मां के लिए जो भाव मन में होते हैं लेकिन अभिव्यक्ति जब बेटे या बेटी को खुद ही कटघरे में खड़ा कर दे और वह अपराधबोध भी उसके मन की निश्छलता को दिखलाया है। वह मां न इसे जानती है और न ही सुन सकती है फिर भी मां और बेटे के भावों के तार अहसास जरूर करवा रहे होंगे। सबसे अलग कुछ लिखा है - #शिखर चंद जैन जी ने।
मां! मैं अच्छा बेटा नहीं !
समय की धूल जब स्मृतियों के पन्नों पर जमने लगती है, तो अक्सर धुंधलाहट में हम उन चेहरों को भूल जाते हैं जिन्होंने हमारे जीवन के कैनवास पर रंग भरे थे। लेकिन आज, कोलकाता की इस व्यस्त और शोर भरी दोपहर में, मैं जब भी अपनी खिड़की से बाहर देखता हूँ, तो मुझे अपनी माँ का चेहरा याद आता है—वह चेहरा जो जीवन की तपती धूप में भी मेरे लिए शीतल छाँव बना रहा। मैं आज खुद को एक कटघरे में खड़ा पाता हूँ। यह कटघरा किसी अदालत का नहीं, बल्कि मेरी अपनी अंतरात्मा का है।
अभावों के बीच संपन्न बचपन!
मुझे याद है पिताजी की वह सीमित आय, जिसमें महीने के आखिरी दस दिन अक्सर हिसाब-किताब की ऊहापोह में बीतते थे। लेकिन ताज्जुब इस बात का है कि मुझे या मेरे बड़े भाई को कभी उस 'कमी' का अहसास तक नहीं हुआ। उस समय माँ एक जादुई कलाकार की तरह थीं। वह कम में भी 'सब' जुटा लेती थीं। हमारी हर फरमाइश, हर वह पकवान जिसकी हमने बस ज़िक्र भर किया हो, थाली में हाज़िर हो जाता था।माँ ने अभावों को कभी घर की दहलीज़ के अंदर नहीं आने दिया, उन्होंने हमें अभावों में भी बहुत अच्छी तरह पाला।
रसोई वाला कोना !
100 वर्ग फीट के छोटे से कमरे के एक कोने में बनी “रसोई” के उस ताखे पर रखे वे छोटे-छोटे डिब्बे जिनमें तमाम मसाले, दालें भरी रहती थीं आज भी मेरी आँखों के सामने तैर जाते हैं। इन्हीं में से 5 डिब्बों में पाँच तरह के अचार होते थे—आम, नींबू, मिर्च, लसोड़े और कैर का मिक्स अचार। वे सिर्फ अचार नहीं थे, वह माँ का हमारे प्रति प्रेम और समर्पण का प्रतीक थे। वह जानती थीं कि हमें कब क्या स्वाद चाहिए। आज जब मैं बड़े-बड़े होटलों में 'बुफे' देखता हूँ या किसी बड़े रेस्टोरेंट के भोजन को देखता हूं तो पराठों के साथ मां के हाथ की सब्जी और उन पाँच डिब्बों के अचार में से किसी एक के स्वाद के आगे सब फीका लगता है। मेहमान भी उनके आचार के स्वाद को खूब सराहते थे।
बचपन का हादसा और मां !
मेरी स्मृतियों के गलियारे में एक मंज़र पत्थर की लकीर की तरह अंकित है। मैं तब मात्र सात साल का था। एक अलमारी से गिरकर मेरे जबड़े बुरी तरह टूट गए थे। वह दर्द असहनीय था, लेकिन उस दर्द से कहीं ज़्यादा तड़प माँ की आँखों में थी। उस वक्त न कोई गाड़ी थी, न आज जैसी सुविधाएं। माँ ने बिना एक पल गँवाए, मुझे अपनी गोद में उठाया और बदहवास होकर अस्पताल की ओर भागीं।
वह दोपहर, वह तपती सड़क और माँ की वह सांसे—मैं आज भी महसूस कर सकता हूँ। सात साल का बच्चा अपनी माँ की गोद में भारी होता है, लेकिन उस दिन माँ के लिए मैं पंख जैसा हल्का था, क्योंकि उनकी ममता ने उन्हें फौलाद बना दिया था। अस्पताल पहुँचने तक उनके पैरों में छाले पड़ गए थे, मगर उनकी नज़रें सिर्फ मेरे चेहरे पर टिकी थीं। मेरा जबड़ा तो डॉक्टरों ने जोड़ दिया, लेकिन बाद के छह महीनों में माँ ने जो अपना सर्वस्व मुझ पर न्यौछावर किया, उसका जोड़ शायद पूरी कायनात में कहीं नहीं है।
कोलकाता की दूरी और मन का अपराध बोध!
आज मैं जयपुर से हज़ारों किलोमीटर दूर कोलकाता में हूँ। दो साल बीत गए हैं। दो साल... सुनने में छोटा लगता है, लेकिन एक माँ के लिए जो अपनी संतान की राह तकती है, यह दो सदियों जैसा है। मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहा, यह सच है। शरीर ने साथ नहीं दिया, यह भी हकीकत है। लेकिन जब मैं अपनी अंतरात्मा में गहराई से झाँकता हूँ, तो एक टीस उठती है—क्या मैंने वाकई कोशिश की? क्या मेरा प्रेम इतना कमज़ोर था कि वह स्वास्थ्य की बाधाओं को पार न कर सका?कोलकाता की इस नमी में मुझे जयपुर की वह सूखी हवा और माँ के आँचल की खुशबू याद आती है। मुझे लगता है कि मैं एक 'कृतघ्न संतान' की श्रेणी में खड़ा हूँ। वह माँ, जिसने मुझे तब गोद में उठाकर जीवन दिया जब मैं टूट चुका था, आज वह शायद खुद को अकेला पा रही होगी। मैं उनका ऋणी तो था ही, अब मैं खुद को अपराधी भी मानता हूँ। अपराधी—उस समय का जो बीत गया, उन शब्दों का जो मैंने उनसे नहीं कहे, और उस स्पर्श का जो उनसे दो साल से दूर है।
एक अधूरा संवाद!
पहले अक्सर फोन पर बात होती थी, तो वह पूछती थीं, "शिखर, तू ठीक तो है ना?" उनकी आवाज़ में वही पुरानी ममता होती है, कोई उलाहना नहीं, कोई शिकायत नहीं। उनकी यही निस्वार्थता मुझे और भी लज्जित करती है। काश वह मुझ पर चिल्लातीं, काश वह अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करतीं, तो शायद मेरा बोझ हल्का हो जाता। अब तो बात भी नहीं हो पाती क्योंकि मां फोन की घंटी या आवाज नहीं सुन पातीं।मैं यहाँ कोलकाता में अपनी सुख-सुविधाओं और बीमारियों के बीच घिरा हूँ, और वहाँ जयपुर के किसी कोने में वह पता नहीं ठीक हैं या नहीं।
यह संस्मरण मेरी माँ के लिए मेरा एक माफीनामा है। माँ, मैं जानता हूँ कि शब्दों से घाव नहीं भरते और न ही दूरी मिटती है। मैं आपका ऋणी हूँ और शायद सात जन्मों तक रहूँगा। मेरा स्वास्थ्य एक बहाना हो सकता है, लेकिन मेरा मन अब और बहाने नहीं बनाना चाहता।मैं अपराधी हूँ, पर मैं अपनी सज़ा का हकदार भी हूँ। और मेरी सज़ा यह है कि मैं जल्द से जल्द उन सारी दूरियों को मिटा दूँ जो मेरे और आपकी ममता के बीच आ गई हैं। मैं फिर से सात साल का वह बच्चा बनना चाहता हूँ, जिसका जबड़ा भले ही टूटा हो, लेकिन जिसका पूरा संसार आपकी गोद में सुरक्षित था।
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शिखरचंदजैन*

