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शनिवार, 20 अप्रैल 2013

जिम्मेदार हम भी हैं !

                   रोज रोज की घटनाएँ हमें क्या दिखा रही हैं? हमारी ही तस्वीर , जिसे हम खुद गढ़ रहे हैं . दोष अगर हम अपने बच्चों को  दें तो फिर हम से अधिक समझदार  और कोई हो ही नहीं सकता है . कभी कभी तो हम उसका दोष दूसरों भी मढ़ने से नहीं चूकते है .
                             मेरी एक मित्र खुद बहुत अच्छे पद पर हैं और पतिदेव भी . बड़ा बेटा वाकई योग्य निकला और वह इंजीनियरिंग के बाद आइ ए  एस  बन गया .  जरूरी तो नहीं कि  सारे बच्चे एक ही तरह के निकलें . छोटा बेटा अभी अभी बालिग़ होने वाला है लेकिन उसके हाथ में गाड़ी है और खर्च करने के लिए पैसे भी . दोस्तों की फौज होना तो बड़े घर के बच्चों की शान ही होती है.
                             एक रात शराब पीकर गाड़ी चलते हुए एक्सीडेंट कर दिया और तुरंत पकड़ में भी आ गए क्योंकि एक्सीडेंट थाने  के आस पास ही हुआ था . पुलिस ने उन्हें साथियों सहित  बंद कर दिया  वो रात में पहले पुलिस वालों को डराने का प्रयास करता रहा कि  मेरे पापा ये हैं और मेरा भाई ये है लेकिन शायद पुलिस वाले उस समय  विश्वास नहीं कर रहे होंगे और उन्होंने छोड़ा नहीं और समाचार अखबार में आ गया . जब मैंने पढ़ा तो मेरी समझ आ गया कि  ये बिगड़े हुए नवाब कौन है? लेकिन दूसरे ही दिन के बाद इस खबर का कोई आगे का  हाल नहीं मिला कि पुलिस ने केस फाइल किया भी या नहीं और फिर कोई समाचार नहीं मिला . मैंने तो उसके घर जाना उचित नहीं समझा  क्योंकि हो सकता है कि वे समझें कि लोग उनके उपहास के लिए पूछने आ रहे हैं .
                      इस बिगड़े हुए बेटे के कार्य कलापों में क्या माता - पिता की कोई भी भूमिका नहीं है ? है  और शत प्रतिशत वे इसके लिए जिम्मेदार है . माना आप बहुत अच्छे और सम्मानीय लोग है लेकिन इस घटना के बाद एक मैं क्या उनके जानने वाले करीब करीब सभी लोगों ने यही कहा होगा की बच्चों की परवरिश हम पूरी पूरी सुख और सुविधा अपनी हैसियत के अनुसार देते ही हैं लेकिन जब हम उनकी नाजायज मांगों को मान लेते हैं या फिर बच्चे को अपने स्टेटस के अनुसार रखने की सोच बना लेते हैं तो वह हमारे लिए ही भारी पड़ता है. हम व्यस्त है लेकिन कितना ? अपने बच्चे के लिये कुछ तो समय निकाल  ही सकते हैं . हम अपनी जीवन शैली में कुछ तो परिवर्तन कर सकते हैं, कितनी ही व्यस्तता हो फिर भी बच्चे की शिक्षा और उसके आचरण के प्रति आपको सजग रहना होगा . रोज न सही लेकिन कभी कभी तो आप उसके कॉलेज में जाकर उसके बारे में पता कर ही सकते है . अगर नहीं कर सकते हैं तो हम गैर जिम्मेदार अभिभावक कहे जाएंगे .
                       बच्चों को बाइक देना तो अब जरूरी समझा  जाने लगा है क्योंकि स्कूल उनके दूर दूर होते हैं और बाइक हाथ में आते ही उनके पीछे बैठने वाले दोस्तों की भी कमी नहीं रहती है.  वे सब किस आचरण के हैं उसका प्रभाव आपके बच्चे पर जरूर ही पड़ेगा . आप उसके मित्रों पर भी नजर रख सकते हैं . ऐसे मित्र कभी न कभी घर पर भी आते रहते हैं और आप अपने परिपक्व होने के साथ ऐसे लोगों को पहचानने की क्षमता रखते जरूर हैं . बच्चों के जेब खर्च को एक सीमा में रखिये . इतना भी न दीजिये कि वे दोस्तों के साथ होटलों या फिर रेस्टोरेंट में जाकर रोज पार्टियाँ करें , ड्रिंक पार्टी एक आम चलन हो चुक  है. जेब खर्च दीजिये लेकिन ऐसा नहीं कि  उसके दुरूपयोग से वे अपनी दिशा भटक जाएँ .
                       बच्चों में चाहे लड़कियाँ हों या फिर लडके घर वापस लौटने की भी एक सीमा निश्चित कीजिये कि  उन्हें इस समय तक घर आना ही होगा . पार्टियाँ बड़े घर के बच्चों की देर से शुरू होकर देर तक चलती हैं , ये आधुनिकता की निशानी आप मान सकते हैं लेकिन ये स्वस्थ मानसिकता की निशानी तो बिलकुल भी नहीं है.  ये नहीं कि  उनके लौटने की कोई समय सीमा ही न हो . कई बार माता - पिता अपने आराम को ध्यान में रखते हुए एक चाबी बेटे को भी दे देते हैं कि  अगर वे देर से लौटें तो उनकी नीद ख़राब न हो , लेकिन शायद वे ये भूल जाते हैं की सिर्फ कभी कभी नींद ख़राब होने को बचने के लिए आप जीवन भर के लिए अपने बच्चे को दिन का चैन और रात की नींद ख़राब करने की छूट दे रहे है .
                          उनका बच्चा रात दो बजे घर से बाहर  घूम रहा है और माता - पिता निश्चिन्त कैसे रह सकते हैं? मोबाइल तो हर बच्चे के पास होता है फिर कैसे उनकी स्वतन्त्रता पर अंकुश लगाने की बात एक समझदार माता पिता नहीं सोचते हैं . किशोरों का अमर्यादित आचरण सिर्फ इसी बात और छूट का परिणाम है की माता - पिता जरूरत से अधिक पैसे और ऐशो आराम के साधनों को बच्चों को सौंप देते है .
                          बच्चों के कमरे और उसमें सभी आधुनिक संसाधन होना  कोई  नई  बात नहीं है. फिर  कमरे में उन संसाधनों के दुरूपयोग को तो आप नहीं रोक सकते हैं . हर बच्चा इतना समझदार भी नहीं होता है कि  वह उसका उचित प्रयोग ही करे. सुविधाएँ प्रदान जरूर करें लेकिन उसके प्रयोग पर एक नजर भी रखना बहुत जरूरी होता है. जो संसाधन उन्हें प्रदान करें उसमें अपनी दखल भी बनायें ताकि उनके प्रयोग पर नजर रखी जा सके . ये कोई गलत काम करने की वजह से  नहीं  बल्कि हमारे बच्चे उस दौर से गुजर रहे  हैं जहाँ उनके भटक जाने की पूरी पूरी गुंजाइश होती है . उसे रोकने के लिए या दिशा भटकने से पहले ही हम उन्हें रोक सकते है .
     जिम्मेदार हम भी हैं !

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

हौसले को सलाम ! (12)

   

                           संघर्ष अगर किसी के सहारे के रहते किया जाय तो   तो साथ  है  अगर मंजिलें बहुत बहुत दूर हों और एक औरत के खाली हाथ हों या फिर हाथ बंधें हों तो फिर उसकी विवशता को और उसमें फंसकर छटपटाते  उसके जीवन को कैसे ईश्वर राह दिखता है और वह भी उस मुकाम तक  दे  उसने कभी कल्पना ही न की हो. एक  ऐसी ही महिला की कहानी जो मिली भी तो सिर्फ कुछ घंटों के  लेकिन दे गयीं ये सब .....

                              आज की प्रस्तुति मेरी ही है. ............!







     वह भी मेरी ही तरह से एयर पोर्ट पर किसी को रिसीव करने के लिए बाहर से आई थी  और फ्लाइट लेट थी .   उनका बेटा आ रहा था और मेरी बेटी।  वह छोटे कद की शालीन सी दिख रही थी।  समय तो  हमें गुजारना ही था, एक दूसरे के बारे में कुछ जानना भी इसका एक अच्छा विकल्प था।    अपनी आदत के अनुसार जब दो महिलायें बैठती हैं तो  एक दूसरे के  बारे में जानने के लिए उत्सुक होती है। 
आप कहाँ से हैं? 
 
किसे लेने आयीं है? 
कौन कौन है परिवार में ? आदि आदि।  
       हम  भी इसके अपवाद न थे. लेकिन इतने थोड़े से समय में सब कुछ बता  देने के लिए किसी को मोटिवेट करना मेरे काम से जुड़ा है ,  और उनके बारे में सब कुछ जान लिया।

                    वह  कमला एक बेटे और एक बेटी की माँ  - बेटा  वैज्ञानिक और बेटी इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफेसर। बेटा  विदेश से "युवा वैज्ञानिक एवार्ड" लेकर लौट  रहा था और उसकी इच्छा थी कि वह अपना एवार्ड माँ को दे और माँ उसको लेने के लिए आये। वह आई थी और उसका सिर गर्व से ऊँचा था। 
                     अपने  संघर्षों  की परछाईं उनकी नज़रों में नजर आ रही थी - जब वह हाई स्कूल कर चुकी तो गाँव के रिवाज के अनुसार उसकी शादी की बात शुरू हो गयी। वहाँ के रिवाज के अनुसार आस पास के रिश्तेदारों में वर खोजा जाता था और एक वर मिला वह इंजीनियर था। पहले कद देख कर उसने मना  कर दिया की इतनी छोटी लड़की से नहीं करेंगे , लेकिन बाद में हाँ कर दी और फिर शादी हो गयी।  वह गाँव छोड़ कर शहर आ गयी , पति के पद के अनुसार उसे हर सुख -सुविधा मिली। वह जल्दी ही एक बेटे और बेटी की माँ  बन गयी।  उसके पति सिविल इंजीनियर थे और अपने पद के अनुसार उनकी ऊपरी आय भी अधिक ही थी और सोसायटी के अनुरूप पार्टी होते रहना आम बात थी और फिर पार्टी में तो ड्रिंक भी करने लगे।  काम में इतने व्यस्त रहते थे कि अपने स्वास्थ्य की ओर कभी ध्यान नहीं दिया  और उनको जल्दी ही डायबिटीज भी हो गयी लेकिन इस बारे में न उन्हें  और न ही मुझे कुछ भी पता न था। सब कुछ वैसे ही चलता रहा और तब पता चला जब कि उनकी दोनों किडनी बेकार हो चुकी थीं। 
         सिर्फ सत्ताईस साल की उम्र में जब बेटा ५ और बेटी ३ साल की थी मेरी दुनियाँ उजड़ गयी।
                   गाँव से जेठ सारा सामान भर कर गाँव ले जाने के लिए आ गए।  पति के ऑफिस में लिख कर दे दिया कि  मेरी बहू नौकरी नहीं करेगी और सब कुछ  लेकर गाँव आ गए। बिना पढ़े लिखे खेती वाले घर में - एक विधवा का जीवन  कैसा होता है? ये हर कोई नहीं जानता।  मेरे घर का सारे सुख- सुविधा का सामान जेठ के कमरे  में लग गया और मुझे मिली एक कोठरी  जिसमें जमीन  पर एक दरी पड़ी होती और उस पर अपने दोनों बच्चों के साथ सोती। सुबह से घर के काम मेरे जिम्मे सबके  खाने के बाद जो भी बचता चाहे सिर्फ रोटी या फिर सिर्फ दाल, पेट भरे या नहीं खा कर रह जाती। बेटा जानवरों के साथ खेतों में घूमता और बेटी मिट्टी में  खेलती रहती और जब थक जाती तो आकर मेरे पास सो जाती।  वे बच्चे जो कभी गाड़ी के अलावा चले नहीं थे, रात में  जमीन पर एक दरी पर मेरे पास सोने आ जाते।  रात में मैं बिस्तर पर पड़ी रोती कि क्या जिन्दगी इतनी विरोधाभासी भी हो सकती है? आगे और पीछे अँधेरे के अलावा कुछ भी नजर नहीं आता था। 
                        एक दिन जेठ जी ने बेटे को कुछ माँगने पर पीटा और कहा वैसे ही रह जैसे बिना बाप के बच्चे रहते हैं, तेरा बाप कमा कर नहीं दे रहा है जो तेरी फरमाइश पूरी करूँ। ये शब्द मेरे कानों में गर्म शीशे की तरह से घुल ही तो गए लेकिन मुझे जलालत के सिवा कुछ भी हाथ नहीं आया। पेंशन मेरी अभी बन कर नहीं आ रही थी, तो मेरे पास जो भी था उसको सँभाल कर रखे थी कि अगर इन लोगों को पता चल गया तो वे वह भी मुझसे ले लेंगे। 
 
           उसी समय मेरी बड़ी ननद गाँव आई और मेरे बच्चों और मेरी दुर्दशा होती देखी, वे  बड़ी थी और उन्होंने अपने पति, जो कि मेरे पति के मित्र भी थे। उन्होंने हम तीनों को मेरे मायके भेजने का प्रस्ताव अपने भाई के सामने रखा लेकिन जेठ जी इसके लिए राजी नहीं थे। उनको एक काम करने वाली मिली थी। लेकिन नन्दोई जी के कहने पर वह एक महीने के लिए भेजने को तैयार हो गए लेकिन उससे पहले उन्होंने मुझसे कुछ कागजों पर दस्तखत करवा लिए , इसमें उनकी मंशा क्या थी ? ये न मुझे पता थी और न ही मेरी ननद को लेकिन नन्दोई जी इसके बारे में अनुमान लगा चुके थे कि वह हमारी जायदाद अपने नाम लिख कर हमें उससे वंचित कर सकते हैं। मायके पहुँच कर मैंने खुली हवा  में साँस ली लेकिन एक माँ  के लिए उसकी सबसे छोटी बेटी और वह भी विधवा हो तो  दिल पर क्या गुजरी  है ये उसके अलावा कोई और नहीं जान सकता। मैं तो कुछ दिन आराम से रही लेकिन मेरी ननद ने कुछ और ही सोच रखा था।
                          मेरी बड़ी ननद ने अपने बड़े भाई से बैर मोल लिया और पति के ऑफिस में  मेरी नौकरी के लिए बात की लेकिन मैं सिर्फ हाई स्कूल पास थी और मुझे क्लर्क की नौकरी के लिए भी टाइपिंग आनी चाहिए थी।  जो मुझे नहीं आती थी , एक इंजीनियर की पति चपरासी जैसे पद पर काम करे न ही मुझे उचित  लग रहा था और न ही ऑफिस वालों को।  मुझे एक महीने  का समय  दिया गया और मैं ऑफिस से आकर टाइपिंग सीखने  जाने लगी।  मेरी ननद मेरे साथ रही बच्चों को देखने के लिए लेकिन अपना घर छोड़ कर कौन कितने दिन रह सकता था और फिर वह भी चली गयी।  
           कुछ दिन में टाइपिंग सीखने के दौरान मेरी दोस्ती एक लड़की से हुई , उसके भाई उसको छूटने के बाद लेने आते थे, मैं बच्चों को साथ लाती थी और वे  उतनी देर बाहर के चबूतरे पर खेलते रहते थे।  एक दिन सोनिया के भाई उसको लेने आये तो उन्होंने बच्चों को खेलते देखा तो पूछ बैठे - "बच्चों आप यहाँ क्या कर रहे हैं ?" बच्चे तो बच्चे बता दिया कि मेरी मम्मी यहाँ पढ़ने आती हैं तो तब तक हम बाहर खेलते हैं , घर में कोई नहीं है न।
 
                   फिर एक दिन और वह मुझे अपने घर ले गयी।  उसके घर में उसके तीन भाई और भाभी थे सबने मुझे उसकी ही तरह से घर में जगह दी।  मेरे पति का सारा पैसा  मुझे दिलवाया और मेरे लिए अपने घर के करीब ही एक फ्लैट खरीदवा दिया। मैं ऑफिस जाती और बच्चे मेरे पीछे उनके घर में  रहते मुझे नहीं पता कि  मेरे बच्चे समय के साथ इतने समझदार और गंभीर कैसे हो गये ? बेटा खुद पढ़ने  बैठता और बहन को भी लेकर बैठता।  खुद ट्यूशन  लेकर अपनी पढाई के लिए सारा सामान खुद जुटा लेता मुझसे कुछ नहीं कहता था। 
                मेरे देवर  और  जेठ ने कभी ये जानने की कोशिश नहीं की कि  मैं कहाँ हूँ ? जिन्दा भी हूँ या मर गयी।  मेरे बच्चों का क्या हुआ ? मेरे हिस्से  की सारी  खेती दबा ली।  मेरी आमदनी अधिक नहीं थी किसी तरह से बच्चों को पाल ही रही थी। बेटे ने स्कालरशिप लेकर अपनी ही नहीं बल्कि अपनी बहन को भी पढाई के लिए प्रेरित किया। फिर उसको अंटार्टिका जाने का अवसर मिला लेकिन हम इतने समर्थ नहीं थे कि वहां पर रहने के लिए जो किट चाहिए थी वह खरीद सकते। उस दिन मैंने अपने बेटे को बहुत मायूस देखा वह मेरे साथ आकर लेट गया और भरे गले से पहली बार बोला - "आई अगर बाबा होते तो मैं अंटार्टिका जा पाता न।" मैं निरुत्तर थी लेकिन मैंने उसके सिर पर हाथ रखते हुए पूछा कि कितने पैसे लगेंगे और उसने जो रकम बताई वो मेरे पास हो ही नहीं सकती थी।बस एक चीज थी कि हमारे यहाँ सोने का महत्व बहुत था और मेरे पास भी काफी जेवर थे और फिर मैंने बगैर किसी की परवाह किये और बगैर बताये अपना मंगलसूत्र जो कि  बहुत कीमती था बेच दिया क्योंकि वह मेरे किसी काम का नहीं था लेकिन वो मेरे पति की निशानी थी और उसको बेचने में मेरा कलेजा मुंह को आ गया था लेकिन दिल कड़ा करके मैंने बेच दिया और उसको पैसे दिए कि जाकर अपनी किट खरीद ले। 
                     उसने मुझसे बहुत सवाल किये कि आप पैसे कहाँ से लाईं ? मैंने कह दिया कि अपनी कलीग से उधार ले लिया है धीरे धीरे अदा कर दूँगी। उसकी ख़ुशी ने मुझे इतना आत्मसंतोष दिया था कि वह मेरे लिए अनमोल था। वहां से आकर उसको पी एचडी के लिए स्कॉलरशिप मिल गई और वहां मेरे पास से दिल्ली चला गया। उसने अपनी बहन को एम टेक करवाया और उसकी शादी में भी पूरी जिम्मेदारी उठाई। 
                     उसके सपने कैसे पंख  लगा कर ऊँचाइयों पर जा पहुँचे मुझे पता नहीं लगा. उसने पढाई लगातार बिना रुके पूरी  की जो मैं न जुटा सकी वह उसने खुद  जुटाया और अपने वैज्ञानिक  के सपने को पूरा ही नहीं किया बल्कि इस एवार्ड को लाकर मेरे संघर्ष को एक मुकाम दे दिया।

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

हौसले को सलाम (११ ) !

                         भाग्य और कर्म दोनों का चोली दमन का साथ है. हाँ ये हो सकता है की भाग्य साथ न दे तो अथक परिश्रम के बाद भी उपलब्धि नगण्य हो लेकिन कर्म कभी भी विफल नहीं होता है . हौसला भी बना रहता है और मार्ग भी आसन हो जाता है. उसके बाद उसका आकलन अगर सही ढंग  से किया गया तो सब कुछ सार्थक लगता है. 

                          आज की प्रस्तुति है विभा श्रीवास्तव जी की . 



नर से बढ़ कर नारी .... 
लिखा हमनें पढ़ा ....
सोचा हमनें  समझा नहीं ....
माना हमनें अपनाया नहीं ....
लेकिन मैं एक उद्दाहरण लाई हूँ ....
सन 1995 ....
मेरे ससुर जी रिटायर्ड होनें पर मुजफ्फरपुर(बिहार) में बना-बनाया घर खरीद लिए जो हमलोगों का स्थाई निवास-स्थान बना ..... उस घर के पड़ोस में ही एक परिवार रहता था .... उस परिवार में पति-पत्नी और दो प्यारी सी छोटी-छोटी बच्चियां .... छोटी वाली कुछ महीनों की थी लेकिन बहुत ही प्यारी थी .... उसी उम्र का मेरी देवरानी का बेटा भी था जो बाहर भोपाल में अपने माता -पिता के साथ रहता था .... पोते के नहीं रहने के कारण मेरी सास उस बच्ची के पास ज्यादा जाती .... और धीरे-धीरे ,उस परिवार से हम सब घनिष्ट होते गए .... उस परिवार के लिए बड़ी भाभी और बच्चियों के लिए बड़ी अम्मा बनी मैं ..... मुझे एक और देवरानी मिली नीतू अस्थाना और देवर विवेक अस्थाना .....
विवेक एक लड़कियों के महाविद्द्यालय में सहायक के तौर पर कार्य करते थे .... आमदनी का एक ही जरिया होने के कारण पैसे की कमी नीतू को बहुत ही परेशान करता था .........
 वो अक्सर बात किया करती :- दीदी मुझे कुछ करना होगा ,क्यूँ कि मैं अपनी बच्चियों को लाड-प्यार से पालना चाहती हूँ .... बहुत पढ़ाना चाहती हूँ .... इतने पैसे से ठीक से भोजन ही नहीं हो पाता .... शिक्षा कैसे होगा .... ??
कुछ सालों के बाद जब छोटी वाली भी स्कूल जाने लगी तो नीतू कुछ करने के लिए सोच ही रही थी , राह मिल गया ..... जिस महाविद्द्यालय में विवेक काम करते थे वहीँ नीतू को एक दूकान मिल गया ...दूकान बहुत ही छोटा था लेकिन नीतू के सपने और उस सपने को पूरा करने के हौसले बहुत ही बड़े थे .... नीतू उस दुकान में लड़कियों के जरुरत के सामान रखती थी .... उस महाविद्द्यालय में होस्टल भी था और दूर गाँव से आने वाली लड़कियों की संख्या भी अधिक थी .... लडकियों को बाहर बाज़ार जाने की इजाज़त भी नहीं थी ..... इसलिए नीतू के दूकान अच्छे चलने लगे ..... नीतू मेहनत भी बहुत करती .... सुबह उठ कर घर का सारा काम करती और लड़कियों को स्कूल भेजती .... फिर विवेक के साथ ही दुकान जाती .... बच्चियों के स्कूल से आने के समय घर आती ,उन्हें खाना खिला फिर दुकान जाती .... शाम में दूकान बंद करने के बाद बाज़ार जाती .... लड़कियों की जो मांग होती उसे खरीदती और साथ में घर के भी सामान लाती ..... फिर घर का रात का काम करती ....
उसके मेहनत रंग ला रहे थे लेकिन नीतू पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पा रही थी .... पैसे आ रहे थे ,तो खर्चे भी बढ़ रहे थे .... कुछ समय के बाद दूकान में ही वो लड़कियों के कपड़े मौसम के अनुकूल रखने लगी .... जो लडकियाँ उसके दुकान से कपड़ें लेती नीतू को ही सिलाने के लिए दे देतीं .... कुछ आमदनी का जरिया और हो गया .......... लेकिन नीतू अभी भी संतुष्ट नहीं थी .... वो थक रही थी लेकिन हौसले के पंख तो अभी भी थे ......... 
आज से 3-4  साल पहले अपने घर में ही लड़कियों का होस्टल खोल ली ..... घर में लड़कियां रखी .... खाने की भी व्यवस्था की .... फिर और कमरे बनवाती गई .... लड़कियों की संख्या बढाती गई ..... अपनी दोनों बेटियों को बाहर रख कर शिक्षा दिलवा रही है ....... 
पिछले दिन(18/3/2013) जब मैं पापा जी का श्राद्ध-कर्म के भोज में उसे आमंत्रित की तो वो अपनी चालीस लड़कियों के साथ एक कुशल सेनापति की तरह आई ........ सच बताऊँ .... उससे ज्यादा मैं उस दिन खुश हुई उन लड़कियों को देख कर .... उन्हें भोजन कराने मैं ज्यादा आनन्दित हुई ......... उन सब को एक बात मैं भी बोली खुद को बदलो समाज बदलना है ....
सच बताईये विवेक से बढ़ कर नीतू हुई कि नहीं ..... ??
उसने  साबित किया या नहीं .... ??

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

हौसले के सलाम ! (१०)

                    कुछ ऐसे ही लोग जिन्हें हम देखते हैं और देख कर खुद हैरान हो जाते हैं लेकिन ये भी सच है की अगर हम खुद हौसला नहीं खोते तो वह ईश्वर भी हमारा हाथ थामे रहता है और हमें उतनी शक्ति देता है और रास्ते भी देता रहता है. 

                      आज की प्रस्तुति है सरस दरबारी जी की .
 
                   

                रेखाजी का मैसेज  आया  कि  अपनी लेखनी द्वारा महिला दिवस के  उपलक्ष्य में  स्त्रियों के संघर्ष और हौसले को  मान दिया जाय , जिन्होंने मुश्किलों को धता बता कर - अपने लिए समाज में एक गरिमा स्थापित की एक उदाहरण  --बनकर .

                 आँखों के सामने एक एककर चेहरे उभरते  ... नाम याद आते गए . सबकी एक ही -  ' प्रताड़ना' .....कभी  पति द्वारा, कभी  ससुराल में,कभी समाज में , बस अलग थी तो परिस्थितियां , परिवेश , शहर और नाम .
      तभी एक नाम जेहन में उभरा -- , सुनीति  का जो उम्र में मुझसे काफी छोटी ,  एक अन्तरंग सहेली , घर भर की चहेती --हाथों हाथ पली उसका हर शौक पूरा किया जाता -- यहाँ तक कि  जब उसने अपने विवाह पर हर साड़ी  के साथ मैचिंग चप्पल और उसी से मेल खाते हैंडबैग आर्डर किए तो रिश्तेदारों को अतिश्योक्ति लगी .  सुनीति  के माता -पिता ने दिल खोल कर उसकी हर  ख्वाहिश पूरी की .
            जितना प्यार दुलार उसे मायके में मिला , उससे कहीं ज्यादा दुलार ससुराल में मिला . विशाल उसे बहुत चाहते थे ,  जितनी देर घर पर रहते उसको आँखों  से  ओझल न होने देते ,  सास-श्वसुर, नन्द और विशाल , इस छोटे से चार सदस्यों के परिवार में वह एक मुट्ठी सी बंध गयी.
                    विशाल जब फैक्ट्री चले जाते तो वह बहुत ऊबती .श्वसुर को जैसे ही इस बात का अहसास हुआ, उन्होंने  उसके लिए एक प्राइमरी स्कूल खुलवा दिया .....
                      अब उसका समय बड़े आराम से कटता, गुणी  तो थी है .....स्कूल भी बढ़कर सेकेंडरी स्कूल बन गया .... इसी बीच दो प्यारे प्यारे बच्चे हुए ....बहुत होनहार ... और दुनियां का हर सुख उस घर में पनाह लेने पहुँच गया . पंद्रह साल यूं ही हंसी ख़ुशी में बीत गये. 
               शायद ईश्वर भी डर गया की कहीं यह लोग इतना सुख पाकर मुझे भूल जायें . और एक दिन विशाल की  फैक्ट्री में बायलर फट गया . त्राहि त्राहि मच गयी और जब तक सब समझ पाते विशाल के सीने में इतना धुआं भर गया कि  सांस के लिए जगह ही न बची ...... वह छोड़ कर चली गयी और उसके साथ ही चली गयीं उस घर की खुशियाँ .....
         सुनीति पत्थर हो गयी ...न बोलती , न रोती  , सबने रुलाने की बहुत कोशिश की , लेकिन सुनीति  सिर्फ सूनी आँखों से सबको देखती रही , लेकिन सुनीति सिर्फ रीती आँखों से सबको देखती रही. जब दर्द असहनीय हो जाता तो एक लम्बा सा नि:श्वास लेती और फिर वैसी ही. मुझे जब खबर मिली तो एक ही बात मूंहसे निकली, " ईश्वर इतना निष्ठुर तो नहीं हो सकता".
                उससे मिली तो मैं बिलख बिलख कर रो पड़ी   और वह मेरी पीठ पर हाथ फेर कर सांत्वना देती रही . 
         मैने  रोते रोते उससे पूछा , "कहाँ से लायी इतनी हिम्मत सुनीति ?" 
                  उसकी आँखों की कोर पर एक नमी ठहरी देखी  बस. मैं चली आई ....धीरे धीरे रिश्तेदार भी चले गए . अब केवल सुनीति  और उसके बच्चे . हल्द्वानी में विशाल और सुनीति  ने एक बहुत ही  सुन्दर बंगला   बनवाया था ... उसे बहुत ही चाव से सजाया था. उस हादसे के बाद जब वह उसी घर में बच्चों के साथ लौटी तो उसका यह संसार यादों की एक क़ब्रगाह बन गया था. हर तरफ विशाल की वही मुस्कराहट .. मानो  एक घिनौना मजाक कर रहे हों .... और अभी ठहाका लगाकर किसी कमरे निकल आयेंगे ......
                  अब, उसके दोनों बच्चे और वह स्कूल जिसे वह चलाती थी, बस यही उसकी दुनिया थे.
                    उस हादसे के बाद वह उठ खड़ी  हुई , उसे बच्चों  के लिए जीना था .  जब  वह बहुत  टूट जाती तो बारी बारी  वह और उसकी बेटियां  एक दूसरे को सहारा देती ... .. माँ बनकर . बस  समय फिर मरहम बना ... घाव तो भरे नहीं ... ;पर उसने उन्हें के साथ जीना सीख लिया . 
  आज उसके बच्चे अव्वल नम्बरों से पास हो ऊँची सिक्षा के लिए बाहर चले गए. और उसका स्कूल शहर के सम्मानित और गरिमा प्राप्त संस्थाओं में से एक है .उसे सरकार की तरफ से कई सम्मान, मैडल और प्रशस्ति पत्र मिले, अपने योगदान के लिए .
                    आज वह सबका गौरव है ...   . अपने माता -पिता का ... अपनी ससुराल और अपने शहर का .

बुधवार, 27 मार्च 2013

हौसले को सलाम (९ ) !


  क्या हमारे लिए अपना संघर्ष ही हमेशा बड़ा  लगता है लेकिन अगर हमने अपने संवेदनशील ह्रदय से  आस पास के चरित्रों को ध्यान से  देखें तो  पता चलता है कि  हम अपनी जिन्दगी में  खुद को एक मनचाही जिन्दगी जीने के लिए संघर्ष करे या फिर कुछ लोगों को रोटियों और जीवन को चलाने  के लिए किया जाने वाला संघर्ष बराबर अर्थ रखता  है. 

                    आज की  प्रस्तुति है डॉक्टर रागिनी मिश्रा की .


रागिनी मिश्रा 



'सरिता'.....
मेरे लिए ये नाम सिर्फ मेरे घर में काम करनेवाली बाई का न होकर एक आदर्श का हो गया है, मेरे लिए इसका अर्थ लगातार बहने वाली नदी ना होकर एक मजबूत चट्टान का हो गया है, क्योंकि  जीवन से हर प्रकार का सुख, सम्पन्नता और संबल छूट जाने के बाद भी वह जिस दृढ इरादों के साथ अपने जीवन को संवार रही है, वह सच में एक मिसाल है हम स्त्रियों के लिये।
                        शराबी पति द्वारा एकड़ो जमीन,घर-बार  सब कुछ बर्बाद कर दिए जाने के बाद भी उसने अपने घर-परिवार या किसी के भी सामने हाँथ नहीं फैलाए बल्कि बीमार शराबी पति को लेकर शहर आकर इलाज़ कराने  लगी। मायके से भी मदद ना मिलने पर उसने हार ना मानी। अनपढ़ थी इसलिए दूसरे के घरों में साफ़- सफाई और मालिश इत्यादि का काम करने लगी . सारा दिन हाड़तोड़ मेहनत  उसने अपने पति का इलाज़ कराया। बच्चों का सरकारी स्कूल में नाम लिखाया। अनपढ़ होने के बावजूद उसे इस बात का भान था कि  अगर उसने पढाई-लिखाई  की होती तो उसकी आज यह दुर्दशा ना होती . इसलिए वह अपनी लड़कियों को पढ़ाना चाहती थी। आज उसका पति भगवान् को प्यारा हो चुका है। उसने अपनी दोनों बेटियों का विवाह एक खाते-पीते घर में किया है। दोनों बेटियां खुश हैं। वह आज भी उतनी ही मेहनत करती है कि उसने जो भी कर्ज अपनी बेटियों के विवाह में लिया था , उसे चुका सके. मेहनती, शरीफ और सच्चाई की प्रतिमूर्ति ' सरिता' मेरे लिए हमेशा ही एक आदर्श रहेगी।

.........................................................डॉ  रागिनी मिश्र ....................................

सोमवार, 25 मार्च 2013

कलम का क्रांतिकारी : गणेश शंकर विद्यार्थी !

                           
 
 कलम का  क्रांतिकारी : गणेश शंकर विद्यार्थी !
 
                                           गणेश शंकर विद्यार्थी एक मूक शहीद कहे जाते हैं, जो कि कलम से क्रांति के अग्रदूत बने। आपका जन्म इलाहाबाद के अतरसुइया नामक मोहल्ले 26 अक्टूबर 1890 में हुआ था। आपके पिता जयनारायण श्रीवास्तव और माँ गोमती देवी थी। 1905 ई. में भेलसा से अंग्रेजी से एंट्रेंस परीक्षा पास करके आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला कालेज में भर्ती के समय से ही उनका रुझान  पत्रकारिता की ओर हुआ और उस समय के लेखक सुन्दर लाल कायस्थ इलाहाबाद के साथ उनके हिंदी साप्ताहिक कर्मयोगी के संपादन में सहयोग करने लगे। लगभग एक वर्ष कालेज में पढ़ने के बाद 1908 ई. में कानपुर के करेंसी आफिस में 30 रु. मासिक की नौकरी की। परंतु अंग्रेज अफसर से झगड़ा हो जाने के कारण उसे छोड़कर पंडित पृथ्वीनाथ हाई स्कूल, कानपुर  में 1910  तक शिक्षण कार्य  किया। इसी के दौरान सरस्वती, कर्मयोगी, स्वराज्य (उर्दू) तथा हितवार्ता (कलकत्ता) में समय समय पर लेख लिखने लगे। उन्होंने अपनी पहली किताब 'हमारी आत्मोत्सर्गता' अपनी सोलह वर्ष की उम्र में लिखी थी। 
                         कानपुर शहर को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले क्रान्तिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी  ने अखबार "प्रताप" से अंग्रेजों के साथ अपनी बगावत को एक अलग दिशा दी। जिसने कलम को ही अपनी बन्दूक और बम बना कर उस शासन की चूलें ही नहीं हिलायीं बल्कि उसके दम पर ही  देश को एक  नए जोश और देशभक्ति से भरने का काम किया। वे पत्रकारिता में रूचि रखते थे, अन्याय और अत्याचार के खिलाफ उमड़ते विचारों ने उन्हें कलम का सिपाही बना दिया। उन्होंने हिंदी और उर्दू - दोनों के प्रतिनिधि पत्रों 'कर्मयोगी और स्वराज्य' के लिए कार्य करना आरम्भ किया।                
             उस समय 'महावीर प्रसाद द्विवेदी', जो हिंदी साहित्य के स्तम्भ थे, ने उन्हें अपने पत्र 'सरस्वती' में उपसंपादन के लिए प्रस्ताव रखा और उन्होंने 1911-13 तक ये पद संभाला। वे साहित्य और राजनीति दोनों के प्रति समर्पित थे, अतः उन्होंने सरस्वती के साथ-साथ 'अभ्युदय' पत्र भी अपना लिया जो कि राजनैतिक गतिविधियों से जुड़ा था।
                      1911  में उन्होंने कानपुर वापस आकर 'प्रताप ' नामक अखबार का संपादन आरम्भ किया।  यहाँ उनका परिचय एक क्रांतिकारी पत्रकार के रूप में उदित हुआ। 'प्रताप' क्रांतिकारी पत्र के रूप में जाना जाता था। पत्रकारिता के माध्यम से अंग्रेजों की खिलाफत का खामियाजा उन्होंने भी भुगता। कानपुर कपड़ा मिल मजदूरों के साथ हड़ताल में उनके साथ रहे।  1920  में 'प्रताप ' का दैनिक संस्करण उन्होंने उतारा। प्रताप के प्रथम अंक  की सम्पादकीय में लिखा था कि  प्रताप सदैव सत्य के  समर्पित रहेगा और उन्होंने अपने उस  को पूरी  से निभाया। वे सदैव सत्य के मार्ग पर चलते रहे।

                    इतना नहीं बल्कि उन्होंने अपने प्रताप के माध्यम से और भी  ऐसे काम किये जो उल्लेखनीय  हैं। उन्होंने देश में 1859 में शुरू हुई कुली प्रथा को अपने पत्र के माध्यम से ही ख़त्म करने का प्रयास किया और सफल  रहे।  देश में जमींदारी प्रथा , देशी राज्यों का विलय , देश की जनता को एक साथ मिलकर लड़ने का सन्देश भी उन्हीं का दिया हुआ था। 
                जब अंग्रेजों द्वारा भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दिए जाने की देश भर में तीखी प्रतिक्रिया हुई, तब घबराकर अंग्रेजों ने देश में सांप्रदायिक दंगे भड़का दिए।  सन1931 में पूरे कानपुर में दंगे हो रहे थे, भाई भाई खून से होली खेल रहे थे और सैकड़ो निर्दोषों की जान चली गई। तब गणेश शंकर विद्यार्थी कानपुर में लोकप्रिय अखबार प्रताप के संपादक थे और उन्होंने पूरे दिन दंगाग्रस्त इलाकों में घूमकर निर्दोषों की जान बचाई थी। इतना ही नहीं कानपुर के जिस इलाके में उन्हें लोगों को फँसे होने की खबर मिलती वे तुरंत अपना काम छोड़कर वहाँ पहुँच जाते है, उन्होंने उस समय पत्रकारिता की नहीं बल्कि मानवता की जरूरत थी और गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता से ज्यादा मानवता को महत्व देते थे। कानपुर दंगे के दौरान जब उन्होंने बंगाली मोहाल में फँसे 200 मुसलमानों को निकाल कर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया, तब एक बुजुर्ग मुसलमान ने उनका हाथ चूम कर - 'तू फरिश्ता है' कह पुकारा। 
          गणेश शंकर विद्यार्थी अपनी पूरी जिंदगी में पांच बार जेल गए थे।  भारतीय इतिहास के एक सजग पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और सक्रिय कार्यकर्ता भी थे, जब कानपुर के दंगों के दौरान उन्होंने सैकड़ो लोगों की जान बचाई और वहाँ से फँसे लोगों को लॉरी में बिठा रहे थे तभी वहाँ भीड़ उमड़ी और किसी ने एक भाला विद्यार्थी जी के शरीर में घुसा दिया, लेकिन इससे पहले वे कुछ कर पाते उनके सिर पर लाठियाँ बरसने लगी और वे 25 मार्च 1931 को वे शांति के दूत अपनी मानवता के चलते शहीद हो चुके थे। कानपुर में लाशों के ढेर में उनकी लाश मिली थी. तब तक उनकी लाश इतनी फूल गई थी कि लोग पहचान नहीं पा रहे थे। दंगों के रोकते रोकते ही उनकी मौत हुई और उन्होंने 29 मार्च को अंतिम विदाई दी गई।
               उनकी शहादत को सभी भारतियों की भावपूर्ण श्रद्धांजलि !
                   

रविवार, 24 मार्च 2013

हौसले को सलाम (8)

                       जिन्दगी जितने लोगों की  हैं उसके  उतने ही रंग देखने को मिलते हैं  यह बात  नारी में ही देखने को मिलाती है की वह कितने धैर्य से अपने गिरे  संघर्ष के दिनों को हौसले से काट कर निकल आती है और तभी तो उसके हौसले को सलाम  करने का मन होता है. जब हम औरों के संघर्ष  हैं तो लगता है की अगर हमने अपने जीवन में संघर्ष किया है तो उसके आगे  बौना सा लगता है या  बड़ा भी हो तो हौसला हमें भी मिलता है. 
आज की इस व्यक्तित्व की  प्रस्तुति दे रही हैं नीलिमा शर्मा जी . 



नीलिमा शर्मा 

नीरू दी !! हाँ यही तो नाम था उनका ... मेरी बहन की सहेली नीरा ... प्यारी सी सूरत ....... शायद कवियों की सारी उपमाये उनको ही समर्पित होती थी .... तीन भाइयो की छोटी बहन ... जुड़वाँ बहन मीरा के साथ पैदा हुए थी परन्तु ईश्वर ने इनको ही उम्र का वरदान दिया था ... सातवे दशक में जब लडकिया कम ही को - एड कालेज में पढ़ती थी उस वक़्त में नीरू दी जब कालेज जाती थी तो कई दिल आहे भरते थे सुन्दरता और सहजता - सरलता का ऐसा अनोखा संगम कम ही देखने को मिलता था उस वक़्त मैं  यही कोई पांचवी छठी में पढ़ती थी . मेरी दी और नीरू दी अक्सर गप्पे लड़ाती थी और मुझसे चाय बनवाई जाती थी बदले में मुझे उन दोनों की चप्पल पहने को मिलती थी या कोई भी नई माला . या टॉप्स .उस उम्र में ख्वाहिशे भी कितनी होती हैं ,बड़ी बहनों के सामान पर अधिकार ज़माना बहुत अच्छा लगता था कभी लगता ही नही था कि वो बहन की सहेली हैं ...छोटी बहन की तरह उनसे जमकर लडाई झगड़ा करना आदतों में शुमार था .... अभी बीए फाइनल में ही आई थी मेरी सबसे बड़ी बहन के पति अपने दोस्त का रिश्ता नीरू दी के लिय ले आये लड़का बैंक में ऑफिसर , दो भाई एक बहन की फॅमिली , चंडीगढ़ जैसा शहर .. बस नीरू दी की बीजी को सब कुछ पसंद आ गया और तीन महीनो में दी की शादी भी हो गयी दीपक जीजू बहुत ही अच्छे ..लगे मुझे कम ही बात करती थी मैं उनसे लेकिन सब से जितना सुना अच्छा  ही लगता था . दी शादी के बाद और भी प्यारी लगने लगी बीच - बीच में बडी दी आकर बताती कि नीरू दी की सास से नही बन रही .... दादी उनको ज्यादा प्यार करती हैं या उनकी ननद उनको परेशान करती हैं
लाड़ - प्यार से पली दी अब सिर्फ घरेलू महिला बनकर रह गयी सास उस ज़माने में भी ताश पार्टिया - किटी पार्टिया करती थी .... आधुनिकता में भी भी रूढ़िवादिता कि बहु सारा घर सम्हाले .. छोटी छोटी बाते जब बढ़कर कलह का रूप लेने लगी तो जीजू के डैडी ने जीजू से कही बाहर तबादला करने को कह दिया और जीजू का ट्रांसफर अहमदाबाद हो गया तब तक दी दो-दो बेटो की माँ बन चुकी थी
बैंक में कiम का प्रेशर बढ़ रहा था ,परन्तु उस हिसाब से पैसा नही मिलता था . गुजराती लोगो के बीच जीजू को भी ज्यादा पैसे कमाने की ललक उठी और चिट  फंड का काम शुरू कर दिया बैंक की नौकरी छोड़ कर . इधर दी ने भी गुजराती लोगो के शहर में अपना पंजाबी सुट्स बनाने का बुटीक खोल लिया ... दी की मीठे बोली और उनका अप्रितम सौन्दय आस पास की महिलाओ को अपनी और खीचने लगा धीरे धीरे दी का काम चल निकला बच्चे भी स्कूल में जाने लगे दी ने जीजू से कहा के आप अपने काम  पर ध्यान दे घर मैं चला लूंगी . तीन साल बीत गये , दी का बुटीक अच्छे से चलने लगा था इधर पैसे कमाने के चक्कर में न जाने जीजू कहा चूक  गये बाकी  हिस्से दार उनको धोखा देकर सारा पैसा हड़प गये और जीजू को सब लोगो ने घेर लिया कि हमारा पैसा वापिस दो .घर के बाहर नारे लगने लगे पुलिस में कंप्लेंन की गयी और दी से बात करने का भी मौका नही मिला और जीजू सलाखों के पीछे डाल दिए गये .... दो बच्चे . जहाँ कोई अपना नही . सब ताने मारने वाले के इसका पति सारा पैसा खा गया बड़ी पैसे वाली बनती थी .ऐसे वक़्त में ससुराल वाले भी और मायके वाले भी महज तमाशबीन बनकर खड़े हो गये थे . दी ने अपना सारा गोल्ड बेच दिया सब कुछ बेचकर लोगो को उनका पैसा वापिस किया और जीजू के साथ जा खड़ी हुए जीजू को आजीवन कारावास सुनाया गया 14 साल की सजा सुनकर भी दी नही टूटी और बच्चो को हौसला दिया और दूर दिल्ली पढने भेज दिया बिना किसी रिश्तेदार का सहारा लिए  . बच्चे भी समझदार थे माँ का दर्द जानते थे . पढ़ लिखकर बहुत ही उच्चे पद पर आसीन हैं .... दोनों बच्चे आज गुडगाँव  में रहते हैं .... दी ने जीजू के बिना ही बड़े बेटे की शादी की ... उनकी बहु एक प्राइवेट बैंक की चीफ मेनेजर हैं ... दी का काम आज भी बहुत अच्छे से चल रहे हैं .... जिस अनजान शहर ने उनको गालियाँ दी थी आज उनकी मेहनत की तारीफ करते नही थकता हैं जीजू अब जेल से आने वाले है अगले साल तो दी अब बच्चो के पास दिल्ली शिफ्ट करना चाहती हैं परन्तु उस से पहले वो अपने आपको आर्थिक रूप से सुदृढ़ करना चाहती हैं ताकि बच्चो पर बोझ न बने . यह सब मुझे अभी पिछले ही हफ्ते दी से बात करने पर पता चला जब उनको अचानक करोल बाग में घुमते देखा .... 50 साल की दी ने 30 साल की शादीशुदा जिन्दगी में न जाने कितने रंग देख लिए थे वक़्त के साथ अपनों का अपनापन भी ....और मुझे ऐसे गले मिली कि जैसे हम बचपन में मिलते थे और वही बहस भी हुआ कि कहाँ थी इतने साल :)) सच में ,दी के हौसले को प्रणाम की ... उन्होंने अपने पति का साथ नही छोडा बच्चो को अच्छे संस्कार भी दिए और अपने को आर्थिक रूप से मजबूत भी बनाया ..... नारीवाद का झंडा उठाकर अपने पति पर आरोप , दी भी लगा सकती थी ,परन्तु उन्होंने उन हिस्सेदारों  को भी माफ़ कर दिया उनके संस्कार ऐसे थे . कहकर ..... कोइ कुछ भी कहे मैं तो यही कहूँगी की यह होती हैं नारी जो सब त्याग भी करती हैं और उनका बखान भी नही करती .