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बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

क्या फेसबुक से ब्लॉग पर सक्रियता कम हो रही है ? (4)



                        विषय अच्छा है और इस पर  का भी उतना ही महत्व है जितना की इसको महसूस कर मन में रखने वालों में - अरे भाई आप भी  अपनी सोच को शब्दों में ढल कर हमें भेज दीजिये।  हम उसे  पढ़ाएंगे।  



vandana A dubey's profile photo 
अच्छा विषय उठाया है रेखा दी...
हिंदी ब्लॉगिंग ने अपने दस साल पूरे कर लिये....
तमाम उतार-चढाव के बीच. हिंदी ब्लॉगिंग की शुरुआती दिक्कतें, फिर उनसे निजात पाना..सब हम लोग पढते रहे हैं. कैसे-कैसे प्रयोग किये गये, ये भी. हिंदी ब्लॉगिंग अपने शुरुआती दौर से लेकर शायद 2010 तक अपने शबाब पर थी, लेकिन पिछले लगभग दो सालों से तमाम सक्रिय ब्लॉगर्स ने अपना ध्यान ब्लॉगिंग से हटा के फेसबुक पर केन्द्रित कर लिया है, ऐसा मुझे लगता है ( क्योंकि मेरे साथ खुद ऐसा हुआ) बीच-बीच में पोस्ट लिखी भी गयीं तो उन्हें उतने पाठक नहीं मिले, जितने पहले मिलते थे. पहले जहां एक-एक पोस्ट पर पचास-साठ कमेंट आते थे, वे दस-पन्द्रह में सिमट गये. वो भी अगर लिंक फेसबुक पर शेयर किया गया है तो. वरना इससे भी कम. 
तो मुझे लगता है कि हिंदी ब्लॉगिंग को सबसे ज़्यादा नुक्सान फेसबुक से हुआ. लोगों को फेसबुक ब्लॉग से कहीं अधिक सुविधाजनक लगने लगा. पोस्ट लिखी और फेसबुक पर शेयर कर दी . कमेंट्स करने वाले भी सुकून में आ गये. अब टिप्पणी करने की बजाय वे बस "लाइक" का बटन दबाने लगे. पोस्ट पढी हो या नहीं, लाइक करने में क्या जाता है? अगले को ओब्लाइज़ भी कर दिया..... पोस्ट पढने की मेहनत से भी बच गये. वरना पहले ध्यान से पोस्ट पढो, फिर उस पर सार्थक टिप्पणी लिखो.... अब ज़्यादा भला. लाइक करो और अधिक से अधिक लिख दो, " जा रहे हैं पढने..." अब पढो चाहे न पढो. 
फेसबुक की लोकप्रियता के आगे ब्लॉगिंग विवश सी नज़र आने लगी....... आखिर हम सब लिखने-पढने वाले लोग फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट के प्रति इतने आकर्षित क्यों हुए? क्या वजह है जो इस साइट ने पोती से लेकर दादी तक, सबको बांध रखा है? क्यों नियमित रूप से ब्लॉग लिखने वाले अब फेसबुक पर रोज़ अपना स्टेटस अपडेट करते भर नज़र आ रहे? बहुत ज़ाहिर से कारण हैं. 
१) तात्कालिक रूप से मुलाकात और बात
२) तात्कालिक सवाल-जवाब
३) एक लाइव बहस जैसा माहौल निर्मित हो पाना.
४) लाइक की सुविधा उपलब्ध होना
५) सबसे बड़ी सुविधा है, नोटिफ़िकेशन की.
नोटिफ़िकेशन की सुविधा के चलते हम अगर किसी का ज़िक्र करते हैं, तो उसे हायपर लिंक करने की सुविधा होती है वहां, जिससे चिन्हित व्यक्ति के पास सूचना पहुंच जाती है, और वो तत्काल उस जगह पर पहुंच के अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा देता है. ज़िक्र करने वाले को भी अच्छा लगता है, और उस व्यक्ति को भी, जिसका ज़िक्र किया गया. जबकि ब्लॉग में ऐसी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है. मुझे लगता है, कि अगर ब्लॉग को भी नोटिफ़िकेशन की सुविधा उपलब्ध हो जाये तो फेसबुक पर अतिसक्रिय ब्लॉगर्स तत्काल ब्लॉग की ओर लौटेंगे. लोग अक्सर अपनी पोस्ट में अन्य साथियों का ज़िक्र करते हैं, कमेंट्स में भी पोस्ट लेखक जवाब देता है,लेकिन टिप्पणीकर्ता को खबर नहीं हो पाती.  अगर नोटिफिकेशन  की सुविधा ब्लॉग पर होगी, तो टिप्पणीकर्ताओं को तत्काल जानकारी होगी कि उन्हें पोस्ट लेखक ने या अन्य किसी ने कोई जवाब दिया है. चिट्ठा-चर्चा जैसे मंच को तो इस सुविधा की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. जब भी चर्चा की जाती है, तो उसमें तमाम लिंक्स शामिल किये जाते हैं, लेकिन कितनों को पता चल पाता है कि उनकी चर्चा की गयी? नोटिफ़िकेशन की सुविधा होगी तो चर्चाकार को भी अभी से अधिक आनन्द आयेगा चर्चा करने में. फिर देखियेगा, कैसे तमाम निष्क्रिय बैठे चर्चाकार कैसे सक्रिय होते हैं .. और वे सारे ब्लॉग-लेखक हरकत में आ जायेंगे जो फ़िलहाल पोस्ट लिखने से जी चुराने लगे हैं, और जिन्हें छोटे-छोटे स्टेटस रास आने लगे हैं. 
वैसे भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स की लोकप्रियता को ,  उनमें  सुविधाओं पर नज़र डालनी ही चाहिए।  और ब्लॉग को अधिक सुविधा- संपन्न बनाए जाने पर  विचार किया ही जाना चाहिए, जब  साइट्स की तरह ब्लॉग भी क्यों न संपन्न हो , आधुनिक तकनीक से ?

 --- वंदना अवस्थी दुबे                                                                          
                                                                                                                                                 (क्रमशः )

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

क्या फेसबुक से ब्लॉग पर सक्रियता कम हो रही है ? ( 3 )

                           बहुत महत्वपूर्ण विषय  है ये और इसके विषय में मैं  सोचती हूँ और इसा के बारे में हमारे ब्लॉगर मित्र जो कहते हैं वो उनके अपने विचार और अपनी सोच है।  फिर भी वे भी इस बात से इनकार नहीं कर रहे हैं कि ऐसा हो रहा है वजह उसकी कोई भी हो।  आपके अपने जो भी विचार हों अगर हमें अवगत कराएँगे तो  प्रस्तुत करके अपने ब्लॉग और अपने प्रयास को सफल मानूंगी।  इन्तजार में ………… !




ब्लॉग और फेसबूक दोनों ही आम आदमी को अपने सृजन क्षमता, सोच को दिखाने का जरिया है जो मानसिक संतुष्टि देती है, जब वो अपनी सृजनता पर प्रत्युतर पता है, बेशक सराहा जाए या गलतियाँ निकली जाए। हाँ ये अलग बात है की फेसबूक अगर एक रफ कॉपी के तरह है तो ब्लॉग एक शानदार डायरी है। फेसबूक पर आप कुछ भी लिखें, उस पोस्ट से तुरंत जुड़ जाते हैं एक संपर्क उसपर कमेंट करने वाले के साथ बनता है, जिस से वो थोड़ी खुशी देती है, पर उसको सहेजना मुश्किल है, क्योंकि कुछ दिनों मे ही वो पोस्ट कहीं विलीन होती दिखने लगती है, इसके उलट ब्लॉग पोस्ट आपके लिए सहेजा हुआ रहता है, उसके कोमेंट्स को कभी भी पढ़ कर आप खुश हो सकते हैं। फिर ब्लॉग पर चूंकि हम सोच समझ कर एक विशेष पोस्ट डालते हैं तो उस से ज्यादा जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। अतः बेशक फेसबूक की लोकप्रियत जितनी भी हो, एक सृजनकर्ता रचनाकर के लिए ब्लॉग ज्यादा अहम है, और ब्लॉग पर समय ज्यादा देना चाहिए।

 मुकेश कुमार सिन्हा 



 Photo: दिसंबर २००७ मे '' दिल्ली आज तक '' पर -- यह रौशनी उन्ही के स्टूडियो की है !

 सोशल मीडिया प्रेमियों के लिये ब्लॉगिंग और फ़ेसबुक मे उतना ही अंतर हैं जितना क्रिकेट प्रेमियों के लिये टैस्ट मैच और टी ट्वेंटी मे. ब्लॉगिंग विचारों की अभिव्यक्ति का एक गंभीर माध्यम है. साथ ही मनोरंजन का भी उत्तम साधन है . यहाँ लेखक सभी तरह के विषयों पर गंभीर चर्चा कर सकते हैं. एक बार लिखी गई पोस्ट सदा के लिये अमर हो जाती है . वर्षों बाद भी किसी विषय विशेष पर लिखी गई पोस्ट को ढूंढ कर पढ़ा जा सकता है . यह रचनात्मकता को प्रोत्साहन देती है . लेकिन टैस्ट मैच की तरह ब्लॉगिंग मे भी समय की खपत ज्यादा होती है . शायद इसीलिये अधिकांश ब्लॉगर्स का ध्यान अब फ़ेसबुक की ओर मुड़ गया है . फ़ेसबुक तुरंत फुरंत माध्यम है जहां एक स्टेटस की उम्र क्षणिक ही होती है . साथ ही यहाँ गंभीर विचार विमर्श के लिये कम ही जगह है .फ़ेसबुक पर लोग मौज मस्ती ज्यादा करते हैं , काम की बातें कम . यहाँ अक्सर स्वमुग्धता ज्यादा देखने को मिलती है. अभिव्यक्ति से ज्यादा अपनी उपलब्धियों का प्रचार ज्यादा होता है. अक्सर कोई कवि , लेखक , कलाकर या अन्य विशेष योग्यता रखने वाला अपनी उपलब्धियों का गुण गान करता ज्यादा नज़र आता है . पता चला है कि फ़ेसबुक पर रहने से कई लोगों को अवसाद होने लगता है. लेकिन सही तरीके से इस्तेमाल किया जाये तो फ़ेसबुक जैसा माध्यम सामाजिक जागृति पैदा करने मे बहुत sahayak siddh हो सकता है .

-- तारिफ दराल




फेसबुक ने ब्लागिंग की सक्रियता को बढाने का कार्य किया है।  यह एक मिथ है कि फेसबुक की  ब्लाग लेखन कम हो गया है।  अगर फेसबुक न होता तो भी ब्लॉग लेखन में सचुरेशन की स्थिति आती।  ब्लागिंग में धीमापन उसका सहज स्वभाव है जबकि फेसबुक त्वरित ढंग से कार्य करता है। नए  ब्लागरो  में लेखन का उत्साह कुछ ज्यादा रहता है सो उनकी पोस्टे फटाफट आती रहती है और जब  व्यक्ति लम्बे समय तक लिखता रहता है तो उसे लेखन कार्य से थोड़े समय के लिए ऊबन होने लगती है और वह कुछ 'रिक्रियेशन' के लिए करता है इसका मतलब यह नही की वह लेखन छोड़ कर 'रिक्रियेशन' को लेखन का विकल्प बना लेगा।  ब्लाग पर देरी से पोस्ट का आना और फेसबुक पर उपस्थित रहना दोनों में कोई सम्बन्ध नही है।  लोग जो फेसबुक पर होते है मैंने उनको भी फेसबुक को छोड़ कर जाते देखा है।  ब्लागिंग का शानदार और चौकस  भविष्य है।  

--- पवन  मिश्रा

                                                                                                                              ( क्रमशः )

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

क्या फेसबुक से ब्लॉग पर सक्रियता कम हो रही है ? (2)



              पिछली पोस्ट पर हमने  अपने मित्रों के विचार इसा विषय पर पढ़े और अब आगे चलते हैं।  यद्यपि  दो मित्रों ने ब्लॉग  फेसबुक के बारे में ही विचार दिए  हैं लेकिन मैं  उनके विचारों का सम्मान करती हूँ अतः उनको भी शामिल कर रही हूँ।  




 जब परिवर्तन आता है तो उसके बहुत सारे कारण होते हैं। लेकिन लेखन में लेखक को उसके विचार मजबूर कर देते हैं लिखने के लिए। इसलिए जो वास्‍तव में लेखक है वह ब्‍लाग पर ही लिखेगा। प्रारम्‍भ में लेखक बनने की चाह में बहुत सारे लोग ब्‍लाग से जुड़ गए थे लेकिन फिर निरन्‍तरता नहीं रख पाए और वे फेसबुक पर चले गए। इसलिए ब्‍लागजगत में लेखन में कमी आयी है। यदि विमर्श बिना पूर्वाग्रह के होगा तब सार्थक होगा, लेकिन आज राजनैतिक पूर्वाग्रह से लिखने वाले बहुत हैं इसलिए भी कुछ लोग दूर हो गए हैं।

--अजित गुप्ता




मुझे एक बात समझ मे नही आती कि इन दिनोँ फेसवुक पर कई लोग ग्रुप बनाकर तरह-तरह के भ्रष्टाचार के खिलाफ खडे नजर आते है, जो खुद कई प्रकार के भ्रष्टाचार मे सुबह से शाम तक लिप्त रह्ते है, एक छोटा सा उदाहरण देखिये - एक प्रोफेसर पढाई से ज्यादा गुटवन्दी मे, अपने हित साधने मे समय बिताते देखे जाते हैँ, एक पत्रकार हर घोटालेबाजोँ के धन्धे मे प्रत्येक्ष और परोक्ष रूप से उसे मदद करता रह्ता है, बदले मे हिस्सा लेता है, सरकारी व्यक्ति अपनी डुयुटी मे फांकी मारता है और भी कई लोग- कई तबके के हैँ, जो फेसबुक पर पिँघल छाँटते हुए दिखाई देते है, किसी मित्र को यह बात समझ मे आए तो बडी कृपा होगी, मुझे भी समझाने का कष्ट करेँगे, आभारी रहुँगा.


--अरुण कुमार झा

 पहली बात जो लोग आफ़िस टाईम मे भी फ़ेस बुक पर लगे रहते हे, वो भी तो एक तरह से भ्रष्टाचार कर रहे हे... सब से पहले वो कसम ऊठाये कि आफ़िस समय मे अपना काम ईमान दारी से करेगे, कोई कागज पेंसिल घर नही ले जायेगे, ओर ना ही आफ़िस के समय वो आफ़िस के पीसी से फ़ेस बुक या ऎसी प्राईवेट जगह पर जायेगे...

--राज भाटिया



 आजकल यह चर्चा ज़ोर शोर से चल रही है कि फेसबुक ने हिन्दी ब्लोगिंग का सब से ज्यादा नुकसान किया है कारण यह कि लगभग सभी हिन्दी ब्लॉगर आजकल फेसबुक पर अधिक सक्रिय दिखते है और इस वजह से उन सब के ब्लॉग असक्रिय हुये जा रहे है | न कोई पोस्ट लिख रहा है न पढ़ रहा है ... फेसबुक पर तुरंत संवाद हो पाने के कारण ब्लॉग से लोगो की दूरी बनती जा रही है !
ऐसे माहौल मे एक सवाल सब के जहन मे आता है क्या हिन्दी ब्लोगिंग अपनों के ही हाथों मारी जाएगी !!??

दरअसल इस पूरे मामले मे गलती हम सब की ही है ... मान लीजिये हम दिन मे २ घंटा फेसबुक पर बिताते है ... ऐसे मे बड़े आराम से हम बगल की विंडो मे अपना ब्लॉग भी खोल कर रख सकते है ... फीड्स का अनुसरण करते हुये नयी आई हुई पोस्ट पढ़ सकते है ... और पढ़ते पढ़ते कमेन्ट देने का मन हुआ तो झट मन की बात कह दी पोस्ट पर ... एक बार इसी तरह सक्रिय होने पर धीरे धीरे खुद भी पोस्ट लिखने का मन भी होने लगेगा और हमारी असक्रियता कब सक्रियता मे बदल जाएगी पता भी नहीं चलेगा !

मैं खुद भी ऐसा ही करता हूँ ... साथ साथ ... ब्लॉग बुलेटिन की पोस्ट लगाने के कारण भी काफी पोस्टों को पढ़ना हो जाता है ... हाँ यह जरूर है कि आजकल कमेंट्स करना काफी कम हो गया है !

फेसबुक पर हम से ज़्यादातर लोग इसी ब्लोगिंग के चलते एक दूसरे से जुड़े है ... तो आइये इस जुड़ाव के आधार को बनाए रखें |

--
शिवम् मिश्रा


अभिव्यक्ति एक सशक्त माध्यम है अपने विचार दूसरों तक पहुँचाने का - चाहे वह कोई भी विधा हो- संगीत, नृत्य, पेंटिंग या लेखन !
अक्सर हमारा लिखा डायरी के पन्नों में सिमट कर रह जाता है , शायद इसलिए की हम उसे अन्यत्र भेजने की हिम्मत नहीं जुटा पाते . लेकिन ब्लॉग एक ऐसे सशक्त मंच के रूप में उभरा है जहाँ हम अपनी सोच ..अपनी भावनाएं..अपने विचार साझा कर सकते हैं .
अमूमन काफ़ी समय हम सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर व्यतीत करते हैं ...कितना अच्छा हो अगर हम अपने ब्लॉग के साथ साथ दूसरे ब्लॉग को भी महत्त्व दें ...थोडासा समय निकालकर ..उनपर जाकर मित्र लेखकों की सोच पर भी एक नज़र डालें, उन्हें पढ़ें, समझें और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें, उनका मनोबल बढाएं, जैसा की हम और मित्रों से अपेक्षा रखते हैं .
तभी तो सही मायनों में हमारा ब्लॉग लेखन सार्थक हो पायेगा .
.......ज़रा सोचिये ..!

       सरस दरबारी 

फेस बुक ने लोगों को एक बहुत बड़ी दुनिया से परिचित करवा दिया है इसने कई अजनबियों को एक परिवार की तरह बाँध दिया है। शुरू में ब्लॉग जगत के लोगों ने फेस बुक को बहुत तवज्जो नहीं दी लेकिन धीरे धीरे बैटन चर्चाओं का आकर्षण सिर चढ़ कर  और कई ब्लोगर्स जो हफ्ते में पांच से छह पोस्ट लिखते थे एक दो पोस्ट तक सिमट गए और इसकी जगह ले ली लाइक और चुटीली टिप्पणियों ने।  इससे निश्चित ही लेखन का स्तर गिरा  है साथ ही अपनी सोच के हिसाब से किसी बात को नए नज़रिए से देखने समझने और समझाने का क्रम भी कम हुआ है जो शोचनीय है। ब्लॉग परडाली गयीं पोस्ट एक सुरुचि पूर्ण दस्तावेज  के रूप में होती हैं और उसके साथ होते हैं लोगों के बेशकीमती विचार ,इसलिए  से ब्लॉग का साथ छोड़ना अपने लेखन के साथ अन्याय करना है।
-- कविता वर्मा
 एक चर्चा 

                                                                                                                           (क्रमशः)

बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

क्या फेसबुक से ब्लॉग पर सक्रियता कम हो रही है ?

              जिसे मैं महसूस कर  हूँ , उसे और भी हमारे साथी भी महसूस कर  हैं लेकिन महसूस करने से कुछ नहीं होता।  कुछ  इस  तरह से सोचा जाय कि  जो हम खोते जा रहे हैं,  उसके अस्तित्व को उसी तरह से जारी  रखें।
                      अरे अभी  शेष है मुद्दे पर आना।   ब्लॉगिंग के ऊपर फेसबुक ने डाका डाल  दिया है और ब्लोगर्स भी ब्लॉग के बजाय फेसबुक पर जाकर स्टेटस अपडेट कर देते हैं, वह भी कुछ ही पंक्तियों में और पढ़ने वाले भी उसको लाइक करके अपने फर्ज से मुक्त हो जाते हैं।  ये अवश्य है कि फेसबुक पर डाली हुई चीज करीब करीब उस हर इंसान की नजर से गुजर जाती है जो ऑनलाइन होता है बल्कि कहिये कि  फेसबुक पर सिर्फ वे लोग पढ़ सकते हैं जो आपके मित्रों में शामिल है  और अगर कुछ घंटों में इतने स्टेटस अपडेट  हो जाते हैं कि जो आगे बढ़ जाते हैं , उनको पढ़  पाना संभव नहीं हो पाता है और ब्लॉग की अपडेट उन्हें  तब ही मिलती है जब वे किसी भी  संकलक  पर जाएँ .  जहाँ पर उन्हें ताजे अपडेट मिलें। लेकिन किसी भी समस्या और विषय को ब्लॉग पर डालने से जितने सहज ढंग से उसको प्रस्तुत किया जा सकता है  फेसबुक पर अगर करें भी तो सारे लोग सारे अपडेट नहीं पढ़ पाते हैं और महत्वपूर्ण विषयों से वंचित रह जाते है।  ब्लॉग पर विषय  संचित और सुरक्षित रहते हैं और उसको  पढ़ने के लिए और उसे कहीं भी उल्लिखित करने के लिए कभी भी जोड़ा जा सकता है जब कि हम फेसबुक के साथ ऐसा नहीं कर पाते  हैं।


                      मैं खुद भी कुछ  ब्लॉग पर  रही हूँ लेकिन जब अपने से जुड़े ब्लॉग पर  नजर डाली तो पाया कि राजभाषा ब्लॉग जिस पर मैं भी कभी बहुत सक्रियता से लिखती थी और वह मुझे बहुत पसंद भी है, लेकिन उसकी आखिरी पोस्ट अप्रैल की पड़ी हुई थी तो मुझे लगा कि फेसबुक जैसी सोशल साईट ही ब्लॉग के प्रति ब्लॉगर की सक्रियता को कम करने लगी है।  हो सकता है कि वहम हो लेकिन सबसे इस पर विचार लेकर कुछ जाना तो जा ही सकता है।  इसी लिए आप सबको एक विषय पर अपने विचार लिखने का अनुरोध किया। जैसे जैसे विचार मिल रहे हैं ,   सबको प्रस्तुत  कर रही हूँ।  आप भी अपने विचार भेजें। 



आपने बिलकुल सही बात उठाई है, पर बात सिर्फ फेसबुक की नहीं है मेरे दृष्टिकोण से  …. लोग कुछ भी लिखने लगे हैं, और कुछ भी लिखे पर कमेंट्स देकर कमेंट्स की आशा रखते हैं और आशा पूरी भी होती है  …। इससे सही लिखनेवाले कमेंट्स से निर्विकार हो गए हैं और इस पर नज़र डालना ज़रूरी है ! 
ब्लॉगर अपने लिंक्स फेसबुक पर देते हैं ताकि आप पढ़ें - पर एक क्षण में लाइक बटन दबानेवाले नहीं समझते कि सही मायनों में लिखनेवाले इससे प्रभावित नहीं होते  . 
हमारे चाहने से कुछ नहीं होगा,क्योंकि जो पढ़ते हैं वे आज भी पढ़ते हैं - और जब प्रभावित होते हैं तो प्रतिक्रिया भी देते हैं - और कई बार समय,मानसिक स्थिति स्तब्ध भी बना देती है  . कमेंट्स के साथ seen  का भी चिन्ह है,जो बताता है कि कितनों ने पढ़ा हमें ! 
हम न जबरदस्ती किसी को पढने के लिए कह सकते हैं,न कमेंट्स देने को - खुद पर विश्वास मायने रखती है

 रश्मि प्रभा


आपका सोच सही हैं ब्लोग्स पर लिखा हर कोई नही पढता   वह  सबकी नजरो में आभी जाए तो यही होता हैं कि आप मेरे ब्लॉग पर आये तभी हम आपके ब्लॉग पर आयेंगे  .कम से कम मुझे तो यही लगता हैं   फेस बुक पर आप जितना भी अच्छा लिख ले हर कोई कमेंट नही करता  बस चलते चलते लाइक कर लेता हैं .मैंने देखा कई बार लोग पूरी पोस्ट पढ़ते भी नही हैं .....ब्लॉग अभिव्यक्ति का उत्तम माध्यम हैं और संजीदा भी   ,परन्तु क्षमा चाहती हूँ मैं भी ब्लोग्स पर सक्रीय होने की कोशिश करती हूँ परन्तु जितना होना चाहिए उतना नही हो पाती शायद मैं नवोदित हूँ इस क्षेत्र में इस लिय ...... हाँ आश्वासन देती हूँ मैं अपनी तरफ से कि अब से कम से कम रोजाना ब्लॉग का अवलोकन अवश्य करूंगी शुक्रिया आपने इस तरह ध्यान दि

 नीलिमा शर्मा




मुझे नहीं लगता कि फेसबुक से ब्लोगिंग पर कोई फर्क पड़ रहा है। बल्कि फेसबुक त्वरित गति से ब्लॉग पर ट्रेफिक बढ़ाने मे सहायता ही करता है। ब्लॉग और फेसबुक दोनों अभिव्यक्ति का माध्यम है और एक दूसरे  के पूरक हैं अलग नहीं। यह हम पर निर्भर है कि किस तरह इन दोनों माध्यम का प्रयोग करते हैं।
रही बात कमेंट्स की तो कमेंट्स आने से ज़्यादा महत्व इस बात का है कि जो हमने लिखा उसे कितने लोगों ने पढ़ा और इसका हिसाब ब्लॉग की statistics से आसानी चल सकता है।
फेसबुक ब्लॉग पर लगभग 70-80% ट्रेफिक बढ़ाता ही है इससे ब्लॉग को कोई खतरा नहीं है .


  यशवंत माथुर

समय और परिस्थिति सब नियंत्रित करती है.,मुझे जब जैसा समय मिलता है सक्रीय रहती हूँ,वैसे मेरा कार्य नए blogs खोजकर पढ़ना ही है...एक अच्छी पहल है .. राय जानने की
आभार

 अर्चना चावजी
 मेरे विचार इस मामले में कुछ भिन्न हैं. ब्लॉगस कोई नहीं पढता ऐसा नहीं है. अब भी अच्छे ब्लॉगस पढ़े जाते हैं. हाँ इतना अवश्य है कि अब ब्लॉग अपनी प्राकृतिक अवस्था में आ गया है. बीच में, चाहे किसी रेटिंग की वजह से हो या किसी और वजह से. हर कोई ब्लॉग लिखता नहीं था, बहुत से लोग ब्लॉग ठेला करते थे. रोज का रोज ठेलना, फिर चाहे वह किसी मेल से कॉपी पेस्ट किया हुआ मटेरियल हो या फिर आपस में दो लोगों की लड़ाई, गाली गलोच और भड़ास. अब वह सब छट कर फेसबुक पर चला गया है. ब्लॉग अब वही लिखता है जिसके पास वाकई कुछ लिखने या अभिव्यक्त करने को है. और तभी लिखता है जब उसका मन लिखने का हो, न कि रोज लिखना है कि तर्ज़ पर कुछ भी लिख दिया जाए.
फेसबुक पूरी दुनिया से जुड़ने का एक माध्यम है इससे इनकार नहीं किया जा सकता और वहां जब आप किसी ब्लॉग का लिंक देते हैं तो वह पूरी दुनिया के सामने होता है. यह सच है कि उसपर कुछ लोग बिना देखे ही लाइक क्लिक कर देते हैं, पर यह भी सच है कि उसे देखकर गंभीर पाठक भी ब्लॉग तक आता है और आपके ब्लॉग की रीडरशिप बढ़ती है. 
गंभीर लेखन आज भी ब्लॉग पर होता है और गंभीर पाठक आज भी उसे पढता है. ब्लॉग की अहमियत आज भी कम नहीं हुई है.
हाँ हलकी फुलकी बातों और टिप्पणियों के लिए फेसबुक बुरा नहीं.

शिखा वार्ष्णेय ,


मैं भी इस बात से सहमत हूँ कि फेसबुक की वजह से पूरा ब्लॉग-जगत इस बात से झूझ रहा है ...यहाँ आने वाले पाठकों की संख्या में कमी आई है ..और फेसबुक के स्टेट्स पर सिर्फ लाइक कर देते से इती-श्री कर देना लिखने और पढ़ने वालो पर सारा सर वार है ..वहाँ का लिखा हुआ इतनी जल्दी खो जाता है कि फिर से उसे खोजने में बहुत वक्त लगता है ....पर फेसबुक से पहचान मिलती है और मिली है इस बात को भी नाकारा नहीं जा सकता |

मेरे जैसे बहुत से लोग है जो वहाँ बहुत सक्रिय नहीं है ...हम लोगों के ब्लॉग या वेब साइड अपने पाठक ढूढं रही है |नीलिमा की बात सही है ..बिना कॉमंट किये कोई भी अपने ब्लॉग पर नहीं आता |सच में कुछ वक्त से सभी ब्लॉग अपने अपने पाठकों के लिए तरस रहें हैं और आगे चल के हालात और भी बुरे होने वाले हैं ...मुझे नहीं लगता कि वो वक्त फिर से आएगा जब सब लोग ब्लॉग लिख भी रहें थे और पढ़ भी रहें थे |

अंजू चौधरी

                                                                                                                     (  क्रमशः)

शनिवार, 21 सितंबर 2013

पांच वर्ष ब्लोगिंग के !

                                      जीवन में लेखन के तो लगभग  पांच दशक होने वाले हैं।  वह बचपन की बाल जगत की कहानियों और कविताओं के काल से जोड़ रही हूँ।   छोटी जगह का आदमी अधिक जानकारी भी नहीं रखता है।  हाँ घर में पिता पढ़ने के  शौक़ीन थे सो सारी पत्र पत्रिकाएं घर में आती थीं।  लिखने की कला तो  विरासत में मिली और प्रोत्साहन भी मिला लेकिन ये मुझे बहुत बाद में पता चला कि  पापा भी लिखते थे लेकिन उनका लिखा कभी पढने  को नहीं मिला।  
                                      लिखने और छपने का काम भी जल्दी ही शुरू हो गया था। लेकिन पत्र पत्रिकाओं में छपने का मजा भी कुछ और ही था क्योंकि तब और कुछ तो था नहीं। मध्यमवर्गीय परिवार में बगैर नौकरी के अर्जन  आपने आप में एक  अलग सुख था। लेकिन तब इतना नहीं जानती थी कि  ये अपनी लिखी हुई हर चीज संभालकर रखनी चाहिए सो काफी  छपा हुआ इधर उधर हो गया और जो शादी के बाद साथ लायी थी वो मेरी अनुपस्थिति में रद्दी की भेंट चढ़ गया।  मेरी अप्रकाशित रचनाएँ भी।  तब मुक्तक नहीं भेजती थी ढेर  सारे मुक्तक और शेर सब कुछ।  
                                     जब ब्लॉग बनाया तो इतना रोना आया कि  काश मेरी सारी डायरी होती तो पता नहीं कितना डालने को मेरे पास होता।  खैर जो भी बचा था और जो भी फिर लिखा गया वह तो ब्लॉग में है।  ऐसा नहीं है मेरी बहनें  अब भी कहती हैं कि  क्या ब्लॉग पर लिखा करती हो ? पत्रिकाओं में क्यों नहीं भेजती ? पहले कितना अच्छा था ? सच तो ये है की पत्रिका उन्हें आसानी से हासिल हो जाती है और ब्लॉग पर जाना और पढना अभी तक सबको आता नहीं है और फिर समय भी नहीं है।  लेकिन अब भेजने में झंझट लगने लगा है क्योंकि ब्लॉग पर तुरंत लिखो और तुरंत प्रकाशित  कर दिया।  अभिव्यक्ति का एक अलग माध्यम है , जिसमें किसी संपादक की पसंद या नापसंद का कोई झंझट ही नहीं ( संपादक बंधुओं से क्षमा याचना सहित ) . वैसे प्रिंट मीडिया में भी अपनी अलग राजनीति होती है।  अब वो जमाना नहीं है - पहले मैंने कभी संपादक को कवर लैटर भी नहीं लिखा।  अपनी रचना लिफाफे में बंद की और सीधे भेज दी।  वहां से स्वीकृति पत्र मिला बस और उसके बाद चेक।  इसमें कुछ भी न सही लेकिन सब कुछ अपने हाथ में है।  लिखो डालो और पब्लिश कर दो.  ढेर सारे  मंच भी  हैं जहाँ अपने और साथियों की रचनाओं के विषय में जानकारी  मिलती रहती है।  
                                  आज अपने पांच वर्ष पूरे करने पर मैं ब्लॉग के बारे अधिक जानकारी देने के लिए अपनी मित्रों रश्मि रविजा , रचना सिंह , संगीता स्वरूप को धन्यवाद कहना चाहूंगी , जिनसे मैंने बहुत कुछ सीख कर आगे कदम रखे।  फिर लेखन में और मेरी श्रृंखलाओं में मेरे सभी मित्रों ने समय समय पर मेरे विषय को लेकर जो अपने विचार या अनुभव दिए उन सबके को भी मेरा हार्दिक धन्यवाद ! 
                                 मेरी कविताओं को लेकर अपने संपादन में छपने वाले संग्रह में स्थान देने के लिए मुकेश कुमार  सिन्हा,सत्यम शिवम् और रश्मि प्रभा जी को मेरा हार्दिक धन्यवाद ! 
                                
                                  चेहरा तो मेरा मेरे पास था जन्म से ही ,
                                  भाव भरे मन में विधाता ही था शायद ,
                                  थामी कलम इन हाथों में वो पिता ने दी ,
                                  तराशा किसी ने नहीं , बस जो लिखा था 
                                  उसी तरह पन्नों पर उतरा और रख दिया। 
                                   ये वक़्त ही था  पहले पन्ने से पन्नों पर 
                                   फिर पन्नों से इस मंच तक चली आई। 
                                    पढ़ा, सराहा या फिर पोस्ट मार्टम किया
                                   साथ रहे मेरे सभी मित्र और बहन- भाई।  


                    बस आपके साथ , स्नेह और सहयोग से शेष जीवन में ब्लॉग पर लिखने की प्रेरणा देते रहें और आलोचना या समालोचना हो भी  निःसंकोच अपने विचार हम तक जरूर भेजें।

शनिवार, 14 सितंबर 2013

हिंदी दिवस : औपचारिकता भर !

                                      १४ सितम्बर हिंदी  दिवस  घोषित किसने किया -  हमारी सरकार ने क्योंकि  आजादी के इतने वर्षों बाद भी सरकारी स्तर पर उसको उसकी जगह दिला पाने में असमर्थ रही  है  और रही  नहीं है बल्कि आज भी है. तभी अपनी नाकामी पर परदा डालने के लिए हिंदी माह , हिंदी पखवारा , हिंदी सप्ताह और हिंदी दिवस अपने प्रयासों को प्रदर्शित करने का एक प्रयास मात्र है।जब कि देश को राजभाषा की दुर्दशा पर कहने का एक  अवसर प्रदान किया जाता है।  
                                      सरकारी प्रयासों से इसमें कुछ  होने वाला नहीं  है ,  वह सिर्फ एक औपचारिकता मात्र है। अभी पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय  ने किसी जानकारी को हिंदी में देने से इनकार  कर दिया ,  आखिर क्यों ?  क्या हमारे लिए अपनी राजभाषा में कोई सरकारी  सूचना प्राप्त करने की मांग करना न्यायसंगत  नहीं है।  जब हमारे सरकारी तंत्र में यह रवैया चल रहा है  फिर इस हिंदी के दिवस , सप्ताह , पखवारा या माह का क्या औचित्य है ?
                           आज के दिन  हिंदी की वकालत  करते हुए हिंदी में  काम  करने को बढ़ावा देने की बात करते हैं और दिवस के गुजरते ही  सब बातें एक साल के लिए दफन कर  जाती है। जब हमारी सरकारी  नीतियां ऐसी हैं  हिंदी की दुर्दशा के लिए किसी और को दोषी कैसे  कह सकते हैं ? कम वाले आमदनी वाले अभिभावक भी बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से पढाना पसंद करते हैं और फिर उसके लिए ट्यूशन भी रखने के लिए मजबूर  होते हैं।   क्यों करते हैं ऐसा क्योंकि वे अंग्रेजी के महिमा मंडन से  परिचित होते हैं।  अंग्रेजी माध्यम से  बुरा  नहीं है लेकिन स्कूल में हिंदी की उपेक्षा और पाठ्यक्रम में उसके विषयवस्तु का ठीक से चयन न करना ही इसका सबसे बड़ा कारण है .  जब संसद में हिंदी  भाषी प्रदेश के सांसद अंग्रेजी में बोल कर अपने आपको विद्वान सिद्ध करने की कोशिश करते हैं और प्रधानमंत्री अपनी मेधा से हिंदी में  भाषण देने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं  तो फिर हिंदी भाषी लोग अपने लिए कहाँ जगह खोजें ? आम आदमी चिल्लाता रहे कि  हिंदी को  आगे लाओ लेकिन सरकारी तंत्र आज भी अंग्रेजों का मुंहताज है।  जहाँ तक मुझे पता है की करीब करीब सभी संस्थानों में हिंदी प्रभाग और हिंदी अधिकारी का पद होता है लेकिन वहां वह हिंदी को बढ़ावा देने के लिए होता है यह तो वहां  पता चल सकेगा ?
                        सरकार क्या कर रही है और उसके क्या करना चाहिए ?  बस इतना कि अपने बच्चों को घर में हिंदी ही बोलने को कहें और उनको इसा भाषा में अपने ज्ञान को भी बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें।  वे स्कूल या कॉलेज के अलावा घर में अधिक सुधारे जा सकते हैं।  
                        स्कूल में हिंदी ज्ञान के  नाम पर  चुटकुला नहीं कहेंगे बल्कि ये वास्तविकता है कि प्राइमरी स्कूल में कुछ अधिकारी औचक निरीक्षण के लिए गए तो वहां पर बच्चे मातृभूमि शब्द शुद्ध नहीं लिख पाए और फिर जब  शिक्षिका जी ने लिखा तो वह भी गलत था।  अधिकारी ने  खुद लिख कर कहा - मैडम आप तो सही  जानकारी रखिये नहीं तो इन बच्चों को क्या पढ़ाएंगी? 
                       ये हमारी शिक्षा  के नाम पर  एक बदनुमा दाग के अलावा कुछ भी नहीं है।  

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

भिक्षुक एक वर्ग !

                        


              भिक्षा वृत्ति सबसे निकृष्ट और हेय रही है लेकिन फिर भी हम माँगने वालों को पालते ही  रहते हैं ( वैसे मैं शारीरिक रूप से सक्षम , युवा वर्ग और बच्चों को कभी  भीख नहीं देती ) . हम ही उन्हें इस वृत्ति के लिए बढ़ावा  देते हैं।  उनकी कमाई एक मेहनतकश से कई गुना ज्यादा है।  उन्हें वो सारी चीजें सहज उपलब्ध है जिन्हें एक मेहनतकश पूरे माह  के बाद भी हासिल नहीं कर पाता है।
                                कानपुर में ७ भिक्षुक गृह है और वे सारे के सारे खाली हैं।   सरकारी सहायता बदस्तूर मिल रही है लेकिन वह जा कहाँ रही है ? इसके बारे मे  मुझे पता नहीं है लेकिन एक बात बता दूं कि ये भिक्षुक अपने अपने घरों में रहते हैं और इनके घर कोई  झोपड़ी नहीं है बल्कि अच्छे खासे मकान  हैं और वह भी सारी  सुख सुविधाओं से युक्त भी हैं।ऐसे ही नहीं जागा ये विचार --  कई घटनाओं और लोगों को देखने के बाद सोचा कि कैसा है ये वर्ग जो औरों की मेहनत या फिर किसी भी तरीके  किये गए पैसे पर ये लोग ऐश कर रहे हैं। 

                    कानपुर का एक प्रसिद्ध मंदिर पनकी की बात कर रही हूँ।  जहाँ पर मंगलवार को हजारों की संख्या में दर्शनार्थी आते हैं और रोज भी जाते हैं।  इस मंदिर में सैकड़ों की संख्या में भिखारी बैठे होते हैं वह भी सपरिवार -   माँ - बाप , बेटे - बेटी , नाती - पोते सभी।   मेरी नजर एक लड़की पर पड़ी , वह नव विवाहिता  लेकिन कम उम्र की अच्छी साड़ी पहने , पूरे साज श्रृंगार से और एक छोटे के बच्चे को गोद में लिए बैठी भीख  मांग थी . वही पास में उसके घर के लोग थे।  चूंकि  लम्बी लाइन थी और दर्शन मुझे भी करने ही थे सो खड़े खड़े ये भी देख रही थी।  तब लगा कि  यहाँ आने वाला हर व्यक्ति तो नहीं लेकिन १० में से ४ तो  पैसे , प्रसाद , लंच पैक , कपडे आदि देते हैं।  मैं नहीं कहती कि  ये सब न किया जाय लेकिन दान या इस तरह की चीजें देने के लिए पात्रता भी  देखनी चाहिए।  इन सभी भिखारियों में करीब करीब ८० प्रतिशत बिलकुल स्वस्थ और कार्य करने की दशा में होते हैं लेकिन वे कार्य नहीं करना चाहते क्योंकि अगर उनको एक जगह पर बैठे हुए एक दिन में कई सौ रुपये , आटा , फल , मिठाई और अन्य खाद्य पदार्थ मिल रहे हैं तो फिर -- 'अल्लाह दे खाने को तो ठेंगा जाय कमाने को ' यह  कहावत चरितार्थ होती है. 
                  नवरात्रि में माता जी के हर मंदिर में लाखों लोग रोज दर्शन करते हैं , जहाँ पर करोड़ों का प्रसाद रोज बिकता है और वही पर लाखों भिखारी भी अपनी थैली भर रहे होते हैं।  ऐसे एक मंदिर के बाहर माँगने वाले सड़क के  दोनों और बैठे होते हैं।   बच्चे बूढ़े और जवान सभी होते हैं , ऐसा नहीं है उनमें अपाहिज ,  कुष्ठ रोगी , अत्यंत वृद्ध और असमर्थ बेसहारा लोग भी होते हैं।  इनके घर में बाकायदा खाना पका कर आने वाले सदस्य और उनके स्थान को घेर कर पहले से बैठे हुए लोग होते हैं। एक परिवार का वार्तालाप ऐसे ही माहौल में  मैंने सुना था -- 
लड़की - चल तू जा , मैं खाना कर रख आई हूँ तब तक मैं यहाँ बैठती हूँ। 
 लड़का - कहे की तरकारी बनायीं है ?
लड़की - आलू   टमाटर की। डब्बा में रोटी और चावल रखा है , जल्दी खा कर आ फिर बप्पा जइहें। 
                                  उस लड़की की उम्र २० साल की रही होगी और जाने वाले लड़के की १५ साल।  उनके बप्पा किस उम्र के होंगे ? यानि की सभी के सभी मेहनत करके कमाने काबिल लेकिन जब उनको दूसरे की कमाई  का सुख लेना ही नसीब में हो तो फिर क्यों हाथ पैर हिलाए जाएँ।  
                      ऐसा नहीं है इनके  घूम घूम कर भीख मांगने वालों के बीच भी इलाके का करार होता है कि  ये हमारा इलाका है और इसमें इन दिनों में हम भीख माँगने हम ही जायेंगे।  कोई दूसरा नहीं जा सकता है।  इनके साथ आता रखने के लिए अलग थैला , चावल रखने के लिए अलग और कभी कभी तो ये  आलू दे दो कह कर सब्जी का भी इंतजाम कर लेते हैं।  जितना आटा  एक आदमी एक महीने में खाता होगा उतनी इनकी एक दिन की कमाई हो जाती है।  वर्षों से सुनती आ रही हूँ - एक भिखारी सड़क से निकलेगा - बेटा रूपया दो रुपया दे इस गरीब को।  धीरे धीरे ये माँगने की सीमा अब ५ से १० रुपये की हो गयी है।  हम तो घर में बैठे ही उनकी आवाज सुना करते हैं।  वैसे भाई मंहगाई का जमाना है तो उनकी मांग भी तो बढ़ेगी न , नहीं तो गुजर कैसे होगी ? 
                           सच कहूं इनको भिखारी हमने बनाया है , जिनकी रोज की आमदनी एक मजदूर से या कहो की एक बाबू से अधिक हो तो वह क्यों परिश्रम करेंगे ? हमारी धार्मिक भावनाओं का फायदा उठा कर ये हरामखोरी की आदत का  शिकार हो गए हैं।  रोज ही दिन में एक आध बार जवान औरतें , अधेड़ औरतें अपने बच्चों के भूखे होने का हवाला देकर रोटी मांगती हैं , पैसे मांगती हैं लेकिन अगर उनसे कहा की कुछ काम क्यों नहीं करती ? तो इस विषय में कुछ भी नहीं बोलना होता है काम के नाम पर चुपचाप अपना झोला उठा कर चल देंगी।  इनमें गैरत जैसी कोई चीज होती ही नहीं है , नहीं तो कितने बूढ़े और बच्चों को रिक्शा चलते देखा है , बोझ ढोते देखा है। इस मुफ्त की खाने वाले वर्ग के प्रति तो सोचने की जरूरत है - किसी और से क्यों कहें ? सिर्फ हम अपने को ही इसा दिशा में जागरूक बना लें।  अगर कुछ देना ही है तो फिर ऐसे व्यक्ति को दें जो कमाने के काबिल न हो।  चलने फिरने में लाचार हो , अत्यंत बूढा , अपाहिज हो।  बच्चों को तो भीख कभी न दें।  इनमें से बहुत  से बच्चे गिरोह द्वारा अपहृत करके उनको भीख मंगवाने का काम करवाते हैं।  वे लोग तो और उच्च कोटि के भिखारी हैं जो दूसरों को प्रयोग करके खुद आलिशान घरों में रहकर हमारी भावनाओं का फायदा उठाया करते हैं।  इस तरफ भी सजग होकर कुछ सामाजिक दायित्वों के प्रति जिम्मेदार बनें।  लोगों को भीख देकर अकर्मण्य न बनायें बल्कि उनको अगर काम के लिए प्रोत्साहित किया जाय तो समाज में कुछ तो  परिवर्तन लाया जा सकता है।  लोगों की खून पसीने की कमी दूसरे तो न खाएं ( वैसे खिलाने वाले हम ही होते हैं। )