जीवन में स्थान मत दीजिये। उसको मानवता के मूल्यों से सदैव सुसज्जित रखिये। बच्चों को भी वह संस्कार दीजिये , जो मानव जाति के लिए अनुकूल हों समाज आपसे बना है और पीछे मुड़ कर देखिये , ये कल क्या कहता था ? जिसे इसने कल गलत कहा था , उसको आज सही मान रहा है किस लिए ? क्योंकि ये समाज हमारी सोच को ही स्वीकार करता है और अगर हमारी सोच किसी के हित पर आघात नहीं करती , किसी को दुःख नहीं पहुंचाती है और सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन तो समय समय पर होते ही  रहते हैं और फिर वे समाज के लिए सामान्य रूप से स्वीकृत हो जाते हैं .