शनिवार, 24 मई 2014

माँ तुझे सलाम ! (10)


                       माँ सिर्फ जन्म ही नहीं देती है , वह एक मानव को तन , मन दोनों से गढ़ती है।  वह संस्कार देती है और हम उसको ग्रहण करते हैं, कितना करते हैं ये हमारे जीवन में परिलक्षित होता है। कोई भूल नहीं पाता  है उसको जीवन के शेष काल में और कोई उसके जीते जी त्याग देता है। जिन्होंने माँ को खो कर भी अपने में समेट लिया है वे हैं नासवा जी - माँ के चले जाने से लेकर आज तक न जाने कितनी रचनाएँ गढ़ ली हैं माँ पर ,फिर भी अभी शेष हैं।  आज की प्रस्तुति -- दिगंबर नासवा जी !



यकीनन तू मेरी यादों में अम्मा मुस्कुराती है 
तभी तो खुद ब खुद होठों पे ये मुस्कान आती है

दिगंबर नाम की पहचान तेरी देन है फिर भी
सफेदी आ गई तू आज भी लल्ला बुलाती है

में घर से जब निकलता हूँ बड़े ही प्यार से मुझको
लगे कोई नज़र ना आज भी काजल लगाती है

बुरी आदत कभी जो देख लेती है मेरे अंदर 
नहीं तू डांटने से आज भी फिर हिचकिचाती है

कभी बचपन में मैं कमजोर था पर आज भी अम्मा
फकीरों की मजारों पर मुझे माथा टिकाती है

रफ़ी आशा लता गीता सुरैया या तलत सहगल
पुराने गीत हों तो साथ अम्मा गुनगुनाती है

बढा कर हाथ अपना थाम लेती है तु चुपके से 
मेरी कश्ती भंवर में जब कभी भी डगमगाती है

8 टिप्‍पणियां:

  1. दिगंबर जी की माँ पर आधारित सभी रचनाएँ अद्वितीय है. कुछ को छोड़कर लगभग सभी मैंने पढी है. इतना मार्मिक और सटीक भाव... सभी अद्भुत हैं.

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  2. बहुत ही भावुक कर देने वाली रचना ..........

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  3. माँ की ममता प्यार चिंता फ़िक्र सभी कुछ इन चंद अशआर में समेट लिया है आपने ! बहुत प्यारी रचना !

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  4. दिगम्बरजी की "माँ' पर लिखी लगभग सभी रचनायें मैंने पढ़ीं हैं..और सभी एक से बढ़कर एक हैं .....शिशु का माँ के प्रति अपनत्व ....एक बालक मन की सहजता .....उनमें दिखाई देती है ..बहोत सुन्दर रचना ...

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  5. माँ पे लिखते हुए शब्द खुद बी खुद निकल आते हैं ... ये उन्ही की प्रेरणा है जो आज में किसी भी मुकाम पर हूँ ... शुक्रिया आप सभी का ... और रेखा जी का भी मेरी रचना आप तक पहुंचाने का ...

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