मंगलवार, 27 मई 2014

माँ तुझे सलाम ! (12)

                 कभी कभी हम कुछ सीखने के लिए प्रयास नहीं करते और न ही माँ हमें सीखने के लिए कुछ करती है।  वह अपने स्वभाव के अनुरूप अपने जीवन की विभिन्न भूमिकाओं के साथ अपना दायित्व निभा रही होती है और हम उससे सीख रहे होते हैं।  यही तो है जो संस्कार कहे जाते हैं।  वह हाथ पकड़  सिखाती नहीं है बल्कि हम उसे ग्रहण कर लेते हैं और फिर वह  हमारे जीवन का दर्शन बन जाता है।  अपनी माँ से सीख कर जीवन में उतारने वाली है : वंदना गुप्ता। 





           माँ ब्रह्माण्ड का सबसे खूबसूरत शब्द ही नही ईश्वर का स्वरूप होता है । कहते हैं जब ईश्वर ने देखा वो हर जगह नहीं पहुँच सकता तब उसने माँ को बनाया अपने प्रतिनिधि के रूप में । दया , करुणा , ममता की प्रतिमूर्ति के रूप में । यूँ तो माँ का ममत्व अनमोल है जिसे किसी भी तरह चुकाया नहीं जा सकता फिर भी जब जब मातृ दिवस आता है तो अचानक हम सबको जैसे अहसास होता है , जैसे सोये से जाग जाते हैं कि हाँ , हमारा भी कुछ कर्तव्य है लेकिन इतने भर से संभव नही मातृ ॠण से उॠण होना । फिर भी रेखा जी के आग्रह पर सोच में पड गयी कि क्या लिखूँ , क्या बताऊँ मैं अपनी माँ के बारे में ।
 
                          मेरी माँ जिसे मैने बचपन से ही सबके लिए ममत्व से भरे देखा फिर चाहे अपना हो या पराया सबको सीने से लगा लेतीं , सबको अपना समझतीं किसी से कोई द्वेष नहीं , जैसे सारा संसार हमारा शब्दों को जीती हों । आज आपको एक घटना से रु-ब-रु करवाती हूँ जिसने बहुत गहरी छाप छोडी मुझ पर क्योंकि उस वक्त मैं मात्र दस वर्ष की थी जब मेरी दादी जिन्हें मैं बहुत प्यार करती थी और वो भी मुझे इतना प्यार करती थीं कि सारे घर से मेरे लिये लड लेती थीं और मेरे लिए खाना पीना तक छोड देती थीं इतनी लाडली थी मैं अपनी दादी की , वो दादी अपने अन्तिम दिनों में चार महीने तक बिस्तर पर थीं । यहाँ तक कि उनके सारे कार्य बिस्तर पर ही होने लगे थे जैसा मुझे याद है तो उनको मोशन की प्रॉब्लम शुरु हो गयी थी जिसके कारण उन्हें मोशन नहीं होता था और अन्दर गाँठें बन जाती थीं जो कितनी भी कोशिश वो करतीं बाहर नहीं आती थीं ऐसे में डॉक्टर बुलाई जाती और वो औजार डाल डाल कर बुरी तरह अम्मा को जख्मी करते हुए उन गाँठों को बाहर निकालती और उस वक्त अम्मा दर्द से तडप कर ऐसे चीखतीं कि सारा घर रो पडता । चीखें ऐसी जैसे गाय डकरा रही हो मगर सब मजबूर रहते क्योंकि और कोई उपाय ही नहीं था और हॉस्पिटल वो जाना नहीं चाहती थीं ऐसे में सब मजबूर थे यहाँ तक कि उनकी सेवा के लिए बाऊजी ने चार महीने की छुट्टी तक ले ली थीं मगर इन हालात के आगे सब मजबूर थे तब जब मेरी मम्मी से ये सब नहीं देखा गया तो उन्होने देखा कि  डॉक्टर कैसे  गाँठें बाहर निकालती है और उसके बाद मेरी मम्मी ने खुद इस काम को अपने हाथों से अंजाम देना शुरु किया उस वक्त कहाँ ग्लव्स होते थे , बस मेरी मम्मी चाहे खाना बना रही हों या खिला रही हों या खा रही हों जैसे ही अम्मा को तकलीफ़ शुरु होती फ़ौरन सब काम छोडकर उनके इस काम में लग जातीं और अन्दर ऊँगलियों से उन  गाँठों को बाहर निकालतीं जिससे अम्मा को तकलीफ़ भी नहीं होती मगर इस चक्कर में मम्मी कितनी ही बार खाना भी नहीं खा पाती थीं जो बीच मे छुट जाता तो फिर दोबारा नहीं खातीं । इस काम के लिये मम्मी ने अपने आधे आधे नाखून तक काट लिये थे ताकि अम्मा को चुभें नहीं और दूसरे नाखूनों में इन्फ़ैक्शन न हो क्योंकि सारे काम तो करने होते ही थे घर के । यूँ तो मेरी मम्मी से बडी उनकी तीने जेठानियाँ भी थीं मगर उनमें से किसी ने भी इस काम की जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं ली । वैसे मम्मी कोई खुद भी सही नहीं रहती थीं उन्हें खुद साँस , दिल और बीपी की शिकायत थी ऐसी हालत में भी  वो  अम्मा की तकलीफ़ के लिए  रोज उनके ऊपर श्रीमद भगवद गीता के सारे के सारे 18 अध्याय करतीं जो बीच में अम्मा की वजह से छुट जाते तो उनका काम करके दोबारा नहातीं और फिर दोबारा पूरा करतीं ताकि उन्हें तकलीफ़ में आराम मिले क्योंकि मेरी मम्मी एक धार्मिक प्रवृत्ति की महिला रही हैं तो ये सब काम उनकी लिस्ट में पहले स्थान पर थे फिर चाहे उसके लिये अपनी अनदेखी कर लेतीं मगर अम्मा के दुख में उन्होने अपने आप को भुला दिया और जब अम्मा को आराम मिलता तो वो ढेरों आशीष देतीं कि तूने मुझे आराम पहुँचाया वरना वो डॉक्टर तो कब का मार चुकी होती क्योंकि अम्मा का खाना पीना तो बंद ही हो गया था बस जरा सा जूस आदि ही दे पाते थे ऐसे में पेट में खुश्की होनी ही थी और उन्हें न तो इंजैक्शन लगवाना था और न हस्पताल जाना था तो घर में इलाज के लिए इसके सिवाय और कोई चारा ही नहीं था । मम्मी को बस ये इत्मिनान रहा कि मुझसे जो बन पडा मैने किया फिर चाहे पता है कि एक दिन सबको जाना ही है और फिर चाहे प्राण कितनी तकलीफ़ से निकले अम्मा के मगर मोशन की तकलीफ़ से तो मरते दम तक अम्मा को आराम रहा ।
                 तब की ये घटना या इसके बाद की और भी छोटी छोटी घटनायें ऐसी हैं जहाँ मम्मी के अंदर की दया और करुणा झलकती है जैसे कभी कोई चिडिया का बच्चा यदि चोट खाकर अधमरा सा हो जाता तो मम्मी को लगता इसे बिल्ली न खा जाए तो उसके लिये कटोरी में गंगाजल लेकर उस पर गीता का पन्द्रहवाँ अध्याय कर जल छिड्क देतीं और देखते ही देखते वो ठीक हो उड जाता । किसी भी कीडे मकौडे तक को कभी नहीं मारतीं यहाँ तक कि यदि कानखजूरा भी आ जाता तो उसे चिमटे से उठा कर बाहर फ़ेंक देतीं मगर मारती कभी नहीं ,ऐसी जाने कितनी ही घटनायें हुयीं जीवन में जिनसे उनके अन्दर छुपी दया और करुणा उजागर होती रहती जिसका हम सबके जीवन पर गहरा प्रभाव पडा और ये संस्कार कुछ हद तक मुझमें भी उतरे । मैं भी किसी भी जीव को मार नहीं पाती बेशक चीखती रहूँ मगर मार नहीं सकती ना उसे उठाकर फ़ेंक सकती हूँ । 

                यहाँ तक कि जब मेरे बाऊजी भी बिस्तर के हो गये तो उनकी भी जब मम्मी खुद  तकरीबन 72 साल की थी तब  उस उम्र में भी इसी तरह सेवा की कि कोई कर नहीं सकता , न दिन देखा न रात हर वक्त बाऊजी का हर काम बिस्तर पर ही होता और मम्मी अपनी सम्पूर्ण निष्ठा और समर्पण से उनकी सेवा में लगी रहीं साथ ही उनके लिए भी जितना हो सका जप तप करती रहीं वो पल तो मेरी आँखों के आगे घटित हुए हैं तो कैसे अन्जान रह सकती हूँ । जब बाऊजी का तीन महीने पहले खाना पीना छुट गया था और आखिरी वक्त में तो कोमा में ही चले गये थे तब तक मेरी मम्मी ने जो सेवा की है उसका तो मैं वर्णन भी नहीं कर सकती । सेवा को धर्म मानने वाली मेरी माँ ने जीवन में जाने कितने आघात सहे हैं न केवल मानसिक बल्कि शारीरिक भी मगर उसमें भी कभी अपने हौसले को गिरने नहीं दिया और उनका ये हौसला हम सबका संबल बना रहा ।


यूँ तो जाने कितने किस्से मिल जायेंगे जहाँ मम्मी के अन्दर की एक औरत कैसे अपने घरबार को चलाती है , कैसे समायोजन कर जीती है वो सब मैने सुना देखा इसलिये नहीं क्योंकि मैं काफ़ी देर से हुयी थी तो जो मुश्किल हालात का दौर था वो तो तब तक गुजर चुका था । मेरे पिता तो सरकारी नौकरी में थे और हम तीन बहनें थीं साथ ही अपने घर में भी बाऊजी को कुछ साझा विरासत के रूप में देना होता था ऐसे में उनकी नौकरी में हाथ तंग रहता था तो मम्मी ने कुछ काम घर बैठे ही शुरु किए काटने सीने के ताकि रिश्तेदारी में कहीं जाना हो या वहाँ का लेन देन हो तो वो उसे पूरा कर सकें और किसी को पता भी न चले जिससे हमें पता चला कि कैसे कम पैसे में समायोजन बैठाया जा सकता है और कैसे रिश्तेदारी आदि में अपने परिवार की इज्जत बनाये रखी जाती है , उनकी इन्हीं बातों ने हमें जीवन जीने में सही योगदान दिया , हमारा मार्गदर्शन किया जिस कारण हम अपने जीवन की बडी से बडी समस्याओं को यूँ पार कर गये कि आज वो सब स्वप्नवत लगते हैं । 

इसके अलावा मम्मी एक धार्मिक महिला रहीं इसलिये धर्म के प्रति जो मेरी आस्था बनी वो उन्हीं के कारण बनी जब वो अपनी ज़िन्दगी के अनेकों किस्से सुनातीं , ईश्वर की दया और करुणा का महत्त्व बतातीं तो हमारी भी आस्था उस ओर जमने लगी जो आज मेरी रग रग में लहू सी पैबस्त हो गयी है। आज जो भी धार्मिक संस्कार हैं वो मेरी माँ और पिता की ही देन हैं ।मैं खुद को भाग्यशाली समझती हूँ कि ऐसे उच्च विचारों और आचरण वाले घर में मेरा जन्म हुआ और उनकी संस्कारों की धरोहर मुझमें भी पैबस्त है जिसे मैं अपने बच्चों में डालने की कोशिश करती रहती हूँ ताकि जो संस्कार हैं वो कभी खत्म न हों ।

घर परिवार में सामंजस्य बैठाना , सबके साथ मिलकर रहना , सबके लिए प्रेम और सौहार्द बनाये रखना जैसे संस्कारों की धरोहर एक माँ ही अपने बच्चों को दे सकती है और इस कार्य को अंजाम मेरी मम्मी ने बखूबी दिया जिसके लिए मैं ताउम्र नतमस्तक रहूँगी । आज मेरी मम्मी 82 साल की हैं और मेरे साथ ही रहती हैं मगर मुझे लगता है मैं उनके लिये कुछ नहीं कर पाती जितना करना चाहिये बस उन्हें देख ये ही ख्याल आता है कि जो उन्होने सबके लिए सेवा ,त्याग, दया, करुणा और ममता रखी उसी का फ़ल है कि आज हम सब जो फ़ल फ़ूल रहे हैं उन्ही के आशिर्वाद के  कारण ये सब संभव हो रहा है ।
     

4 टिप्‍पणियां:

  1. aapki maa aapke sath hain,isse achhi bat kya hogi.....maa yesi hi hoti hain...unke pyar-jajwat ki koi sima hi nahi...

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  2. Aparna Sah जी सही कह रही हैं माँ का प्यार अनन्त होता है

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  3. रेखा जी आपका हार्दिक आभार जो आपने हमें ये मौका दिया

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