बुधवार, 6 जनवरी 2021

वर्क फ्रॉम होम : सुखद या दुखद !

 वर्क फ्रॉम होम : सुखद या दुखद !


                                   आईटी  कंपनी के लिए वर्क फ्रॉम होम एक अच्छा विकल्प था कि कर्मचारी को कभी आपात काल में घर में बैठ कर काम करने की सुविधा प्राप्त थी और वह इससे कुछ आराम भी महसूस कर सकता था। ये व्यवस्था हर कंपनी में थी  और  करीब करीब  सबको दी जा रही थी और कर्मचारी ले  रहे थे।  लेकिन हद से ज्यादा कोई  सुविधा भी अवसर की जगह गले की फांस बन जाती है। 

              कोरोना की दृष्टि से वर्क फ्रॉम होम एक सुरक्षित और सहज तरीका है , जिससे कार्य भी होता रहे और उनके कर्मचारी सुरक्षित भी रहें।  अब वर्क फ्रॉम होम करते करते लोगों के लिए एक वर्ष पूर्ण होने जा रहा है और कंपनी के काम तो सुचारु रूप से चल रहा है लेकिन उसके कर्मचारियों के लिए एक गले की फाँस बन चुका है। ऑफिस के कार्य करने के वातावरण में और घर के वातावरण में अंतर होता है। अब जब कि बच्चे भी घर में ही अपनी पढाई  कर रहे हैं और  पत्नी भी कामकाजी है तो वह भी अपने काम को किसी न किसी तरीके से सामंजस्य स्थापित करके जारी रख रही है।  

                   बच्चों के लिए स्कूल का वातावरण और घर में रहकर पढाई करने से सबके समय का तारतम्य बैठ नहीं  पाता है।  बच्चे अगर छोटे हैं तो माँ उन्हें साथ लेकर उनकी पढाई करवानी होती है।  ऐसे समय में जब कि न सहायिकाएं बुलाई जा रही हैं और न कोई और साथ दे सकता है तब ये वर्क फ्रॉम होम भी गले की फाँस ही  बना है।  एक गृहणी घर , काम और बच्चे सब का  सामान्य दिनों में प्रबंधन कर लेती हे लेकिन जब सारी जिम्मेदारियां  एक साथ आ खड़ी हों तो पति , अपना और बच्चे की पढाई सामान्यतया  संभव नहीं है।  परिणाम ये होता है कि पति का काम समय से पूरा न हो तो वह भी इसकी जिम्मेदारी परिवार पर ही डालता है , पत्नी भी यही सोचती है लेकिन वह  ही  क्यों खट रही है , क्योंकि हर हाल में सब को सही वातावरण देकर स्वयं को अधिक काम के बोझ तले दबा हुआ देख कर वह अपनी झुंझलाहट किस पर उतार सकती है , बच्चों पर , पति पर न।  इसके बाद घर का वातावरण तनाव पूर्ण ही बन जाता है।  फिर सब एक दूसरे के ऊपर आरोप प्रत्यारोप लगाने लगते हैं। 

                     स्थितियाँ इसके विपरीत भी बन रही हैं , अगर पति किसी व्यवसाय में है और पत्नी अन्य तरीके से कार्यरत है तो इसमें पति अवसाद का शिकार हो रहा है क्योंकि व्यवसाय लगभग बंद रहे हैं या फिर निश्चित समय  के लिए ही खुल पा रहे हैं।  अगर वह समझदार है तो वह पत्नी के  कार्यों में सहभागिता करके परिवार को एक अलग ही वातावरण दे रहा है और समझदारी भी यही है। लेकिन जरूरी नहीं है कि वह जो चाहता है वह कर सके क्योंकि हर जगह की  अलग कार्य शैली होती है। स्कूल में कार्य करने का समय अलग होता है , सरकारी कार्यालयों में अलग और आईटी कंपनियों में अलग होता है।  

                       इसमें सबसे अधिक होता है कंपनियों की कार्य  शैली में अंतर।  मीटिंग्स और कार्य का कोई समय नहीं होता है क्योंकि आपका मैनेजर या फिर बॉस कभी भी मीटिंग रख लेता है और वर्क फ्रॉम होम में कभी भी  करके आया काम सौप सकता है।  अपने सम्पर्क में आये  कई परिवारों के बच्चों के बारे में सुना है कि अब तो न कोई खाने का समय और न ही सोने का  , हर समय लैपटॉप पर बैठे काम  ही किया करते हैं।  कभी कभी तो  ३ बने तक भी काम होता रहता है।  इससे कर्मचारी के ऊपर कितना दबाव बढ़ जाता है।  ऐसे  कठिन समय ें में जब कि कंपनियों में भी काम करने वालों को निकला जा रहा है, अपनी नौकरी बचने के लिए कर्मचारी हर शर्त और हर हाल में काम करने के लिए मजबूर है। कितने घंटे काम के होते हैं इसकी कोई भी सीमा नहीं होती है। 

                      इससे पहले  कर्मचारी का एक निश्चित कार्यक्रम होता था कि उसको इतने बजे ऑफिस में रिपोर्ट करना है और  इतने बजे निकलना है।  इसके बाद वह अपने परिवार के लिए समर्पित होता था। अब स्थितियां उसके लिए अपने अनुसार नहीं चल रही हैं। कंपनी का पूरा काम हो रहा है, कर्मचारियों को दी जाने वाली यातायात सुविधा की   है लिहाजा उसके चालक या तो बेकार हो चुके हैं या फिर उसके मालिक को नुक्सान हो रहा है।  ऑफिस के रख रखाव का पूरा पूरा व्यय अब उनके लिए बचत ही हो चुकी है।  लेकिन वहीँ कर्मचारी के लिए सारे दिन वाई फाई का लोड और कई सारे व्यय बढ़ चुके हैं। 

                     कंपनी का नजरिया भी कई तरह से ठीक है वह अपने कर्मचारियों की सुरक्षा को देखते हुए ये सुविधा प्रदान कर रही है  और जो बच्चे माँ-बाप से दूर शहरों में काम कर रहे हैं , उन्हें घर आकर एक मुद्दत बाद  उनके साथ रहने का मौका मिल रहा है।  घर में बंद  बच्चों को अपनों का साथ मिल रहा है और माँ-बाप को आंतरिक ख़ुशी भी मिल रही है।   हर सुविधा के दो पहलू होते हैं सुखद और दुखद - ये हमारे ऊपर निर्भर करता है कि उसको हम अवसर के अनुकूल किस  दृष्टि से देख रहे हैं। 

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